निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 251, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ २ अ० २ पा० ३ खं० ।
अवस्थितः सः "अस्मै" "वाचम्"-वर्षसा-
धिकां-"अयच्छत्"-अददत्-इत्यर्थः ।
अनुवादः ।
[ मन्त्रार्थः ] जिस समय देवापि शन्तनु राजाके अर्थ वर्षाके
साधक कर्ममें होताके कर्मके लिये वरण किया गया
और उसने राजा शन्तनु पर कृपा करते हुए, ध्यान
किया कि-इसके राज्यमें वृष्टि हो, तब वृष्टिके याचन
करनेवाले देवापिको देते हुए बृहस्पति ब्रह्मा हुए और
ब्रह्मत्वमें स्थित होकर उसने इस देवापिको वृष्टिके
देनेवाली वाणी दी ।
[ एकपद निरुक्त ] 'शन्तनु'-'शम्' नाम सुखका और 'तनु' नाम
शरीरका है । इन्हीं दो शब्दोंसे 'शन्तनु' शब्द
बना । जिसका अर्थ यह होता है कि-वह
किसीको रोगार्त्त देखकर कहता है कि-तेरे
शरीरका कल्याण हो, तो वह नीरोग हो जाता
है । अथवा इसको शरीरका सुख हो, इस
प्रकार वह इच्छा करता है ।
'पुरोहित' 'पुरः' नाम पहिले 'हित' धारण किया गया, अर्थात्-
राजा लोग शान्ति पौष्टिक और आभिचारिक कर्मोंमें इससे पहिले
धारण करते हैं, या आगे करते हैं।
'देवश्रुत्' 'देवाः एनम्-स्तुतीः-उच्चारयन्तं शृण्वन्ति इति-'देव-
श्रुत्' । अर्थात्-जब वह स्तुतियोंका उच्चारण करता है, तब
देवता उसे सुनते हैं ।
'रराज' 'रा' दाने ( अदा० प० ) धातुका दोहराया हुआ रूप
है। अर्थात् बहुत दान करनेवाला या उदार ।