मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
३६ मुहूर्तचिन्तामणि
अन्वयः—विरिक्ते (तिथौ) शुक्रेज्यार्केह्नि, मैत्रध्रुवलघुसहितादित्यशाक्रद्विदैवे,
स्थिराख्ये लग्नेऽपि, शशिनि शुभदृष्टे, शुभैः केन्द्रगैः, कुन्तवर्मेष्वसनशरकृपाणासिपुत्र्यः
सन्धार्याः स्युः। ध्रुवमृदुलघुहर्यन्तकादित्ये शय्यासनादेः भोगः इष्टः स्यात् ॥ २१ ॥
रिक्ता तिथियों को छोड़ अन्य तिथियों में, शुक्र, बृहस्पति और रविवार
में, मैत्रसंज्ञक, ध्रुवसंज्ञक, लघुसंज्ञकसहित पुनर्वसु, ज्येष्ठा और विशाखा
नक्षत्र में; स्थिर अर्थात् वृष, सिंह, वृश्चिक अथवा कुम्भ लग्न में चन्द्रमा के
रहते और शुभ ग्रहों से देखते तथा केन्द्र में शुभ ग्रहों के रहते बरछी, कवच,
धनुष-बाण, तलवार, छुरी आदि धारण करना चाहिए। ध्रुवसंज्ञक, मृदु-
संज्ञक, लघुसंज्ञक, श्रवण, भरणी और पुनर्वसु में शय्या और आसन आदि
का उपभोग हितकारक होता है ॥ २१ ॥
नक्षत्रों की अन्धाक्षादि संज्ञा
अन्धाक्षं वसुपुष्यधातृजलभद्धीशार्यमान्त्याभिधं
मन्दाक्षं रविविश्वमैत्रजलपाश्लेषाश्विचन्द्रं भवेत् ।
मध्याक्षं शिवपित्रजैकचरणत्वाष्ट्रेन्द्रविध्यन्तकं
स्वक्षं स्वात्यदितिश्रवोदहन बाहिर्बुध्न्यरक्षोभगम् ॥ २२ ॥
अन्वयः—वसुपुष्यधातृजलभद्धीशार्यमान्त्याभिधं अन्धाक्षं भवेत्, रविविश्वमित्रजल-
पाश्लेषाश्विचन्द्रं मन्दाक्षं भवेत्, शिवपित्रजैकचरणत्वाष्ट्रेन्द्र विध्यन्तकं मध्याक्षं भवेत्,
स्वात्यदितिश्रवोदहनबाहिर्बुध्न्यरक्षोभगम् स्वक्षं भवेत् ॥ २२ ॥
धनिष्ठा, पुष्य, रोहिणी, पूर्वाषाढ़, विशाखा, उत्तराफाल्गुनी, रेवती इन
नक्षत्रों की अन्धाक्ष संज्ञा है; हस्त, उत्तराषाढ़, अनुराधा, शतभिष, आश्लेषा,
अश्विनी, मृगशिरा इन नक्षत्रों की मन्दाक्ष संज्ञा है, आर्द्रा, मघा, पूर्वाभाद्र-
पद, चित्रा, ज्येष्ठा, अभिजित्, भरणी, इन नक्षत्रों की मध्याक्ष संज्ञा है
और स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, कृत्तिका, उत्तराभाद्रपद, मूल, पूर्वाफाल्गुनी,
इनकी स्वक्ष अर्थात् सुलोचन संज्ञा है ॥ २२ ॥
अन्धाक्षादि चक्र
| धनिष्ठा | पुष्य | रोहिणी | पू०षा० | विशाखा | उ०फा० | रेवती | अन्धाक्ष |
| हस्त | उ०षा० | अनुराधा | शतभिष | आश्ले० | अश्विनी | मृगशिरा | मन्दाक्ष |
| आर्द्रा | म० | पू०भा० | चित्रा | ज्येष्ठा | अभि० | भरणी | मध्याक्ष |
| स्वाती | पुनर्वसु | श्रवण | कृत्तिका | उ०भा० | मूल | पू०फा० | स्वक्ष |
नक्षत्रप्रकरण ३७
अन्धाक्षादि नक्षत्रों का फल
विनष्टार्थस्य लाभोऽन्धे शीघ्रं मन्दे प्रयत्नतः ।
स्याद्दूरे श्रवणं मध्ये श्रुत्याप्ती न सुलोचने ॥ २३ ॥
अन्वयः—अन्धे विनष्टार्थस्य शीघ्रं लाभः, मन्दे प्रयत्नः, मध्ये दूरे श्रवणं स्यात्,
सुलोचने श्रुत्याप्ती न ॥ २३ ॥
यदि अन्धाक्षसंज्ञक नक्षत्रों में कोई वस्तु चोरी जाय तो शीघ्र मिले,
मन्दाक्षसंज्ञक नक्षत्रों में बड़े उपाय से मिले, मध्याक्षसंज्ञक नक्षत्रों में
दूर में सुन पड़े मिले नहीं, और सुलोचन संज्ञक में तो कुछ भी पता
न लगे ॥ २३ ॥
धन के व्यवहार में निषिद्ध नक्षत्रादि
तीक्ष्णमिश्रध्रुवोग्रैर्यद्द्रव्यं दत्तं निवेशितम् ।
प्रयुक्तं च विनष्टं च विष्टयां पाते च नाप्यते ॥ २४ ॥
अन्वयः—तीक्ष्णमिश्रध्रुवोग्रैः, विष्टयां, पाते व यद्द्रव्यम् दत्तं, निवेशितम्, प्रयुक्तं
विनष्टं च (तत्) न आप्यते ॥ २४ ॥
तीक्ष्णसंज्ञक, मिश्रसंज्ञक, ध्रुवसंज्ञक और उग्रसंज्ञक नक्षत्रों में और
भद्रा वा व्यतीपात में जो द्रव्य किसी को दी जाय, अथवा धरोहर धरी जाय,
अथवा ऋण दिया जाय, अथवा कहीं गिर पड़े या चोरी जाय वह फिर
किसी तरह न मिले ॥ २४ ॥
जलाशय और नृत्यारम्भ का मुहूर्त्त
मित्रार्कध्रुववासवाम्बुपमघातोयान्त्यपुष्येन्दुभिः
पापैर्हीनबलैस्तनौ सुरगुरौ ज्ञे वा भृगौ खे विधौ ।
आप्ये सर्वजलाशयस्य खननं व्यम्भोमघैः सेन्द्रभै-
स्तैर्नृत्यं हिबुके शुभैस्तनुगृहे ज्ञेऽब्जे झराशौ शुभम् ॥ २५ ॥
अन्वयः—मित्रार्कध्रुववासवाम्बुपमघातोयान्त्यपुष्येन्दुभिः, पापैः हीनबलैः, तनौ सुर-
गुरौ ज्ञे वा, खे भृगौ, आप्ये विधौ, सर्वजलाशयस्य खननं शुभम् । व्यम्भोमघैः सेन्द्रभैः
तैः (पूर्वोक्तनक्षत्रैः), हिबुके शुभैः, तनुगृहे ज्ञे, झराशौ अब्जे नृत्य शुभम् ॥ २५ ॥
अनुराधा, हस्त, तीनों उत्तरा, रोहिणी, धनिष्ठा, शतभिष, मघा,
पूर्वाषाढ़, रेवती, पुष्य और मृगशिरा इन नक्षत्रों में, पापग्रहों के निर्बल
रहते, लग्न में बृहस्पति वा बुध के रहते, लग्न से दशवें स्थान में शुक्र के
३८ मुहूर्तचिन्तामणि
रहते, जल-राशियों में चन्द्रमा के रहते वापी, कूप, तड़ाग आदि जलाशयों
का खनना शुभ है। पूर्वोक्त नक्षत्रों में पूर्वाषाढ़ और मघा को छोड़कर,
ज्येष्ठा को मिलाकर अर्थात् अनुराधा, हस्त, तीनों उत्तरा, रोहिणी, धनिष्ठा,
शतभिष, रेवती, पुष्य, मृगशिरा और ज्येष्ठा इन नक्षत्रों में, लग्न से चौथे
स्थान में शुभग्रहों के रहते, शुभग्रहों से दृष्ट लग्न में बुध के रहते और मिथुन
या कन्याराशि में चन्द्रमा के रहते नाचने का आरम्भ करना शुभदायक
होता है ॥ २५ ॥
स्वामी की सेवा करने का मुहूर्त
क्षिप्रे मैत्रे वित्सितार्केज्यवारे सौम्ये लग्नेऽर्के कुजे वा खलाभे ।
योनेर्मैत्र्यां राशिपोश्चापि मैत्र्यां सेवा कार्या स्वामिनः सेवकेन ॥ २६ ॥
अन्वयः—क्षिप्रे, मैत्रे, वित्सितार्केज्यवारे, सौम्ये लग्ने, अर्के खलाभे, वा कुजे
खलाभे, योनेमैत्र्यां च, राशिपोः अपि मैत्र्यां, (तदा) सेवकेन स्वामिनः सेवा
कार्या ॥ २६ ॥
अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा और रेवती, इन
नक्षत्रों में; बुध, शुक्र, रविवार, बृहस्पति इन वारों में; लग्न में शुभग्रहों
के रहते; दशवें और गेरहवें स्थान में सूर्य वा मंगल के रहते सेवक को
स्वामी की सेवा करने का प्रारम्भ करना शुभदायक होता है। परन्तु वहाँ
इतना और विचारना चाहिए कि स्वामी और सेवक के जन्मनक्षत्र की
योनियों में परस्पर मित्रता और दोनों के जन्मराशीशों की परस्पर
मित्रता हो ॥ २६ ॥
द्रव्यप्रयोग और ऋणग्रहण का मुहूर्त
स्वात्यादित्यमृदुद्विदैवगुरुभे कर्णत्रयाश्वे चरे
लग्ने धर्मसुताष्टशुद्धिसहिते द्रव्यप्रयोगः शुभः ।
नारे ग्राह्यमृणं तु संक्रमदिने वृद्धौ करेऽर्केऽह्नि यत्
तद्वंशेषु भवेदृणं न च बुधे देयं कदाचिद्धनम् ॥ २७ ॥
अन्वयः—स्वात्यादित्यमृदुद्विदैवगुरुभे, कर्णत्रयाश्वे, धर्मसुताष्टशुद्धिसहिते, चरे लग्ने,
द्रव्यप्रयोगः शुभः । आरे तु संक्रमदिने वृद्धौ, करेऽर्केऽह्नि, ऋणं न ग्राह्यं, यत् (यस्मात्)
तद्वंशेषु ऋणं भवेत् । बुधे कदाचिद्धनं न देयम् ॥ २७ ॥
स्वाती, पुनर्वसु, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, विशाखा, पुंष्य,
श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, और अश्विनी, इन नक्षत्रों में; चर लग्न में;
नक्षत्रप्रकरण ३९
नवें और पाँचवें स्थान में शुभग्रहों के रहते और आठवें स्थान में किसी ग्रह
के न रहते द्रव्य का प्रयोग अर्थात् ऋण आदि देना वा रोजगार में लगाना
शुभ होता है । मङ्गल के दिन, संक्रान्ति के दिन, जिस दिन वृद्धि योग हो
उस दिन, हस्त नक्षत्र में और रविवार को ऋण नहीं लेना चाहिए; क्योंकि
इन दिनों में लिया हुआ ऋण लेनेवाले के वंशभर में होता है; पुत्र-पौत्रादिकों
में से किसी का दिया नहीं चुकता । बुधवार को कोई किसी को भी अपना
धन किसी तरह से भी न दे ॥ २७ ॥
हल चलाने का मुहूर्त्त
मूलद्वीशमघाचरध्रुवमृदुक्षिप्रैर्विनाकं शनिं
पापैर्हीनबलैर्विधौ जलगृहे शुक्रे विधौ मांसले ।
लग्ने देवगुरौ हलप्रवहणं शस्तं न सिंहे घटे
कर्काजैणघटे तनौ क्षयकरं रिक्तासु षष्ठ्यां तथा ॥ २८ ॥
अन्वयः—मूलद्वीशमघाचरध्रुवमृदुक्षिप्रैः, अर्कं, शनि विना, पापैः हीनबलैः, विधौ
जललवे, शुक्रे विधौ मांसले, देवगुरौ लग्ने हलप्रवहणं शस्तम् । सिंहे घटे, कर्काजैणघटे
तनौ तथा रिक्तासु षष्ट्यां क्षयकरम् ॥ २८ ॥
मूल, विशाखा, मघा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, तीनों
उत्तरा, रोहिणी, चित्रा, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, अश्विनी, पुष्य और
हस्त इन नक्षत्रों में; शनिवार और रविवार छोड़ अन्य दिनों में; पापग्रहों
के निर्बल रहते; और जलराशि में चन्द्रमा के रहते; शुक्र के उदय रहते;
लग्न में पूर्ण चन्द्रमा वा बृहस्पति के रहते पहिले पहिल हल चलाना
शुभदायक होता है । यदि सिंह, कुम्भ, कर्क, मेष, मकर और तुला लग्न;
चौथि, नवमी, चतुर्दशी, छठि और अष्टमी तिथि हो तो क्षयकारक
होता है ॥ २८ ॥
बीजोप्तिमुहूर्त्त
एतेषु श्रुतिवारुणादितिविशाखोडूनि भौमं विना
बीजोप्तिर्गदिता शुभा त्वशुभतोऽष्टाग्नीन्दुरामेन्दवः ।
रामेन्द्रग्नियुगान्यसच्छुभकराण्युप्तौ हलेऽर्कोज्झिता-
रुद्रामाष्टनवाष्टभानि मुनिभिः प्रोक्तान्यसत्सन्ति च ॥ २९ ॥
अन्वयः—श्रुतिवारुणादितिविशाखोडूनि विना एतेषु [पूर्वोक्तनक्षत्रेषु], भौमं विना,
बीजोप्तिः शुभा गदिता । तु [पुनः] अशुभतः अष्टाग्नीन्दुरामेन्दवः रामेन्द्रग्नियुगानि
४० मुहूर्त्तचिन्तामणि
[भानि] असत्, शुभकराणि, उप्तौ प्रोक्तानि । हले अर्कोज्झिताङ्घ्रात् रामाष्टनवाष्टभानि,
असत्सन्ति, मुनिभिः प्रोक्तानि ॥ २६ ॥
श्रवण, शतभिष, पुनर्वसु और विशाखा नक्षत्र तथा मंगल दिन को
छोड़ पूर्वोक्त हलप्रवाह-मुहूर्त्त में बीज बोना शुभदायक है। जिस नक्षत्र में
राहु स्थित हो उस नक्षत्र से आठ नक्षत्र बीज बोने में अशुभ, फिर तीन
शुभ, फिर एक अशुभ, फिर तीन शुभ, फिर एक अशुभ, फिर तीन
शुभ, फिर एक अशुभ, फिर तीन शुभ, और उसके बाद चार अशुभ होते
हैं ॥ २९ ॥
राहुभात् फणिचक्र
| ८ | ३ | १ | ३ | १ | ३ | १ | ३ | ४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अशुभ | शुभ | अशुभ | शुभ | अशुभ | शुभ | अशुभ | शुभ | अशुभ |
| पहिले-पहिल हल चलाने के लिए सूर्यभुक्त अर्थात् जिस नक्षत्र में सूर्य | ||||||||
| वर्त्तमान हो उस नक्षत्र के पूर्व नक्षत्र से लेकर तीन नक्षत्र पर्यन्त अशुभ, | ||||||||
| चौथे से लेकर गेरहवें तक शुभ, बारहवें से लेकर बीसवें तक अशुभ और | ||||||||
| इक्कीसवें से लेकर अट्ठाइसवें तक शुभ मुनियों ने कहा है ॥ २९ ॥ | ||||||||
| सूर्यभुक्तभात् हलचक्र | ||||||||
| ३ | ८ | ९ | ८ | |||||
| :---: | :---: | :---: | :---: | |||||
| अशुभ | शुभ | अशुभ | शुभ | |||||
| शिरामोक्ष व विरेकादि व धर्मक्रिया के मुहूर्त्त | ||||||||
| त्वाष्ट्रान्मित्रकभाद्द्वयेऽम्बुपलघुश्रोत्रे शिरामोक्षणं | ||||||||
| भौमार्कैज्यदिने विरेकवमनाद्यं स्याद्बुधार्कौ विना । | ||||||||
| मित्रक्षिप्रचरध्रुवे रविशुभाहे लग्नवर्गे विदो | ||||||||
| जीवस्यापि तनौ गुरौ निगदिता धर्मक्रिया तद्बले ॥ ३० ॥ | ||||||||
| अन्वयः—त्वाष्ट्रान्मित्रकभाद्द्वयेऽम्बुपलघुश्रोत्रे, भौमार्कैज्यदिने शिरामोक्षणम् | ||||||||
| (कार्यम्) । बुधार्कौ विना [पूर्वोक्तनक्षत्रेषु] विरेकवमनाद्यं (शुभं) स्यात् । मित्र- | ||||||||
| क्षिप्रचरध्रुवे, रविशुभाहे, विदः जीवस्य अपि लग्नवर्गे, गुरौ तनौ, तद्बले [गुरुबले] | ||||||||
| धर्मक्रिया (शुभा) निगदिता ॥ ३० ॥ |
नक्षत्रप्रकरण ४१
चित्रा, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, रोहिणी, मृगशिरा, शतभिष, अश्विनी,
पुष्य, हस्त, अभिजित् और श्रवण नक्षत्र में; मंगल, रविवार, बृहस्पति
दिन में शिरामोक्षण अर्थात् फस्त खोलवाना शुभ होता है। बुध और
शनैश्चर को छोड़ अन्य दिनों में और इन्हीं पूर्वोक्त नक्षत्रों में विरेक-वमन
आदि शुभकारक होता है। अनुराधा, अश्विनी, पुष्य, हस्त, श्रवण, धनिष्ठा,
शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, तीनों उत्तरा और रोहिणी नक्षत्र में; रविवार,
सोमवार, बुध, बृहस्पति, शुक्र दिन में; बुध और बृहस्पति के लग्न वा षड्वर्ग
में; लग्न में बृहस्पति के रहते और कर्त्ता का बृहस्पति बली होने पर धर्म-
क्रिया का आरम्भ करना शुभ होता है ॥ ३० ॥
धान्यच्छेदनमुहूर्त्त
तीक्ष्णाजपादकरवह्निवसुश्रुतीन्दु-
स्वातीमघोत्तरजलान्तकतक्षपुष्ये ।
मन्दाररिक्तरहिते दिवसेऽतिशस्ता
धान्यच्छिदा निगदिता स्थिरभे विलग्ने ॥ ३१ ॥
अन्वयः- तीक्ष्णाजपादकरवह्निवसुश्रुतीन्दुस्वातीमघोत्तरजलान्तकतक्षपुष्ये, मन्दार-
रिक्तरहिते दिवसे, स्थिरभे विलग्ने धान्यच्छिदा अतिशस्ता निगदिता ॥ ३१ ॥
मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, पूर्वाभाद्रपद, हस्त, कृत्तिका, धनिष्ठा,
श्रवण, मृगशिरा, स्वाती, मघा, तीनों उत्तरा, पूर्वाषाढ़, भरणी, चित्रा
और पुष्य नक्षत्र में; शनैश्चर, मंगल दिन और रिक्ता तिथि को छोड़
अन्य दिन और तिथि में और स्थिर लग्न में अनाज का काटना शुभ
होता है ॥ ३१ ॥
कणमर्दन और सस्यरोपण का मुहूर्त्त
भाग्यार्यमश्रुतिमघेन्द्रविधातृमूल-
मैत्रान्त्यभेषु कथितं कणमर्दनं सत् ।
द्वीशाजपान्त्रिऋतिधातृशतार्यमर्क्षे
सस्यस्य रोपणमिहार्किकुजौ विना सत् ॥ ३२ ॥
अन्वयः-भाग्यार्यमश्रुतिमघेन्द्रविधातृमूलमैत्रान्त्यभेषु, कणमर्दनं सत् कथितम् ।
द्वीशाजपान्त्रिऋतिधातृशतार्यमर्क्षे, आर्किकुजौ विना सस्यस्य रोपणं सत् ॥ ३२ ॥
पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, श्रवण, मघा, ज्येष्ठा, रोहिणी, मूल,
अनुराधा और रेवती नक्षत्र में कणमर्दन अर्थात् खरिहान में अनाज का
४२ मुहूर्त्तचिन्तामणि
पीटना अथवा माड़ना शुभ है। विशाखा, पूर्वाभाद्रपद, मूल, रोहिणी,
शतभिष और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में; शनैश्चर और मंगल को छोड़ अन्य
दिनों में; खेतों में धान का लगाना शुभ है ॥ ३२ ॥
धान्यस्थिति और धान्यवृद्धि का मुहूर्त्त
मिश्रोग्ररौद्रभुजगेन्द्रविभिन्नभेषु
कर्कजतौलिरहिते च तनौ शुभाहे ।
धान्यस्थितिः शुभकरी गदिता ध्रुवेज्य-
द्वीशेन्द्रदस्रचरभेषु च धान्यवृद्धिः ॥ ३३ ॥
अन्वयः-मिश्रोग्ररौद्रभुजगेन्द्रविभिन्नभेषु च (तथा) कर्कजतौलिरहिते तनौ,
शुभाहे धान्यस्थितिः शुभकरी गदिता। च [पुनः] ध्रुवेज्यद्वीशेन्द्रदस्रचरभेषु धान्यवृद्धिः
शुभकरी गदिता ॥ ३३ ॥
विशाखा, कृत्तिका, तीनों पूर्वा, भरणी, मघा, आर्द्रा, आश्लेषा और
ज्येष्ठा को छोड़ अन्य नक्षत्रों में; कर्क, मेष और तुला को छोड़ अन्य लग्नों
में; सोम, बुध, शुक्र और बृहस्पति के दिन में धान्यस्थिति अर्थात् अन्न का
रखना शुभ होता है। तीनों उत्तरा, रोहिणी, पुष्य, विशाखा, ज्येष्ठा,
अश्विनी, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु और स्वाती नक्षत्र में धान्यवृद्धि
अर्थात् डेढ़ी और सवाई पर अनाज देना शुभ है ॥ ३३ ॥
शान्तिक और पौष्टिक मुहूर्त्त
क्षिप्रध्रुवान्त्यचरमैत्रमघासु शस्तं
स्याच्छान्तिकं च सह मङ्गलपौष्टिकाभ्याम् ।
खेऽर्के विधौ सुखगते तनुगे गुरौ नो
मौढ्यादिदुष्टसमये शुभदं निमित्ते ॥ ३४ ॥
अन्वयः-क्षिप्रध्रुवान्त्यचरमैत्रमघासु अर्के खे, विधौ सुखगते, गुरौ तनुगे मङ्गल-
पौष्टिकाभ्याम् सह शान्तिकं शस्तं स्यात् । मौढ्यादिदुष्टसमये नो शुभदं (तथा)
निमित्ते [केत्वाद्युत्पातदर्शने सति] शुभदं (स्यात्) ॥ ३४ ॥
अश्विनी, पुष्य, हस्त, तीनों उत्तरा, रोहिणी, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा
शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, अनुराधा और मघा नक्षत्र में; रिक्ता, अष्टमी,
पूर्णमासी, अमावस, सूर्य-संक्रान्ति, रविवार, मङ्गल, शनैश्चर को छोड़ अन्य
तिथियों और दिवसों में; लग्न से दशवें स्थान में सूर्य, चौथे स्थान में
गणेशादि की पूजा,
Wait, is it "गणेशादि"?
"मङ्गल अर्थात् गणेशादि की पूजा," -> Yes.
पौष्टिक अर्थात् पुष्टिकामना से कोई पुरश्चरणादि और मूलशान्ति आदि
करना शुभ है । बृहस्पति, शुक्रास्तादि और केतूदयादि उत्पात के समय को
Wait, space before danda? "करना शुभ है।" - no space before danda.
छोड़कर उक्त मुहूर्त्त मिले तो बहुत उत्तम है, अन्यथा कैसा ही समय हो,
शान्त्यादि करने में कुछ दोष नहीं है ॥ ३४ ॥
होमाहुतिमुहूर्त्त
सूर्यभात्तित्रिभे चान्द्रे सूर्यविच्छुक्रपङ्गवः ।
चन्द्रारेज्यागुशिखिनो नेष्टा होमाहुतिः खले ॥ ३५ ॥
अन्वयः—सूर्यभात् त्रित्रिभे चान्द्रे [चान्द्रर्क्षे] सूर्यविच्छुकपङ्गवः चन्द्रारेज्यागुशिखिनः
Wait, does it have colon after अन्वय? "अन्वयः—" (visarga + em-dash).
Then: "(स्युः) खले होमाहुतिः नेष्टा (भवति) ॥ ३५ ॥" सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित हो उससे तीन-तीन नक्षत्रों का एक
४४ मुहूर्त्तचिन्तामणि
नवान्नभक्षणमुहूर्त्त
नवान्नं स्याच्चरक्षिप्रमृदुभे सत्त नौ शुभम् ।
विना नन्दाविषघटीमधुपौषार्किभूमिजान् ॥ ३७ ॥
अन्वयः—चरक्षिप्रमृदुभे, सत्त नौ, नन्दाविषघटीमधुपौषार्किभूमिजान् विना नवान्नं
(शुभं) स्यात् ॥ ३७ ॥
श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पुनर्वसु, स्वाती, अश्विनी, पुष्य, हस्त, चित्रा,
अनुराधा, मृगशिरा और रेवती नक्षत्र में शुभग्रहों से युक्त वा दृष्ट शुभग्रहों
के लग्न में, परीवा, छठि, एकादशी तिथि, विषघटी, पूस और चैत्रमास,
मङ्गल और शनैश्चर दिन को छोड़ अन्य तिथि, वार और मास में नवान्न-
भक्षण शुभ है ॥ ३७ ॥
नौकाघट्टनमुहूर्त्त
याम्यत्रयविशाखेन्द्रसार्पपित्र्येशभिन्नभे ।
भृग्विज्यार्कदिने नौकाघट्टनं सत्त नौ शुभम् ॥ ३८ ॥
अन्वयः—याम्यत्रयविशाखेन्द्रसार्पपित्र्येशभिन्नभे, भृग्वीज्यार्कदिने सत्त नौ नौकाघट्टनं
शुभम् ॥ ३८ ॥
भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, विशाखा, ज्येष्ठा, आश्लेषा, मघा, आर्द्रा को
छोड़ अन्य नक्षत्रों में; शुक्र, बृहस्पति और रविवार में तथा शुभग्रहयुक्त वा
दृष्ट शुभ लग्न¹ में नाव का बनवाना शुभ होता है ॥ ३८ ॥
वीरसाधन व अभिचार का मुहूर्त्त
मूलाद्रार्भरणीपित्र्यमृगे सौम्ये घटे तनौ ।
सुखे शुक्रेऽष्टमे शुद्धे सिद्धिवीराभिचारयोः ॥ ३९ ॥
अन्वयः—मूलाद्रार्भरणीपित्र्यमृगे, घटे तनौ सौम्ये, शुक्रे सुखे, अष्टमे शुद्धे वीराभि-
चारयोः सिद्धिः (भवति) ॥ ३६ ॥
मूल, आर्द्रा, भरणी, मघा और मृगशिरा नक्षत्र में; बुधयुक्त कुम्भ लग्न
में; लग्न से चौथे स्थान में शुक्र के रहते और आठवें स्थान में किसी ग्रह के
न रहते वीरसाधन और अभिचार करना सिद्धिकारक होता है ॥ ३९ ॥
रोग शान्त होने के पश्चात् स्नान का मुहूर्त्त
व्यन्त्यादितिध्रुवमघानिलसार्पधिष्ण्ये
रिक्ते तिथौ चरतनौ विकवीन्दुवारे ।
१—विवाहप्रकरण में कहेंगे ।
नक्षत्रप्रकरण ४५
स्नानं रुजा विरहितस्य जनस्य शस्तं
हीने विधौ खलखगैर्भवकेन्द्रकोणे ॥ ४० ॥
अन्वयः—व्यन्त्यादितिध्रुवमघानिलसार्पधिष्ण्ये, रिक्ते तिथौ, चरतनौ, विकवीन्दु-
वारे, विधौ हीने, खलखगैः भवकेन्द्रकोणे, (तदा) रुजा विरहितस्य [जनस्य] स्नानं
शस्तम् ॥ ४० ॥
रेवती, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मघा, स्वाती और आश्लेषा को
छोड़ अन्य नक्षत्रों में; रिक्तासंज्ञक तिथियों में; शुक्रवार और सोमवार को
छोड़ अन्य दिनों में, मेष, कर्क, तुला और मकर लग्न में निषिद्ध स्थान में
चन्द्रमा के रहते और गेरहवें, पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, पाँचवें, नवें स्थान
में पापग्रहों के रहते रोग से छूटे हुए पुरुष का स्नान करना शुभदायक
होता है ॥ ४० ॥
शिल्पविद्या के प्रारंभ का मुहूर्त्त
मृदुध्रुवक्षिप्रचरे ज्ञे गुरौ वा खलग्नगे ।
विधौ ज्ञजीववर्गस्थे शिल्पविद्या प्रशस्यते ॥ ४१ ॥
अन्वयः—मृदुध्रुवक्षिप्रचरे, ज्ञे खलग्नगे, वा गुरौ खलग्नगे, विधौ ज्ञजीववर्गस्थे
शिल्पविद्या प्रशस्यते ॥ ४१ ॥
मृदुसंज्ञक, ध्रुवसंज्ञक, क्षिप्रसंज्ञक और चरसंज्ञक नक्षत्रों में; लग्न और
दशवें स्थान में बुध या बृहस्पति के रहते; बुध और बृहस्पति के षड्वर्ग में
चन्द्रमा के रहते शिल्पविद्या का प्रारम्भ करना शुभदायक होता है ॥ ४१ ॥
सन्धानमुहूर्त्त
सुरेज्यमित्रभाग्येषु चाष्टम्यां तैतिले हरौ ।
शुक्रदृष्टे तनौ सौम्यवारे सन्धानमिष्यते ॥ ४२ ॥
अन्वयः—सुरेज्यमित्रभाग्येषु, च (तथा) अष्टम्यां, हरौ, तैतिले, शुक्रदृष्टे तनौ,
सौम्यवारे सन्धानं इष्यते ॥ ४२ ॥
पुष्य, अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी, अष्टमी, द्वादशी, सोमवार, बुध, बृहस्पति,
शुक्रवार, शुक्र से दृष्ट वा युत लग्न और तैतिलनाम करण में सन्धि और
मित्रता करना शुभ होता है ॥ ४२ ॥
परीक्षामुहूर्त्त
त्यक्त्वाष्टभूतशनिविष्टिकुजान् जनुर्भ-
मासौ मृतौ रविविधू अपि भानि नाड्यः ।
४६ मुहूर्त्तचिन्तामणि
द्व्यङ्गे चरे तनुलवे शशिजीवतारा-
शुद्धौ करादितिहरीन्द्रकपे परीक्षा ॥ ४३ ॥
अन्वयः-अष्टभूतशनिविष्टिकुजान्, जनुर्भमासौ, मृतौ रविविधू, अपि नाड्याः
भानि त्यक्त्वा, द्व्यङ्गे चरे तनुलवे, शशिजीवताराशुद्धौ, करादितिहरीन्द्रकपे, परीक्षा
(कार्या) ॥ ४३ ॥
अष्टमी, चतुर्दशी, शनैश्चर, मंगल, भद्रा, जन्मनक्षत्र, जन्ममास, आठवाँ
सूर्य, आठवाँ चन्द्रमा, जिस नाड़ी में जन्मनक्षत्र हो उस नाड़ी¹ के सब नक्षत्र,
इन सबको छोड़कर हस्त, पुनर्वसु, श्रवण, ज्येष्ठा, शतभिष नक्षत्र में; मिथुन,
कन्या, धन, मीन, मेष, कर्क, तुला, मकर लग्न में और इन्हीं राशियों के
नवांश में; चन्द्रमा और बृहस्पति का गोचर शुद्ध तथा ताराशुद्धि रहते
परीक्षा अर्थात् सत्यासत्य के निर्णय के लिये लोहे का गरम गोला आदि
उठवाना शुभ होता है ॥ ४३ ॥
सब शुभ कार्यों में लग्नशुद्धि
व्ययाष्टशुद्धोपचये लग्नगे शुभदृग्युते ।
चन्द्रे त्रिषट्दशायस्थे सर्वारम्भः प्रसिद्धयति ॥ ४४ ॥
अन्वयः-व्ययाष्टशुद्धोपचये लग्नगे शुभदृग्युते, त्रिषड्दशायस्थे चन्द्रे सर्वारम्भः
प्रसिद्धयति ॥ ४४ ॥
लग्न से बारहवाँ और आठवाँ स्थान शुद्ध हो, अर्थात् किसी शुभाशुभ
ग्रह से युक्त न हो। कर्त्ता के जन्मराशि वा जन्मलग्न से तीसरी, छठी,
गेरहवीं, दशवीं इनमें से कोई लग्न हो और शुभग्रहों से युक्त अथवा दृष्ट हो।
चन्द्रमा लग्न से तीसरे, छठे, दशवें, गेरहवें इनमें से किसी स्थान में हो तब
सम्पूर्ण शुभ कर्मों का आरम्भ शुभदायक होता है ॥ ४४ ॥
जिन नक्षत्रों में ज्वर होने से मृत्यु होती है अथवा जितने
दिनों तक ज्वर रहता है वह कहते हैं-
स्वातीन्द्रपूर्वाशिवसार्पभे मृतिज्वरेन्त्यमैत्रे स्थिरता भवेद्रुजः ।
याम्यश्रवोवारुणतक्षभे शिवा घस्रा हि पक्षो द्व्यधिपार्कवासवे ॥ ४५ ॥
मूलाग्निदात्रे नव पित्र्यभे नखा बुध्यार्यमेज्यादितिधातृभे नगाः ।
मासोऽब्जवैश्वेऽथ यमाहि मूलभे मिश्रेशपित्र्ये फणिदंशने मृतिः ॥ ४६ ॥
१—विवाहप्रकरण में कहेंगे ।
नक्षत्रप्रकरण ४७
अन्वयः-स्वातीन्द्रपूर्वाशिवसार्पभे ज्वरे मृतिः (स्यात्), अन्त्यमैत्रे रुजः स्थिरता
भवेत्, याम्यश्रवोवारुणतक्षभे शिवा घस्राः द्व्यधिपार्कवासवे पक्षः, हि मूलाग्निदास्रे नव,
पित्र्ये नखाः, बुध्न्यार्यमेज्यादितिधातृभे नगाः, अब्जवैश्वे मासः। अथ मिश्रेशपित्र्ये,
फणिदंशने मृतिः (स्यात्) ॥ ४५-४६ ॥
स्वाती, ज्येष्ठा, तीनों पूर्वा, आर्द्रा और आश्लेषा में जिसे ज्वर हो उसकी
मृत्यु होती है। रेवती और अनुराधा में हो तो रोग की स्थिरता होती है,
अर्थात् रोग बहुत दिन तक रहता है। भरणी, श्रवण, शतभिष और चित्रा
में हो तो गेरह दिन तक; विशाखा, हस्त और धनिष्ठा में हो तो पन्द्रह
दिन तक; मूल, कृत्तिका और अश्विनी में हो तो नव दिन तक; मघा में हो
तो बीस दिन तक; उत्तराभाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी, पुष्य, पुनर्वसु, रोहिणी में
हो तो सात दिन तक; मृगशिरा और उत्तराषाढ़ में हो तो एक महीने तक
ज्वर रहता है। यदि भरणी, आश्लेषा, मूल, कृत्तिका, विशाखा, आर्द्रा वा
मघा नक्षत्र में किसी को सर्प काटे तो उसकी मृत्यु होती है। चन्द्रमा बली
हो तो शायद बच जाय ॥ ४५-४६ ॥
रोगी के शीघ्र ही मरने का योग
रौद्राहिशाक्राम्बुपयाम्यपूर्वाद्दिदैववस्वग्निषु पापवारे।
रिक्ताहरिस्कन्ददिने च रोगे शीघ्रं भवेद्रोगिजनस्य मृत्युः ॥ ४७ ॥
अन्वयः-रौद्राहिशाक्राम्बुपयाम्यपूर्वाद्दिदैववस्वग्निषु, पापवारे, रिक्ताहरिस्कन्ददिने
च, रोगे रोगिजनस्य शीघ्रं मृत्युर्भवेत् ॥ ४७ ॥
आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, शतभिष, भरणी, तीनों पूर्वा, विशाखा,
धनिष्ठा अथवा कृत्तिका नक्षत्र; रविवार, मंगल वा शनैश्चर दिन और
चौथि, नवमी, चतुर्दशी, द्वादशी वा छठि तिथि; ऐसे योग में यदि रोग उत्पन्न
हो तो रोगी की शीघ्र ही मृत्यु होती है ॥ ४७ ॥
प्रेतक्रिया का मुहूर्त्त
क्षिप्राहिमूलेन्दुहरीशवायुभे प्रेतक्रिया स्याज्झषकुम्भगे विधौ।
प्रेतस्य दाहं यमदिग्गमं त्यजेच्छय्यावितानं गृहगोपनादिकम् ॥ ४८ ॥
अन्वयः-क्षिप्राहिमूलेन्दुहरीशवायुभे, प्रेतक्रिया स्यात्, विधौ झषकुम्भगे प्रेतस्य दाह,
यमदिग्गमं, शय्यावितानं, च गृहगोपनादिकम् त्यजेत् ॥ ४८ ॥
अश्विनी, पुष्य, हस्त, आश्लेषा, मूल, ज्येष्ठा, श्रवण, आर्द्रा और स्वाती
४८ मुहूर्त्तचिन्तामणि
नक्षत्र में प्रेतक्रिया करना योग्य है, यदि मरणकाल में किसी कारणवश से
न की गई हो। धनिष्ठा नक्षत्र का उत्तरार्द्ध, शतभिष, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा-
भाद्रपद, रेवती इन साढ़े चार नक्षत्रों में प्रेत का दाह, दक्षिण दिशा की
यात्रा, खाट बिनाना और घर छवाना वर्जित है। आदि पद से तृण काष्ठ
आदि का संग्रह भी न करे ॥ ४८ ॥
त्रिपुष्कर योग और उसका फल
भद्रातिथी रविजभूतनयार्कवारे
द्वीशार्यमाजचरणादितिवह्निवैश्वे ।
त्रैपुष्करो भवति मृत्युविनाशवृद्धौ
त्रैगुण्यदो द्विगुणकृद्वसुतक्षचान्द्रे ॥ ४९ ॥
अन्वयः—भद्रातिथिः, रविजभूतनयार्कवारे, द्वीशार्यमाजचरणादितिवह्निवैश्वे,
मृत्युविनाशवृद्धौ त्रैगुण्यदः त्रैपुष्करो भवति । (एवं) भद्रातिथिः, रविजभूतनयार्कवारे,
वसुतक्षचान्द्रे, मृत्युविनाशवृद्धौ द्विगुणकृत् (द्विपुष्करो योगो) भवति ॥ ४६॥
शनैश्चर, मंगल या रविवार हो; दुइज, सप्तमी वा द्वादशी तिथि हो;
विशाखा, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाभाद्रपद, पुनर्वसु, कृत्तिका वा उत्तराषाढ़ नक्षत्र
हो तो त्रिपुष्कर योग होता है। इस योग में यदि किसी के घर में कोई मरे
तो तीन प्राणी मरें। और यदि कोई वस्तु नष्ट हो जाय तो तीन नष्ट हों
यदि किसी वस्तु का लाभ हो तो तीन वस्तुओं का लाभ हो। यदि रविवार,
मंगल, शनैश्चर इन्हीं दिनों में दुइज, सप्तमी वा द्वादशी यही तिथि हों
और धनिष्ठा, चित्रा या मृगशिरा नक्षत्र हो तो द्विपुष्कर योग होता है।
इसमें कोई मरे तो उस घर में दो मरें, कोई वस्तु नष्ट हो तो दो नष्ट हों
और कुछ लाभ हो तो दो का लाभ हो ॥ ४९ ॥
शवप्रतिकृतिदाह का निषिद्धकाल
शुक्राराकिषु दर्शभूतमदने नन्दासु तीक्ष्णोग्रभे
पौष्णे वारुणभे त्रिपुष्करदिने न्यूनाधिमासेऽयने ।
याम्येऽब्दात्परतश्च पातपरिघे देवेज्यशुक्रास्तके
भद्रावैधृतयोः शवप्रतिकृतेर्दाहो न पक्षे सिते ॥ ५० ॥
जन्मप्रत्यरितारयीमृतिसुखान्त्येऽब्जे च कर्तुर्न स-
न्मध्योमैत्रभगादितिध्रुवविशाखाद्यङ्घ्रिभे ज्ञेऽपि च ।
नक्षत्रप्रकरण ४९
श्रेष्ठोऽर्केज्यविधोर्दिने श्रुतिकरस्वात्यश्विपुष्ये तथा
त्वाशौचात्परतो विचार्यमखिलं मध्ये यथासम्भवम् ॥ ५१ ॥
अन्वयः—शुक्रारार्किषु, दर्शभूतमदने नन्दासु, तीक्ष्णोग्रभे, पौष्णे, वारुणभे, त्रिपुष्कर-
दिने, न्यूनाधिमासे, अब्दात्परतः याम्ये अयने, च पातपरिघे, देवेज्यशुक्रास्तके, भद्रावैधृ-
तयोः, सिते पक्षे, शवप्रतिकृतेर्दाहः न (कार्यः) जन्मप्रत्यरितारयोः, अब्जे मृतिसुखान्त्ये,
कर्तुः न सत्, मैत्रभगादितिध्रुवविशाखाद्वयङ्घ्रिभे, च ज्ञेऽपि कर्तुः मध्यः अर्केज्यविधोर्दिने,
श्रुतिकरस्वात्यश्विपुष्ये, कर्तुः श्रेष्ठः (स्यात्) । (इदं) अखिलं अशौचात्परतः विचार्यम्,
मध्ये तु यथासम्भवं (कार्यम्) ॥ ५०-५१ ॥
शुक्र, मंगल, शनैश्चर दिन में; अमावस, चतुर्दशी, त्रयोदशी, परीवा,
छठि, एकादशी तिथि में; मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा, तीनों पूर्वा, भरणी,
मघा, रेवती, शतभिष नक्षत्र में; त्रिपुष्कर योग, क्षयमास, मलमास, जिसे
मरे हुए एक वर्ष से अधिक हो गया हो उसका दक्षिणायन, व्यतीपात योग,
परिघ योग, बृहस्पति और शुक्र का अस्त, वैधृति योग, भद्रा और शुक्लपक्ष
में शवप्रतिकृतिदाह न करे। कोई आचार्य आषाढ़, पौष और हरिशयन में भी
निषेध करते हैं ॥ ५० ॥ कर्त्ता की जन्मतारा अर्थात् जन्मनक्षत्र और जन्मनक्षत्र
से दशवाँ वा उन्नीसवाँ नक्षत्र और प्रत्यरि तारा अर्थात् जन्मनक्षत्र से पाँचवाँ,
चौदहवाँ और तेइसवाँ नक्षत्र. इनमें और कर्त्ता की जन्मराशि से आठवें,
चौथे, बारहवें चन्द्रमा के रहते शवप्रतिकृतिदाह शुभ नहीं होता। अनुराधा,
पूर्वाफाल्गुनी, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, रोहिणी, विशाखा, मृगशिरा, चित्रा,
धनिष्ठा इन नक्षत्रों में और बुधवार में शवप्रतिकृतिदाह मध्यम; रविवार,
बृहस्पति और सोमवार में श्रवण, हस्त, स्वाती, अश्विनी, पुष्य नक्षत्र में
शवप्रातेकृतिदाह श्रेष्ठ है। मरने के दिन से लेकर दश दिन बीत गये हों तो
यह सम्पूर्ण विचार करना चाहिए और दश दिन के भीतर भी यदि श्रेष्ठ
मुहूर्त्त मिल जाय तो उत्तम है। यदि सम्भव न हो तो कुछ भी न विचारना
चाहिए ॥ ५०-५१ ॥
अभुक्तमूलघटी
अभुक्तमूलं हि घटीचतुष्टयं ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवं हि नारदः ।
वशिष्ठ एकद्विघटीमितं जगौ बृहस्पतिस्त्वेकघटीप्रमाणकम् ॥ ५२ ॥
अथोचुरन्ये प्रथमाष्टघटचो मूलस्य शाक्रान्तिमपञ्चनाड्यः ।
जातं शिशुं तत्र परित्यजेद्वा मुखं पितास्याष्टसमा च पश्येत् ॥ ५३ ॥
५० मुहूर्त्तचिन्तामणि
अन्वयः—ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवं घटिकाचतुष्टय, अभुक्तमूलं (इति) नारदः जगौ,
ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवं एकद्विघटीमितं अभुक्तमूलं (इति) वसिष्ठः जगौ, बृहस्पतिस्तु
ज्येष्ठान्त्यमूलादिभवम् एकघटीप्रमाणकम् अभुक्तमूलं स्यादिति जगौ, अथ मूलस्य
प्रथमाष्टघटचः, शाक्रान्तिमपञ्चनाड्यः (अभुक्तमूलं स्यादिति) अन्ये ऊचुः, तत्र जातं
शिशुं परित्यजेत्, वा पिता अस्य अष्टसमा मुखं न पश्येत् ॥ ५२-५३ ॥
ज्येष्ठा नक्षत्र के अन्त की चार घड़ी और मूल नक्षत्र के आदि की चार
घड़ी अभुक्त मूल हैं, यह नारदजी कहते हैं। ज्येष्ठा के अन्त की एक घड़ी
और मूल के आदि की दो घड़ी अभुक्त मूल हैं, यह वसिष्ठजी ने कहा है।
ज्येष्ठा के अन्त की आधी घड़ी और मूल के आदि की आधी घड़ी अभुक्त-
मूल है, यह बृहस्पतिजी ने कहा है॥ ५२ ॥ मूल नक्षत्र के आदि की आठ घड़ी
और ज्येष्ठा के अन्त की पाँच घड़ी अभुक्तमूल हैं, यह अन्याचार्यों ने कहा है।
अभुक्तमूल में उत्पन्न सन्तान को त्याग दे अथवा आठ वर्ष तक पिता उसका
मुख न देखे। अब इस विषय में कोई यह पूछे कि इन अनेक मतों में किसका
मत प्रामाणिक है ? तो उसका उत्तर यह है कि बहुत से आचार्यों की सम्मति
होने के कारण नारदजी का मत ठीक है ॥ ५२-५३ ॥
मूल और आश्लेषा नक्षत्र में उत्पन्न सन्तान
का शुभाशुभ फल
आद्ये पिता नाशमुपैति मूलपादे द्वितीये जननी तृतीये ।
धनं चतुर्थोऽस्य शुभोऽथ शान्त्या सर्वत्र सत्स्यादहिभे विलोमम् ॥ ५४ ॥
अन्वयः—आद्ये मूलपादे पिता नाशं उपैति, द्वितीये जननी, तृतीये धनं (नाशं
उपैति) चतुर्थः अस्य (शिशोः) शुभः (स्यात्) शान्त्या सर्वत्र सत्स्यात् । अहिभे
विलोमं (भवति) ॥ ५४ ॥
मूल नक्षत्र के पहिले चरण में जन्म होने से पिता का नाश, दूसरे चरण
में माता का और तीसरे चरण में धन का नाश होता है। चौथा चरण शुभ-
दायक होता है और शान्ति करने से चारों चरणों में शुभ ही होता है।
आश्लेषा में इससे विपरीत अर्थात् आश्लेषा के चौथे चरण में यदि किसी का
जन्म हो तो उसके पिता का, तीसरे चरण में माता का और दूसरे चरण में
धन का नाश होता है तथा पहिला चरण शुभदायक है ॥ ५४ ॥
मूल का निवास
स्वर्गे शुचिप्रोष्ठपदेषमाघे भूमौ नभः कार्त्तिकचैत्रपौषे ।
मूलं ह्यधस्तात्तु तपस्यमार्गवैशाखशुक्रेष्वशुभं च तत्र ॥ ५५ ॥
नक्षत्रप्रकरण ५१
अन्वयः—शुचिप्रौष्ठपदेषमाघे मूलं स्वर्गे (तिष्ठति) । नभः कार्त्तिकचैत्रपौषे मूलं
भूमौ (तिष्ठति) । तु (पुनः) तपस्यमार्गवैशाखशुक्रेषु मूलं अधस्तात् (तिष्ठति) । मूलं
(यत्र) तिष्ठति तत्र अशुभं (ज्ञेयम्) ॥ ५५ ॥
आषाढ़, भाद्रपद, आश्विन और माघ में स्वर्ग में; श्रावण, कार्त्तिक,
चैत्र और पौष में भूमि में; और फाल्गुन, ज्येष्ठ, अगहन और वैशाख में
पाताललोक में मूल का निवास होता है । जहाँ मूल का वास होता है वहाँ
उसका अशुभ होता है ॥ ५५ ॥
गण्डान्तादि में जन्मे हुए का अरिष्ट और उसका परिहार
गण्डान्तेन्द्रभशूलपातपरिघव्याघातगण्डावमे
संक्रान्तिव्यतिपातवैधृतिसिनीवालीकुहूदर्शके ।
वज्रे कृष्णचतुर्दशीषु यमघण्टे दग्धयोरमृतौ
विष्टौ सोदरभे जनिर्न पितृभे शस्ता शुभा शान्तितः ॥ ५६ ॥
अन्वयः—[अत्रान्वयः श्लोकक्रमेणैवान्ते] जनिः न शस्ता, शान्तितः शुभा
(भवति) ॥ ५६ ॥
गण्डान्त, ज्येष्ठा, शूलयोग, पात अर्थात् गणित से सिद्ध होनेवाला
व्यतीपात, परिघ, व्याघात, गण्डयोग, अवम अर्थात् तिथिक्षय, संक्रान्ति,
व्यतीपात, वैधृतियोग, सिनीवाली अर्थात् चतुर्दशीयुक्त अमावास्या, कुहू
अर्थात् परीवासंयुक्त अमावास्या, दर्श अर्थात् सूर्य और चन्द्रमा का समागम
जिसमें हो वह तिथि, वज्रयोग, कृष्णपक्ष की चतुर्दशी, यमघंट, दग्धयोग,
मृत्युयोग, भद्रा, भाई-बहिन का जन्म नक्षत्र, माता-पिता का जन्मनक्षत्र, तथा
चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहणकाल में यदि किसी का जन्म हो, तीन कन्याओं
के बाद पुत्र का जन्म और तीन पुत्रों के बाद कन्या का जन्म हो तो अशुभ
होता है । परन्तु उसकी शान्ति करने से शुभ होता है ॥ ५६ ॥
अश्विन्यादि नक्षत्रों के तारों की संख्या
त्रित्र्यङ्गपञ्चाग्निकुवेदवह्नयः शरेषुनेत्राशिवशरेन्दुभूकृताः ।
वेदाग्निरुद्राशिवयमाग्निवह्नयोऽब्धयः शतंद्विद्विरदा भतारकाः ॥ ५७ ॥
अन्वयः—[श्लोकक्रमेण] (एताः) भतारकाः [क्रमेण ज्ञेया] ॥ ५७ ॥
अश्विनी का स्वरूप तीन ताराओं का, भरणी का तीन ताराओं का,
कृत्तिका का छः ताराओं का, रोहिणी का पाँच ताराओं का, मृगशिरा का
५२ मुहूर्तचिन्तामणि
पाँच ताराओं का, आर्द्रा का एक तारा का, पुनर्वसु का चार ताराओं का,
पुष्य का तीन ताराओं का, आश्लेषा का पाँच ताराओं का, मघा का पाँच
ताराओं का, पूर्वाफाल्गुनी का दो ताराओं का, उत्तराफाल्गुनी का दो ताराओं
का, हस्त का पाँच ताराओं का, चित्रा का एक तारा का, स्वाती का एक
तारा का, विशाखा का चार ताराओं का, अनुराधा का चार ताराओं का,
ज्येष्ठा का तीन ताराओं का, मूल का गेरह ताराओं का, पूर्वाषाढ़ का दो
ताराओं का, उत्तराषाढ़ का दो ताराओं का, अभिजित् का तीन ताराओं का,
श्रवण का तीन ताराओं का, धनिष्ठा का चार ताराओं का, शतभिष का सौ
ताराओं का, पूर्वाभाद्रपद का दो ताराओं का, उत्तराभाद्रपद का दो ताराओं
का और रेवती का स्वरूप बत्तिस ताराओं का है ॥ ५७ ॥
अश्विन्यादि नक्षत्रों का रूप
अश्व्यादिरूपं तुरगास्ययोनिक्षुरोनएणास्यमणीगृहं च ।
पृषत्कचक्रे भवनं च मञ्चः शय्याकरो मौक्तिकविद्रुमं च ॥ ५८ ॥
तोरणं बलिनिभं च कुण्डलं सिंहपुच्छगजदन्तमञ्चकाः ।
त्र्यस्रि च त्रिचरणाभमर्दलो वृत्तमञ्चयमलाभमर्दलाः ॥ ५९ ॥
अन्वयः—तुरगास्ययोनिक्षुरः, अनः, एणास्यमणिः, गृहं च, पृषत्कचक्रे भवनं च,
मञ्चः, शय्या, करः, मौक्तिकविद्रुमं च, तोरणं, बलिनिभं च, कुण्डलं, सिंहपुच्छगजदन्त-
मञ्चकाः, त्र्यस्रि च, त्रिचरणाभमर्दलः, वृत्तमञ्चयमलाभमर्दलाः [एतत्] अश्व्यादिरूपं
(ज्ञेयम्) ॥ ५८-५९ ॥
घोड़े के मुख के सदृश अश्विनी, योनि के सदृश भरणी, छुरा के सदृश
कृत्तिका, गाड़ी के सदृश रोहिणी, हरिण के मुख के सदृश मृगशिरा,
मणि के सदृश आर्द्रा, घर के सदृश पुनर्वसु, बाण के सदृश पुष्य, चक्राकार
आश्लेषा, घर के समान मघा, मचान के सदृश पूर्वाफाल्गुनी, खाट के
सदृश उत्तराफाल्गुनी, हाथ के सदृश हस्त, मोती के सदृश चित्रा, मूंगा
के सदृश स्वाती, तोरण के सदृश विशाखा, भात के ढेर के सदृश अनुराधा,
कुण्डल के सदृश ज्येष्ठा, सिंह की पूँछ के सदृश मूल, हाथी-दाँत के सदृश
पूर्वाषाढ़, मचान के सदृश उत्तराषाढ़, त्रिकोणाकार अभिजित्, वामन
भगवान् के सदृश श्रवण, नगाड़ा के सदृश धनिष्ठा, मण्डलाकार शतभिष,
मचान के सदृश पूर्वाभाद्रपद, जुड़े हुए दो नक्षत्र उत्तराभाद्रपद और नगाड़ा
के सदृश रेवती है ॥ ५८-५९ ॥
संक्रान्तिप्रकरण ५३
जलाशय-वाटिका-देवप्रतिष्ठा के मुहूर्त्त
जलाशयारामसुरप्रतिष्ठा सौम्यायने जीवशशाङ्कशुक्रे ।
दृश्ये मृदुक्षिप्रचरध्रुवे स्यात्पक्षे सिते स्वर्क्षतिथिक्षण वा ॥ ६० ॥
रिक्तारवर्ज्ये दिवसेऽतिशरता शशाङ्कपापैस्त्रिभवाङ्गसंस्थैः ।
व्यन्त्याष्टगैः सत्खचरैर्मृगेन्द्रे सूर्यो घटे को युवतौ च विष्णुः ॥ ६१ ॥
शिवो नृयुग्मे द्वितनौ च देव्यः क्षुद्राश्चरे सर्व इमे स्थिरर्क्षे ।
पुष्ये ग्रहा विघ्नपयक्षसर्पभूतादयोऽन्त्ये श्रवण जिनश्च ॥ ६२ ॥
इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ नक्षत्रप्रकरणं समाप्तम् ॥ २ ॥
अन्वयः—सौम्यायने, जीवशशाङ्कशुक्रे दृश्ये, मृदुक्षिप्रचरध्रुवे, सिते पक्षे, वा स्वक्षं-
तिथिक्षणे, रिक्तारवर्ज्ये दिवसे, शशाङ्कपापैः त्रिभवाङ्गसंस्थैः सत्खचरैः व्यन्त्याष्टगैः
(तदा) जलाशयारामसुरप्रतिष्ठा अतिशस्ता स्यात् । मृगेन्द्रे सूर्यः, घटे कः, युवतौ
विष्णुः, नृयुग्मे शिवः, च द्वितनौ देव्यः, चरे क्षुद्राः, इमे सर्वे स्थिरर्क्षे [स्थाप्याः ] पुष्ये
ग्रहाः, अन्त्ये विघ्नपयक्षसर्पभूतादयः (स्थाप्याः), श्रवणे जिनः (स्थाप्यः) ॥ ६०-६२ ॥
उत्तरायण में; बृहस्पति, चन्द्रमा और शुक्र के उदय रहते; मृदुसंज्ञक,
क्षिप्रसंज्ञक, चरसंज्ञक, ध्रुवसंज्ञक नक्षत्रों में; शुक्लपक्ष में; जिस देवता की
प्रतिष्ठा आदि करना हो उसी के नक्षत्र, तिथि और मुहूर्त्त में; रिक्ता तिथि
और मंगल दिन को छोड़ अन्य तिथि और दिवस में तड़ागादि जलाशयों
का उत्सर्ग, बगीचे आदि का उत्सर्ग और देवताओं की स्थापना शुभ होती
है। लग्न से तीसरे, गेरहवें और छठे स्थान में चन्द्रमा वा पापग्रहों के रहते;
आठवें और बारहवें स्थान को छोड़ अन्य स्थानों में शुभग्रहों के रहते और
स्थिर वा द्विस्वभाव लग्नों में सामान्यतः सब देवताओं की प्रतिष्ठा शुभ
होती है। परन्तु विशेष यह है कि सिंह लग्न में सूर्य की, कुम्भ में ब्रह्मा
की, कन्या में विष्णु की, मिथुन में शिव की, द्विस्वभाव लग्नों में देवी की,
चर लग्नों में योगिनी आदि देवियों की, स्थिर लग्नों में उक्तानुक्त सब
देवताओं की, पुष्य नक्षत्र में चन्द्रादि आठ ग्रहों की, हस्त नक्षत्र में सूर्य की,
रेवती नक्षत्र में गणेश, यक्ष, सर्प, भूतादिकों की और श्रवण नक्षत्र में बुद्ध
की स्थापना शुभ होती है ॥ ६०-६२ ॥
५४ मुहूर्त्तचिन्तामणि
संक्रान्तिप्रकरण
——————:०:——————
दिन और नक्षत्र के भेद से संक्रान्तियों के नाम और फल
घोरार्कसंक्रमणमुग्ररवौ हि शूद्रान्
ध्वाङ्क्षी विशो लघुविधौ च चरर्क्षभौमे ।
चौरान् महोदरयुता नृपतीन् ज्ञमैत्रे
मन्दाकिनी स्थिरगुरौ सुखयेच्च मन्दा ॥ १ ॥
विप्रांश्च मिश्रभभृगौ तु पशूंश्च मिश्रा
तीक्ष्णार्कजेऽन्त्यजसुखा खलु राक्षसी च ।
अन्वयः—[यदि] उग्ररवौ अर्कसंक्रमणं (स्यात्) (तदा) घोरा (नाम्नीसंक्रान्तिः)
(सा) शूद्रान् सुखयेत्, लघुविधौ ध्वाङ्क्षी [सा] विशः, च (पुनः) चरर्क्षभौमे महोदर-
युता (संक्रान्तिः) (सा) चौरान्, ज्ञमैत्रे मन्दाकिनी (सा) नृपतीन्, स्थिरगुरौ मन्दा
(सा) विप्रान्, तु (पुनः) मिश्रभभृगौ मिश्रा (सा) पशून् सुखयेत्, तीक्ष्णार्कजे राक्षसी
(सा) अन्त्यजसुखा (स्यात्) ॥ १ ॥
तीनों पूर्वा, भरणी या मघा नक्षत्र में रविवार को जो सूर्य की संक्रान्ति
होती है, उसका घोरा नाम होता है। वह शूद्रों को सुख देती है। हस्त,
अश्विनी, पुष्य या अभिजित् नक्षत्र में सोमवार को जो संक्रान्ति होती है,
उसका नाम ध्वांक्षी होता है। वह वैश्यों को सुख देती है। स्वाती, पुनर्वसु,
श्रवण, धनिष्ठा वा शतभिष नक्षत्र में मंगलवार को जो संक्रान्ति होती है,
उसका महोदरी नाम होता है। वह चोरों को सुख देती है। मृगशिरा,
रेवती, चित्रा वा अनुराधा नक्षत्र में बुधवार को जो संक्रान्ति होती है,
उसका मन्दाकिनी नाम होता है। वह क्षत्रियों को सुख देती है। तीनों
उत्तरा वा रोहिणी नक्षत्र में बृहस्पति के दिन जो सक्रान्ति होती है, उसका
मन्दा नाम होता है। वह ब्राह्मणों को सुख देती है ॥ १ ॥ विशाखा अथवा
कृत्तिका नक्षत्र में शुक्रवार को जो संक्रान्ति होती है, उसका मिश्रा नाम
होता है। वह पशुओं को सुख देती है। मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा या आश्लेषा
नक्षत्र में शनैश्चर को जो संक्रान्ति होती है, उसका राक्षसी नाम होता है।
वह चाण्डालादि को सुख देती है।
संक्रान्तिप्रकरण ५५
संक्रान्तिचक्र
| घोरा | ध्वांक्षी | महोदरी | मन्दाकिनी | मन्दा | मिश्रा | राक्षसी |
|---|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य | सोम | मंगल | बुध | बृहस्पति | शुक्र | शनैश्चर |
| पू० ३<br>भरणी<br><br>मघा | हस्त<br>अश्विनी<br>पुष्य<br>अभिजित् | स्वाती<br>पुनर्वसु<br>श्रवण<br>धनिष्ठा<br>शतभिष | मृगशिरा<br>रेवती<br>चित्रा<br>अनुराधा | उत्तरा ३<br>रोहिणी | विशाखा<br>कृत्तिका | मूल ज्येष्ठा<br>आर्द्रा<br>आश्लेषा |
| शूद्र<br>सुखदा | वैश्य<br>सुखदा | चोर सुखदा | क्षत्रिय<br>सुखदा | ब्राह्मण<br>सुखदा | पशु<br>सुखदा | चांडालादि<br>सुखदा |
| दिन-रात्रि के विभाग से संक्रान्तियों का शुभाशुभ फल | ||||||
| त्र्यंशे दिनस्य नृपतीन्प्रथमे निहन्ति | ||||||
| मध्ये द्विजानपि विशोऽपरके च शूद्रान् ॥ २ ॥ | ||||||
| अस्ते निशाप्रहरकेषु पिशाचका- | ||||||
| दीन्नक्तंचरानपि नटान् पशुपालकांश्च । | ||||||
| सूर्योदये सकललिङ्गिजनं च सौम्य | ||||||
| याम्ययनं मकरकर्कटयोर्निरुक्तम् ॥ ३ ॥ | ||||||
| **अन्वयः—**दिनस्य प्रथमे त्र्यंशे (अर्कसंक्रमणं) नृपतीन् निहन्ति, मध्ये (त्र्यंशे) | ||||||
| द्विजान्, अपरके (त्र्यंशे) विशः, अस्ते शूद्रान् । निशाप्रहरकेषु (क्रमेण) पिशाचकादीन्, | ||||||
| नक्तंचरान्, नटान् अपि, पशुपालकान् च निहन्ति, सूर्योदये (अर्कसंक्रान्तिः) सकललिङ्गि- | ||||||
| जनं निहन्ति । मकरकर्कटयोः (क्रमेण) सौम्ययाम्ययानम् निरुक्तम् ॥ २-३ ॥ | ||||||
| दिनमान के तीन भाग करके यह विचार करना चाहिए कि प्रथमभाग | ||||||
| में सूर्यसंक्रान्ति हो तो क्षत्रियों का, दूसरे भाग में हो तो ब्राह्मणों का, तीसरे | ||||||
| भाग में हो तो वैश्यों का और सूर्यास्तकाल में हो तो शूद्रों का नाश करती | ||||||
| है । रात्रि के पहले पहर में संक्रान्ति हो तो पिशाचों और भूतों का, दूसरे | ||||||
| पहर में हो तो राक्षसों का, तीसरे पहर में हो तो नटों का चौथे पहर में | ||||||
| पशुपालकों अर्थात् अहीरों का और सूर्योदय काल में पाखण्डियों का नाश |