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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1234

हिन्दी निरुक्त ( ४७२ ) १२ अ० १ पा०, ३ खं० ॥
“तयोः०” उन दोनों समान काल वालों समान कर्म
वालों प्रायः एक साथ स्तुति वाले अश्विनों की पृथक् स्तुति
की यह आधी ऋचा है ।-
“वासात्यो अन्य०” अर्थात्— 'अन्यः' ( एकः ) एक
'वासात्यः' रात्रि को पुत्र है 'अन्यः' एक “तव उषःपुत्रः”
तुझ उषा का पुत्र है । यह ॥
“तयो रेषा०” उन ( अश्विनों ) की यह और ऋचा
है ॥ २ ॥
( खं० ३ )
निरु०- इहेह जाता समवावशीतामरेपसा तन्वा३
नामभिः स्वैः । जिष्णुर्वामन्यः सुमखस्य सूरि
र्दिवो अन्यः सुभगः पुत्र ऊहे ॥” (ऋ०सं० २, ४,
२५, ४ ) ।
इह च इह च जातौ संस्तूयेते पापेन अलिप्य-
मानया तन्वा नामभिश्च स्वैः जिष्णुर्वामन्यः
सुमहतो बलस्य ईरयिता मध्यमः , दिवः अन्यः
सुभगः पुत्रः ऊह्यते आदित्यः ।
तयोः एषा अपरा भवति ॥३॥
अर्थ—“इहेह जाता०” इस ऋचा का अगस्त्य ऋषि
और प्रातरनुवाक और आश्विन में विनियोग है ।
( हे अश्विनौ ! युवाम् ऊह्येथे ) हे अश्विनो ! तुम दोनों