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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

८० २ अ० ३ पा० २ खं० ।
भवति । ‘अधरः,’ ‘अधोरः,’ ‘अधः’ ‘न
धावति’ इति उर्द्धगतिः प्रतिषिद्धा ।
तस्य-उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ २ ॥
अन्वयार्थः-‘आष्टिषेणो देवापिर्ऋषिः होत्रं’ कर्मप्रति
‘निषीदन्’ उपविष्टवान् । ततोऽपि ‘सः’ देव
सुमतिम्’ ‘चिकित्वान्’ जानानः ‘उत्तर-
स्मात्’ अन्तरिक्षात् समुद्रात् ‘अधरं’ पार्थिवं
‘समुद्रं’ प्रति [ एष विभागः समुद्रयोः । ]
‘दिव्याः’ ‘वर्ष्ण्याः’ वर्ष सम्बन्धिनीः ‘अपः’
जलानि ‘असृजत्’ अक्षारयत् — इत्यर्थः ।
ममापि इदानीं तथा एव अस्तु—इति वर्त-
मानेन सम्बन्धः ॥
अनुवाद ।
मन्त्रार्थ-ऋष्टिषेण या इषितषेणका पुत्र ऋषि देवापि होताके कर्ममें
बैठा। उससे भी उसने देवताओंकी कल्याणी मतिको,
जो वर्षाको देनेवाली है, जानते हुएने उत्तर या अन्तरिक्ष
समुद्रसे अधर या पृथिवीके समुद्रके प्रति सुन्दर वृष्टिके
जलोंको गिराया था । इस समय मेरे लिये भी वैसाही हो ।
भाष्यार्थ-‘आष्टिषेण’ ऋष्टिषेणका पुत्र । अथवा इषितषेण, जिसने
सेना भेजी हो, उसका । ‘सेना’ इन अर्थात् ईश्वर या
प्रभुके सहित । अथवा समान या एकसी गतिवाली ।
‘पुत्र’ पुरु=बहुत, त्रा=रक्षा करता है। अथवा ‘प’

हिन्दी निरुक्त । ८१
पालन पूरणयोः [ क्र्या० प० ] धातुसे । अर्थात् पितरोंको
पिण्डदानसे पालन या पूरण करनेवाला। अथवा 'पुम्' नाम
एक नरक है, उससे त्राण करनेवाला । “होत्रम्-ऋषः-निषी-
दन्” यहाँ ऋषि शब्द दर्शन क्रियासे है । [क्योंकि-] 'उसने
स्तोम या मन्त्रोंको देखा है, यह औपमन्यव आचार्य
[ मानता है ] जो वह स्वयम्भू = दूसरेसे न होकर आपसे
हुआ, ब्रह्म = वेद तप करते हुए इन ऋषियोंको प्राप्त हुआ,
यही ऋषियोंका ऋषिपना है, यह [ ब्राह्मणमें—] जाना
गया है। ‘देवापि’ [ क्यों ? ] देवताओंकी प्राप्ति अर्थात्
स्तुति अथवा प्रदानसे । 'देव सुमति' देवताओंको कल्या-
णी = वर्षाके देनेवाली बुद्धिको 'चिकित्त्वान्' चेतनेवाला
वह उत्तर नाम अन्तरिक्ष समुद्रसे अधर नाम पृथिवीके
समुद्रके ऊपर । 'उत्तर'-[ क्यों ?-] बहुत उठा हुआ है।
'अधर' नीचेको न जानेवाला, और न दौड़नेवाला, अर्थात्
ऊपरको, यह उर्द्ध-गतिका निषेध है, उसके बहुत निर्व-
चन या व्याख्याके लिये अगली ऋचा है ॥ २ ॥
व्याख्या ।
जिस देवापिको “आष्टिषेण” यह ऋचा प्रकट हुई, उस देवा-
पिसे मन्त्रस्थ देवापि भिन्न और कल्पान्तरका था । उसी प्रकार
शान्तनु भी दो ही थे । क्योंकि-मन्त्रमें देवापि किसी पूर्वकालके
देवापिके इतिहासको श्रवण या दर्शन कर रहा है । इससे मन्त्रार्थ-
के अन्तमें ‘इस समय मेरे लिये भी ऐसा ही हो' अवर या पीछेका
देवापि जो इस मन्त्रका देखनेवाला है, की—ओरसे जोड लेना
चाहिये । ऐसा करनेसे मन्त्रका वर्त्तमानसे सम्बन्ध हो जाता है ।
ऐसी योजना प्रयोजनानुसार अन्यत्र भी कर लेना चाहिये । क्योंकि-
जो कोई भी मन्त्रका प्रयोग करता है, वह अपने स्वार्थके लिये
११ •

८२ २ अ० ३ पा० २ खं० ।
करता है, और प्रयोग कर्त्ताका स्वार्थ उसके समान कालमें होता
है। तथा मन्त्रकी अर्थवत्ता वर्त्तमान कर्मके स्मरण करानेके द्वारा
ही सार्थक होती है।
'समुद्र' शब्द अन्तरिक्ष और पार्थिवसमुद्र दोनोंके लिये आता
है, यही बात पुष्ट करनेके अर्थ यह ऋचा दी गई है। इसमें कहा
गया है कि– देवापिने ऊपरके समुद्रसे नीचेके समुद्रमें वृष्टि करवाई'
इससे स्पष्ट रूपसे दोनों अर्थोंमें 'समुद्र' शब्दका होना सिद्ध हो
जाता है।
'ऋष्टिषेण'—'ऋष्टि' एक आयुध होता है, जिसके सेनामें ऋष्टि
आयुध बहुत हों, वह ऋष्टिषेण होता है। अथवा 'ऋष्टिषेण' से
इषितसेन लेना। अर्थात्—जो शत्रुओंके प्रति नित्य ही सेना भेजता
है वह 'ऋष्टिषेण' है।
'सेना'—'इन' यह ईश्वरका नाम है, वह नित्य ही नेतासे संयुक्त
रहती है। अथवा समान गति होती है, अर्थात् एक जयरूप अर्थके
उद्देश्यसे सदा जाती है।
'पुत्र' क्यों ?—पिताने चाहे बहुत भी पाप किये हों, तोभी उनसे
उसकी रक्षा कर लेता है।
'ऋषि' शब्द दर्शन क्रियासे सम्बन्ध रखता है। क्योंकि—वह
[ऋषि] सूक्ष्म अर्थोको देख लेता है। उपमन्युका पुत्र मानता है
कि—मन्त्रोंके दर्शन करनेसे 'ऋषि' है। इसी अर्थमें ब्राह्मण भी
साक्ष्य देता है।
इस ऋचाके ऐतिहासिक अर्थको अगली ऋचा बहुत कुछ कहती
है,—जैसे—देवापिने उत्तर समुद्रसे वृष्टिकी देवताओंसे याचना की,
जैसे—उसने पुरोहितता की, और जिस प्रकार शन्तनुको जिस
कर्मसे यज्ञ कराया ॥ २ ॥

हिन्दी निरुक्त। ८३
[ खं० ३ ]
“यद्देवापिः शन्तन्वे पुरोहितो होत्राय वृतः
कृपयन्नदीधेत् । देवश्रुतं वृष्टिवनिं रराणो बृहस्पति-
र्वा च मस्मै अयच्छत् ॥”
[ भा० ] “शन्तनुः” शंतनो रस्त्वति वा । शम्-
अस्मैतन्वस्त्विति वा । “पुरोहितः”
पुरः एनं दधति । “होत्राय वृतः” कृपा-
यमाणः-अन्वध्यायत् । “देवश्रुतं” देवा एनं
शृण्वन्ति । वृष्टि याचितं “रराणः” रातिः-
अभ्यस्तः । “बृहस्पतिः” ब्रह्मा आसीत्,
सः “अस्मै” “वाचम्-अयच्छत्” । ‘बृहत्’-
उपव्याख्यातम् ॥ ३ ॥
इति द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ २, ३ ॥
अन्वयार्थः-“यत्” यदा “देवापिः शन्तजवे” राज्ञे
“होत्राय” वर्षार्थीय कर्मणि होतृकर्मणे
“वृतः” सन् “कृपयन्” राज्ञः शन्तनोः
कृपायमाणः “अदीधेत्” वृष्टिर्भवेत्-इति
अन्वध्यायत्, तदा ‘वृष्टिवनि’ वृष्टियाचिनम्
एनं “देवश्रुतं” देवापि “रराणो” ददत्
“बृहस्पति“ ब्रह्मा आसीत् । ब्रह्मत्वे च

८४ २ अ० २ पा० ३ खं० ।
अवस्थितः सः "अस्मै" "वाचम्"-वर्षसा-
धिकां-"अयच्छत्"-अददत्-इत्यर्थः ।
अनुवादः ।
[ मन्त्रार्थः ] जिस समय देवापि शन्तनु राजाके अर्थ वर्षाके
साधक कर्ममें होताके कर्मके लिये वरण किया गया
और उसने राजा शन्तनु पर कृपा करते हुए, ध्यान
किया कि-इसके राज्यमें वृष्टि हो, तब वृष्टिके याचन
करनेवाले देवापिको देते हुए बृहस्पति ब्रह्मा हुए और
ब्रह्मत्वमें स्थित होकर उसने इस देवापिको वृष्टिके
देनेवाली वाणी दी ।
[ एकपद निरुक्त ] 'शन्तनु'-'शम्' नाम सुखका और 'तनु' नाम
शरीरका है । इन्हीं दो शब्दोंसे 'शन्तनु' शब्द
बना । जिसका अर्थ यह होता है कि-वह
किसीको रोगार्त्त देखकर कहता है कि-तेरे
शरीरका कल्याण हो, तो वह नीरोग हो जाता
है । अथवा इसको शरीरका सुख हो, इस
प्रकार वह इच्छा करता है ।
'पुरोहित' 'पुरः' नाम पहिले 'हित' धारण किया गया, अर्थात्-
राजा लोग शान्ति पौष्टिक और आभिचारिक कर्मोंमें इससे पहिले
धारण करते हैं, या आगे करते हैं।
'देवश्रुत्' 'देवाः एनम्-स्तुतीः-उच्चारयन्तं शृण्वन्ति इति-'देव-
श्रुत्' । अर्थात्-जब वह स्तुतियोंका उच्चारण करता है, तब
देवता उसे सुनते हैं ।
'रराज' 'रा' दाने ( अदा० प० ) धातुका दोहराया हुआ रूप
है। अर्थात् बहुत दान करनेवाला या उदार ।

'बृहन्'–यह शब्द 'बृहस्पति' शब्दके अन्तर्गत् है। 'बृहत्' नाम
'महान्' या 'पूजनीय' का है, इसकी पहिले (१. ३. २) व्याख्या
हो चुकी है। पूजनीयों का जो पति है, वह 'बृहस्पति' कहलाता है ॥३॥
व्याख्या ।
“यद्देवापिः”–इस मन्त्रमें कहे हुए इतिहाससे यह निकलता
है, कि–किसी अवस्था विशेषमें यज्ञकर्ममें ब्रह्मासे अतिरिक्त वर्ण-
का मनुष्य भी यदि–यजमानका सवर्ण सहोदर भ्राता हो, कर
सकता है। किन्तु ब्रह्माकी अनुमति उसे मिले। ब्रह्मा चारों
वेदों व वेदोक्त सकल धर्मका ज्ञाता ब्राह्मण होता है। तथा इसी
कारण उसके कर्त्तव्यमें कर्मका अवेक्षण एवम् उसकी त्रुटियोंके
प्रायश्चित्तका अनुष्ठान है। श्रौत तथा स्मार्त्त कर्मोंमे ब्रह्मा
व्यवस्थापक होता है। अतएव देवापिको अपने भाईके कष्ट पर
करुणा आई [“कृपयन्न दीधेत्”] और उसने उसके कल्याणके
अर्थ उसके होतृ-कर्ममें संयुक्त होना चाहा, (होत्रायवृतः) किन्तु
वह क्षत्रिय था, उसे आर्त्विज्यका अधिकार नहीं था। क्योंकि–
आर्त्विज्य ब्राह्मणोंका ही होता है, यह जैमिनीय पूर्व मीमांसामे'
निर्णीत है। इससे शन्तनु राजाके वृष्टि साधन यज्ञमे' बृहस्पति
ब्रह्माने देवापिको आज्ञा दी। “बृहस्पतिर्वाचमस्मा अयच्छत्॥
यद्यपि–इसी प्रकरणमें पहिले भगवद्दुर्गाचार्यने कहा है कि–
“देवापि विश्वामित्रके समान तीव्र तपसे ब्राह्मण हो गया था”
तथापि मन्त्र और यास्क मुनिके अक्षरोंसे यह बात नहीं कही गई
है, इससे नितराम् मान्य नहीं हो सकती। हाँ, मेरा यह अभि-
प्राय नहीं, कि–ऐसा हो ही नहीं सकता, बल्कि-जाति ब्राह्मण नहीं,
तो कर्म. ब्राह्मण हो सकता है। आपत्-कालमें अन्य, वर्णके मनुष्य
अन्य-वर्णकी वृत्तियोंको करने लगते है। और वे। वृत्तिके अनुसार
वर्णान्तरके नामकी गौण प्रथासे व्यवहृत होने लगते है, तथा उनके

८६ २ अ० ३ पा० ३ ख० ।
जाति व्यवहार जन्म-सम्बन्धी पूर्व-वर्णमें ही होते हैं, और होने
चाहिये । ऐसी कई जाति इस समयमें भी हैं जो सुवर्णकार आदि
जातिका कार्य करते हैं, तथा उनकी जातिका प्रसिद्ध नाम भी
'सुवर्णकार' आदि हो गया है, किन्तु उनके धार्मिक व सामाजिक
व्यवहार क्षत्रिय आदि पूर्व जातिके अनुसार होते हैं । अतः जन्मसे
जो प्राचीन पृथक् जाति या वर्ण हैं, उनमें कुछ लोग कर्मको प्रयो-
जकता लेकर गोलमाल करते हैं, यह शास्त्रीय मर्यादा नहीं है, और
न अच्छी ही है, क्योंकि-जाति स्थायि वस्तु है, उसका निमित्त भी
वैसा ही चाहिये, किन्तु कर्म कोई स्थायि वस्तु नहीं है ॥ ३ ॥
इति हिन्दी निरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥३॥

हिन्दी निरुक्त । ८७
चतुर्थः पादः ।
( खण्ड १ )
( निघ० ) स्वः ( १ ) । पृश्निः ( २ ) । नाकः (३) ।
गौः ( ४ ) । विष्टप् ( ५ ) । नभः ( ६ ) ।
इति षट् साधारणानि ॥ ४ ॥
( निरु० ) साधारणानि-उत्तराणि षड्, दिवश्च आ-
दित्यस्य च । यानि तु-अस्य प्राधान्येन-
उपरिष्टात्-तानि व्याख्यास्यामः । आदित्यः
कस्मात् ? आदत्ते रसान् । आदत्ते भासं
ज्योतिषाम् । आदोप्तो भासा-इति वा ।
अदितेः पुत्रः-इति वा । अल्पप्रयोगं तु-
अस्य-एतत्-ऋर्चाभ्नाये । सूक्तभाक् ।
“सूर्य॑ मा॑दि॒तेयम्” [ऋ० सं० ८, ४, १२, १]
एवमन्यासामपि देवतानाम्-आदित्यप्रवादाः स्तु-
तयो भवन्ति । तद् यथायतद्-मित्रस्य, वरुणस्य,
अर्यम्णः, दक्षस्य, भगस्य, अंशस्य-इति ।
अथापि मित्रावरुणयो—
“आदित्यः दानु॑नस्पती”[ऋ०सं०२, ८, ८, १]दानपती ।
अथापि मित्रस्य-एकस्य—

४८ २ अ० ४ पा० १ खं० ।
“प्रसमित्म॒र्त्तो अ॑स्तु॒ प्रय॑स्वान्यस्त॑ आदित्य॒ शिक्ष॑ति
व्र॒तेन॑”-इत्यपि निगमो भवति [ऋ० सं० ३, ४, ५, २]
अथापि वरुणस्य-एकस्य —
“अथा वय मादित्य व्रते तव” [ऋ० सं० १, २, १५, ५]
‘व्रतम्’-इति कर्मनाम, ‘वृणोति’-इति सतः।
इदमपि इतरत्-व्रतम्-एतस्मादेव, निवृत्तिकर्म, ‘वार-
यति’-इति सतः। ‘अन्नम्’-अपि व्रतम्-उच्यते, यद्
आवृणोति शरीरम् ॥ १ ॥
अर्थ ।
अन्तरिक्ष-नामोंके आगे दिव् और आदित्यके साधारण या
साझेके छः (६) नाम हैं। किन्तु इस आदित्यके जो नाम प्रधान
स्तुतिके भागी हैं, उनकी व्याख्या ऊपर या दैवतकाण्ड या सत्तर-
हवें अध्याय (दै० का० ६, २, १—३, ६) में करेंगे। ‘आदित्य
किस हेतुसे है?। रसोंका आदान या ग्रहण करता है। ज्योतियों
या ग्रह-नक्षत्रोंकी दीप्तिको ले लेता है। अथवा भास् या प्रकाशसे
आवरण किया हुआ है। अथवा अदितिका पुत्र है। इस अर्थका
‘आदित्य’ शब्द ऋग्वेदमें बहुत कम आता है। अदितिकी पुत्रताका
बोधक ‘आदित्य’नाम प्रायः करके सूक्तमें देवताकी स्तुतिके लिये ही
आता है, कदाचित् हविके विधायक वाक्यमें भी। [उदाहरण] “यद्दे-
वेनमदधुर्यज्ञियासो दिवि देवाः सूर्यमादितेयम्” अर्थात्-‘जब ही
यज्ञके योग्य देवताओंने इस आंग्र और अदितिके पुत्र सूर्यको द्युलो-
कमें स्थापन किया।’ [ऐसे ही] अन्य देवताओंकी भी ‘आदित्य’
विशेषणसे स्तुति होती हैं। सो जैसे-यह-मित्रकी, वरुणकी,
अर्य्यमाकी, दक्षकी, भगकी, अंशकी,। और भी मित्र और वरुण

हिन्दी निरुक्त । ८६
दोनों मिलित देवताओंकी-[ उदाहरण ] आदित्या दानुनस्पती" ।
अर्थात् अदितिके पुत्र और दानके पति [ मित्रावरुण है । ] दानके
पति । और भी अकेले मित्रकी स्तुतिमें “प्रसमित्र०” । अर्थात्
‘हे मित्र ! अदितिके पुत्र ! वह मनुष्य अन्नवान् हो, जो तेरे लिये
निर्वपण आदि कर्मसे संस्कार करके इस चरु-रूप हविः को देता है’
यह निगम होता है। और भी अकेले वरुणको ‘आदित्य’ नामसे
स्तुतिमें—“अथाव ” । ‘हे अदितिके पुत्र ! हम तेरे व्रतमें
आदर-युक्त हों।’ [ यह निगम है ।] ‘व्रत’ यह कर्मका नाम है।
[ क्योकि- ] वह कर्त्ताको आवरण कर लेता है। कर्त्तृवाच्य ‘वृञ्’
( स्वा० उ० ) धातुसे । यह भी दूसरा ‘व्रत’ शब्द जो यम, नियम
आदिका वाचक है इसी धातुसे होता है। यहाँ निवृत्ति , अर्थ है।
कर्त्तृवाच्य णिजन्त ‘वारयति’ इस क्रियारूपसे है। अन्न भी व्रत
कहाता है। जो शरीरको आवरण या व्यापन कर लेता है ॥ १ ॥
व्याख्या ।
द्युलोक भी अन्तरिक्षका ही एक उच्चतम भाग है, एवम् उसीमें
आदित्यमण्डल घूमता है, इससे अन्तरिक्षनामोंके अनन्तर इन
दोनोंके साधारण नाम कहे गये हैं। यद्यपि देवताओंके नामोंकी
व्याख्याके लिये दैवतकाण्ड स्वतन्त्र स्थान है, अतः आदित्यके नाम
होनेसे ये उसी काण्डमें चाहिये, तथापि द्युलोकके सम्बन्धसे ये
नाम यहाँ नैघण्टुक काण्डमें संग्रह किये गये हैं। इसीसे जिन
आदित्यके नामोंसे मन्त्रोंमें आदित्यकी मुख्यतासे स्तुति आती है,
उन ‘सविता’, भग’ आदि नामोंकी व्याख्या दैवतकाण्डमें
ही होगी ।
व्याख्येय ‘खः’ आदि छः नामोंमें भाष्यकारको कुछ अल्प
वक्तव्य है, किन्तु इनके व्याख्याभूत ‘आदित्य’ शब्दमे अनेक विशेष

६० २ अ० ४ पा० १ खं० ।
हैं, उन्हींके उद्घाटन करनेके लिये कौतुकवश पहिले ही यह प्रश्न
उठाते हैं—'आदित्यः कस्मात्' ? यहाँ पर 'आदित्य' शब्दके चार
अर्थ दिखाये हैं, जिनमें प्रथम तीन अर्थ-रसोंका आदान, ज्योतियों-
की दीप्तिका आदान और प्रकाशसे व्याप्त होना, आदित्य मात्रमें
घटते हैं, और चतुर्थ अर्थ 'अदितिका पुत्रभाव' सूर्य तथा अन्य मित्र
आदि सब देवताओंमें साधारण है, इससे उस अर्थको लेकर यह
'आदित्य' शब्द और देवताओंके लिये भी विशेषणरूपसे आता है।
भगवद्दुर्गाचार्यने “अल्पप्रयोगं तु अस्यैतद् आर्चाम्याम्नाये”
यह पंक्ति 'आदितेय' नामके अभिप्रायसे और 'सूक्तभाक्, सूर्यमादि-
तेयम्'-यह पङ्क्ति 'आदितेय' नामके अभिप्रायसे लगाई है, किन्तु
हमारे विचारमें “आदित्यः कस्मात्” से “अथाप्ययमादित्य व्रते तव”
तक आदित्य शब्दका ही सम्बन्ध है। आपको प्रकरण भेद करनेका
मुख्य कारण “सूर्यमादितेयम्” यह उदाहरण है, इसीके कारण
आपने 'सूक्तभाक्' इस वाक्यके लिये 'आदितेयः इति' का अध्या-
हार किया। किन्तु वास्तवमें यह ठीक नहीं प्रतीत होता। वस्तुतः
'सूर्यमादितेयम्' यह सूर्यमें आदित्य प्रवाद स्तुतिका उदाहरण ही
है। इसीसे 'अन्यसामपि देवता नामादित्यप्रवादाः स्तुतयो
भवन्ति'—इस अग्रिम पङ्क्तिमें अपि शब्द दिया है। जिसका अभि-
प्राय यह है कि जिस प्रकार 'सूर्यमादितेयम्' इस उक्त उदाहरणमें
सूर्यकी आदित्यप्रवाद स्तुति है, उसी प्रकार और देवताओंकी भी
हैं। यास्कके अभिप्रायमें 'आदित्य' और 'आदितेय' दोनों
समानार्थ हैं।
इसके अतिरिक्त यह भी है कि 'आदित्य' शब्दके प्रथम तीन
निर्वचन प्रत्यक्ष सिद्ध हैं, किन्तु चतुर्थ निर्वचन ही प्रमाणापेक्ष है,
इससे यह उदाहरण दिया है, जिससे सूर्यको अदितिपुत्रता स्पष्ट
उक्त होती है।

६२ २ अ० ४ पा० २ ख०।
आदित्यप्रवादाः। आदित्येन आदित्य-इति नाम्ना प्रवादः
प्रकर्षेण वादः स्तवनं यासु, ताः आदित्यप्रवादाः। जिन स्तुतियोंमे
आदित्य नामसे विशेष कर स्तुति या कथन हो वे स्तुतियें आदित्य-
प्रवाद होती हैं ॥ १ ॥
(खण्ड २)
(निरु०) 'स्वः'—आदित्यो भवति । सु-अरणः,
सु-ईरणः। स्वृतो रसान् । स्वृतो भासं ज्योति-
षाम्। स्वृतो भाषा-इति वा। एतेन द्यौ
व्याख्याता । 'पृश्निः' आदित्यो भवति । प्राश्नुते-
एनं वर्णः-इति नैरुक्ताः । संस्पृष्टा रसान् ।
संस्पृष्टा भासं ज्योतिषाम् । संस्पृष्टो भासा-इति
वा । अथ द्यौः-संस्पृष्टा ज्योतिर्भिः पुण्यकृद्भिञ्च ।
'नाकः' आदित्यो भवति । नेता भासाम् । ज्योतिषां
प्रणयः। अथ द्यौः-'कम्'-इति सुखनाम, तत्
प्रतिषिद्धं प्रतिषिध्येत ।
“न वा अमुं लोकं जग्मुषे किञ्च नाकम्” ।
न वा अमुं लोकं जग्मुषे किञ्चन-असुखम्,
पुण्यकृतो हि-एव तत्र गच्छन्ति। 'गौः' आदित्यो
भवति । गमयति रसान् । गच्छति-अन्तरिक्षे ।
अथ “द्यौ”-यत्-पृथिव्या अधि दूरं गता भवति ।
यच्च-अस्यां ज्योतींषि गच्छन्ति । 'विष्टप्' आदित्यो

हिन्दी निरुक्त । ६३
भवति । आविष्टो रसान् । आविष्टो भासं
ज्योतिशाम् । आविष्टो भासा-इति वा । अथ
द्यौः-आविष्टा ज्योतिर्भिः पुण्यकृद्भिञ्च । 'नभः'
आदित्यो भवति । नेता भासाम् । ज्योतिषां
प्रणयः । अपि वा भन एव स्याद्विपरीतः । न'न
भाति-इति वा । एतेन द्यौ व्याख्याता ॥ २ ॥
इति द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ २, ४ ॥
अर्थ ।
[ दोनों पक्षोंमें छहों शब्दोंका निर्वचन । ]
(आदित्य पक्षमें-) 'खर्' (१) आदित्य होता है । (क्योंकि-)
सुन्दर गमन करता है । ( ऋ' गतौ (जु० प०) धातुसे । ) सुन्दर
प्रेरण करनेवाला है । [ अर्थात् उसके उदय होते ही सब लोक
अपने कर्ममें लगजाता है । ] [ 'ईर्'गतौ (अदा० आ०) धातुसे । ]
सुन्दर रसोंके प्रति गया हुआ । [ सूर्यकी किरणें पृथ्वी पर सब
जलको खे'चनेके लिये आती हैं । ] सब ज्योतियोंके प्रकाशके प्रति
गया हुआ । [ क्योंकि सूर्यकी ज्योतिसे ही चन्द्र आदि ज्योति
चमकते हैं । ] अथवा भास् या प्रकाशसे घिरा हुआ । [ द्युलोक-
पक्षमें । ] इससे द्यौ भी व्याख्याकी गई । [ आदित्यवाली बातें
आदित्य-लोकमे भी हैं, इससे वे ही अर्थ इस पक्षमें ले लेने
चाहियें । ] आदित्य पक्षमें-] 'पृश्नि' ( २ ) आदित्य है।
[ क्योंकि-] नैरूक्त कहते हैं कि—'इसे वर्ण बाहुल्यसे व्याप्त करता
है। रसोंको अच्छे प्रकार स्पर्श करता है। ज्योतियोकी भास्
को अच्छे प्रकार स्पर्श करने या छूनेवाला । अथवा भास् या

दीप्तिसे छूया हुआ। [द्युलोक पक्षमें-] और द्यौ (द्युलोक)
ज्योतियों या ग्रह-ताराओसे और पुण्यवान् पुरुषोंसे छूई हुई।
[आदित्य पक्षमें-] 'नाक' (३) आदित्य है। [क्योंकि-] वह
भासों या प्रकाशो का नेता है। और ज्योतिश्चक्र या ग्रहमण्डलका
घुमानेवाला। [इन्ही भगवान् सूर्यदेवके रश्मिजालके अग्रोंमें लगा
हुआ ज्योतिश्चक्र घुमता है।] [द्युलोक पक्षमे-] और 'द्यौः'
[नाक क्यो है?] 'क' यह सुखका नाम है। उसका प्रतिषेध
करके प्रतिषेध किया जावेगा। [अर्थात् जो 'क' सुख नहीं है,
वह 'अक' दुःख होता है, और 'अक' या दुःख जिसमें न हो, वह
नाक होता है। द्युलोकमें दुःख न होनेसे वह 'नाक' है। 'न,
अ, क'—इन तीन शब्दोके जुडनेसे 'नाक' शब्द होता है।] [इस
अर्थमें ब्राह्मण प्रमाण है-] “न वा ० ०”। उस लोकमें गये हुए
को कोई असुख या दुःख नहीं होता। क्योकि वहाँ पुण्यकर्मके
करनेवाले ही जाते हैं। [आदित्य पक्षमें-] 'गो' (४) आदित्य
होता है। [क्यों?-] रसोको अपनी ओर ले जाता है, या उन्हें
पृथवीसे सुखा देता है। [अथवा-] अन्तरिक्षमें चलता है। और
द्यौ [क्यों 'गो' है?] जिससे कि—वह पृथवीके ऊपर दूर गई हुई
होती है। और जिससे कि—इसमें ज्योतिष्गण गमन करते हैं।
[आदित्य पक्षमें-] विष्टप्' (५) आदित्य होता है। [क्योकि-]
यह सम्मुख भावसे पृथिवी और अन्तरिक्षके रसोको अपनी
किरणोंसे लेनेको उनके प्रति लगा हुआ होता है। और ज्योतिषों
या ग्रहोकी भासाके प्रति आविष्ट अर्थात् प्रवेश किये हुए रहता है।
अथवा भास् या दीप्तिसे प्रविष्ट होता है। [द्युलोक पक्षमें-]
और द्यौः [क्यों 'विष्टप्' है?] वह ज्योतियों और पुण्यवानोंसे
प्रवेशकी हुई होती है। [आदित्य पक्षमें-] नभस्' (६) आदित्य
होता है। [क्योंकि-] भासःओंका नेता होता है। और ज्योतियों-

हिन्दी निरुक्त । ६५
का प्रणयण या घुमानेवाला है। अथवा 'भन्' शब्द ही उलटा
हो। अर्थात् भासन होता हुआ ही विपरीत होकर नभ' होगया ।
अथवा 'नहीं प्रकाश होता हुआ नहीं, अर्थात् अवश्य प्रकाश होने-
वाला। [द्युलोक पक्षमें-] इससे द्यौ का भी व्याख्यान हो चुका ।
[अर्थात् ये ही प्रकार उसमें भी जानने जो आदित्य पक्षमें
हैं।] ॥२॥
इति हिन्दीनिरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थ पादः
समाप्तः ।

६६ २ अ० ५ पा० १ खं० ।
पञ्चमः पादः ।
[ निघ० ] खदयः (१) । किरणाः (२) ।
गावः (३) । रश्मयः (४) । अभीशवः (५) । दी-
धितयः (६) । गभस्तयः (७) । वनम् (८) ।
उस्राः (६) । वसवः (१०) । मरीचिपाः (११) ।
मयूखाः (१२) । सप्त ऋषयः (१३) । साध्याः
(१४) । सुपर्णाः (१५) । इति पञ्चदश रश्मि-
नामानि ॥ ५ ॥
[ निघ० ] आताः (१) । ओशाः (२) । उपराः
(३) । आष्ठाः (४) । काष्ठाः (५) । व्योम (६) ।
ककुभः (७) । हरितः (८) । इति अष्टौ दिङ्
नामानि ॥ ६ ॥
( खण्ड १ )
[ निरु० ] रश्मिनामानि-उत्तराणि पञ्चदश । 'रश्मिः
यमनात् । तेषाम्-आदितः साधारणानि
पञ्च अश्वरश्मिभः । दिङ् नामानि उत्त-
राणि-अष्टौ । 'दिशः' कस्मात् ? दिशतेः ।
आसदनात् । अपि वा अभ्यशनात् । तत्र
'काष्ठा' इत्येतद् अनेकस्यापि सत्वस्य
भवति । काष्ठा दिशो भवन्ति । क्रान्त्वा

हिन्दी निरुक्त । ६३
स्थिता भवन्ति । काष्ठा उपदिशो भवन्ति ।
इतरेतरं क्रान्त्वा स्थिता भवन्ति ।
आदित्योऽपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा
स्थितो भवति । आज्यन्तः-अपि काष्ठा
उच्यते । क्रान्त्वा स्थितो भवति । आपः-
अपि काष्ठा उच्यते । क्रान्त्वा स्थिता
भवन्ति-इति स्थावराणाम् ॥ १ ॥
अर्थ ।
दिव् व आदित्यके नामोंके अनन्तर पन्द्रह ( ५ ) रश्मि (किरण
या लगाम) के नाम हैं । 'रश्मि' क्यों ? जलो या अश्वोंके यमन
(थाँम्हने) से । उनमें प्रथम पाँच नाम घोडोंकी रश्मियोंके साथ
साझेके नाम हैं ।
रश्मि नामोंके पश्चात् आठ (८) दिशाके नाम हैं । 'दिश्'
किस निर्वचनसे ? दिश् अतिसर्जन या दान अर्थ मे (तु० प०)
धातुसे । क्योंकि-'अति सृज्यन्ते आसु हविरादीनि देवतानाम्'
इनमे देवताओके लिये हविः आदि दी या रखी जाती हैं । ] आसा-
दन अर्थात् प्रत्येक वस्तुके आसन्न या समीप रहनेसे । अथवा
प्रत्येक वस्तुको अभ्यशन या अपने अन्तर्गत कर लेती हैं, इससे ।
उनमें 'काष्ठा' यह नाम उनके द्वय्योका होता है । 'काष्ठा' दिशा
होती है । क्योंकि वे प्रत्येक वस्तुके प्रति जाकर स्थित होती है ।
'काष्ठा' उपदिशा या कोण-दिशा होती हैं । क्योंकि-वे भी
परस्परको दबा कर दिशाओंके साथ स्थित होती है । आदित्य भी
'काष्ठा' कहा जाता है । क्योकि-वह भी अपने स्थानको दबा कर
१३

६८ २ अ० ५ पा० २ खं० ।
स्थित होता है । रण या संग्रामका देश भी-'काष्ठा' कहलाता है ।
क्योंकि-वह भी अपने स्थानको दबा कर स्थित होता है। जल
भी 'काष्ठा' कहलाते है । [ जल दो प्रकारके होते हैं, स्थावर और
जङ्गम उनमें ] ये जलाशयमें जाकर स्थित हो जाते हैं, यह स्था-
वरोंका निर्वचन है । [ अस्थावर या चलते हुए जलोंके अभिप्रायसे-
'क्रामन्ते च एताः, न क्वचित् तिष्ठन्ति, इति काष्ठाः मेध्याः आपः'
अर्थात् ये चलते ही रहते हैं, किन्तु कहीं भी ठहरते नहीं, इससे
'काष्ठाः' मेध्य या पवित्र जल हैं। यह निर्वचन है । ] ॥ १ ॥
(खण्ड २)
(निरु०) "अतिष्ठन्ती नाम निवेशनानां का-
ष्ठानां मध्ये निहितं शरीरम् । वृत्रस्य निण्यं वि-
चरन्त्यापो दीर्घं तम आशयदिरुद्रशत्रुः ॥”
“अतिष्ठन्तीनाम्”-अनिवेशमानानाम्-इति ।
अस्थावराणां “काष्ठानां मध्ये निहितं शरीरं”
मेघः । 'शरीरं' शृणातेः । शम्नातेर्वा । “वृत्रस्य
निण्यं” निर्णामं “विचरन्ति” विजानन्ति-“आपः”
इति । “दीर्घं” द्राघतेः । “तमः” तनोतेः ।
“आशयत्” आशेतेः । “इन्द्रशत्रुः” इन्द्रः-अस्य
शमयिता वा । घातयिता वा, तस्मादिन्द्रशत्रुः ।
तत्को वृत्रः ? मेघः इति नैरुक्ताः । त्वाष्ट्रः-असुरः-
इति ऐतिहासिकाः । अपां च ज्योतिषश्च मिश्री-
भावकर्मणो वर्षकर्म जायते । तत्रउपमार्थेन युद्धवर्णाः

हिन्दी निरुक्त। ६६
भवन्ति । अहिवत् तु खलु मन्त्रवर्णाः ब्राह्मण-
वादाश्च । विवृद्ध्या शरीरस्य स्रोतांसि निवारया-
ञ्चकार, तस्मिन् हते प्रसस्यन्दिरे आपः । तदभिवा-
दिनी-एषा-ऋग् भवति ॥ २ ॥
अर्थ ।
[ जङ्गम काष्ठा या जलोंके वर्णनमें मन्त्र— ]
“हिरण्यस्तूपस्य इयमर्षम्, दासपत्नीरिति च ।
त्रिष्टुभावेते । 'अग्निष्टोमे निष्केवल्यं नाम शस्त्रम्
तत्र निविद्धानीयमेतत् सूक्तम्, तत्र द्वे अपि शस्येते ।”
'अतिष्ठन्ती' मेघके चलते हुए बराबर चलती हुईं 'अनिबेशना'
जलाशयकी प्राप्तिसे पहिले कहीं कही रुकनेवाली 'मध्ये' मेघके
उदरमें स्थित हुई हुईं काष्ठाआं (जलों) के बाहरसे विधाताने
मेघरूप शरीर जो उनको आवरण किये हुए और उन्हींकी रक्षाके
लिये है, लगा दिया है। अप् या जल वृत्र (मेघ) के 'निण्य'
नीचे स्थानको जिससे वह गमन करता है, जानते हुएके समान
नीचेकी ओर जाते हैं, और इन्द्र शत्रु (वृत्र या मेघ) उसके
रोकनेवालेके समान दूर तक उसके आगे बढ़ता है, और अन्धकार-
को फैला कर स्थित होता है ।
इस मन्त्रमें वर्षाकालीन मेघका स्वभाव और रूप वर्णन किया
है। वर्षाऊ बादलकी काली काली घटाएं नीचेको पृथ्वीकी ओर
लटक आती हैं और दूरतक फैल जाती हैं। बादलके भीतरका
पानी भारीपनसे नीचेको आता है और उसीके साथ उसका धूम-
आदि-मय शरीर भी उसके आगे तक फैल जाता है। मानो एककी
स्पर्धासे एक आगे बढ़ता है, यही दृश्य इस मन्त्रके द्वारा देख रहा है।

३०० २ अ० ५ पा० २ ख० ।
[ निरुक्तार्थ ] नहीं ठहरने वालियोंके, नहीं निवेश ( प्रवेश )
करनेवालियोंके, यह स्थावर (चल) जलोंका (वर्णन है।)
काष्ठाओंके बीचमें (रहते हुए) (विधाताने बाहरसे) शरीर रख
दिया। शरीर नाम मेघ। "शरीर" शब्द ‘शॄ’ हिंसायाम्-
(क्रयादि० प०) धातुसे होता है। [क्योंकि वह इन्द्रदेवसे विदा-
रण किया जाता है।] अथवा हिंसार्थक 'शम्' (क्रया० प०)
धातुसे है। 'वृत्र' के 'निण्य' निर्णाम नीचेको झुके हुए स्थानको
'विचरन्ति' विशेषरूपसे जाती हैं। "आपः" जल। "दीर्घ" शब्द
'द्राघ्' वृद्धयर्थक (भ्वा० आ०) धातुसे होता है। [क्योंकि वह
बढ़ा हुआ होता है।] "तमस्" शब्द विस्तार अर्थमें 'तनु' (त० उ०)
धातुसे है। [क्योंकि वह विस्तृत होता है।] "आशयत्" पद
'आङ्' (३ प०) और 'शीङ्' स्वप्ने (अदा० आ०) धातुसे है।
"इन्द्रशत्रु" [क्यों ?] इन्द्र इसका शमन करनेवाला है। अथवा
शातन या छेदन करनेवाला है। इससे वह 'इन्द्रशत्रु' है। सो
कौन "वृत्र" है ? 'मेघ' यह निरुक्तके आचार्य कहते हैं। 'त्वष्टाका
पुत्र असुर है' यह इतिहासके जाननेवाले कहते हैं। जलोंके और
ज्योति या बिजलीके मेलसे वृष्टि होती है। तहाँ मन्त्रोंमें उपमा
रूपसे इन्द्र और वृत्रासुरके युद्धका वर्णन है। अहिके समान और
वृत्रके समान मन्त्रोंके वर्ण और ब्राह्मण ग्रन्थोंके वाद हैं। [वृत्रने]
शरीरको वृद्धिसे स्रोतों या जलके प्रवाहोंको रोका, इन्द्रके द्वारा
उसके विदीर्ण होते ही जल झरे (बरसे) उसको कहनेवाली यह
ऋचा है ॥ २ ॥
व्यवस्था ।
मन्त्रोंमें देवताओं और असुरोंके संग्रामका वर्णन बाहुल्यसे
आता है, किन्तु उसमें सन्देह होता है, क्या यह वास्तव है
या रूपक ?