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सर्वकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

४८ मुहूर्त्तचिन्तामणि
नक्षत्र में प्रेतक्रिया करना योग्य है, यदि मरणकाल में किसी कारणवश से
न की गई हो। धनिष्ठा नक्षत्र का उत्तरार्द्ध, शतभिष, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा-
भाद्रपद, रेवती इन साढ़े चार नक्षत्रों में प्रेत का दाह, दक्षिण दिशा की
यात्रा, खाट बिनाना और घर छवाना वर्जित है। आदि पद से तृण काष्ठ
आदि का संग्रह भी न करे ॥ ४८ ॥
त्रिपुष्कर योग और उसका फल
भद्रातिथी रविजभूतनयार्कवारे
द्वीशार्यमाजचरणादितिवह्निवैश्वे ।
त्रैपुष्करो भवति मृत्युविनाशवृद्धौ
त्रैगुण्यदो द्विगुणकृद्वसुतक्षचान्द्रे ॥ ४९ ॥
अन्वयः—भद्रातिथिः, रविजभूतनयार्कवारे, द्वीशार्यमाजचरणादितिवह्निवैश्वे,
मृत्युविनाशवृद्धौ त्रैगुण्यदः त्रैपुष्करो भवति । (एवं) भद्रातिथिः, रविजभूतनयार्कवारे,
वसुतक्षचान्द्रे, मृत्युविनाशवृद्धौ द्विगुणकृत् (द्विपुष्करो योगो) भवति ॥ ४६॥
शनैश्चर, मंगल या रविवार हो; दुइज, सप्तमी वा द्वादशी तिथि हो;
विशाखा, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाभाद्रपद, पुनर्वसु, कृत्तिका वा उत्तराषाढ़ नक्षत्र
हो तो त्रिपुष्कर योग होता है। इस योग में यदि किसी के घर में कोई मरे
तो तीन प्राणी मरें। और यदि कोई वस्तु नष्ट हो जाय तो तीन नष्ट हों
यदि किसी वस्तु का लाभ हो तो तीन वस्तुओं का लाभ हो। यदि रविवार,
मंगल, शनैश्चर इन्हीं दिनों में दुइज, सप्तमी वा द्वादशी यही तिथि हों
और धनिष्ठा, चित्रा या मृगशिरा नक्षत्र हो तो द्विपुष्कर योग होता है।
इसमें कोई मरे तो उस घर में दो मरें, कोई वस्तु नष्ट हो तो दो नष्ट हों
और कुछ लाभ हो तो दो का लाभ हो ॥ ४९ ॥
शवप्रतिकृतिदाह का निषिद्धकाल
शुक्राराकिषु दर्शभूतमदने नन्दासु तीक्ष्णोग्रभे
पौष्णे वारुणभे त्रिपुष्करदिने न्यूनाधिमासेऽयने ।
याम्येऽब्दात्परतश्च पातपरिघे देवेज्यशुक्रास्तके
भद्रावैधृतयोः शवप्रतिकृतेर्दाहो न पक्षे सिते ॥ ५० ॥
जन्मप्रत्यरितारयीमृतिसुखान्त्येऽब्जे च कर्तुर्न स-
न्मध्योमैत्रभगादितिध्रुवविशाखाद्यङ्घ्रिभे ज्ञेऽपि च ।