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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1230, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1230

हिन्दी निरुक्त ( ४१८ ) १२ अ० १ पा०, १ खं०

अर्थः-मध्यस्थान के देवताओं का विशेष वचनों और लिङ्गों
के द्वारा व्याख्यान हो चुका, अब उसी समाम्नाय के अनुक्रम
के अनुसार द्युस्थान [उत्तम स्थान] के देवताओं का व्याख्यान
करना चाहिये, इस लिये विशेष रूप से पुनः अधिकार वचन
कहते हैं-,
“अथातो द्युस्थाना देवताः”
अब यहां से द्युस्थान के देवताओं का व्याख्यान किया
जावेगा । उनमें 'अश्विन्' प्रथमागामी (पहिले आने योग्य) हैं।
'अश्विनौ' [१] [अश्विन्] क्यों हैं? 'यद् व्यश्नुवातेसर्वम्'
जिससे कि- वे सब को व्यापन करते हैं, उनमें एक रस
(जल) से, और दूसरा (एक) ज्योति या प्रकाश से ।
अश्वों (घोड़ों) से वे 'अश्विन्' हैं- वे घोड़े वाले होने से
'अश्विन्' हैं । यह और्णवाभ आचार्य मानता है । (यह व्या-
ख्यान ऐतिहासिक पक्ष में घटता है ।)
“तत्०” सो कौन अश्विन् हैं ?
'द्यावापृथिवी हैं- द्युलोक और पृथिवी लोक हैं'
ऐसा कोई मानते हैं ।
'अहोरात्र हैं- दिन और रात्रि हैं' ऐसा कोई आचार्य
मानते हैं ।'
'सूर्य चन्द्रमा हैं -ऐसा कोई आचार्य मानते हैं ।'
'पुण्य कर्म के करने वाले राजा हैं- ऐसा ऐतिहासिक
मानते हैं।'
“तयोः०” उन (अश्विनों)का काल अर्द्धरात्र(आधीरात)
से पीछे है, ज्योति से फाड़ा जाता हुआ अंधेरा- जिस समय