सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

५०६ नाट्यशास्त्र

४५. जो अलं अर्थात् पर्याप्त रूप में काकु के स्वरूप का सम्पादन करता
है वह 'अलङ्कार' है। तीनों स्थानों में प्रत्येक की ऊर्ध्व, अधः तथा मध्य की
कल्पना के द्वारा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित के निर्वाह के द्वारा
इसका स्वरूप निष्पन्न होता है। इनमें आवेश के अभाव के कारण सभी स्थानों
में मध्यम भाग में यह विद्यमान होता है किन्तु ऊर्ध्व तथा अधः भाग में यह
आवेश की स्थिति या भाव में होता है। इस प्रकार तीनों स्थानों में प्रत्येक
का अवलम्बन करने से छः अलङ्कार बन जाते हैं।
गद्यभाग—उच्चो नाम इत्यादि। इनमें शिर के अधोभाग में दूरस्थ व्यक्ति
के साथ भाषण करने में 'तार' बतलाया गया है जो स्वर काकु का विषय
है। विस्मय के ज्ञान होने पर वही रस काकु तथा दूसरों को भयभीत करने
पर वही अभिनय से विभाव काकु हो जाता है। स्वर काकु से ही श्रुति काकु
होता है जो भिन्न होता है। यह श्रुति काकु आक्षेप के अवसर पर ऊर्ध्व अर्थात्
तारतम होता है जिसका होता स्थान शिर ही है। यहाँ तार शब्द प्रकर्ष का
उपलक्षण है। इन आक्षेपादि में अवस्थाओं के अनुसार श्रुति, विभाव एवं रस
भेद से तीन रूप में काकुओं का विभाग हो जाता है। जो उर के ऊर्ध्वभाग
में है वह मन्द्र है तथा उसी उरः के नीचे भाग में अत्यन्त मन्द्र नीच काकु है।
दीनता की अवस्था में वही काकु दो रूपों को ग्रहण करती है। अपनी चित्त-
वृत्ति के अर्पण करने से रस काकु तथा पररूप में उत्पादन करने पर विभाव
काकु होती है। यहाँ प्रधानतया दोनों का आदर किया गया है और स्थानों से
इन दोनों का आदर नहीं किया जाता किन्तु जो प्रधान है उसी के अंश का
व्यपदेश होता है। स्वाभाविक भाषण वहाँ होता है जहाँ वक्ता आवृत्त-कंठ
स्वर वाला हो। आवृत्तकण्ठ स्वर का अर्थ है संवृत स्वर से युक्त कंठ वाला
व्यक्ति। त्रास के भय से गिर जाने वाला त्रस्त पतित। त्रास के समय काकु
दीप्त ही होती है। कण्ठ स्थान में ऊर्ध्व भाग निष्पन्न होती है, इससे स्पष्टतः
सिद्ध है कि स्थान भेद ही अलङ्कारता का प्रयोजक है।
५६. अब सभी का संग्रह कर कहते हैं—'यानि सौम्यार्थ' इत्यादि से।
सौम्य = जो सोम की तरह आह्लादक हो। सुखभाव = यहाँ सुख के हेतु
तथा कार्य दोनों का सुखभावकृत् शब्द से समासभेद से संग्रह किया गया है।
५७. नाना—नाना आश्रयों से उपेत अर्थात् युक्त का अनेक स्थानों में
निवेश करते हुए पाठ्य का प्रयोग या विधान रखना चाहिए। काकुओं को
पर्याप्त या परिसीमित करने में कारण होता है उनके आश्रयों या स्थानों
का भेद।

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०७
अङ्गानि इत्यादि के द्वारा काकु की ही प्रधानता है इसका उपसंहार
करते हैं—‘अथाङ्गानि’ इत्यादि गद्यभाग से । वाक्य का जो न्यास, त्यजन या
अनादरण है वह नाद का ही है । अतः भाव एवं अभाव, उपचय तथा अपचय
और आरोह तथा अवरोह इनके कारण नाद छः प्रकार हो जाता है । स्वर के
रूप में विहित अन्तराल विशिष्ट श्रुतियों में जो वैस्वर्य है, वह ध्वनिगत
विसंवाद से होता है यह ( ऐसे स्थानों पर ) सर्वत्र समझना चाहिए ।
शृङ्गार में ( जो ) उदात्त एवं स्वरित को अर्पण एवं विच्छेद आदि अङ्गों
को तथा विलम्बित को अलङ्कार कहा गया वह दूरस्थ पुरुष के साथ आभाषण
में कर्तव्य है । शिरः स्थान में षड्ज या पञ्चम में से किसी एक के स्थायी स्वर
के आश्रय के द्वारा अंश स्वर के विभाग से चार चार को मिला कर किया
जाता है । यदि ऐसा नहीं मानेंगे तो फिर दूरस्थ के साथ आभाषण आदि
सभी कथन पुनरुक्त हो जाएगा । दीपन तथा प्रशमन के विषय में यह विधि है
कि मन्द्र करने के बाद तार नहीं किया जाता है, इसी प्रकार मन्द्रतार से तार
तर को और तारतर से मन्द्र को भी नहीं करना चाहिए ।
समग्रतः काल-तत्त्व की भावना अशक्य है अतः उद्देश्य ग्रन्थ से ही लय और
विराम कहे जाते हैं तथा जिनमें उद्देश्य कुछ भी नहीं होता । विच्छेद से लय
को स्वीकार किया गया है । विच्छेद का अर्थ है विराम । यह विराम कितने
समय वाला हो इसी प्रश्न से लय भी मान लिया जाएगा । इस प्रकार यह
विच्छेद की भी परीक्षा हो गयी ।
अर्थ की समाप्ति के लिये विराम किया जाता है । अर्थ = अवान्तर वाक्य
का अर्थ । केवल छन्द की अपेक्षा से विराम नहीं किया जाता क्योंकि कवि
प्रयोग के अधीन ( परतन्त्र ) रहता है और जब कवि ( ही ) परतन्त्र है
तो फिर उसे विराम वाले छन्दों में विराम के लिये प्रयत्न करना ( ही )
चाहिए । प्रयोग कवि के आधीन नहीं है इसीलिये कहा भी गया कि विराम
अर्थ की अपेक्षा या अधीनता के कारण किये जाते हैं । एक, दो या तीन आदि
संख्याओं का यहाँ जो निर्देश किया गया है वह ( इसी ) नियम का उपलक्षण
समझना चाहिये । जैसे :—‘किं गच्छ’ इत्यादि पद्य में है ।
प्रश्न—अवान्तर वाक्य के अर्थ में विराम का विधान है तो फिर एक
वाक्यता न रखना ( या मीमांसाशास्त्र के अनुसार वाक्यभेद करना ) दूषण
होता है । उत्तर—कभी-कभी एकवाक्यताभाव दूषण नहीं भूषण भी हो जाता

५०८ नाट्यशास्त्र
है। इसके उपपादन में यही कहा जा सकता है कि किसी वस्तु की सूचना
देने में या अंकुरगत अर्थ (मूलभूत अर्थ) को कहने में उपचार में अल्पाक्षर
वाले पद की काव्य में (या पद्य में) स्थिति रहनी चाहिये। काव्य अनेक
विध सूचाभिनय तथा अंकुर के प्रकारों से युक्त होता है यदि यही स्वल्पाक्षर
वाले असमस्त पद वाला भी हो तो। क्योंकि अनेक या बहुअक्षर वाले पदों के
बीच सूचा तथा अंकुर की उपपत्ति नहीं होती है।
६१. विराम के होने पर (ही) अभिनयस्थ पदार्थ को विषयानुरूप प्रयोग
में दिखलाया जा सकता है, वह पदार्थ विराम से अवगत होता है तथा कार्य
की अवधि या समाप्ति में विराम रखना होता है। तब समापनीय पदार्थ का
स्वरूप उसकी विरामावस्था में प्रतीत हो जाता है इसीलिये कहा गया है कि
विराम होने पर अभिनय अर्थ को दर्शाता है तथा विराम के अभाव में यही
असमञ्जस हो सकता है या यही कि अभिनय के अर्थ का वहन विराम ही
करता है।
६२-६६. इसी तथ्य को बतलाते हैं—‘यत्र व्यग्रा’ इत्यादि से भी। इस
प्रकार इसी बात को पहिले दृष्टि की प्रमुखता के तात्पर्य से बतलायी थी अब
यहाँ दृष्टि समन्वित हस्तों की प्रधानता से बतलाने से पुनरुक्ति नहीं होती
है। इसी की व्यापकता को दिखलाई है ‘प्रायः वीर, रौद्र आदि में करना
चाहिये’ इत्यादि कथनों से। कुञ्चितौ = संकोच युक्त। अलङ्कार यहाँ उच्च,
दीप्त इत्यादि होंगे जिन्हें वृत्त के विराम स्थल में रखना चाहिए। जैसे—
‘यो यः शस्त्रं बिभर्त्ति (वे० सं० ३।) में है भी।
उच्च दीप्त ‘काकु’ को पद के अन्त में नहीं रखा जाए। वीर तथा रौद्र
रस में भी स्रग्धरा प्रभृति लम्बे वृत्तों में अर्ध या आदि में विराम नहीं रखना
चाहिए किन्तु पद के अन्त में ही। जैसा कि कहा भी है—‘प्राणवशेन वा’।
अर्थात् आरम्भ में आधे में प्रायः प्राण वायु का संवेग नहीं होता। आशय यही
कि पद के अन्त में ही विच्छेद किया जाए। अथवा ‘प्राणवशेन में’ प्राणशब्द का
अर्थ है रस भावादि। अतः रस एवं भावादि के औचित्य से यहाँ विच्छेद किया
जा सकता है तथा यह विच्छेद पाद का आरम्भक या आदि में भी हो सकता
है। इससे यह भी दिखलाया गया है कि अनुबन्ध (आरम्भ) भी विच्छेद
में उपयोगी होता है। ‘शेषम्’ इत्यादि। जहाँ चित्तवृत्ति की प्रधानता नहीं
हो किन्तु विभावादि की हो तो वहाँ अर्थ के अनुरोध पर विराम रखे जाते
हैं। क्लृप्ताक्षर अर्थात् सन्ध्यक्षर। कला के प्रमाण वाला जो काल है तदनुसार

परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०९
विलम्बित लय से पाठ करना चाहिए। इस प्रकार विच्छेद ही प्रमाण है,
यह तथ्य दिखलाया गया।
७०-७१. शेषाणाम्—इत्यादि। यहाँ शेषाणाम् का अर्थ है ह्रस्व अक्षरों
का। अर्थयोगेन पद से का आशय है कि जैसे अर्थ की स्फुट प्रतीति हो उसी
प्रकार विच्छेद करना चाहिये न कि अतिविलम्बित लय से पाठ करे। इस
पर यहाँ प्रश्न होता है कि कला का प्रमाण कितना रहे ? तो इसके उत्तर में
यही समझना चाहिए कि विलम्बित एक, दो, तीन, चार तथा पाँच कलाओं
तक ( का ) रहता है। गुर्वक्षर अर्थात् कृप्याक्षर।
७२. अथवा में वा शब्द से अधिक के लिये भी सहमति या अनुज्ञा देने
का संकेत किया गया है। कारणोपेतम् में कारण का अर्थ है चिन्तन आदि से
दीर्घकाल तक स्मरण होना।
७३. वृत्तविराम से अर्थविराम प्राथमिकता पाता है यही बात 'ये
विरामाः' इत्यादि से दिखलाते है। तज्ज्ञैः में तत् पद का अर्थ है विरामात्मक
वृत्तगत पदार्थ। उत्क्रम्यापि का आशय है कि यद्यपि उपक्रम विशेष का
था किन्तु उपसंहार सामान्य में है। अतएव इस प्रकार विराम को पढ़ा जाए
कि जिससे विवक्षित अर्थ की प्रतीति हो सके।
७४-७५. भिन्नवृत्तम् इत्यादि। वृत्त को तोड़कर नहीं पढ़ना चाहिए।
ऐसा विच्छेद न करे कि जिससे प्रकृत में कोई दूसरा ही वृत्त प्रतीत होने लगे
जिससे भ्रान्ति उत्पन्न हो। अपशब्द एवं भिन्नवृत्त दोषों के कहने से पुनरुक्ति
नहीं समझना चाहिए क्योंकि वस्तुतः उसके अभाव में भी विच्छेद के वश से
उसकी प्रतीति हो जाती है। इसीलिये यह कहा गया कि जहाँ विराम का
स्थल नहीं हो वहाँ विश्राम नहीं किया जाता है। विराम की इस प्रकार
व्यापकता बतलाकर न्यूना या दीप्ता को दिखलाने के लिए कहा कि—'दीन
स्थिति में काकु को दीप्त न करे'। इससे यहाँ बतलाया गया कि शोकादि में
मग्न चित्तवृत्ति को छोड़कर अन्य प्रसंगों में सर्वत्र काकु का दीपन शोभाधायक
होता है।
इस प्रकार स्वर, उसके तीन स्थान या आश्रय, उनके उपयोगी उदात्त
आदि वर्ण एवं उनके स्वरूप, स्वरूप के पूर्ति कारण अलङ्कार और इतिकर्तव्यता
रूप सभी अंगों को यहाँ कहा गया। (यह ध्यान रहे कि) स्वरभेद से काकु
का भेद होता है। स्वरभेद तब होगा जब काकु की विवक्षा होगी और जब
उसी काकु की विवक्षा करेंगे तो रस, भाव आदि धर्मान्तरों की उत्पत्ति या

५१० नाट्यशास्त्र
उदय भी होगा। स्वरों के स्थानों का भेद अलङ्कारों एवं अङ्गों के कारण
नहीं होता है। यहाँ 'वर्जितं काव्यदोषैः' पदों से यह भी दिखलाया कि पूर्व
अध्याय के विवरण से इस अध्याय के अर्थ की संगति है।
७६. इस कारिका से-संस्कृत भाषा के लिये दिखलाये गये काकुविधान
का प्रकृत अध्याय के पूर्व प्रतिपादित प्राकृत भाषा में भी अतिदेश है—यह
दिखलाया गया है।
७७. प्रकृत अध्याय के अर्थ का उपसंहार करते हुए यहाँ अग्रिम अध्याय के
अर्थ का सूत्रपात—'दशरूप' इत्यादि से किया गया है। वक्ष्यमाण या अग्रिम
अध्याय में जिनका विवरण दिया जा रहा है उन दशरूपकों के विधान में
जो उपयुक्त पाठ्य ( कहने योग्य या संवाद ) है उसकी योजना इन्हीं ( प्रकृत
अध्याय में दर्शित ) प्रकारों से की जाए।
७८. यहाँ 'तु' शब्द से व्युत्क्रम की सूचना दी गयी है। इस प्रकार
प्रसङ्ग या क्रमप्राप्त जो काकुविधान नहीं था उसे भी अपेक्षावश बतला दिया
गया है। 'अनुपूर्वशः' का आशय है कि अब जो क्रमप्राप्त दशरूपकों का
विधान विवरण है उसको विभागादि विवरणों के सहित पूर्णतः अगले अध्याय
में कहूँगा ॥ शिवम् ॥
भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र के श्री बाबूलाल शुक्ल, शास्त्रि प्रणीत
प्रदीप हिन्दी व्याख्यान की अतिरिक्त टिप्पणियों का
द्वितीय-भाग सम्पूर्ण ॥ शिवम् ॥

परिशिष्ट २
पद्यार्धानुक्रमणिका
पद्य पृष्ठ पद्य पृष्ठ
अ अञ्चितौ कूर्परांसौ तु ७८
अङ्कच्छेदे तमन्यस्मिन् १८३ अश्लिष्ट कपोतश्च ३८
अङ्कच्छेदे तु निर्वृत्तं १८४ अचिन्तयन्त्यभिनव २४१
अकार्यं सहसा कृत्वा ३२२ अज्जुकेति च वक्तव्या ३५५
अङ्कुशग्रहणाक्षाशं १४९ अट्टितश्च पुनर्वाम १२४
अकाराद्याः स्वरा ज्ञेया २०२ अट्टितं शकटास्यञ्च ११५
अक्रोधः क्रोधजननै ३२१ अत ऊर्ध्वं व्याख्यास्ये ८३
अङ्गालङ्कारचेष्टा तु १९८ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि
अङ्गालङ्कारयोज्या तु १९८ ७५, ११४, २६९, ३३४, ३७३
अङ्गकाव्यकृतं हास्यं १५७ अतश्च विपुलाभ्या तु २७१
अङ्गनेपथ्यसत्वानि २०० अतश्च संयुतान् हस्तान् ६४
अङ्गा वङ्गाः कलिङ्गाश्च १९० अतः परं प्रवक्ष्यामि १०, ३४, ४३, ८१,
अङ्गाभिनयमेवादौ ५ ८५, ९४, ११५, १२१, १२७, १६१, २९७,
अङ्गारकारकव्याध ३५४ अतः परं रङ्गपरिक्रमस्य १७७
अङ्गप्रत्यङ्गसंयुक्तः ५ अतः परं लक्षयिष्ये १३
अङ्गसौष्ठवसम्पन्नै १११ अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा १०३
अङ्गहारविनिष्पन्नं ६ अतिक्रान्तक्रमे चैव ९३
अङ्गुल्यग्रस्वस्तिकयोगात् ४८ अतिक्रान्तं पुनर्वामं ११६, ११७; १२०
अङ्गुल्यः करणं विप्राः ८२ १२०, १२१
अङ्गुल्यो यस्य हस्तस्य ४९, ६६ अतिक्रान्ता ह्यपक्रान्ता ९७
अङ्गुल्यः संहताः सर्वाः ५५ अतिक्रान्तेन पादेन १४७
अङ्गुल्यः संयुताः वक्राः ६४ अतिक्रान्तैः पदैर्विप्राः १४३
अङ्गुष्ठः कुञ्चितश्चैव ६० अतिक्रान्तं विचित्रञ्च ११५
अङ्गुल्यश्चाञ्चिताः सर्वाः ९२, ९३ अतिवृष्ट्यां सहस्राणि २१६
अग्न्यादिदैवतं प्रोक्तं २२२ अतिपीतं तथा भुक्तं ११४
अघोषा इति ये २०३ अतिरिक्तेऽतिरिक्तञ्च १७५
अचञ्चलमकुब्जश्च ११२ अतिभाषार्यभाषा च ३३५
अचञ्चलमनाश्चैव १४४ अतिभाषा तु देवानां ३३४
अचलैर्मधुरैर्गात्रै ११४ अतिवाक्यक्रियोपेतं १९५
अञ्चितः कुञ्चितश्चैव ९१ अत्तेति गणिकामाता ३५५
अञ्चितापसृतोद्बद्ध ३५ अतोऽधिकाक्षरं छन्दो २१४

५१२ नाट्यशास्त्र
अत्यायतपदश्चावच्च १५७ अधोमुखस्थितश्चैव १७६
अत्र नित्यं प्रयत्नो हि ११२ अधोमुखीनां सर्वासां ५६
अत्र नोक्तं मया यस्तु ३४६ अधोवलोकनेनैव १४६
अत्रोच्यते कथं नैषा १३२ अध्यर्धमेतद् विज्ञेयं १२५
अथानुवृत्तिरङ्गोपपत्ति ३१३ अध्यर्धिका चाषगति ७९
अथवाभिनयोपेतं १११ अनन्तरप्रयोगस्तु ३०६
अथवार्थवशाच्चापि १८१ अनर्थकैः विकारैश्च १५८
अथवा कारणोपेतं ३७२ अनवस्थिततारा च १८
अथवा छन्दतः कार्या ३४२ अनवस्थितसञ्चारा १९
अथ दिव्याः प्रकृतयो १६२ अनाविद्धेषु भावेषु २७
अथ मध्यमनीचेस्तु १३२ अनिबद्धपदं छन्दः २११
अय प्रेषणिकाश्चापि १८२ अनिमित्तप्रकथनो १५४
अथ बाह्यप्रयोगे तु ११४ अनियुक्तार्थकं वाक्यं ३६०
अथवान्यादृशं प्राप्य ७४ अनिष्पणेन गात्रेण १४४
अथ वीरे च कर्तव्या १३९ अनिष्टदर्शने गन्धे २४
अथ वृद्धस्य कर्तव्या १५२ अनिष्टश्रवणे चैव १३५
अथ योन्यन्तरी भाषा ३३६ अनीप्सिते विषादे च ७
अथातो मुखरागस्तु ३३ अनुक्तं श्रूयते यच्च १९६
अथायैव प्रवक्ष्यामि २३ अनुपश्लिष्टशब्दं यत् २९९
अथैषां रसभावेषु २२, २४ अनुष्टुप् चपला सा २६३
अथैषां सम्प्रवक्ष्यामि २६ अनेकस्वाद्विचाराणां २७७
अर्थस्य साधकश्चैव २८३ अनेकभावसंयुक्तं ३०६
अर्थान्तरस्य कथने २८३ अनेकभेदबहुलं ५
अर्थापत्तिः प्रसिद्धिश्च २७५ अनेकवाक्यसंयुक्तं ३२०
अर्थापेचयक्षरस्यूतं २११ अनेकयुक्तिमद्वाक्यं ३२०
अथावेष्टितमेकं स्यात् ४१ अनेकस्य तथैकेन २८७
अथासनविधिः कार्यः १६९ अनेकार्थविशेषैर्यत् ३०७
अद्य मे सफलमायत २३४ अनेकोपाधिसंयुक्तो २८१
अद्भुते विस्मयात् स्तब्धौ ३७० अनेन कार्य स्थानेन १०६, १०८
अदृष्टोऽन्योऽपिवा २८५ अनेनैव क्रमेणैव २५
अधमा इति ये ख्याता १५९ अनेन चारीयोगेन १५५
अधमेषु प्रकीर्णाश्च ७३ अनेनैव विधानेन १४९
अधरोष्ठपानरञ्जन ५० अन्धकारेऽथ याने च १४५
अधोभागचरी दृष्टिः १९ अन्तःस्था संवृतजा २०४
अधोभागविचारा च १८ अन्त्यं सप्तदशश्चैव २५१
अधोमुखतलाविद्धौ ७९ अन्त्यं सप्तदशे पादे २४७
अन्त्यमेकोनविंशच्च २५५

पद्यार्थानुक्रमणिका ५१३
अन्त्योपान्त्ये गुरुर्यत्र २५१ । अभिमुखपराङ्मुखीभ्यां ५३
अन्धकारेऽथ याने च १४५ अभियुक्तैर्विशेषस्तु १०३
अन्त्योपान्त्ये च दीर्घाणि २४६ अभूतपूर्वो यो ह्यर्थः २७८
अन्त्योपान्त्ये च शक्कर्यां २४२, २४४ अभूतपूर्वैर्यन्त्रार्थैः ३१७
अन्यत्रार्थेन सम्बद्धं ३२४ अभ्यन्तरेण करणं ८१
अन्यदा पुनरायेति ३५२ अमी गुणा रूपगुणा २३३
अन्यस्मिंश्चैव पतना- २८२ अथथातथादिकेषु तु ३३१
अन्यापदेशैः कथनं २८४ अयमुद्धितकरणे ९१
अन्यापदेशकथनैः ३१८ अयं विधिस्तु कर्तव्यो १३३
अन्ये चाप्यर्थसंयुक्ता ७१ अयमेवाङ्गुलि परि ६६
अन्येऽपि देशाः प्राच्या १९० अयुग्गणे विधातव्यो २६९, २७०
अन्योन्यजङ्घासंवेधात् ९९ अयुजोर्लक्षणं ह्येतत् २६२
अन्योन्य-सदृशा यत्र ३०३ अरालकटकाख्यौ च ७७
अपक्रान्तः पुनश्चाद्यो ११९ अरालस्य यदा वक्रा ४९
अपक्रान्तः पुनर्वामः ११७ अरालौ तु विपर्यस्ता ६७
अपदेशस्तु परोक्षो ३१७ अर्थस्य च व्यक्तिरुदा ३००
अपराद्धानुसरणे १३५ अर्थहीनं त्वसम्बद्धं २९८
अपरस्परनिष्पन्ना ३३२ अर्धचन्द्रो हरालश्च ३७
अपरिज्ञाततत्त्वार्थः ३२० अर्धतालोत्थितैः पादैः १५१
अपशिसानतत्त्वार्थं ३२० अर्धनारीगतिः कार्या १६७
अपसर्पी पुनर्वामः १२५ अर्धव्याकोशपद्ममात्रा १८
अपसव्यप्रवेशा तु १९१ अर्धेनैकेन यद् वृत्तं २९२
अपस्मारे तथा कार्या २० अलङ्काराः गुणाश्चैव ३०३
अपि कस्यचिद् युवति २३७ अलङ्कारैर्गुणैश्चैव २७६, ३१४
अपि चाध्यायिके कार्ये १३५ अलङ्कारा विरामाश्च ३७३
अपूर्वक्रोधजनितं ३२४ अलङ्कारविरामाभ्यां ३७०
अप्यनुक्तो बुधैर्यत्र ३०२ अलपल्लवकाराला ७९
अप्रत्यक्षार्थसंस्पर्शं २८० अलपल्लवसंस्थाना ७७
अप्रार्थनीयामन्यां वा ३२१ अलपल्लवोध्वणौ च ४०
अभावहन्तवैकल्या २९३ अलम्भलाभाद् भुक्तस्य १५९
अभितप्ता च निर्वेदे २० अलातं वामकक्षैव ११६
अभिनयकरास्तु ये ७१ अलातं वामकं पादं ११८
अभिनेयास्त्वनेनैव ४५ अलातश्च पुनर्वामः १२१
अभिपूर्वस्य णीञ् धातु ४ अलातश्च भवेद् वामः १२०
अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं २७९, २८२ अलोलचक्षुश्च भवेत् १४४
अभिप्लुतार्थं विज्ञेयं २९९ अवकृष्टे मदे चैव १५४
अभिमानावष्टम्भ ६८ अवगीतोऽपि हीनोऽपि ३०५
३३ ना० शा० द्वि०

५१४ नाट्यशास्त्र
अवज्ञाविहतादौ च ३२ | अस्मिंस्ते शिरसि २३०
अवर्ण्यं वर्ण्यते यत्र २९७ | अस्य दृष्टिविधानस्य ११
अवलोक्य दिशः सर्वाः १६१ | अस्याः विविधान् योगान् ५२
अवस्थान्तरमासाद्य १३३ | अस्य शाखा च नृत्तञ्च ६
अवस्रत्तोत्तरपुटा १४ | अस्यैव तु कपित्थस्य ५१
अवाङ्मुखस्त्वं निर्भुग्नं ३२ | अस्यैव च यदा मुष्टेः ५०
अवाङ्मुखस्थितश्चापि १० | अस्यैव चाङ्गुलीभिस्त्वधो ४२
अविशेषाभिधानं यत् २९८ | अस्यैव दक्षिणं पादं १०८
अवृद्धस्य प्रयोगज्ञो १५१ | अस्यैष वैपरीत्येन १४६
अवेक्ष्य वृत्तिबाहुल्यं १९२ | अस्यैव समपादस्य ९२
अव्यक्तार्थप्रवादे च ३६५ | अस्यैव शिखराख्यस्य ५०
अशुद्धकार्यं प्रक्रान्तं ११४ | असौ हि रामारति २९६
अशेषाङ्गाकुकुलापूर् १४९ | अहह्या तु मही यत्र १३८
अश्वयाने गतिः कार्या १५० | अह्नः प्रमाणं गत्वा तु १८३
अश्रुप्रमार्जनं तिलक ४४ | अहमिति च दर्पवचने ८४
अष्टादशं सप्तदशं २५३ | अहं वः कथयिष्यामि ३
अष्टादश द्वितीयञ्च २७३ | आ
अष्टावादौ गुरूणि २५८ | आकम्पितं कम्पितञ्च ६
अष्टाशीतिश्च वृत्तानि २१६ | आकारैकारसंयुक्तं ३७१
अष्टाक्षरकृते पादे २२९ | आकारस्तु स्मृते कार्यं ३१०
अष्टाशीति सहस्राणि २१७ | आकाशगमने चैव १४६
अष्टिरत्यष्टिरपि च २२४ | आकाशेन विमानेन १८२
अष्टौ चैव तु वृत्तानि २१७ | आकाक्षिक्यः स्मृता ह्येता १७, १०४
अष्टौ चैव सहस्राणि २१८ | आका शिकीनां चारीणां १००
अष्टौ षष्ठिश्च वृत्तानि २१६ | आकुञ्चितं कुञ्चितं स्यात् २४
असंख्येय-प्रमाणानि २१५ | आकुञ्चितं समञ्चैव १७५
असंयुताः करा ह्येते ६४ | आकुञ्चितपुटापाङ्ग १८
असंयुताः संयुताश्च ३८ | आकृत्या चेष्टया चिह्नैः ७१
असंस्पर्शाच्च लोकस्य १६० | आकेकरा दुरालोके २१
असंस्थितैः पदैः २२८ | आकेकरपुटा चैव १३
असंस्थितपदा सुविह्वलाङ्गी २६५ | आकेकरा विकोशा च ११
असिचापचक्रतोमर ५० | आखिसं नामकं कुर्यात् १२०
असूयावेदनावज्ञा ३० | आख्यातं पाठ्यकृतं २०७
असूयिते जुगुप्सायां २६ | आख्यानाज्ञा-प्रतिषेध ३१२
अस्पृष्टश्च दकारो ३३० | आगतासि भवनं मम २३४
अस्वस्थकामिते चैव १३५ | आघूर्णमानमध्य्‌या या १९
अस्वराः सस्वराश्चापि २२० |

पदार्थानुक्रमणिका ५१५
आङ्गिकस्तु भवेच्छाखा ६ | आपाणं आबाणं भवति ३३१
आङ्गिको वाचिकश्चैव ५ | आभाषणञ्च दूरस्थे ३५९
आचार्यबुद्ध्या तानीह १२६ | आभीरोक्तिः शाबरी च ३४४
आश्चर्य अच्छुरियं ३३३ | आभुग्नं तदुरो ज्ञेयं ८४
आत्मभावमुपन्यस्य ३१८ | आभुग्नतालमध्यस्थः ६१
आदर्शधारणं खण्डनं ५१ | आभुग्नमथ निर्भुग्नं ८५
आदित्यांशुरपर्धिन्येषा २२९ | आभ्यन्तरस्तु नृपते १७३
आदौ द्वे च चतुर्थञ्च २४३ | आमन्त्रणैस्तु पाषण्डा ३५२
आदौ द्वे नैधने २२७ | आम्नायसिद्धं सर्वासां ३४०
आदौ द्वे यत्र पादे २१४ | आयतञ्चावहित्थञ्च १६२
आदौ द्वौ पञ्चमश्चैव २३२ | आयतदण्डग्रहणं ५१
आदौ पञ्चाक्षरच्छेदः २३६ | आयतनासादण्डे २७१
आदौ पादे तु यत्र स्यात् २१४ | आयामनादुभयतः ८६
आदौ षट् दशमश्चैव २४१, २४५ | आयुष्मन्निति वाच्यस्तु ३५०
आदौ यत् क्रोधजननं ३१९, ३२१ | आरोढुमुद्वहेद् गात्रं १४६
आद्यञ्चैव चतुर्थञ्च २५७ | आरोहणावतरणम् १४७
आद्यन्तु जनितं कृत्वा ११६, ११८, १२३, | आर्यागीतिरथार्धे च २७४
१२५ | आर्या त्वक्षरपिण्डेन २७३
आद्यस्तु जनितो भूत्वा १२५ | आर्या मुखे तु चापला २७२
आद्यं कुर्यादपक्रान्तं ११९ | आर्येति पूर्वजो भ्राता ३५३
आद्यं चतुर्थमन्यच्च २३१ | आर्येति ब्राह्मणं ब्रूयात् ३४८
आद्यं चतुर्थं दशमं २३९ | आलस्यश्रमखेदेषु १७७
आद्यं चतुर्थं षष्ठञ्च २४५, २४९ | आलिङ्गने महास्तम्भ ६०
आद्यं चारालमुत्तानं १४३, १६६ | आलीढपरिवर्तस्तु १०८
आद्यं तृतीयमन्यच्च २२८, २३३, २३४, | आलीढसंहितं शस्त्रं १०८
२६६ | आलीढं स्थानकं कुर्यात् १०८
आद्यं पादञ्च जनितं ११६ | आलीढं स्थानकं कृत्वा १६०
आद्यः पृष्ठापसर्पी च १२४ | आलेख्यनेत्ररञ्जन ६२
आद्यस्तु जनितः कार्यः १२२ | आवर्जितं प्रयोक्तव्यं ९०
आद्यस्तु जनितो भूत्वा ११८ | आवर्जितं नतं क्षिप्तं ९०
आद्यो दण्डक्रमश्चैव १२० | आवर्जिताः करतले ५७
आद्ये पुनरन्त्ये २२५ | आवर्तन्ते कनिष्ठाद्या ८२
आद्यो भ्रमरकः कार्यः १२२ | आवाहनमवतरणं ४३
आद्यो भ्रमरकश्चैव १२३ | आवाहने विसर्गे ४९
आद्यात् पराणि पञ्चाथ २४७ | आवाहने विसर्गे च १६२
आद्या धनुर्नता कार्या ४७ | आविद्धवक्त्रौ सूच्यास्यौ ४०
आधूतं तु शिरोज्ञेयम् ८ | आवेगे चैव हर्षे च १३५

५१६ नाट्यशास्त्र
आवेष्टयन्ते यदाङ्गुल्यः ८१
आवन्तिका वैदेशिका १८९
आवन्ती दाक्षिणात्या च १८६, १९१
आवन्त्यां दाक्षिणात्यायां १९१
आलोकश्चैव लोकश्च १७९
आशीः प्रियोक्तिः कपट ३१३
आशीर्वादा तथा भावा ४७
आसन्नोक्तश्च यद्वाक्यं १९६
आसां तु सम्प्रवक्ष्यामि २६७
आसाद्य तु रसं हास्यं १३९
आस्कन्दितेन वामेन ११६
आस्पन्दितः पुनश्चार्मः १२२
आस्पन्दितः पुनः सव्यः १२३
आस्पन्दितञ्च वामेन ११८
आस्फोटने च योज्यः ५५
आह्वानञ्च निवारण ४८
आह्लादिश्चोर्ध्वसुकुला २०
आहाराधिष्ठिताः प्राणाः ११३
इ
इतरार्धे तु षष्ठस्य २७४
इतरेण निषीदेच्च १५६
इतिच्छन्दांसि यानीह २२४
इति दन्तोष्ठजिह्वानां ३१
इत्यादि लोकभावार्था ३३
इत्यूर्वोर्लक्षणं प्रोक्तं ९०
इत्येतदङ्गजं प्रोक्तं ९४
इत्येतदुदरस्योक्तं ८७
इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं ३६
इत्येते पर्वतश्रेष्ठाः १८५
इत्येवं जङ्घयोः कर्म ९१
इत्येवं तु भ्रुवोः प्रोक्तं २७
इत्येवं लक्षिता ह्येषा १९
इत्येष दर्शनविधिः २२
इत्येष निषधो हस्तः ६८
इत्येष मुखरागस्तु ३४
इत्येषा सर्वविषमा २६५
इत्येषु रसभावेषु २५
इत्योष्ठकर्मण्युक्तानि ३०
इत्योष्ठलक्षणं प्रोक्तं २९
इदमेव विपर्यस्तं १०६
इष्टार्थख्यापने चैव ३६५
इह भावा रसाश्चैव १८४
इह साम्प्रतमस्येद्य ५६
ई
ईषत् प्रसारिते जङ्घे १७७
ईप्सितेनार्थजातेन ३०१
उ
उक्तं काकुविधानं तु ३७२
उकार बहुलां तज्ज्ञस्तेषु ३४६
उक्तान्तः परश्चैव १२६
उक्ताद्युत्कृतिजातानि २१८
उक्तान्तः परश्चैव १२६
उक्ता ह्येते द्विविधा ७१
उच्चयः सहशार्थो यः २८०
उच्चा दीप्ता द्रुता चैव ३६४
उच्चो दीप्तश्च मन्द्रश्च ३६१
उत्कण्ठिते च तज्ज्ञैः ७०
उत्कर्षणं विकर्षणं ७२
उत्क्षिप्तवक्रा तु यदा ५१
उत्क्षिप्तश्चापि विज्ञेयं १०
उत्क्षिप्तबाहुशिरस ९
उत्क्षेपः पातनञ्चैव २५
उत्क्षेपो विस्मये हर्षे २६
उत्सङ्ग इति विज्ञेयः ६७
उत्तमार्थाद्विशिष्टो यः ३१७
उत्तमानां कराः कार्या ७३
उत्तमानां भवेद्भाषा १४४
उत्तमानां तु कर्तव्या १४०
उत्तमाधममध्यानां १३३
उत्तमानामयं प्रायः १३९
उत्तमानां गतिर्या १३४
उत्तमैर्मध्यमैर्वाचैः ३४७

पद्यार्थानुक्रमणिका ५१७
उत्तानः पार्श्वगश्चैव ७२, ७५ उद्वेष्टितप्रसारित इत्येते ८२
उत्तानितमुखञ्चैव १७६ उदात्तश्चानुदात्तश्च ३६०
उत्तानो वर्तुलश्लक्ष्णः ७५ उदात्तगमने चैव ९२
उत्तानौ वामपार्श्वस्थौ ६६ उदारमधुरैः शब्दै ३१०
उत्तरोत्तरसञ्जल्प १०८, ३६३ उदात्तललितैर्गात्रैः १६७
उत्तरोत्तरसङ्कल्पे ३६५ उद्धता ये च पुरुषाः १९३
उत्तानवञ्चितौ चैव ४० उन्नतं पूर्णमन्त्रोक्तं २८
उत्तानाधोमुखौ कार्यौ ४५ उन्नताभ्युन्नतमुखी ३५
उत्क्रम्यापि क्रमं ३७२ उन्नामनं प्रणामो ४३
उत्सादनं बहु तथा ४२ उन्मत्तो भवति ह्येवं १५५
उत्क्षिप्य पातयेच्चैनं १०० उन्मत्तस्यापि कर्तव्या १५४
उत्क्षिप्ता तु भवेत् ९२ उन्मत्तस्यापि पठतः ३३७
उत्क्षिप्ता तु भवेत् पार्ष्णि ९३ उन्मादेऽसूयिते चैव ३६५
उत्क्षिप्ता यस्य पार्ष्णिः ९३ उन्मेषश्च निमेषश्च २३
उत्क्षिप्य पतितकरः १४० उपमाद्युपदिष्टाना ३०३
उत्क्षिप्य हस्तं पाशेन १३६ उपमा नाम सा २८७
उत्प्लुतमकेहस्त २५४ उपमाया बुधैरेते २८९
उत्फुल्लमध्या दृष्टिस्तु १३ उपमा रूपकञ्चैव २८६
उत्साहजननैः स्पष्टै ३१५ उपवनसलिलानां २४१
उत्साहो उच्छाहो पुष्पं ३३३ उपस्थितस्मृतिश्चैव १४४
उद्घट्टितेन पादेन १०१ उपसर्गा ह्युद्दिष्टाः २०८
उद्घट्टितः समश्चैव ९१ उपपरुहुत्तरारो ३२९
उद्धटभाषिणी परुष २७२ उत्स्यन्दिताऽथ जनिता ९७
उद्वृत्तो दक्षिणश्च स्यात् ११८ उपसर्गे नतं कार्यं ८६
उद्वृत्तं दक्षिणञ्चैव ११६ उपस्थितोऽधस्ताद् वा— ३३४
उद्वृत्ताविति विज्ञेयौ ७६ उपर्युपरि विन्यस्तौ ६९
उद्वाहितमुरः कृत्वा ९८ उपाध्यायेति चाचार्यं ३४४
उद्वेष्टितो भवेदेको ७९ उपाध्यायस्य नृपते १७५
उद्वेष्ट्यन्ते कनिष्ठाद्या ८२ उपालम्भकृते चैव १०६
उद्वेष्ट्यन्ते यदाङ्गुल्यः ८१ उपेतमतिचित्रार्थं ३०७
उद्वाहितं तूर्ध्वकृतं ८५ उपेन्द्रवज्रा विज्ञेया २३३
उद्वाहितञ्च विज्ञेयं ९०, १७७ उभयोरर्धयोरेत २७३
उद्वाहितं नतञ्चैव १७५ उभयोरर्धयोर्यन्त्र २७२
उद्वाहितं समञ्चैव ८४ उभयोः प्रीतिजननो २८२
उद्वाहिता चेति कटी ८८ उभाभ्यामपि पादाभ्यां १००
उद्वाह्य गात्रं पादञ्च १४७ उभाभ्यामपि हस्ताभ्यां ६५
उद्वेष्टितापविद्धैश्च १०० उरःपातहतोत्साह— १४१

५१८ नाट्यशास्त्र
उरःसमं तु विज्ञेयं ८५ | एक एव रसस्तेषां १३७
उरसः शिरसः कण्ठात् ३५९ | एकः खञ्जगतौ नित्यं १५६
उरसश्चापि चिबुकं १२८ | एकं भुजमुपाधाय १७६
उरसोदाहृतं वाक्यं ३५९ | एकपादप्रचारो यः ९६
उरस्युद्वेष्टनं कार्यं ११० | एकमात्रं भवेद् ह्रस्वं ३०९
उरो निर्भुग्नमेतद्धि ८४ | एकमात्रं घटके २२६
उरोमण्डलिनौ चैव ४० | एकं वा विंशतिं वापि २१९
उष्णं उण्हं यक्षो ३३३ | एकत्रिंशत् सहस्राणि २१६
उष्णीषमुकुटधारण ४३ | एकद्वित्रिचतुः ३७१
ऊ | एकादश्या एवाललिता २५
ऊरुद्वृत्तञ्च तेनैव १२१ | एकस्या हि द्वयोर्वापि २५
ऊरुद्वृत्तः स एव १२२ | एकस्यानेकविषया २८७
ऊरुभ्यां वलनं कृत्वा १०१ | एकस्यैकेन सा २८७
ऊरुभ्यां वलनं यत् ९९ | एकवाक्येन संयुक्तं २८९
ऊर्णनाभस्ताम्रचूड ३८ | एकस्य बहुभिः सा २८७
ऊर्णनाभः स विज्ञेय ६३ | एकस्य बहूनां वा २०९
ऊर्ध्वजानुश्च सूची च ९७ | एकाङ्के संविधातव्यो १८४
ऊर्ध्वनतलोलकम्पित ५२ | एकादशं सप्तदशं २५७
ऊर्ध्वप्रसारितविद्धौ ८० | एकादशाक्षरा त्रिष्टुप् २१३
ऊर्ध्वमण्डलिनौ चैव ४० | एकादशाक्षरे पादे २३२
ऊर्ध्वमण्डलिनौ हस्तौ ७९ | एकार्थसाधनकृतं ३१७
ऊर्ध्वमन्ये प्रकीर्णे च ५९ | एकाक्षरं भवेदुक्तं २१३
ऊर्ध्वमुखेन तु कुर्यात् ४६ | एकारबहुलां भाषां ३४५
ऊर्ध्वमुल्लोकितं ज्ञेयं २३ | एकीभूताः पुनश्चैताः १९२
ऊर्ध्वक्षेपैरुरो यन्न ८५ | एकीभूताः पुनस्त्वेताः १९२
ऊर्ध्वाः श्लक्ष्णताम्राश्च ५४ | एकेन द्वाभ्यां वा किञ्चित् ५८
ऊर्ध्वा हंसमुखस्यैव ६२ | एकैकं पादमुत्क्रम्य २९३
ऊष्माणस्तालव्या २०३ | एकोनविंशतिधृतिः २१४
ऊष्माणश्च शषसहा २०४ | एको हि शब्दद्यते तत् २८५
ऋ | एतच्चापगतं विद्यात् १२६
ऋजुस्थितस्य चोर्ध्वाधः ७ | एतदास्यन्दितं नाम १२२
ऋज्वायतोन्नतैः १४६ | एतदुक्तं मया सम्यक् ८५
ऋतवो महीं तयौघं ५७ | एतदेव विपर्यस्तं ३२५
ए | एतदेवावतरणं १४८
| एतद्दशविधं ज्ञेयं २९१
एओआरपराणि अ १२७ | एताश्चार्यो मया प्रोक्ताः १०४, ११५
| एताः भौम्यः स्मृताश्चार्यः ९७, १००

पद्यार्थानुक्रमणिका ५१९
एतान्याकाशगानीह १२१ | एलकाक्रीडितैश्चैव १२४
एतान्यपि दशोक्तानि ११५ | एलकाक्रीडिता बद्धा ९७
एतान्याविद्धसंज्ञानि १९३ | एलकाक्रीडितैः पादैः १३८, १४२
एतानि काव्यस्य च २८६ | एलकाक्रीडितं विद्यात् १२४
एतानि खण्डानि समण्ड- १२९ | एवमेषः प्रयोक्तव्यः ४३
एतानि गुरुसंख्यानि १५८ | एवं कक्ष्याविभागस्तु १४६, १९८
एतानि च गुरूणि स्युः २५२ | एवं गतागतैर्गत्वा १३१
एतानि पार्श्वकर्माणि ८७ | एवं ज्ञेयाः करा ह्येते ७५
एतानि नवकर्माणि २१ | एवं तु संस्कृतं पाठ्यं ३२५
एतानि च लघूनि स्युः २५६ | एवं तूभयसंयोगो २१३
एतानि समवृत्तानि २६० | एवं देवानुकरणे १३३
एतावदिति च कार्यो ६६ | एवं नामेति कार्यञ्च ३२
एतेन च विकल्पेन २१८ | एवं पादस्य जङ्घायाः ९५
एतेन त्वभिनेयं ४९ | एवं भावरसार्थेषु ३३
एतेन तरुणफलरूप ५६ | एवं तु भारते वर्षे १८४
एतेन धैर्यमदगर्व ६८ | एवं भाषाविधानं तु ३४६, ३४७, ३५७
एतेन पुनः स्त्रीणां ४८ | एवमाभ्यन्तरो ज्ञेयो १७४
एतेन सत्त्वशौण्डीर्यं ४७ | एवमादिषु चान्येषु ३७०
एते तु संयुक्ता हस्ता ३९ | एवमेतत्तु विज्ञेयं १३४
एते घोषाघोषाः २०३ | एवमेताः प्रयोक्तव्या १६१
एते दोषा हि काव्यस्य ३०० | एवमेतत् स्वरकृतं ३७३
एते मेघा गर्जितनादा २४३ | एवमेतानि वृत्तानि २६८
एते व्यञ्जनवर्गा २०५ | एवमेते ह्यलङ्काराः ३०८
एतेषामपि सर्वेषा ३३७ | एवमर्द्धाङ्गहीनं तु १३४
एतेषु संश्रिता देशा १८८ | एवं नानाश्रयोपेतं ३६६
एतेष्वेवं गतिं प्राज्ञो १३५ | एवं नानार्थसंयुक्तै २१२
एते ह्यष्टौ त्रिका नाम्ना २२० | एवं नामविधानं तु ३५७
एतैरङ्गैः समासैश्च २०२ | एवं भावरसोपेताः १६६
एतैर्नानाप्रकारैः २५४ | एवं राजसभां प्राप्य १७३
एभिरर्थक्रियायुक्तैः २९७ | एवं रसेषु भावेषु २६
एभिः प्रयोक्तृभिर्न्यायै १०९ | एवं विचारः कर्तव्यो १०९
एभिरेव विपर्यस्तै १४४ | एवं व्यायामसंयोगे ११४, १२७
एभिरेव तु संयुक्ता २३३ | एवं स्थानविधिः कार्यः १६४
एभिः शङ्खविधानैः २११ | एवं हस्तं चरित्वा तु १०४
एभिर्व्यञ्जनवर्गै २०५ | एषोऽभिधाशानिरु- ४२
एभ्योऽन्ये बहवो भेदा १० | एष एव करः कार्यो ६४
एभ्यो विनिर्गताश्चान्या २२० | एष एव तु विज्ञेय १३०

५२० नाट्यशास्त्र
एष गजोऽद्रिमस्तक २४९ | कक्ष्याविभागे ज्ञेयानि १७९
एष च वधूवराणा ७० | कञ्चुकीयस्य कर्तव्या १५१
एष च सलिलनिवापे ६० | कटकः कटकेर्न्यस्तः ६७
एष चारीप्रयोगस्तु ११७, ११९ | कटकाख्ये यदा हस्ते ५१
एषः पादप्रचारस्तु १२१ | कटकावर्धमानश्च ३८
एष पादाहते कार्यों ९३ | कटिकर्म मया प्रोक्तं ८८
एष प्रहारपाते ४१ | कटिपार्श्वभुजांसैश्च ८६
एष प्रहारे ब्यायामे ४९ | कटिशीर्षनिविष्टौ द्वौ ७९
एष मदनाङ्गमर्दे ६६ | कटी कर्णसमा यत्र ११२
एष विनयाभ्युपगमे ६५ | कटी जानुविवर्त्ताच्च १०३
एष सलिलप्रदाने ५५ | कटीतरे विनिक्षिप्य १२३
एषानुसरणे कार्या १४२ | कटीनाभिचरौ हस्तौ ११२
एषामेवानुगा हस्तैः १४२ | कटी भवेत्तु ब्याभुग्ना ८६
एषा कान्ता ब्रजति २४४ | कटी मध्यस्य वलनात् ८८
एषा खञ्जगतिः कार्या १५६ | कथं न्विदं कमलविशाल २४१
एषा अप्रति मत्ता २२७ | कथं वाभिनयो ज्ञेय ३
एषा स्त्रीणां प्रयोक्तव्या १४०, १४२ | कदाचिदुपविष्टस्तु १५७
एषां प्रयोगः कर्तव्यो १६३ | कदाचिद् धावति जवात् १५४
एषोम्बुदनिस्वन २३२ | कदाचिद् वीररौद्राभ्यां ३०८
| कनिष्ठाङ्गुष्ठावूर्ध्वौ ५६
ऐ | कन्दलसेन्द्रगोपकर २४६
ऐन्द्रे तु मण्डले पादौ १०७ | कपोलस्यान्तरे वापि १०९
ऐश्वर्येण प्रमत्तानां ३३७ | कमलामलरेणुतरङ्ग ३२६
| कम्पनञ्चैव गात्राणां १५२
ओ-औ | कम्पनं वलनञ्चैव ८७
ओकारत्वं गच्छे ३३२ | कम्पनं वेदनाशील २०
ओकारबहुलां नित्यं ३४६ | करङ्कपदविभूषिता २१९
औत्पत्तिकानि तानि ३५५ | करणे तु प्रयोक्तव्या ८०
| करणानां समायोगः ९६
क | करणं कर्म स्थानं ७३
कखगघङाः कण्ठस्था २०४ | करावुद्वेष्टिताग्रौ च ८०
कखचछ् टठतथ २०१ | करणे शक्करी चैव ३०९
कगतदयवाणं णिण्णं ३२९ | करौ वक्षसि निक्षिप्य १४१
कचटतपा स्वरिताः स्युः २०४ | कर्णावंसप्रलम्बौ २५३
कण्ठेन शमनं कुर्यात् ३५९ | कर्णादष्टाङ्गुलस्थे च १२८
कण्ठोरस्यान् विद्यात् २०४ | कर्त्तव्यो नारीणामभिनय ४७
कण्ठ्यौ विसर्जनीयौ २०४ | कर्म लक्षणसंयुक्तं ३७
कक्ष्याविभागो निर्देश्यो १७९ |

पद्यार्थानुक्रमणिका ५२१
कलहे स्वस्तिकयुक्ता ५३
कलाकालगतेः पादैः १३९
कलाकालप्रमाणेन ३७९
कलाभ्यासाश्रयञ्चैव ३४०
कलिकं मध्यमे यत्र १३४
कलोपचारज्ञानार्थं ३४०
कस्मादभिनयो ह्यस्मिन् ३६९
कस्मान्मृत इति प्रोक्ते १४९
कस्य तु पृथु मृदु २९१
काङ्गुलेऽनामिका वक्रा ५६
कान्ता भयानका हास्या ११
कामस्यापीदं २३७
कामस्य सारभूते २६२
कार्मुकमुक्तेनाशु २५८
कारणव्यपदेशेन ३३७
कार्यं शनैश्च कर्तव्यं १४१
कार्यं शीतस्पर्शे वर्षे ८४
कार्यस्त्रिकविवर्तश्च १२०, १२२, १२२
कार्यः प्रवेशः पात्राणां १२७
कार्यः पुष्पप्रकरश्च ५५
कार्यः प्रतिग्रहाचमनं ६०
कार्याणि रोषाजानि ५६
कार्यानुगतमस्यैव २५
कार्येषु विपरीतेषु ३१९
कार्योंऽभिनयविशेषः ६०
कार्या चैव हि नीचानां १५९
कार्या पाशुपतानाञ्च १४४
कार्या प्रकम्पिता ५३
कार्या यथारसं ६०
कार्या शेषेषु भावेषु २८
कार्यों निवर्तिताभ्यां ५५
कार्यों विरामः पादान्ते ३७०
कार्यों द्वादशमात्रौ २७३
क्रान्तमेतन्तु विज्ञेयं १२१
कालावस्थान्तरगतं ३३९
काव्यं कार्यं तु २०८
काव्यबन्धास्तु कर्तव्या २७४
काव्यबन्धेष्वशेषेषु ३१०
काव्यस्यैते ह्यलङ्कारा २८६
काव्यहास्यं तु विज्ञेयं १५८
काव्ये कार्याणि कविभि २५६
काव्येषु भावार्थगतानि ३१३
किञ्चिदुद्ध्रिज्जङ्घश्च १०५
किञ्चिदाकुञ्चितपुटा १९
किञ्चिदाकुञ्चितादृष्टा १४
किञ्चिदुन्नमितैर्गात्रैः १६६
किञ्चित् तिर्यग्गतावेतौ ७८
किञ्चिन्नताग्रकाया तु १४८
किञ्चिन्नतेन गात्रेण १६५
किञ्चिन्निस्तब्ध-तारा च १६
किञ्चिद् विवर्जिताग्रः ६२
किञ्चिच्च सदृशी २८८
किञ्चित् सादृश्यसम्पन्नं २९०
किमिदपरवक्तमेव २६६
किमिदं कपटाश्रय २३५
किमिदं रुषापहतशोभं २६६
किमिह बहुभिरुक्तैः २४५
किं गच्छ मा विश ३६८
किं त्वया सुभट २३३
क्रियते वाक्यचेष्टाभिः २८३
किल शङ्कास्थो रेफो ३३०
कीर्त्यमानैर्गुणैर्यत्र ३१५
क्रीडार्थं सर्वलोकस्य ३४०
कुञ्चितश्च सरोमञ्चं २९
कुञ्चितं पादमुत्क्षिप्य १००, १०१, १०२,
१०३
कुञ्चितश्च तथाङ्गुष्ठः ४०
कुञ्चितं दक्षिणं १०८
कुञ्चितं रेचितं चैव २५
कुञ्चिता कुञ्चिता मूर्ध्नि ३५
कुञ्चित सूयिता दृष्टिः २०
कुञ्चिता चाभितश्चा च ११
कुट्टनं खण्डनं छिन्नं ३०
कुट्टनं दन्तसङ्घर्षः ३०

५२२ नाट्यशास्त्र
कुटिलभ्रुकुटी दृष्टिः १४ | कौशल्यादेककरवाद् वा १९६
कुटिलगतयश्च सर्वे ५२ | क्रमशः करणं विप्रा ८१
कुन्तलककुण्डलाङ्गद ५३ | क्रमादाकुञ्चितपुटा १२
कुब्जवामननीचानां ८८ | क्रोधस्थानेषु दीप्तेषु २६
कुमार्यश्चैव वक्तव्या ३५४ | क्रोधे निवर्तितं कार्यं २४
कुसुमदनिभा त्वं २३६ | क्वचिदासन्नपतिते १३८, १४२
कुमुदोत्पलवृन्तेषु ६७ | क यास्यसि बरोरु २६५
कुर्वन्त्यावन्तिकीमेते १८९ | कुमप्रविष्टताशा च १६
कुसुमितमभिपश्यन्ती २३० | क्षतेर्गवाक्षैरिव २९६
कूलवृक्षानारुजती २६४ | ख
कूर्परां सौचितौ हस्तौ ७० | खगैश्च सर्वैर्युधि २९४
कूर्परस्वस्तिकगतौ ८० | खगथधभाणहभारो ३२९
क्रूरा रूक्षारुणोद्वृत्ता १२ | खगथधमा उण ३२८
कृत्वा गात्रं ततो गच्छेत् १६६ | खटकास्यौ करौ स्यातां ८०
कृत्वा गात्रं तथा गच्छेत् १४३ | खटकावर्धनमानौ १५१
कृत्वावहिरस्थं स्थानन्तु १६४, १६६ | खलो बलो बलो मालो २९६
कृत्वादौ समपादं तु १२४ | खस्थानाच्चैव नारीणां १६९
कृत्वा नामितटे हस्तं १४३ | खण्डैस्त्रिभिश्चतुर्भिर्वा ९६
कृत्वोर्ध्वजानुचरणं ११७ | खस्थानां स्यन्दनस्थानां १०६
कृत्वा समपदं स्थानं ९२ | खेटकं भ्रामयेत् पश्चात् १०९
कृतिश्च प्रकृतिश्चैव २२४ | खेटकेन च कर्तव्यः १०९
कृतेन रमणस्य किं २६२ | खयातरूपावृत्ते २२६
कृतौ शतसहस्राणि २१६ | ग
कृशस्यापि हि कर्तव्या १७२ | गङ्गासागरमध्ये तु ३४५
केतकीकुसुमपाण्डुर २४३ | गङ्गेवमेघोपूगमे २६४
केतकीकुसुमपाण्डुरदन्तः २९३ | गघङजझअडदण २०३
केतुमय्यां गणाः प्रोक्ताः २६५ | गच्छेत् तं त्यक्त्वा २४४
केवलं तद्य निक्षेपं १४८ | गच्छेद्यभ्यन्तरं जानु ८९
केवलं पृष्ठतः शस्त्रं ११० | गच्छेत् सललितं पादैः १३६
केशदेशाद्विनिष्क्रान्तौ ७८ | गच्छेत्तथाध्यर्धिकया १४०
केशपाशच्छृदा २४० | गजदन्तोऽबहिस्थश्च ३९
केशैः स्नानाद्यैः २५१ | गजदन्तः स तु करः ७०
कोटिश्चैवहि वृत्तानि २१७ | गजाश्वाजाविकोष्ट्रादि २४४
कोपे वितर्के हेलायां २६ | गणेषु त्रिषु पादस्य २७१
कोऽसाविति निर्देशे ५३ | गण्डयोर्लक्षणं प्रोक्तं २९
कोसखास्तोसलाश्चैव १८८ | गतिरपि चरणावलग्न १३९
कौतुकविवाहयोगः ४८ |

पद्यार्थानुक्रमणिका ५२३
गतिरेवं प्रकर्तव्या १३८ गुणाभिधानैर्विविधै २८०
गतिः खिन्ना चेयं २४६ गुणाभिवादं दोषाद्वा ३२३
गतिष्वधमपात्राणां ८९ गुणा विपर्ययादेषां ३००
गतिश्च वार्षगण्येऽपि ११० गुणैर्बहुभिरेकार्थे ३१८
गतिः स्थितलया कार्या १३४ गुरुमध्यविहीनस्तु २६९, २७०
गतिः शृङ्गारिणी कार्या १३५ गुरुभार्या च वक्तव्या ३५३
गतिं तत्र प्रयुञ्जीत १३८ गुरुर्दीर्घ प्लुतञ्चैव २२०
गतिः प्रयोक्तृभिः कार्या १४१ गुरुपूर्वो भकारः स्यात् २१९
गतिप्रचारं विभजेत् १५८ गुरुयुगमन्त्ये २२५
गतिप्रचारस्तु मयो १७७ गुरुलध्वक्षरकृतः २१९
गतिप्रचारानुगतं १९४ गुर्वक्षरप्रायकृतं ३०८
गतौ नमेत चेटानां १५९ गुरूण्यान्यानि पादे तु २३४
गन्तव्यं विक्रमैर्विप्राः १६१ गुरूण्यष्टाक्षरे पाद २२८
गम्भीरार्थानि नामानि ३५७ गुरूण्येकादशे पादे २३२, २३३
गम्याभूमिरगम्या वा १९७ गुरूणि जागते पादे २३५
गमनेन निष्षण्णः स्यात् १५६ गुरूणि द्वादशे पादे २३८
गर्भिणीव दृश्यसे २३१ गुह्यार्थवचने चैव ३६४
गर्वेच्छादर्शने चैव ८ गुरूणि यस्मिन् सा २२८
गर्वोऽहमिति ललाटे ५३ गुरूणि यस्याः सा २२९
गर्वेऽप्यहमिति तज्ज्ञैः ४१ गुरूणि त्रैष्टुभे पादे २३१
गर्वे विलासे विम्बोके ९ गूढार्थमर्थान्तर २१७
ग्रथिताः पादयोगेन २६० गूढा चकिततारा च १६, १७
ग्रहनक्षत्रचरितं ३२९ गृहीत्वा वामहस्तेन ६८
ग्रहणे ह्यामिषलाभे ५४ गोष्ठीभिरुद्यानवनानि २९०
गात्रैर्विकारविक्षिप्तै १५९ ग्रथिताः पादयोगेन २६०
गाढप्रहारे कार्या च १४१ ग्रहणे ह्यामिषलाभे ५४
गान्धारश्च निषादश्च ३५८ ग्रीवाप्रदेशः कर्तव्यो १२८
गायत्रीप्रभृति स्वेषां २१५ ग्रीवाकर्माणि सर्वाणि ३६
गायत्यकस्माद् हसति १५४ ग्रीष्मो गिह्मोत्ति तथा ३३३
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च २२३ ग्लाना च शङ्किता चैव ११
ग्राम्या च भद्रति च ३५३ ग्लाने स्वप्ने विहस्ते च ७४
ग्राह्यान्युपनेयानि च ६९
ग्राह्यं विडालपदमिति ५९ च
गुणातिपाताद्दोषाद् वा ३८३ चक्रवच्चक्रवालं तद् २९३
गुणानुवादो हीनानां २१७ चक्रं तदित्पताका ५२
गुणातिपातो मधुरैः २८० चक्रस्य मोक्षणे चैव १०६
गुणातिपातातिशयौ २७५ चतुर्थमन्त्यं दशमं २३८

५२४ नाट्यशास्त्र

चतुर्भिरंशकैर्ज्ञेया २६५
चतुर्थश्च द्वितीयश्च २२८
चतुर्भिस्तु भवेद्युक्तं २१२
चतुर्थमार्थं षष्ठश्च २५४
चतुर्थाद्यक्षराद्यत्र २६३
चतुर्विधश्चैव भवेत् ५
चतुर्विंशतिके पादे २५६
चतुर्णां यत्र पादानां २९१
चतुरर्शकलं वा स्यात् १३३
चतुरस्रस्थितौ हस्तौ ७६
चतुरस्रो भवेद् वामः ७८
चतुरस्रौ तथोद्वृत्तौ ४०
चतुष्कलोऽथ द्विकलः १२९, १३१
चतुष्कलमथाधंश्च १३२
चतुष्कलो ह्यसमानां १२९
चतुस्तालो द्वितालश्च १२९
चतुस्तालान्तरोत्क्षिप्तैः १३८
चतुस्तालस्तु देवानां १२९
चतुस्तालप्रमाणेन १३२
चतुर्दशं तथान्ये द्वे १४८, २५

पद्यार्थानुक्रमणिका ५२५
जघने चपला चैव २६९
जङ्घान्विता तथोद्वृत्ता ९९
जङ्घाञ्चिता परिच्छिन्ना १०३
जङ्घा स्वस्तिकसंयुक्ता १०२
जपाध्ययनसल्लाप ३१
जलधररवं श्रुत्वा २४८
जलप्रमाणापेक्षा तु १४८
जातिचेष्टानुरूपाणि २४७
जातिभाषाश्रयं पाठ्यं ३३६
जातिहीनाश्च या नार्यः १६८
जात्या नीचेषु योक्तव्या १६०
जानाति मांसयुक्ता १७२
जानुनः कुञ्चनाच्चैव ९०
जानूपरि करं ह्येक १६०
जालवातायनादीनां ६८, ७०
जिह्वा दृष्टिरसूयायां २०
जिह्वामूलीयः कः २०४
जुगुप्सिता विस्मिता च ११
जृम्भणे चुक्कितं कार्यं ३१
ज्येष्ठे चतुष्कलं यत्र १३४
ज्येष्ठे स्वल्पप्रचारा च ७३
ज्वरात्ते च क्षुधार्ते च १३४
ज्ञेयमाम्रेडितं नाम २९५
ज्ञेयाभ्यनुक्तसिद्धिश्छ २९५
ज्ञेयस्त्वभिनयो विप्राः ५
ज्ञेया शतसहस्राणां २१७
ज्ञेया ह्यष्टौ स्त्रिकास्तत्र २१९
ज्ञेयो वै वर्धमानस्तु ७०
ज्ञेयौ गरुडपक्षौ च ४०
ज्ञेयौ प्रयोक्तृभिर्नित्यं ७७
ज्ञेयो वै निषधो नाम ६८
ट
टठडढणा मूर्धन्याः २०४
ड
ड इति च भवति टकारो ३३०
डिमः समवकारश्च १९३
डोलापादा तथाक्षिप्ता ९७
त
त एव सर्वे कर्तव्या २७३
तच्छन्दो नामतो ज्ञेयं २२३
ततो भाण्डोन्मुखो गच्छेत् १३१
ततो वामपदं दद्यात् १६५
ततः पाठ्यं प्रयुञ्जीत ३५७
ततः सल्ललितं पादं १६५
तत्त् काव्यीयमकं नाम २९२
तत्र पुरुषादिस्तज्ज्ञैः २११
तत् प्राहुः सप्तविधं २०७
तत् प्रियं वचनं ज्ञेयं ३