निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४७७ ) १२ अ० १ पा० ७ खं०
उषः ! तत् चित्रं चायनीयं महनीयं धनम् आहर
अस्मभ्यम् अन्नवति !, येन पुत्रांश्च पौत्रांश्च
दधीमहि ॥
तस्या एषा अपरा भवति ॥ ६ ॥
अर्थ :- "उषस्तच्चित्रमाभरा" इस ऋचा का गोतम
ऋषि, और प्रातरनुवाक तथा आश्विन [ शस्त्र ] में विनि-
योग है ।
'उषः!' हे उषः ! 'अस्मभ्यम्' हमारे लिये 'तत्' सो 'चि-
त्रम्' ( चायनीयम् ) चाहने योग्य ( महनीयम् ) मंहणा या
पूजनीय (धनम्) धन 'आहर' ला, 'वाजिनीवति ! ' ( अन्न-
वति ! ) हे अन्नवाली ! अन्नपूर्णे ! 'येन' जिस धनसे 'तोकम्'
'च' ( पुत्रांश्च ) पुत्रों को 'तनयं च' ( पौत्रांश्च ) और पोतों
को 'धामहे' ( दधीमहि ) पालें ॥
"तस्याः०" उस उषा की यह और ऋचा है । सो क्यों ?
पूर्व ऋचा में "चित्रं धनमाहर" 'सुन्दर धन को ला' यह
कहा है, वह उत्तम और मध्यम दोनों उषाओंके लिये समान
है, किन्तु अगली ऋचामें उत्तम उषाका विशेष लिङ्ग है- ,
"पूर्वे अर्द्धे रजसो भानुमञ्जते ।" इससे यह अगली
ऋचा उदाहरण में दीजाती है ॥६॥
(खं० ७)
निरु०- " एताउ त्या उषसः केतुमक्रत पूर्वे
अर्द्धे रजसो भानु मञ्जते ॥ निष्कृण्वाना आयु-