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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

दिव्यान्‍याप्यप्रमाणानि नीयन्ते वाक्यवञ्चकैः ।
देशकालप्रमाणादावप्रमादो भवेदतः ॥ ३० ॥
वञ्चक, दुर्जन तथा वाणी-कुशल आदि चतुर पुरुष मानवीय प्रमाणों—साक्षी,
लेख तथा अधिकार आदि—के अभाव में अग्नि या जल आदि दिव्य प्रमाणों की
उपेक्षा करके अपना पक्ष प्रस्तुत करने लग जाते हैं। अतः विवाद से सम्बन्धित
व्यक्तियों को देश, काल और प्रमाण आदि के सम्बन्ध में विशेष सावधान रहना
चाहिए, प्रमाद कदापि नहीं करना चाहिए, अन्यथा उनके द्वारा ठगे जाने की
सम्भावना बढ़ जाती है।
तत्र शिष्टं छलं राजा मर्षयेद् धर्मसाधनः ।
भूतमेव प्रपद्येत धर्ममूला यतः श्रियः ॥ ३१ ॥
राजा की लक्ष्मी और कीर्ति धर्म पर आश्रित होती है, अर्थात् धर्म की रक्षा
करने से ही राजा के यश का प्रसार और धन का विस्तार होता है। अतः राजा के
लिए न्याय के अनुसार व्यवहार करना आवश्यक है। उसे देखना चाहिए कि वादी
का अभियोग मिथ्या है अथवा सत्य है। उसे सत्य के निर्णय के लिए सदैव सत्पथ
का ग्रहण करना चाहिए, अर्थात् राग-द्वेष से सर्वथा मुक्त होकर निष्पक्ष दृष्टिकोण
अपनाना चाहिए।
टिप्पणी — असहाय भाष्यकार के अनुसार—यदि मिथ्या अभियोग लगाने
वाला वादी अपने अपराध को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लेता है और
पश्चात्ताप करता है, तो राजा को उसे दण्डित नहीं करना चाहिए, अपितु क्षमा कर
देना चाहिए। भाष्यकार ऐसे छल को प्रमादवश शिष्ट व्यवहार मानने वाले को क्षमा
का पात्र घोषित करते हुए लिखते हैं।
यदि वादी स्वकीयं प्रमादाभिहितं वचनं ज्ञात्वा वटपत्रकग्रामं च सम्यक्
स्मृत्वा तमेव वटपत्रकग्रामेस्थितसंव्यवहारं कीर्तयति, तदा वादिना तत्स्वकीयं
प्रमादाभिहितं छलं शिष्टं कथितमित्यर्थः। तं वादिशिष्टच्छलमनमर्षयेद्
धर्मसाधनः क्षमयेदित्यर्थः ।
धर्मेणोद्धरतो राज्ञो व्यवहारान् कृतात्मनः ।
सम्भवन्ति गुणाः सप्त सप्त वह्नेरिवार्चिषः ॥ ३२ ॥
अग्नि की सात रश्मियां (ज्योति-किरणें) होती हैं। सूर्य को भी 'सप्तरश्मि'
कहा गया है। वस्तुतः जिस प्रकार रंगों की संख्या सात है, उसी प्रकार सूर्य की
किरणें तथा अग्नि-शिखाएं भी सप्तवर्ण होती हैं। धर्म के अनुसार व्यवहार देखने
वाले राजा को भी अग्नि की सात रश्मियों के समान अगले पद्य में निर्दिष्ट सात गुणों
के विकास का लाभ मिलता है।
नारदस्मृति / 25

धर्मश्चार्थश्च कीर्त्तिश्च लोकपङ्क्तिरुपग्रहः ।
प्रजाभ्यो बहुमानं च स्वर्गे स्थानं च शाश्वतम् ॥ ३३ ॥
धर्म एवं न्यायपूर्वक व्यवहार के द्रष्टा राजा के निम्नोक्त सात गुण विकसित
होते हैं—धर्म, अर्थ, कीर्ति, प्रजा का अनुराग, प्रजा की भक्ति-भावना, प्रजा के द्वारा
सम्मान तथा मरणोपरान्त स्वर्ग में सुरक्षित स्थान।
टिप्पणी—शिष्टों पर अनुग्रह तथा दुष्टों के निग्रह से धर्म की रक्षा होती है,
धर्म से धन की प्राप्ति और उससे सुख मिलता है। दुष्टों को दण्डित करने से प्रजा को
निर्भयता और निश्चिन्तता प्राप्त होती है। किसी प्रकार के उत्पातों के होने की
आशंका समाप्त हो जाती है। इससे प्रजा अपने कार्य-व्यापार को तन्मयता से कर
पाती है। इससे जहां राजा को यश, प्रजा का अनुराग और उसकी श्रद्धा मिलती है,
वहां देश की समृद्धि को भी चार चांद लग जाते हैं। प्रजा भी ऐसे राजा की मंगल
कामना करती है और इस प्रकार धर्म-रक्षा से सद्गति सुनिश्चित हो जाती है।
तस्माद्धर्मासनं प्राप्य राजा विगतमत्सरः ।
समः स्यात् सर्वभूतेषु बिभ्रद्वैवस्वतं व्रतम् ॥ ३४ ॥
इस प्रकार सिंहासन पर आसीन राजा को धर्म को प्रमुखता देते हुए राग-द्वेष
तथा ईर्ष्या-स्पर्धा आदि से सर्वथा मुक्त होकर यमराज के व्रत—व्यक्ति द्वारा कृत
शुभाशुभ कर्मों के अनुरूप ही उन्हें सत्-असत् फल प्रदान करना—का निर्वाह
करना चाहिए, अर्थात् उसे सदाचारी धर्मात्माओं पर अनुग्रह और दुराचारी दुष्टों का
निग्रह करना चाहिए। उसे प्रजाजनों के आचरण के अनुरूप ही उनसे व्यवहार
करना चाहिए, न कि स्वेच्छा बरतनी चाहिए।
टिप्पणी—विष्णु के अनुसार—विवस्वान् यमदेव का ही एक नाम है और
वह प्रत्येक प्राणी के हृदय में स्थित है। यदि उससे व्यक्ति का कोई विवाद-भय
आदि नहीं, तो व्यक्ति को आत्मरक्षा के लिए किसी पुण्यानुष्ठान की कोई आवश्यकता
ही नहीं है—
यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैष हृदिस्थितः ।
तेन चेदविवादस्ते मा गङ्गां मा कुरुं गम ॥
इसी सन्दर्भ में यम की कार्यप्रणाली का परिचय देते हुए आचार्य महोदय का
कथन है—यमो धर्मराजः तस्य व्रतं लोकानां स्वकृत शुभाशुभफलदत्वम्।
अर्थात् यम इसीलिए धर्मराज कहलाते हैं; क्योंकि वे व्यक्ति द्वारा किये शुभ-अशुभ
कर्मों का शुभ-अशुभ फल देते हैं। अतः राजा के लिए भी उचित है कि वह—
सर्वभूतेषु समः स्यात्—सभी प्रजाजनों के साथ बिना किसी भेद-भाव के समान
व्यवहार करे।
26 / नारदस्मृति

धर्मशास्त्रं पुरस्कृत्य प्राड्विवाकमते स्थितः।
समाहितमतिः पश्येद् व्यवहाराननुक्रमात् ॥ 35 ॥
राजा को व्यवहार की परीक्षा करते समय निम्नोक्त तीन तथ्यों को पर्याप्त
महत्त्व एवं गौरव देना चाहिए—
प्रथम, धर्मशास्त्र (आचार संहिता Penal Code) में निर्धारित नियम, विनियम
एवं विधान।
द्वितीय, क़ानूनवेत्ता न्यायाधिकारियों अथवा वकीलों द्वारा धर्मशास्त्र के आधार
पर निर्धारित मत।
तृतीय, अपनी बुद्धि को शान्त-संयत रखते हुए वादी-प्रतिवादियों से पूछे
गये प्रश्नों के उत्तरों से प्राप्त सत्य।
इन्हीं तीन तत्त्वों को आधार बनाकर राजा अथवा राज-प्रतिनिधि को एक के
उपरान्त दूसरे व्यवहार को देखना-परखना चाहिए।
टिप्पणी-मनु ने राजा की व्यस्तता को देखते हुए अपने स्थान पर प्रतिनिधि
नियुक्त करने का अधिकार दिया है—
यदा स्वयं न कुर्यात्तु नृपतिः कार्यदर्शनम्।
यदा नियुञ्ज्याद् विद्वांसं ब्राह्मणं कार्यदर्शने ॥
आगमः प्रथमं कार्यों व्यवहारपदं ततः।
चिकित्सा निर्णयश्चैव दर्शनं स्याच्चतुर्विधम् ॥ 36 ॥
व्यवहार-प्रक्रिया के चार पक्ष होते हैं—
प्रथम, किसी व्यवहार के स्वीकृत (Admit) होने के लिए विषय से सम्बद्ध
कोई लिखित प्रमाण होना चाहिए। इसी का नाम आगम है। इसी के अन्तर्गत
वर्गीकरण है, अर्थात् विवाद किस वर्ग के अन्तर्गत है, अर्थात् क्या वह लेन-देन
सम्बन्धी, अर्थात् दीवानी (Civil Suits) अथवा अपराध सम्बन्धी, अर्थात् फ़ौजदारी
(Criminal) है। इन सब तथ्यों का निर्धारण भी आगम के अन्तर्गत आता है।
द्वितीय, व्यवहार संज्ञा पाने के उपरान्त व्यवहार का द्वितीय चरण है—
उसका लिखित उत्तर-प्रत्युत्तर। आज की भाषा में इसे दावा-जवाबदावा कहा जाता
है। इसी का नाम प्रचलन है।
तृतीय, वादी अथवा पक्षी द्वारा लिखित दावा—विपक्षी द्वारा जवाब देना—
पक्षी द्वारा वापसी जवाबदावा तथा प्रतिरक्षी द्वारा फिर से जवाबदावा आदि प्रक्रिया
के उपरान्त मौखिक (face-to-face) प्रश्नोत्तर (बयान) तथा बहस (Argument)
आदि तृतीय चरण है—इसी का नाम क्रिया अथवा चिकित्सा है।
चतुर्थ, चिकित्सा के परिणाम के रूप में दिया जाने वाला निर्णय फ़ैसला
(judgment) चतुर्थ चरण है—इसी का पारिभाषिक नाम दर्शन है।
नारदस्मृति / 27

टिप्पणी—असहाय भाष्यकार ने इस पद्य के अनुरूप अपना मत इस प्रकार
व्यक्त किया है—आगमः सम्बन्धः । तत्तदृणादानाद्यष्टादशपदानां मध्ये
कतमदिदं व्यवहारपदम्, तस्यापि मध्ये कतमोऽयं तदीयशाखाभेद इति
व्यवहारस्य नाम करणीयम्। ततस्तस्य चतुष्पादक्रियानिर्वाहादिका व्याधेरेव
चिकित्सा करणीया। ततः प्रमाणपरीक्षानुसारेण तस्य व्यवहारस्य निर्णयः
कार्य इति व्यवहारदर्शनं स्याच्चतुर्विधम्।
‘व्यवहार कल्पतरु’ के अनुसार आगम का अर्थ उत्तर प्रत्युत्तर को लिपिबद्ध
करना तथा चिकित्सा का अर्थ उत्तर प्रत्युत्तर पर विचार करना है—आगमः
भाषोत्तरयोः श्रुत्वा लेखनम्। चिकित्सा विचारणा।
धर्मशास्त्रार्थशास्त्राभ्यामविरोधेन यत्नतः ।
सम्पश्यमानो निपुणं व्यवहारगतिं नयेत् ॥ 37 ॥
धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र में निपुण राजा को किसी के प्रति पक्षपात—
अनुग्रह अथवा विरोध—का भाव न दिखाते हुए तथा अत्यन्त सावधान होकर और
मूल तथ्यों तक पहुंचने के लिए कठोर श्रम करते हुए ही, प्रत्येक व्यवहार का
निरपेक्ष भाव से निरीक्षण-परीक्षण करना चाहिए।
टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार—कभी कभी कहीं पर धर्मशास्त्रोक्त
अर्थशास्त्र के विरुद्ध और अर्थशास्त्रोक्त धर्मशास्त्र के विरुद्ध मिलता है। ऐसी
स्थिति में राजा को लोकाचार और अपने विवेक का आश्रय लेना चाहिए। इसके
अतिरिक्त न्यायविदों से भी परामर्श करना चाहिए, परन्तु लोकाचार के विरुद्ध कभी
नहीं जाना चाहिए।
किञ्चिद्धर्मशास्त्रोक्तमर्थशास्त्रविरुद्धं भवति। किञ्चित्पुनरर्थशास्त्रोक्तं
धर्मशास्त्रविरुद्धं भवति। तयोरितेरेतरतारतम्यालोचनेन यथा लोकाचारविरुद्धं
न भवति तथा ससभ्योऽपि राजा व्यवहारगतिं नयेत्।
याज्ञवल्क्य ने भी अपनी स्मृति में लोकाचार को महत्त्व देते हुए लिखा है—
यद्यपि शिष्टं लोकविरुद्धं नाचरणीयम् न करणीयम्।
यथा मृगस्य विद्धस्य व्याधे मृगपदं नयेत् ।
कक्षे शोणितपादेन तथा धर्मपदं नयेत् ॥ 38 ॥
जिस प्रकार व्याध अपने बाण से क्षत-विक्षत होकर भाग गये मृग के शरीर
से बहते और पृथ्वी पर गिरे रक्त को देखता हुआ उसकी खोज करता है, उसी प्रकार
धर्म व्यवहार के आसन पर प्रतिष्ठित राजा को प्रत्येक व्यवहार के प्रत्येक चरण की
गहन समीक्षा परीक्षा और उपलब्ध प्रमाणों-साक्ष्यों के निरीक्षण-परीक्षण के द्वारा
सत्य पर पहुंचने और वादी को न्याय दिलाने का प्रयास करना चाहिए।
28 / नारदस्मृति

यत्र विप्रतिपत्तिः स्याद्धर्मशास्त्रार्थशास्त्रयोः ।
अर्थशास्त्रोक्तमुत्सृज्य धर्मशास्त्रोक्तमाचरेत् ॥ ३९॥
व्यवहार का निर्णय करते समय अथवा अपराधी को दण्डित करने के समय
अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र में मतभेद मिलने की स्थिति में राजा को अर्थशास्त्र के मत
की अपेक्षा धर्मशास्त्र के कथन को ही वरीयता एवं मान्यता देनी चाहिए। वस्तुतः
अर्थशास्त्र के किसी भी सिद्धान्त की धर्मशास्त्रसम्मत होने पर ही मान्यता एवं
प्रामाणिकता है। धर्मशास्त्र के विरुद्ध तो किसी भी अन्य शास्त्र के किसी भी कथन
का कोई महत्त्व ही नहीं है।
टिप्पणी—याज्ञवल्क्य भी इसी मत का समर्थन करते हुए अपनी स्मृति में
लिखते हैं—अर्थशास्त्रात्तु बलवद् धर्मशास्त्रमिति स्थितिः ।
व्यवहारमातृकाकार का भी यही मत है—अस्मिन्नप्यर्थशास्त्रे धर्मशास्त्रा-
विरुद्धोयोंऽशः स उपादेयः । इतरस्तु परित्याज्यः ।
असहाय भाष्यकार भी धर्मशास्त्र को वरीयता देते हुए लिखते हैं—
यदा व्यवहारस्य निर्णयदानकाले तथा दण्डनिगमनावसरे सर्वशास्त्रोक्ता
महती लघ्वी वा आकोटना दृश्यते । धर्मशास्त्रोक्ता चान्यादृशाकारा दृश्यते ।
तदा तयोः शास्त्रयोः परस्परं विप्रतिपत्तौ विसंवादे अर्थशास्त्रोक्तमुत्सृज्य
धर्मशास्त्रोक्तमेवाचरेत् ।
धर्मशास्त्रविरोधे तु युक्तियुक्तो विधिः स्मृतः ।
व्यवहारो हि बलवान् धर्मस्तेनावहीयते ॥ ४० ॥
विभिन्न धर्मशास्त्रों में परस्पर विरोध अथवा धर्मशास्त्र और लोक-व्यवहार
में मतभेद मिलने पर अपने विवेक से युक्ति-युक्त और तर्कसंगत का ग्रहण तथा शेष
अयुक्त का त्याग करना चाहिए। तर्क और युक्ति की संगति के लिए लोक-व्यवहार
को ही आधार बनाना चाहिए। शिष्ट जनों के आचार-व्यवहार को औचित्य की
कसौटी मानना चाहिए; क्योंकि धर्म के निर्णय के लिए इससे अधिक प्रामाणिक
और कोई आधार हो ही नहीं सकता। लोक-व्यवहार को शास्त्र से कहीं अधिक
गौरव देना चाहिए।
टिप्पणी—'श्रीमद्भगवद्गीता' में श्रेष्ठ पुरुष के आचरण का दूसरे लोगों
द्वारा अनुसरण किये जाने का उल्लेख हुआ है—
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
सः यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
शिष्ट जनों के आचरण-रूप लोक-व्यवहार की प्रामाणिकता की पुष्टि करते
हुए असहाय भाष्यकार का कथन है—यत्र पुनस्थार्पत्या विप्रतिंपत्तिः स्याद्धर्म-
नारदस्मृति / 29

शास्त्रोक्तलोकव्यवहारयोः तत्र धर्मशास्त्रोक्तमुत्सृज्य लोकव्यवहारस्थमाचरेत्।
यतः सः एव बलवान्।
इस सम्बन्ध में वे दो उदाहरण प्रस्तुत करते हैं—
प्रथम, धर्मशास्त्र, अपुत्रा स्त्री के पति खो जाने, मर जाने, संन्यासी बन जाने,
जाति से पतित हो जाने तथा नपुंसक सिद्ध होने पर देवर से सम्बन्ध योजना द्वारा
पुत्रोत्पत्ति की अनुमति देता है, परन्तु लोक द्वारा स्वीकृत न होने पर आज यह प्रथा
अमान्य, अतः लुप्त हो गयी है।
द्वितीय, दक्षिण भारत में मामा भांजी का विवाह सम्बन्ध धर्मशास्त्रसम्मत
होने पर भी लोकनिन्दित होने से आज अतीत की कथा बनकर रह गया है।
इस प्रकार आचार्य महोदय का स्पष्ट कथन है कि शास्त्र की दुहाई देकर
देश, कुल और समाज में परम्परा से प्रचलित प्रथा का अनादर कभी नहीं करना
चाहिए—देशे देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः। स शास्त्रार्थ बलान्नैव लंघनीयः
कदाचन।
सूक्ष्मो हि भगवान् धर्मः परोक्षो दुर्विचारणः।
अतः प्रत्यक्षमार्गेण व्यवहारगतिं नयेत् ॥ 41 ॥
शास्त्र से लोक व्यवहार की वरीयता के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करते हुए
देवर्षि नारद कहते हैं—धर्म भगवान् है, अतः वह सूक्ष्म है, उसे देख पाना सहज-
सरल कार्य नहीं। इसके अतिरिक्त वह प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष है, दृष्टिगोचर है ही
नहीं। साथ ही वह विचार की सीमा से भी बाहर है। इसके विपरीत व्यवहार स्थूल,
प्रत्यक्ष एवं सरल-सुबोध है, अतः शास्त्र की अपेक्षा व्यवहार को अपनाने में ही
बुद्धिमत्ता है।
यात्यचौरोऽपि चौरत्वं चौरश्चायात्यचौरताम्।
अचौरश्चौरतां प्राप्तो माण्डव्यो व्यवहारतः ॥ 42 ॥
व्यवहार-युक्ति द्वारा विवेचन एवं निर्णय की प्रक्रिया भी सर्वथा निर्दोष नहीं
है। व्यवहार में अचोर को चोर और चोर को अचोर समझ लेना बड़ी बात नहीं।
उदाहरणार्थ, माण्डव्य महर्षि ने कोई चोरी नहीं की थी, परन्तु मौनव्रती होने के
कारण राजा ने अपने द्वारा पूछे प्रश्नों का उत्तर न देने—मौन—को उनके अपराध
की स्वीकृति मानकर उन्हें दण्डित कर दिया। इस प्रकार वे चोर न होते हुए भी
चोरी के दण्ड के भागी हुए। इस उदाहरण से यह सिद्ध होता है कि युक्ति द्वारा
तथ्य निर्णय करने में भी विशेष सावधानी अपेक्षित होती है।
स्त्रीषु रात्रौ बहिर्ग्रामादन्तर्वेश्मन्यरातिषु।
व्यवहारः कृतोऽप्येषु पुनः कर्त्तव्यतामियात् ॥ 43 ॥
30 / नारदस्मृति

निम्नोक्त स्थानों एवं परिवेशों में किया गया व्यवहार सदैव पुनरीक्षा (Revision)
का विषय होता है। इसका स्पष्ट कारण यह है कि इन स्थानों-स्थितियों में अनुराग,
भय तथा प्रमाद का वातावरण रहता है, अतः लिये गये निर्णय को विवेकसम्मत
नहीं माना जा सकता।
स्त्रियों की संगति में अथवा स्त्रियों के द्वारा रात्रि के समय, ग्राम के बाहर,
वन आदि निर्जन स्थान में, घर के भीतर तथा शत्रुओं की परिषद् में किये गये
व्यवहार को अन्तिम तथा न्यायसंगत नहीं मानना चाहिए।
गहनत्वाद् विवादानामसामर्थ्यात् स्मृतेरपि।
ऋणादिषु हरेत्कालं कामं तत्त्वबुभुत्सया ॥ 44 ॥
अपनी विविधता और जटिलता के कारण एक तो विवाद गहन है, दूसरे
मनुष्यों की स्मरणशक्ति सीमित है, कार्य अधिक है और समय व क्षमता अल्प है,
अतः व्यस्तता और व्यग्रता है। यही कारण है कि उनके लिए ऋण आदि से
सम्बन्धित सभी लेन-देन को स्मरण रख पाना तथा सभी तथ्यों की गहराई में
उतरना सम्भव ही नहीं होता।
गोभूहिरण्यस्त्रीस्तेयवाग्दण्डात्ययिकेषु च।
साहसेष्वभिशापे च सद्य एव विवादयेत् ॥ 45 ॥
निम्नोक्त से सम्बन्धित विवादों का निर्णय (व्यवहार) तत्काल करना चाहिए—
गाय, धरती, स्वर्ण, स्त्री, चोरी, गाली-गलौच, मार-पीट, हत्या, डकैती तथा
अभिशाप-दुर्भावना। ऋण आदि के लेन-देन से सम्बन्धित मामलों में देर-सवेर की
जा सकती है, परन्तु उपर्युक्त मामलों में तो किसी भी कारण से की गयी देरी
अनुचित होती है।
टिप्पणी—याज्ञवल्क्य ने भी अपने स्मृति-ग्रन्थ में चोरी, डाका, गाली-
गलौच, गो-हरण, स्त्री-हरण तथा शाप आदि के विवादों को तत्काल सुलझाने का
निर्देश दिया है—
साहसस्तेयपारुष्यगोभिशापात्यये स्त्रियाम्।
विवादयेत् सद्य एव कालोऽन्यत्रेच्छया स्मृतः॥
मिताक्षराकार के अनुसार 'विवादयेत्' का अर्थ है—विवादं समापयेदित्यर्थः,
अर्थात् विवाद को अविलम्ब समाप्त करना।
अनावेद्य तु यो राज्ञे सन्दिग्धेऽर्थे प्रवर्त्तते।
प्रसह्यः स विनेयः स्यात् स चास्यार्थो न सिद्ध्यति ॥ 46 ॥
किसी भी विवाद के उत्पन्न होने पर राजा को आवेदन न करके अपने आप
कार्यवाही करने वाले, अर्थात् क़ानून को अपने हाथ में लेने वाले व्यक्ति को विधि
के अनुसार न केवल दण्डित करना चाहिए, अपितु उसके द्वारा लिये गये सभी
नारदस्मृति / 31

निर्णयों को भी निरस्त कर देना चाहिए।
वक्तव्येऽर्थे न तिष्ठन्तमुत्क्रामन्तं च तद्वचः।
आसेधयेद् विवादार्थी यावदाह्वानदर्शनम्॥ 47॥
प्रतिवादी द्वारा अपने वक्तव्य पर स्थिर न रहने और पूर्ववक्तव्य से विरुद्ध
अथवा भिन्न वक्तव्य देने पर राजा के आदेश होने तक वादी के व्यवहार को निरुद्ध
अथवा स्थगित समझना चाहिए; क्योंकि यह निर्णय लेना राजा का कार्य है कि
प्रतिवादी के पूर्ववक्तव्य के अतिक्रमण करने वाले नये वक्तव्य को मान्यता दी जाये
अथवा नहीं। वादी को तो राजा के आदेश की प्रतीक्षा ही करनी चाहिए।
स्थानासेधः कालकृतः प्रवासात्कर्मणस्तथा।
चतुर्विधः स्यादासेधो नासिद्धस्तं विलङ्घयेत्॥ 48॥
व्यवहार का आसेध—अवरोध, विरोध अथवा स्थगन (Suspension)—
चार प्रकार का होता है—स्थानासेध, कालासेध, प्रवासासेध तथा कर्मासेध। आसिद्ध
(प्रतिबन्धित) व्यक्ति को इन चारों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
नदीसन्तारकान्तारदुद्देशोपप्लवादिषु ।
आसिद्धस्तं परासेधमुत्क्रामन्नापराध्युयात्॥ 49॥
स्थान-विशेष को न छोड़ने का राजकीय आदेश स्थानासेध कहलाता है। इस
सम्बन्ध में यदि नदी-पार के स्थान पर भयानक, दुर्गम वन में भूकम्प आदि
उपद्रव-ग्रस्त स्थान पर तथा प्रदूषित-दुर्गन्धित (स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिप्रद)
स्थान पर रखा गया व्यक्ति स्थान बदल लेता है, तो उसे राजाज्ञा के उल्लंघन का
दोषी-अपराधी नहीं माना जाना चाहिए। यदि ऐसा व्यक्ति नदी-पार चला जाता है
अथवा दुर्गम-भयंकर निर्जन वन को छोड़कर ग्राम में आ जाता है अथवा किसी
निरापद एवं स्वच्छ स्थान पर चला जाता है, तो उसे आज्ञा-भंग नहीं मानना
चाहिए।
राजप्रत्यक्षदृष्टानि सुहृत्सम्बन्धिबान्धवैः।
प्राप्तद्विगुणदण्डानि कार्याणि पुनरुद्धरेत्॥ 50॥
स्वयं राजा द्वारा अथवा अपने बन्धु, मित्र अथवा आप्त (प्रामाणिक) पुरुष
द्वारा भली प्रकार से सोच-विचार के उपरान्त दिये गये निर्णय के विरुद्ध पुनर्विचार
के लिए याचिका प्रस्तुत करने वाले की प्रार्थना को निर्णय के सही पाये जाने पर
दुगुना दण्ड भुगतने की शर्त को मानने पर ही स्वीकार करना चाहिए।
आसेधकाल आसिद्ध आसेधं यो व्यतिक्रमेत्।
स विनेयोऽन्यथा कुर्वन्नासेधा दण्डभाग् भवेत्॥ 51॥
दोनों—आसेध (House Arrest) की अवधि में आसेध का अतिक्रमण करने
वाला, अर्थात् अपराधी को समय से पहले छोड़ देने वाला अधिकारी व आसेध के
32 / नारदस्मृति

अन्तर्गत न आने वाले व्यक्ति-को बन्दी बनाकर रखने वाला अधिकारी ही दण्ड
के पात्र होते हैं; क्योंकि इन दोनों ही स्थितियों में राजाज्ञा का उल्लंघन तथा विधि
की अवमानना होती है।
निम्नोक्त चौदह प्रकार के व्यक्तियों को कभी बन्दी बनाकर नहीं रखना चाहिए।
इनके कार्य-व्यापार को देखते हुए राजा इन्हें रोककर रखने का आदेश कभी नहीं
देता—
निर्वेष्टुकामो रोगार्त्तो यियक्षुर्व्यसनेस्थितः।
अभियुक्तस्तथान्येन राजकार्योद्यतस्तथा ॥ 52 ॥
गवां प्रचारे गोपालाः शस्यारम्भे कृषीबलाः।
शिल्पिनश्चापि तत्कालमायुधीयाश्च विग्रहे ॥ 53 ॥
अप्राप्तव्यवहारश्च दूतो दानोन्मुखो व्रती।
विषमस्थश्च नासेध्यो न चैतानाह्वयेन्नृपः ॥ 54 ॥

  1. विवाह के लिए वरण किया गया युवक।
  2. (असाध्य एवं विषम) रोग-पीड़ित।
  3. यज्ञ-यागादि सम्पन्न करने का इच्छुक।
  4. (दुर्भिक्ष आदि) विपत्ति-ग्रस्त।
  5. किसी अन्य अभियोग में फंसा होने से दूसरे न्यायाधिकरण का सामना
    कर रहा।
  6. राजकार्य में लगा।
  7. गो-सेवा में नियुक्त गोपाल।
  8. कृषि, शस्यक्षेत्र से जुड़ा (साग-सब्जी और पशुओं का चारा उगाने
    वाला) किसान।
  9. शिल्प-कार्य से जुड़ा शिल्पी।
  10. युद्ध में संलग्न सैनिक।
  11. अबोध बालक।
  12. सन्देशवाहक दूत।
  13. दान करने को उद्यत व्यक्ति।
  14. विषम स्थान पर रहने वाला।
    नाभियुक्तोऽभियुञ्जीत तमतीत्वार्थमन्यतः।
    न चाभियुक्तमन्येन न विरुद्धं वेद्धुमर्हति ॥ 55 ॥
    अभियोग के सुनने के समय सम्बद्ध विषय को छोड़कर किसी अन्य विषय
    की चर्चा नहीं करनी चाहिए और न ही किसी अन्य विषय का उपस्थापन करना
    चाहिए। इसके अतिरिक्त एक मामले में उलझे व्यक्ति पर उस मामले के निपटने से
    नारदस्मृति / 33

पहले कोई दूसरा मामला नहीं चलाना चाहिए; क्योंकि पहले से ही दुखी प्राणी को
और अधिक दुखी नहीं करना चाहिए।
टिप्पणी—याज्ञवल्क्य स्मृति में भी इस मत का समर्थन किया गया है—
अभियोगमनिस्तीर्य नैनं प्रत्यभियोजयेत्।
अभियुक्तं च नान्येन नोक्तं विप्रकृतिं नयेत्॥
अर्थात् जब तक अभियुक्त एक अभियोग में उलझा है, उससे निपट नहीं
जाता है, तब तक किसी अन्य द्वारा उसे किसी दूसरे मामले में नहीं फंसाना चाहिए।
यमर्थमभियुञ्जीत न तं विप्रकृतिं नयेत्।
नान्यत् पक्षान्तरं गच्छेद् गच्छन् पूर्वात् स हीयते ॥ ५६ ॥
अभियोग को एक बार जिस वर्ग, श्रेणी तथा उपवर्ग में रखा जाता है, उसे
कभी बदलना नहीं चाहिए। उसी परिप्रेक्ष्य में उस पर विचार, विवाद, निरीक्षण
और निर्णय करना चाहिए। इसके अतिरिक्त अभियुक्त को भी अपने पक्ष को छोड़कर
दूसरे पक्ष को ग्रहण नहीं करना चाहिए। एक बार जो स्थिति अपना ली, उसी पर
डटे रहना चाहिए। स्थिति बदलते रहने से मामले के प्रति न्याय नहीं हो पाता।
टिप्पणी—याज्ञवल्क्यस्मृति में इस तथ्य को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया
है—यदि स्वर्ण की चोरी का मामला दर्ज कराया गया है, तो कभी धान्य की चोरी
की बात नहीं करनी चाहिए। न ही साक्षियों को स्वर्ण की चोरी से भिन्न कुछ कहना
चाहिए। इतना ही नहीं, अभियुक्त ने स्वर्ण के साथ-साथ धान्य भी चुराया है—यह
भी नहीं कहना चाहिए। ऐसा न करने वाले को निश्चित रूप से पराजय का मुख ही
देखना पड़ता है—'हिरण्यं लेखयित्वा साक्षिप्रश्नकाले धान्यमिति। नान्यत्पक्षान्तर-
मिति गच्छेत् साक्षिणमुद्दिश्येत्युक्तम्। नार्थान्तरमुद्दिश्येति। इदमन्यन्मम धारयति
तत् तावद् दाप्यतां तिष्ठन्तु साक्षिण इति। स पूर्वोक्तादर्थाद्धीयते। तत्र पराजीयत्
इत्यर्थः। तच्च न लभते, दण्डश्चेति।'
न च मिथ्याभियुञ्जीत दोषो मिथ्याभियोगिनः ।
यस्तत्र विनयः प्रोक्तः सोऽभियोक्तारमाव्रजेत् ॥ ५७ ॥
काम, क्रोध तथा लोभ आदि के वशीभूत होकर कभी किसी पर झूठा
अभियोग नहीं चलाना चाहिए। मिथ्या आरोप लगाने वाले को स्मरण रखना चाहिए
कि अपराधी को दिया जाने वाला, अर्थात् निर्धारित दण्ड आरोप के झूठा प्रमाणित
होने पर मिथ्याभाषी को दिया जाता है।
टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार किसी निर्दोष पर गुरु-पत्नीगामी
का मिथ्या आरोप लगाने वाले को गुरुपत्नीगमन-जैसे जघन्य अपराध के लिए
निर्धारित दण्ड से दण्डित करना चाहिए—अगुरुतल्पगः गुरुतल्पग इत्युक्ते
गुरुतल्पगस्य यत्कार्यं तदभियोक्तुः कर्त्तव्यम्।
34 / नारदस्मृति

सापदेशं हरन्कालमब्रुवंश्चापि संसदि।
उक्ता वाचो विब्रुवंश्च हीयमानस्य लक्षणम्॥ 58 ॥
न्यायाधिकारी द्वारा न्यायालय में पूछे गये प्रश्नों का सीधे-सीधे और तत्काल
उत्तर न देकर टालमटोल करने वाले, बहाना बनाने वाले, मौन खड़े रहने वाले
अथवा अपनी ही पूर्वोक्त कथन से मुकर जाने वाले को हीनवादी (दुर्बल पक्ष) समझना
चाहिए। वादी के इस व्यवहार को उसकी पराजय का प्रथम लक्षण मानना चाहिए।
पलायते य आहूतः प्राप्तश्च विवदेन यः।
विनेयः स भवेद्राज्ञा हीन एव स वादतः ॥ 59 ॥
राजा द्वारा बुलाये जाने पर भाग खड़ा होने वाले (आज की भाषा में समन
लेने से इनकार करने वाले अथवा समन लाने वाले को घूस देकर वापस लौटा देने
वाले अथवा उसे देखते ही खिसक जाने वाले) तथा यत्न द्वारा बलपूर्वक पकड़े
जाने पर निरर्थक कलह करने वाले को न केवल दण्डित करना चाहिए, अपितु ऐसे
व्यक्ति को दुर्बल पक्ष समझते हुए हीन (पराजित) वादी भी घोषित कर देना चाहिए।
टिप्पणी — याज्ञवल्क्यस्मृति में भी दोमुखी बात करने वाले, मनमानी करने
वाले तथा राज्य द्वारा बुलाये जाने पर उपस्थित न होने वाले को दण्डनीय और हीन
(पराजित) माना गया है—
सन्दिग्धार्थं स्वतन्त्रो यः साधयेद्यश्च निष्पतेत्।
न चाहूतो वदेत् किञ्चिद्धीनो दण्ड्यश्च सः स्मृतः॥
सम्यक्प्रणिहितं चार्थं पृष्टः सन्नाभिनन्दति।
अपदिश्य च यो देश्यं पुनस्तमनुधावति ॥ 60 ॥
अपने विवाद-विषय को सोच-समझकर और तर्क-युक्ति-संगत बनाकर
प्रस्तुत करने वाले, परन्तु न्यायाधिकारियों (ज्यूरी के सदस्यों) द्वारा पूछे जाने पर
कभी एक समय अपने पक्ष में किसी लिखित प्रमाण और साक्ष्य आदि के न होने
और फिर दूसरे समय प्रमाण और साक्ष्य आदि का होना बताने वाले, अर्थात्
अस्थिर बुद्धि और अनिश्चित भाव वाले वादी को भी हीन, झूठा एवं पराजित
घोषित करना चाहिए।
सन्ति ज्ञातार इत्युक्त्वा दिशेत्युक्तो दिशेन यः।
एतैस्तु कारणैः सर्वैर्धर्महीनान् विनिर्दिशेत् ॥ 61 ॥
न्यायाधिकरण में अपने विवाद को प्रस्तुत करते समय वादी अपने पक्ष में
लिखित प्रमाण और साक्ष्य आदि का उल्लेख तो करता है, परन्तु न्यायालय द्वारा
प्रमाण और साक्ष्य दिखाने के आदेश मिलने पर उन्हें उपस्थित नहीं करता, तो ऐसे
वादी के व्यवहार को अपुष्ट एवं न्यायविरुद्ध मानते हुए उसे निरस्त कर देना चाहिए।
नारदस्मृति / 35

निर्णिक्तव्यवहारेषु प्रमाणमफलं भवेत्।
लिखितं साक्षिणो वापि पूर्वमावेदितं न चेत्॥ ६२॥
व्यवहार-निर्णय से पूर्व लिखित प्रमाण और साक्ष्य आदि प्रस्तुत करने की
अनुमति देने के लिए आवेदन न किये जाने पर अथवा आवेदन करने और अनुमति
मिलने पर यथासमय लिखित प्रमाण और साक्ष्य आदि उपस्थापित न किये जाने
पर, निर्णय घोषित हो जाने के उपरान्त प्रमाणों के उपस्थापित करने की प्रार्थना को
निरर्थक मानते हुए निरस्त कर देना चाहिए और घोषित निर्णय को स्थिर बनाये
रखना चाहिए।
यथा पक्वेषु धान्येषु निष्फलाः प्रावृषो गुणाः।
निर्णिक्तव्यवहाराणां प्रमाणमफलं तथा॥ ६३॥
उपर्युक्त तथ्य—निर्णय घोषित करने के उपरान्त प्रमाणों को देखने की दुहाई
की निरर्थकता—के समर्थन में स्मृतिकार का कथन है कि जिस प्रकार धान्य के
पक जाने पर वर्षा की कोई उपयोगिता नहीं होती, उसी प्रकार व्यवहार का निर्णय
हो जाने के उपरान्त प्रमाण आदि के होने की भी कोई उपयोगिता नहीं होती।
अभूतमप्यभिहितं प्राप्तकालं परीक्षयेत्।
यत्तु प्रमादान्नोच्येत तद्भूतमपि हीयते॥ ६४॥
व्यवहार में असत्य प्रतीत होने वाले वक्तव्य अथवा तथ्य की प्रश्न आदि से,
साक्ष्य से, लिखित प्रमाण से अथवा अपनी जानकारी से अथवा अन्यान्य किन्हीं
विश्वस्त स्रोतों से वास्तविकता का पता लगाने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रयास
में चूक अथवा प्रमाद अथवा उपेक्षा होने पर सत्य का गला घुट सकता है तथा
अन्याय न्याय को दबा सकता है। अतः विशेष सावधानी बरतनी आवश्यक है।
तीरितं चानुशिष्टं च यो मन्येत विधर्मतः।
द्विगुणं दण्डमास्थाय तत्कार्यं पुनरुद्धरेत्॥ ६५॥
विचार-विमर्श तथा वाद-विवाद के उपरान्त परिणाम पर पहुंचे और घोषित
निर्णय—जय-पराजय तथा दण्ड-विधान आदि—वाले व्यवहार के विरुद्ध पुनर्विचार
की प्रार्थना करने वाले को पराजित होने पर दुगुना दण्ड भुगतने को सहमत होने की
लिखित शपथ लेनी होती है। इसी आधार पर उसकी प्रार्थना स्वीकार की जानी चाहिए।
दुर्दृष्टे व्यवहारे तु सभ्यास्तं दण्डमाप्नुयुः।
न हि जातु विना दण्डं कश्चिन्मार्गेऽवतिष्ठते॥ ६६॥
यदि न्यायाधिकरण (ज्यूरी) के सदस्य अज्ञान, प्रमाद अथवा पक्षपात व
राग-द्वेष के कारण ग़लत व्यवहार करते हैं, तो उन्हें भी दण्डित करना चाहिए।
न्याय के प्रति विश्वासघात को दण्डनीय अपराध ही मानना चाहिए। वस्तुतः दण्ड
ही एकमात्र ऐसा साधन है, जिसके भय से व्यक्ति पापाचरण, अन्याय-प्रवर्तन तथा
36 / नारदस्मृति

कुमार्ग-गमन से अपने को रोकता-बचाता है। दण्ड के भय से ही धर्म और
सदाचार की रक्षा हो पाती है।
रागादज्ञानतो वापि लोभाद्वा योऽन्यथा वदेत्।
सभ्योऽसभ्यः स विज्ञेयः तं पापं विनयेन्नृपः ॥ 67 ॥
अनुराग एवं स्नेहवश, अज्ञानवश अथवा घूस लेने आदि लोभ-लालच में
फंसकर, सत्य की उपेक्षा करके वक्तव्य देने वाले वादी, प्रतिवादी, साक्षी अथवा
न्यायाधिकरण के सदस्य, सभी को समान रूप से दण्डनीय अपराधी समझना
चाहिए और राजा को इन्हें यथोचित दण्ड देना चाहिए।
किं तु राज्ञा विशेषेण स्वधर्ममनुरक्षता।
मनुष्यचित्तवैचित्र्यात् परीक्ष्या साध्वसाधुता ॥ 68 ॥
राजा को दण्ड देने का अधिकार तो अवश्य है, परन्तु उसे दण्ड के अनुचित
प्रयोग की छूट कदापि नहीं है। अतः धर्म की रक्षा के प्रति सजग राजा को दण्ड-
विधान से पूर्व अपराध की प्रकृति, प्रवृत्ति, मात्रा तथा परिस्थिति के साथ-साथ
व्यक्ति की मनोवृत्ति की जांच-परख भी अवश्य करनी चाहिए। राजा को दण्ड-
निर्धारण से पूर्व यह अवश्य सुनिश्चित करना चाहिए कि अपराध जान-बूझकर
किया गया है अथवा अनजाने में और विवशतावश किया गया है। अपराध करने
वाला व्यक्ति अपराधी मनोवृत्ति का है अथवा साधु प्रकृति का है। राजा को इस
तथ्य को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए कि मनुष्य की चित्तवृत्ति परिवर्तनशील
है। कभी साधु प्रकृति के व्यक्ति की मानसिकता भी मलिन और कभी पक्के धूर्त
व्यक्ति की मनोवृत्ति भी उज्ज्वल हो सकती है।
इन सभी तथ्यों पर विचार किये बिना सबके लिए एक समान दण्ड का
निर्धारण, अर्थात् सबको एक ही लाठी से हांकना न्यायसंगत नहीं होता।
पुरुषाः सन्ति ये लोभात् प्रब्रूयुः साक्ष्यमन्यथा।
सन्ति चान्ये दुरात्मानः कूटलेख्यकृतो जनाः ॥ 69 ॥
कुछ लोग ऐसे दुष्ट होते हैं, जो लोभ के वश में होकर नकली-जाली लेखपत्र
(दस्तावेज़, documents) तैयार कर लेते हैं और कुछ दूसरे दुर्जन झूठी गवाही
देने में सिद्धहस्त होते हैं।
अतः परीक्ष्यमुभयमेतद्राज्ञा विशेषतः।
लेख्याचारेण लिखितं साक्ष्याचारेण साक्षिणः ॥ 70 ॥
अतः राजा (न्यायाधिकारी) को लिखित प्रमाणों की सत्यता-असत्यता की
तथा साक्षी के चरित्र की भली-भांति जांच-परख करने के उपरान्त ही उनके
आधार पर अपना निर्णय देना चाहिए। बिना जांच-परख किये उन्हें कदापि प्रामाणिक
नहीं मान लेना चाहिए।
नारदस्मृति / 37

असत्याः सत्यसङ्काशाः सत्याश्चासत्यसन्निभाः।
दृश्यन्ते विविधा भावास्तस्माद्युक्तं परीक्षणम् ॥ 71 ॥
राजा (न्यायाधिकरण के सदस्यों) को इस तथ्य का भी विस्मरण नहीं करना
चाहिए कि अनेक सीधे-सादे व्यक्ति सच्चे होने पर भी अपनी सरलता और अकुशलता
के कारण झूठे-से प्रतीत होते हैं। उनमें सत्य पर टिके रहने की अपेक्षित दृढ़ता का
अभाव होता है। वे यह नहीं जानते कि चतुर वकील उनके मुंह से क्या उगलवा रहा
है अथवा उनके सीधे-सादे वचनों का क्या अर्थ निकाला जा रहा है। इसके विपरीत
कुछ व्यक्ति बड़े ही धूर्त, चालाक और तिकड़मी होते हैं। वे झूठे होते हुए भी अपने
हाव-भावों, चेष्टाओं, गतिविधियों और वचनों से अपने को नितान्त सच्चे और
विश्वसनीय स्थापित करने में सफल हो जाते हैं। राजा को इस तथ्य की ओर विशेष
ध्यान देना चाहिए। इस तथ्य की उपेक्षा करने पर धूर्तों की चांदी हो जाती है और
सीधे-सादे व्यक्ति अन्याय के शिकार हो जाते हैं।
तलवद् दृश्यते व्योम खद्योतो हव्यवाडिव।
न तलं विद्यते व्योम्नि न खद्योते हुताशनः ॥ 72 ॥
तस्मात् प्रत्यक्षदृष्टोऽपि युक्तो ह्यर्थः परीक्षितुम्।
परीक्ष्य ज्ञापयन्नर्थान्न धर्मात् परिहीयते ॥ 73 ॥
इसी तथ्य के समर्थन में दो उदाहरण प्रस्तुत करके राजा को सावधान करते
हुए कहा गया है कि जिस प्रकार दूर से देखने पर आकाश और पृथिवी मिलते प्रतीत
होते हैं, जिस प्रकार जुगनू में आग की चिनगारी प्रतीत होती है, जबकि वास्तविकता
इनसे भिन्न है, न तो आकाश-पृथिवी का मिलन है और न ही जुगनू में अग्नि
स्फुलिंग है, इसी प्रकार किसी पुरुष के वचन में सत्य का आभास दीखने पर भी
सत्य नहीं होता। अतः जो प्रत्यक्ष दीखता है, उसकी भी गहन परीक्षा किये बिना
उसे अन्तिम सत्य नहीं मान लेना चाहिए; क्योंकि यहां भी ग़लती की सम्भावना को
नकारा नहीं जा सकता। इस प्रकार गहरी सूझ-बूझ से काम करने वाला और
नितान्त सजग सतर्क रहने वाला राजा ही धर्म और न्याय की रक्षा करने में समर्थ
हो पाता है।
एवं पश्यन् सदा राजा व्यवहारान् समाहितः ।
वितत्येह यशोदीप्तं प्रेत्याप्नोति त्रिविष्टपम् ॥ 74 ॥
इस प्रकार अत्यन्त सजग एवं तटस्थ रहकर यथानिर्दिष्ट विधि से व्यवहार पर
विचार करने वाला राजा अपने जीवनकाल में प्रजा के अनुराग और उज्ज्वल यश
को प्राप्त करता है तथा मरणोपरान्त उत्तम गति का अधिकारी बनता है।
टिप्पणी - भगवान् कृष्ण ने गीता में अर्जुन को कर्तव्यपालन के लिए प्रेरित
करते हुए यश और स्वर्ग की प्राप्ति का प्रलोभन दिया था—
38 / नारदस्मृति

॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
युद्ध में विजयी होने पर पृथ्वी पर शासन का और मृत्यु हो जाने पर स्वर्ग में
वास का अधिकार सुनिश्चित है। यहां कर्तव्यपालक राजा के लिए जीवनकाल में
कमनीय कीर्ति और मरने पर परमगति सुरक्षित हो जाती है। इसके अतिरिक्त शास्त्र
यह भी कहता है "कीर्तिर्यस्य सः जीवति" यशस्वी तो अमर हो जाता है।
॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥
नारदस्मृति / 39

द्वितीय अध्याय

द्वितीय अध्याय
सुनिश्चितबलाधानस्त्वर्थी स्वार्थप्रचोदितः ।
लेखयेत् पूर्वपक्षं तु कृतकार्यविनिश्चयः ॥ १ ॥
वादी न्यायाधिकरण को यह आवेदन कर सकता है कि प्रतिवादी साधन-
सम्पन्न होने के अतिरिक्त अपने स्वार्थ से प्रेरित है तथा इस व्यवहार को जीतने का
दृढ़ संकल्प लिये हुए है, अतः वह लिखित प्रमाणों में गड़बड़ी और साक्ष्य आदि
को भड़काने-तोड़ने-जैसा कुछ भी कर सकता है, जिससे मुझे संरक्षण की आवश्यकता
है। मुझे सुरक्षा प्रदान की जाये और मेरा प्रतिद्वन्द्वी मनचाहा अनुचित न कर सके,
इसे सुनिश्चित किया जाये।
पूर्वपक्षश्रुतार्थस्तु प्रत्यर्थी तदनन्तरम् ।
पूर्वपक्षार्थसम्बन्धं प्रतिपक्षं निवेशयेत् ॥ २ ॥
वादी के आवेदन-पत्र में उल्लिखित आशंका के तात्पर्य को समझकर
प्रतिवादी को स्पष्टीकरण के रूप में अपना पक्ष न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना
चाहिए।
श्वो लेखनं वा स लभेत् त्र्यहं सप्ताहमेव च।
अर्थी तृतीयपादे तु युक्तं सद्यो ध्रुवं जयी ॥ ३ ॥
प्रतिवादी को न्यायालय से वादी द्वारा की गयी शिकायत का उत्तर दूसरे
दिन, अथवा तीन दिनों में अथवा अधिक-से-अधिक एक सप्ताह के भीतर अवश्य
प्रस्तुत कर देना चाहिए। ऐसा न करने पर और व्यवहार के तीसरे चरण लेख-
परीक्षा, साक्ष्य-विचार तथा विवाद (Argument) को पार कर लेने पर व्यवहार को
निर्णीत और वादी को विजयी घोषित मानना चाहिए।
मिथ्या सम्प्रतिपत्तिर्वा प्रत्यवस्कन्दमेव वा।
प्राङ्न्यायविधिसाम्यं वा उत्तरं स्याच्चतुर्विधम् ॥ ४ ॥
वादी द्वारा प्रतिवादी के विरुद्ध उपस्थापित व्यवहार के प्रतिवादी द्वारा दिये
जाने वाले उत्तर के चार प्रकार हो सकते हैं—(१) व्यवहार को मिथ्या बताना,
(२) सम्प्रतिपत्ति—आवेदन की भाषा का अस्पष्ट होना, (३) दुर्बोध—कारण-
विशेष—का उल्लेख न होने की कहना तथा बताना, अर्थात् (४) इस व्यवहार का
अन्य न्यायालय में निरस्त हो गया बताना-प्राङ्न्याय।
40 / नारदस्मृति

मिथ्यैतन्नाभिजानामि मम तत्र न सन्निधिः।
अजातश्चास्मि तत्काल एवं मिथ्या चतुर्विधम् ॥ 5 ॥
मिथ्या उत्तर के चार प्रकार हो सकते हैं—
प्रथम, वादी द्वारा लगाये गये आरोप को मिथ्या बताना, द्वितीय, अभियोग
के विषय के सम्बन्ध में अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना, तृतीय, अभियोग में
उल्लिखित घटनास्थल पर अपनी अनुपस्थिति बताना तथा चतुर्थ, उल्लिखित
घटना के समय अपना जन्म ही न हुआ होना अथवा उस समय अपने को विदेश में
या किसी समारोह में उपस्थित बताना।
मिथ्या च विपरीतं च पुनः शब्दसमागमम्।
पूर्वपक्षार्थसम्बन्धमुत्तरं स्याच्चतुर्विधम् ॥ 6 ॥
उपर्युक्त चारों मिथ्या उत्तरों के निम्नोक्त रूप से क्रमशः चार प्रत्युत्तर दिये जा
सकते हैं—
प्रथम, प्रतिवादी द्वारा अभियोग को मिथ्या बताना, अर्थात् मिथ्या है।
द्वितीय, प्रतिवादी अभियोग-आरोप के सम्बन्ध में पूरी जानकारी रखता है
तथा मेरे अभियोग-पत्र की भाषा पूर्णतः स्पष्ट सरल और सुबोध है।
तृतीय, अभियोग-पत्र में सभी कारणों का स्पष्ट उल्लेख हुआ है।
चतुर्थ, यह अभियोग किसी अन्य न्यायालय में कभी निरस्त नहीं हुआ। इस
सम्बन्ध में प्रतिवादी का कथन मिथ्या एवं भ्रामक है।
भाषाया उत्तरं यावत् प्रत्यर्थी विनिवेशयेत्।
अर्थी तु लेखयेत्तावद्यावद्वस्तु विवक्षितम् ॥ 7 ॥
वादी को लिखित आवेदन में केवल अत्यावश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य
तथ्य लिखने चाहिए और प्रतिवादी के उत्तर की प्रतीक्षा करनी चाहिए। उसका
उत्तर न आने तक तथा अभियोग-पत्र की कोई प्रतिलिपि न भेजे जाने तक वादी
अपने आवेदन-पत्र में यथेष्ट संशोधन—जोड़ना-छोड़ना—कर सकता है। प्रतिवादी
को वादी के अभियोग से परिचित किये जाने के उपरान्त उसमें किसी प्रकार का
कोई परिवर्तन-परिवर्द्धन नहीं किया जा सकता। हां, प्रतिवादी के उत्तर के प्रत्युत्तर
में अपनी बात कहने के लिए वह अवश्य स्वतन्त्र है।
टिप्पणी—स्मृति चन्द्रिकाकार किन्हीं आचार्यों द्वारा प्रतिवादी के उत्तर के
आने के उपरान्त भी वादी द्वारा अपने अभियोग-पत्र में संशोधन की अनुमति देने
को अनुचित एवं अवाञ्छनीय मानते हैं—केचिन्निविष्टेऽप्युत्तरे शोधनमिच्छन्ति।
तदनवस्था प्रसंगात् पूर्वोक्तवचनविरोधाच्च हेयम्।
अन्यार्थमर्थहीनं च प्रमाणागमवर्जितम्।
लेख्यं हीनाधिकं भ्रष्टं भाषादोषास्तूदाहृताः ॥ 8 ॥
नारदस्मृति / 41

वादी द्वारा अपने विरुद्ध प्रस्तुत अभियोग-पत्र में प्रतिवादी निम्नोक्त सात दोष
निकाल सकता है—
प्रथम, अन्यार्थ—वाञ्छनीय अर्थ में भिन्न अर्थ की प्रतीति होना।
द्वितीय, अर्थहीनता—अभियोग के आवेदन करने का पात्र ही न होना।
तृतीय, प्रमाण-वर्जित—वादी द्वारा प्रस्तुत अभियोग की पुष्टि में किसी
प्रमाण का न होना।
चतुर्थ, आगम-वर्जित—अभियोग-पत्र का न्याय, धर्म आदि शास्त्रों के तथा
समाज व देश के विरुद्ध होना।
पञ्चम, हीन—अपेक्षित स्थान पर न होना। उपर्युक्त का अपनेक्षित स्थान पर
होना।
षष्ठ, अधिक—विसर्ग, विराम, अल्पविराम, मात्रा तथा स्वर आदि का यथास्थान
प्रयोग न होना।
सप्तम, भ्रष्ट—अभियोग-पत्र का स्वच्छ न होना, तेल, मिट्टी आदि से गन्दा
तथा पानी से भीगा होना एवं शिष्टता का अभाव।
लब्धव्यं येन यद्यस्मात् स तत्तस्मादवाप्नुयात्।
न त्वन्योन्यमथान्यास्मादित्यन्यार्थमिदं त्रिधा ॥ 9 ॥
सातों दोषों का परिचय इस प्रकार है—अभियोग-पत्र की—प्रथम अन्यार्थ—
जो वस्तु जिसको जिससे प्राप्त करनी हो—भाषा से वही अर्थ निकलना चाहिए;
क्योंकि अभिमत से भिन्न वस्तु को, वाञ्छित से भिन्न व्यक्ति से तथा अभीष्ट से
भिन्न व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। अतः सन्दर्भ से भिन्न अर्थ देने वाली भाषा का
प्रयोग अन्यार्थ दोष कहलायेगा और यह दोष अभियोग को निरस्त कर सकता है।
मनसाहमपि ध्यातस्त्वन्मित्रेणेह शत्रुवत्।
अतोऽनया महाक्षान्त्या त्वमिहावेदितो मया ॥ 10 ॥
किसी दूसरे की ओर से—उसकी अनुमति-सहमति होने अथवा न होने
(पावर ऑफ अटार्नी) पर—अमुक व्यक्ति मित्रता का ढोंग करता हुआ आपके प्रति
शत्रुता का व्यवहार करता है—जो मुझे रुचिकर नहीं—यह कहते हुए सम्बद्ध
व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय में अभियोग चलाना अर्थहीन अभियोग कहलाता है।
यहां विचारणीय तथ्य यह है कि जब सम्बद्ध व्यक्ति को विरोधी से कोई शिकायत
ही नहीं, वह स्वयं कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता तथा उसके विरुद्ध कोई पग
नहीं उठाता, तो किसी दूसरे को क्यों कष्ट हो रहा है ? ऐसे मामले में आजकल इस
मुहावरे का प्रयोग किया जाता है—‘‘मुद्दई (वादी) सुस्त, गवाह चुस्त।’’
द्रव्यप्रमाणहीनं यत्फलोपाश्रयवर्जितम्।
प्रमाणवर्जितं नाम लेख्यदोषं तदुत्सृजेत् ॥ 11 ॥
42 / नारदस्मृति

प्रमाण-वर्जित दोष वह होता है, जिसमें न तो द्रव्य (रुपया-पैसा अथवा
स्वर्ण, रत्न आदि अन्य मूल्यवान् वस्तु) का कोई लिखित प्रमाण होता है और न ही
उसके परिमाण की कोई निश्चित जानकारी होती है। इस प्रकार लेख्य-दोष के
कारण ऐसा अभियोग भी चलने योग्य नहीं होता।
आगमवर्जितं दोषं पूर्ववादे विवर्जयेत्।
एकस्य बहुभिः सार्धं पुरराष्ट्रविरोधकम् ॥ 12 ॥
आगम-वर्जित दोष का अर्थ है—एक के हित के विरुद्ध बहुतों के हित का
जुड़ा होना, अर्थात् व्यक्ति और समष्टि का संघर्ष, दूसरे शब्दों में व्यक्ति के व्यवहार
का जाति, समाज, नगर और देश के हितों के विरुद्ध होना। कहने की आवश्यकता
नहीं कि ऐसा अभियोग न्यायशास्त्र और लोक-विरुद्ध होने से तत्काल, प्रथम दृष्टि
में ही निरस्त होने योग्य होता है।
बिन्दुमात्राविहीना वा पदवर्णविदुष्टा वा।
हीनाधिका भवेद् व्यर्थी तां यत्नेन विवर्जयेत् ॥ 13 ॥
हीन और अधिक वे दोष हैं, जब अभियोग-पत्र की भाषा में विसर्ग, मात्रा
आदि न लगे हों, अल्पविराम, पद और वर्ण के अभाव हों, जिससे मनमाना अर्थ
निकलता हो, ऐसा अभियोग भी महत्त्वहीन हो जाता है। उदाहरणार्थ, 'पुत्री न
पुत्रः' को 'पुत्री, न पुत्रः' लिखने में अल्पविराम के स्थान-भेद से अर्थ-भेद हो
जाता है। अभियोग-पत्र में भी इस प्रकार से विराम आदि का यथोचित ध्यान न
रखने से अर्थ-भेद हो जाता है। लोक में भी अल्पविराम के स्थान-भेद से अर्थ-
भेद का बहुप्रचलित उदाहरण है—'रोको, मत जाने दो', 'रोको मत, जाने दो'।
भ्रष्टं तु दुःखितं यत्स्याज्जलतैलादिभिर्हतम्।
भाषायां तदपि स्पष्टं विस्पष्टार्थं विवर्जयेत् ॥ 14 ॥
भ्रष्ट-दोष से अभिप्राय है—अभियोग-पत्र का तेल आदि चिकने पदार्थों से,
रेत-मिट्टी आदि मलिन पदार्थों से दूषित तथा पानी से भीगा होना तथा अक्षरों का
कटा-फटा होना, अर्थात् सुवाच्य न रह पाना। ऐसा व्यवहार भी विचारणीय नहीं
रह पाता।
सत्या भाषा न भवति यद्यपि स्यात् प्रतिष्ठिता।
बहिश्चेद् भ्रश्यते धर्मान्नियताद् व्यवहारिकात् ॥ 15 ॥
यदि अभियोग-पत्र की भाषा-शैली शुद्ध, स्वच्छ, दोषरहित, सरल और
सुबोध होने पर भी अभियोग का विषय लोक-प्रचलित एवं व्यवहार में शुद्ध एवं
उपयोगी होने से सर्वमान्य धर्म के अनुकूल (सम्मत) नहीं, तो भी ऐसा अभियोग
अनुमत (Admit) नहीं होता, अपितु प्रथम दृष्टि में ही निरस्त हो जाता है।
गन्धमादनसंस्थस्य मयास्यासीत्तदर्पितम्।
व्यावहारिकधर्मस्य बाह्यमेतन्न सिध्यति ॥ 16 ॥
नारदस्मृति / 43

अभियोग-पत्र में अविश्वसनीय एवं काल्पनिक तथ्यों के उल्लेख से भी
अभियोग अग्राह्य हो जाता है। उदाहरणार्थ, किसी का गन्धमादन पर्वन पर किसी
वस्तु के लेने और न लौटाने का अभियोग विश्वसनीयता की सीमा से बाहर होने के
कारण ग्राह्य नहीं हो सकता; क्योंकि इस तथ्य की पुष्टि नहीं हो सकती कि लेने और
देने वाला दोनों कभी उक्त स्थान पर थे और दोनों में किसी प्रकार का कोई लेन-
देन हुआ था।
अन्याक्षरनिवेशेन अन्यार्थगमनेन च।
आकुलं च क्रियादानं क्रिया चैवाकुला भवेत्॥ 17 ॥
यदि अभियोग से सम्बन्धित आवेदन-पत्र में लिखे गये तथ्यों पर विवाद
(Argument) के समय व्यक्ति लिखित से अभिव्यक्त होने वाले अर्थ पर दृढ़ न
रहकर उससे भिन्न मन्तव्य प्रकट करता है, अर्थात् वह यह कहता है कि जो लिखा
गया है, वह उसका आशय नहीं था, तो ऐसा अभियोग भी निरस्त होने योग्य होता
है।
उदाहरणार्थ, यदि व्यक्ति किसी पर मानहानि का आरोप लगाते हुए मार-पीट
आदि करने का उल्लेख करता है और बहस में केवल अपशब्द कहना बताता है,
तो ऐसा अभियोग-पत्र निरस्त ही किया जाना चाहिए; क्योंकि इस प्रकार के
लिखित और मौखिक कथन के अन्तर से न केवल न्यायाधिकरण के सदस्य
परेशान हो जाते हैं, अपितु न्याय की प्रक्रिया भी दूषित हो जाती है।
रागादीनां यदेकेन कोपितः करणं वदेत्।
तदादौ तु लिखेत् सर्वं वादिनः फलकादिषु॥ 18॥
यदि कोई व्यक्ति काम, क्रोध और लोभ-ये तीनों रागादि (राग-द्वेष) के
नाम से जाने जाते हैं। इन तीनों में से किसी एक-क्रोध-में आकर धर्माधिकारी
को मौखिक रूप से अपने पक्ष में निर्णय लिखने के लिए धमकाता है, तो ऐसे
व्यक्ति का नाम तत्काल सूचनापट्ट (नोटिसबोर्ड) पर मोटे-काले अक्षरों में लिख
देना चाहिए।
राजकुलावबोधाय धर्मस्थैः सुविचारितम्।
तस्मादन्यद्व्यपोहां स्याद् वादिनः फलकादिषु॥ 19॥
यदि वादी द्वारा प्रस्तुत अभियोग-पत्र के विषय के एक सीमा तक राजकुल-
उच्च न्यायालय अथवा उच्चतम न्यायालय के विचार क्षेत्र में आने के कारण
धर्माधिकारियों-निम्न न्यायालय के न्यायाधीशों-द्वारा भली प्रकार विचार किये
जाने पर कुछ अविचारित रह जाता है, तो वादी को उस पर आपित्त करने का
अधिकार नहीं मिलता।
44 / नारदस्मृति