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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1238, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1238

हिन्दी निरुक्त ( ४७६ ) १२ अ० १ पा० ६ खं०
भी है कि-‘अस्मद्’ हम से ‘अन्यः’ दूसरा कोई पुरुष ‘यजते’
इन अश्विनों को यजन करता है या करे, ‘विचावः’ (वि च
अवः) (व्यावयति च) और हविष्यों से तर्पण करता है,
या करे, तो “पूर्वंः पूर्वः यजमानः वनीयान्” (वनयि-
तृतमः) पहिला पहिला यजमान सेवन करने योग्य होता है
या मान्य होता है—क्योंकि—हम पहिले यजन करते हैं, इस
से देवता के निकट उनके प्रसाद के पात्र हमीं बनेंगे ॥
“तयोः०” उन अश्विन देवों का सूर्योदय पर्यन्त काल
है। [ उस से क्या है ? ] उस स्तुति कालमे अश्विनोंके शस्त्र
में और देवता आवाप किये जाते हैं—अन्य देवताओं को
उस काल की स्तुति प्राप्त हो, इस लिये वे वहां भरे जाते
( घाले जाते ) हैं = उनके मन्त्र पढ़े जाते हैं।
‘उषाः’ [२] कैसे ? कान्ति अर्थ में ‘वश’ [ अदा० प० ]
धातु से है। जोकि-कहा है—(१, ६, १) ‘उच्छति’ (उच्छ
भ्वा० प०) कत्र्तृवाच्य धातु का है, वह विकल्प से द्युस्थान
उषा का नाम है। और जो दूसरी ‘उषाः’ मध्यम लोक की
है, उसके लिये विकल्प नहीं है, किन्तु वह ‘उच्छ’ (भ्वा०प०)
धातु से ही है।
“तस्याः०” उस (मध्यम लोक की उषा) की यह ऋचा
है— ॥ ५ ॥
[ खं० ६ ]
निरु०-“उषस्तच्चित्रमाभरास्मभ्यं वाजिनीवती।
येन तोकं च तनयं च धामहे ॥” ( ऋ० सं० १,
६, २६, ३ ) ॥

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