सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 304 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 35

अन्तर्गत न आने वाले व्यक्ति-को बन्दी बनाकर रखने वाला अधिकारी ही दण्ड
के पात्र होते हैं; क्योंकि इन दोनों ही स्थितियों में राजाज्ञा का उल्लंघन तथा विधि
की अवमानना होती है।
निम्नोक्त चौदह प्रकार के व्यक्तियों को कभी बन्दी बनाकर नहीं रखना चाहिए।
इनके कार्य-व्यापार को देखते हुए राजा इन्हें रोककर रखने का आदेश कभी नहीं
देता—
निर्वेष्टुकामो रोगार्त्तो यियक्षुर्व्यसनेस्थितः।
अभियुक्तस्तथान्येन राजकार्योद्यतस्तथा ॥ 52 ॥
गवां प्रचारे गोपालाः शस्यारम्भे कृषीबलाः।
शिल्पिनश्चापि तत्कालमायुधीयाश्च विग्रहे ॥ 53 ॥
अप्राप्तव्यवहारश्च दूतो दानोन्मुखो व्रती।
विषमस्थश्च नासेध्यो न चैतानाह्वयेन्नृपः ॥ 54 ॥

  1. विवाह के लिए वरण किया गया युवक।
  2. (असाध्य एवं विषम) रोग-पीड़ित।
  3. यज्ञ-यागादि सम्पन्न करने का इच्छुक।
  4. (दुर्भिक्ष आदि) विपत्ति-ग्रस्त।
  5. किसी अन्य अभियोग में फंसा होने से दूसरे न्यायाधिकरण का सामना
    कर रहा।
  6. राजकार्य में लगा।
  7. गो-सेवा में नियुक्त गोपाल।
  8. कृषि, शस्यक्षेत्र से जुड़ा (साग-सब्जी और पशुओं का चारा उगाने
    वाला) किसान।
  9. शिल्प-कार्य से जुड़ा शिल्पी।
  10. युद्ध में संलग्न सैनिक।
  11. अबोध बालक।
  12. सन्देशवाहक दूत।
  13. दान करने को उद्यत व्यक्ति।
  14. विषम स्थान पर रहने वाला।
    नाभियुक्तोऽभियुञ्जीत तमतीत्वार्थमन्यतः।
    न चाभियुक्तमन्येन न विरुद्धं वेद्धुमर्हति ॥ 55 ॥
    अभियोग के सुनने के समय सम्बद्ध विषय को छोड़कर किसी अन्य विषय
    की चर्चा नहीं करनी चाहिए और न ही किसी अन्य विषय का उपस्थापन करना
    चाहिए। इसके अतिरिक्त एक मामले में उलझे व्यक्ति पर उस मामले के निपटने से
    नारदस्मृति / 33