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सर्वकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 304 में से

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पृष्ठ 32

शास्त्रोक्तलोकव्यवहारयोः तत्र धर्मशास्त्रोक्तमुत्सृज्य लोकव्यवहारस्थमाचरेत्।
यतः सः एव बलवान्।
इस सम्बन्ध में वे दो उदाहरण प्रस्तुत करते हैं—
प्रथम, धर्मशास्त्र, अपुत्रा स्त्री के पति खो जाने, मर जाने, संन्यासी बन जाने,
जाति से पतित हो जाने तथा नपुंसक सिद्ध होने पर देवर से सम्बन्ध योजना द्वारा
पुत्रोत्पत्ति की अनुमति देता है, परन्तु लोक द्वारा स्वीकृत न होने पर आज यह प्रथा
अमान्य, अतः लुप्त हो गयी है।
द्वितीय, दक्षिण भारत में मामा भांजी का विवाह सम्बन्ध धर्मशास्त्रसम्मत
होने पर भी लोकनिन्दित होने से आज अतीत की कथा बनकर रह गया है।
इस प्रकार आचार्य महोदय का स्पष्ट कथन है कि शास्त्र की दुहाई देकर
देश, कुल और समाज में परम्परा से प्रचलित प्रथा का अनादर कभी नहीं करना
चाहिए—देशे देशे य आचारः पारम्पर्यक्रमागतः। स शास्त्रार्थ बलान्नैव लंघनीयः
कदाचन।
सूक्ष्मो हि भगवान् धर्मः परोक्षो दुर्विचारणः।
अतः प्रत्यक्षमार्गेण व्यवहारगतिं नयेत् ॥ 41 ॥
शास्त्र से लोक व्यवहार की वरीयता के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करते हुए
देवर्षि नारद कहते हैं—धर्म भगवान् है, अतः वह सूक्ष्म है, उसे देख पाना सहज-
सरल कार्य नहीं। इसके अतिरिक्त वह प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष है, दृष्टिगोचर है ही
नहीं। साथ ही वह विचार की सीमा से भी बाहर है। इसके विपरीत व्यवहार स्थूल,
प्रत्यक्ष एवं सरल-सुबोध है, अतः शास्त्र की अपेक्षा व्यवहार को अपनाने में ही
बुद्धिमत्ता है।
यात्यचौरोऽपि चौरत्वं चौरश्चायात्यचौरताम्।
अचौरश्चौरतां प्राप्तो माण्डव्यो व्यवहारतः ॥ 42 ॥
व्यवहार-युक्ति द्वारा विवेचन एवं निर्णय की प्रक्रिया भी सर्वथा निर्दोष नहीं
है। व्यवहार में अचोर को चोर और चोर को अचोर समझ लेना बड़ी बात नहीं।
उदाहरणार्थ, माण्डव्य महर्षि ने कोई चोरी नहीं की थी, परन्तु मौनव्रती होने के
कारण राजा ने अपने द्वारा पूछे प्रश्नों का उत्तर न देने—मौन—को उनके अपराध
की स्वीकृति मानकर उन्हें दण्डित कर दिया। इस प्रकार वे चोर न होते हुए भी
चोरी के दण्ड के भागी हुए। इस उदाहरण से यह सिद्ध होता है कि युक्ति द्वारा
तथ्य निर्णय करने में भी विशेष सावधानी अपेक्षित होती है।
स्त्रीषु रात्रौ बहिर्ग्रामादन्तर्वेश्मन्यरातिषु।
व्यवहारः कृतोऽप्येषु पुनः कर्त्तव्यतामियात् ॥ 43 ॥
30 / नारदस्मृति