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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

३० मुद्राराक्षस ।

नटी ।—आर्य्य ! यह पृथ्वी ही पर से चन्द्रमा को कौन बचाना चाहता है ?
सूत्र०।—प्यारी, मै ने भी नही लखा, देखो, अब फिर से वही पढता हू और अब जब वह फिर बोलैगा तो मै उस की बोली से पहिचान लूगा कि कौन है।


भा सूर्य्य सै आगे नही जाता। विल्सन ने केतु शब्द से मलयकेतु का ग्रहण किया हे। इस मे भी एक प्रकार का अलकार अच्छा रहता है।

चमत्कृत बुद्धिसम्पन्न पण्डित सुधाकर जी न इस विषय में जो लिखा हे वह विचित्र ही है। वह भी प्रकाश किया जाता हं—

करत अधिक अंधियार वह, मिलि मिलि करि हरिच द ।
द्विजराजहु विकसित करत, धान धनि यह हरिच द ॥
श्री बाबू साहब को हमारे अनेक आशीर्वाद,

महाशय !

चन्द्रग्रहण का सम्भव भूच्छाया के कारण प्रति पूर्णिमा के अन्त में होता है और उस समय में केतु और सूर्य्य साथ रहते हैं। परन्तु कतु और सूर्य्य का योग यदि नियत सख्या के अर्थात् पाच राशि सोतरह अश से लेकर छ राशि चौदह अश क वा ग्यारह राशि सोरह अश मे लेकर बारह राशि चौदह अश के भीतर होता है तब ग्रहण होता है और यदि योग नियत सख्या क बाहर पड जाता है तब ग्रहण नही होता इस लिये सूर्य्य केतु के योगही के कारण से प्रत्येक पूर्णिमा मे ग्रहण नही होता। तब

क्रूरग्रह स केतुश्च द्रमस पूर्णामण्टलमिदानीम ।
अभिभवितुमिच्छति बलाद्गद्गत्येन तु बुधयोग ॥

इस श्लोक का यथार्थ अर्थ यह है कि क्रूरग्रह सूर्य्य केतु के साथ च द्रमा क पूर्णम ण्डल को यून करने की इच्छा करता है पर तु हे बुध ! योग जो हं वही बल सै उस च द्रमा की रक्षा करता है। यहा बुध शब्द पण्डित के अर्थ मे सम्बोधन हे, ग्रहवाची कदापि नही हे। बुध शब्द को ग्रहार्थ में ले जान से जो जो अर्थ होते हं वे सब बनावट हैं। इति

स० १८३७ वशाख शुक्ल ५

ऊंचे ह्नौ गुरु बुध कवी मिलि लरि होत विरूप ।
करत समागम सबहि सो, यह द्विजराज अनूप ॥

आप का
पं० सुधाकर।

प्रस्तावना। ३१

(अहि चन्द्र पूरन भए फिर से घटता है)

(नेपथ्य मे)

हैं ! मेरे जीते चन्द्र को कौन बल से ग्रस सकता है ?

सूत्र० — (सुन कर) जाना।

अरे अहै कौटिल्य ५

नटी ।— (डर नाट्य करती है)

सूत्र० ।— दुष्ट टेढ़ी मतिवारो।

नन्दवंश जिन सहजहि निज क्रोधानल जारो ॥

चन्द्रग्रहण को नाम सुनत निज नृप को मानी ।

इतही आवत चन्द्रगुप्त पै कछु भय जानी ॥ ८ ॥ १०

तो अब चलो हम लोग चलैं।

(दोनों जाते हैं)

इति प्रस्तावना।

—.*.—

प्रथम अंक ।

स्थान—चाणक्य का घर।

(अपनी खुली शिखा को हाथ से फटकारता हुआ चाणक्य आता है)

। क्य। —बता ! कौन है जो मेरे जीते चन्द्रगुप्त को बल से ग्रसना चाहता है ?

सदा दन्ति के कुम्भ को जो बिदारै ।
ललाटै नए चन्द सी जौन धारै ॥
जभाई समै काल सो जौन बाढैँ ।
भलो सिंह को दात सो कौन काढैँ ॥ ९ ॥

और भी

काल सर्पिणी नन्द कुल, क्रोध धूम सी जौन ।
अब हूं बाधन देत नहि, अहो शिखा मम कौन ॥ १० ॥
दहन नन्दकुल बन सहज, अति प्रज्वलित प्रताप ।
को मम क्रोधा नल पतंग, नयो चहत अब पाप ॥ ११ ॥

शारगरव ! शारगरव !!

( शिष्य आता है )

**शिष्य ।—**गुरु जा ! क्या आज्ञा है ?
**चाणक्य ।—**बेटा ! मै बैठना चाहता हू ।
**शिष्य ।—**महाराज ! इस दालान मे बेत की चटाई पहिले ही से बिछी है, आप बिराजिये ।
**चाणक्य ।—**बेटा ! केवल कार्य्य म तत्परता मुझे व्याकुल करती है न कि और उपाध्यायों के तुल्य शिष्य जन से

प्रथम अङ्क । ३३

प्रथम अङ्क । ३३

दुःशीलता * ( बैठ कर आप ही आप ) क्या सब लोग यह
बात जान गए कि मेरे × नन्दवंश के नाश से क्रुद्ध हो कर
राक्षस, पितावध से दुखी मलयकेतु + से मिल कर यवनराज
की सहायता ले कर चन्द्रगुप्त पर चढाई किया चाहता है।
( कुछ सोच कर ) क्या हुआ, जब मै नन्दवश की बड़ी प्रतिज्ञा ५
रूपी नदी से पार उतर चुका, तब यह बात प्रकाश होने ही से
क्या मै इस को न पूरी कर सकूँगा ? क्यों कि—
दिसि सरिस रिपु रमनी बदन शशि शोक कारिख लाय कै।
लै नीति पवनहि सचिव बिटपन छार डारि जराय कै ॥
बिनु पुर निवासी पच्छिगन नृप बंसमूल नसाय कै । १०
भो शांति मम क्रोधाग्नि यह कछु दहन हित नहि पाय कै - ॥१२॥
और भी
जिन जनन नै अति सोच सों नृप भय प्रगट धिक नहि कह्यौ।
पै मम अनादर को अतिहि वह सोच जिय जिन के रह्यौ =॥
ते लखहि आसन सों गिरायो नन्द सहित समाज कौं । १५
जिमि शिखर तें वनराज क्रोधि गिरावई गजराज कौं ॥ १३ ॥
सो यद्यपि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर चुका हूं, तौ भी
चन्द्रगुप्त के हेतु शस्त्र अब भी धारण करता हूं। देखो मैने—
नवनन्दन कौ मूल सहित खोद्यो छन भर में।
चन्द्रगुप्त मै श्री राखी नलिनी जिमि सर में ॥ २०
क्रोध प्रीति सो एक नासि कै एक बसायो।
शत्रु मित्र को प्रगट सबन फल ले दिखलायो ॥


* अर्थात् कुछ तुम लोगो पर दृष्टता मे नहीं अपने काम की घबराहट से बिछी हुई चटाई नहीं देखी ।
× नन्दवश अर्थात् नवा न द, एक नन्द और उस क आठ पा ।
+ पर्वतेश्वर राजा का पत्र ।
— अग्नि बिना आधार नही जलती ।
= न द ने कुरूप होने क कारण चाणक्य को अपने श्राद्ध से निकाल दिया था ।

३४ मुद्राराक्षस ।

अथवा जब तक राक्षस नही पकडा जाता तब तक नन्दों के मारने से क्या और चन्द्रगुप्त को राज्य मिलने से ही क्या ? (कुछ सोचकर) अहा ! राक्षस की नन्दवंश मे कैसी दृढ़ भक्ति है ! जब तक नन्दवंश का कोई भी जीता रहेगा तब तक
५ वह कभी शूद्र का मन्त्री बनना स्वीकार न करेगा, इस से उस के पकडने मे हम लोगों को निरुद्यम रहना अच्छा नही । यही समझ कर तो नन्दवंश का सर्वार्थसिद्धि बिचारा तपोवन मे चला गया तौ भी हमने मार डाला । देखो, राक्षस मलय केतु को मिला कर हमारे बिगाड़ने मे यत्न करता ही जाता है
१० (आकाश मे देख कर) वाह राक्षस मन्त्री वाह ! क्यों न हो ! वाह मन्त्रियों मे वृहस्पति के समान वाह ! तू धन्य है, क्योंकि—

जब लौं रहै सुख राज को तब लौं सबै सेवा करै ।
पुनि राज बिगडे कौन स्वामी तनिक नहि चित पे धरै ॥
१५ जे विपतिहू मे पालि पूरब प्रीति काज सवारहीं ।
ते धन्य नर तुम सारिखे दुर्लभ अहै संसय नहीं ॥

इसी से तो हम लोग इतना यत्न करके तुम्हें मिलाया चाहते है कि तुम अनुग्रह करके चन्द्रगुप्त के मन्त्री बनो, क्योंकि—

२० मूरख कातर स्वामिभक्ति कछु काम न आवै ।
पण्डित हूं बिन भक्ति काज कछु नाहि बनावै ॥
निज स्वारथ की प्रीति करैं ते सब जिमि नारी ।
बुद्धि भक्ति दोउ होय तबै सेवक सुखकारी ॥

सो मै भी इस विषय मे कुछ सोता नही हूं, यथाशक्ति
२५ उसी के मिलाने का यत्न करता रहता हूं । देखो, पर्व्वतक को चाणक्य ने मारा यह अपवाद न होगा, क्योंकि सब जानते है कि चन्द्रगुप्त और पर्व्वतक मेरे मित्र है तो मै पर्व्वतक को मार

प्रथम अङ्क । ३५

प्रथम अङ्क । ३५

कर चन्द्रगुप्त का पक्ष निर्बल कर दूंगा ऐसी शंका कोई न करेगा
सब यही कहेंगे कि राक्षस ने विषकन्या-प्रयोग करके चाणक्य
के मित्र पर्वतक को मार डाला। पर एकान्त मे राक्षस ने मलय
केतु के जी मे यह निश्चय करा दिया है कि तेरे पिता को मै ने
नहीं मारा चाणक्य ही ने मारा, इस से मलयकेतु मुझ से ५
बिगड़ रहा है। जो हो, यदि यह राक्षस लड़ाई करने को
उद्यत होगा तो भी पकड़ जायगा । पर जो हम मलयकेतु को
पकड़ेंगे तो लोग निश्चय करलेंगे कि अवश्य चाणक्य ही
ने अपने मित्र इस के पिता को मारा और अब मित्रपुत्र
अर्थात् मलयकेतु को मारना चाहता है । और भी, अनेक १०
देश की भाषा पहिरावा चाल व्यवहार जाननेवाले अनेक
वेषधारी बहुत से दूत मै ने इसी हेतु चारो ओर भेज रक्खे
हैं कि वे भेद लेते रहें कि कौन हम लोगों से शत्रुता
रखता है, कौन मित्र है । और कुसुमपुर निवासी नन्द के
मन्त्री और सम्बन्धियों के ठीक ठीक वृत्तान्त का अन्वेषण १५
हो रहा है, वैसे ही भद्रभटादिकों को बड़े बड़े पद देकर
चन्द्रगुप्त के पास रख दिया है और भक्ति की परीक्षा लेकर
बहुत से अप्रमादी पुरुष भी शत्रु से रक्षा करने को नियत कर
दिए हैं । वैसे ही मेरा सहपाठी मित्र विष्णुशर्म्मा नामक
ब्राह्मण जो शुक्रनीति और चौसठों कला से ज्योतिषशास्त्र में २०
बड़ा प्रवीण है, उसे मै ने पहिले ही योगी बना कर नन्दवध की
प्रतिज्ञा के अनन्तर ही कुसुमपुर में भेज दिया है, वह वहां
नन्द के मन्त्रियों से मिलता करके, विशेष कर के राक्षस का
अपने पर बड़ा विश्वास बढ़ा कर सब काम सिद्ध करेगा,
इस से मेरा सब काम बन गया है परन्तु चन्द्रगुप्त सब राज्य २५
का भार मेरे ही ऊपर रख कर सुख करता है । सच है,
जो अपने बल बिना और अनेक दुःखों के भोगे बिना राज्य
मिलता है वही सुख देता है । क्योंकि—

३६ मुद्राराक्षस ।

अपने बल सों लावही, यद्यपि मारि सिकार ।
तदपि सुखी नहि होत है, राजा सिंह-कुमार ॥१६॥
( * यम का चित्र हाथ मे लिये योगी का वेष धारण किये दूत आता है । )
५ दूत ।—अरे, और देव को काम नहि, जम को करो प्रनाम ।
जो दूजन के भक्त को, प्रान हरत परिनाम ॥ १७ ॥
और
उलटे ते हू बनत है, काज किये अति हेत ।
जो जम जो सब को हरत, सोई जीविका देत ॥ १८॥
१० तो इस घर मे चल कर जमपट दिखाकर गावै ।
( घूमता है )
शिष्य ।—रावल जी ! ड्योढी के भीतर न जाना ।
दूत ।— अरे ब्राह्मण ! यह किस का घर हे ?
शिष्य ।—हम लोगों के परम प्रसिद्ध गुरु चाणक्य जी का ।
१५ दूत ।— ( हँस कर ) अरे ब्राह्मण, तब तो यह मेरे गुरुभाई ही का घर है, मुझे भीतर जाने दे, मै उस को धर्मोपदेश करू गा ।
शिष्य ।—( क्रोध से ) छि मूर्ख ! क्या तू गुरुजी से भी धर्म विशेष जानता है ?
२० दूत ।—अरे ब्राह्मण ! क्रोध मत कर, सभी सब कुछ नही जानते, कुछ तेरा गुरु जानता है, कुछ मेरे से लोग जानते ह ।
शिष्य ।—(क्रोध से ) मूर्ख ! क्या तेरे कहने से गुरु जी की सर्वज्ञता उड जायगी ?
दूत ।—भला ब्राह्मण ! जो तेरा गुरु सब जानता ह तो बतलावे
२५ कि चन्द्र किस को नही अच्छा लगता ?


* उस काल में एक चाल के फकीर जम का चित्र दिखला कर संसार की अनित्यता के गीत गाकर भीख मागते थे ।

प्रथम अङ्क । ३७

प्रथम अङ्क । ३७

शिष्य ।—मूर्ख ! इस को जानने से गुरु को क्या काम ?
दूत ।—यही तो कहता हूं कि यह तेरा गुरु ही समझेगा कि इसके जानने से क्या होता है ? तू तो सीधा मनुष्य है तू केवल इतना ही जानता है कि कमल को चन्द्र प्यारा नहीं है । देख—

जदपि होत सुन्दर कमल, उलटो तदपि सुभाव ।
जो नित पूरन चन्द सों, करत बिरोध बनाव ॥

चाणक्य ।—( सुन कर आपही आप ) अहा ! “मै चन्द्रगुप्त के बैरियों को जानता हूं ” यह कोई गूढ वचन से कहता है ।
शिष्य ।—चल मूर्ख ! क्या बेठिकाने की बकवाद कर रहा है ।
दूत ।—अरे ब्राह्मण ! यह सब ठिकाने की बाते होंगी ।
शिष्य ।—कैसे होंगी ?
दूत ।—जो कोई सुननेवाला और समझनेवाला होय ।
चाणक्य ।—रावल जी ! बेखटके चले आइये, यहां आपको सुनने और समझनेवाले मिलेंगे ।
दूत ।—आया ( आगे बढ़ कर ) जय हो महाराज की ।
चाणक्य ।— ( देख कर आप ही आप ) कामों की भीड़ से यह नहीं निश्चय होता कि निपुणक को किस बात के जानने के लिये भेजा था । अरे जाना, इसे लोगों के जी का भेद लेने को भेजा था ( प्रकाश ) आओ, आओ, कहो, अच्छे हो ? बैठो ।
दूत ।—जो आज्ञा ( भूमि मे बैठता है ) ।
चाणक्य ।—कहो, जिस काम को गए थे उसका क्या किया ? चन्द्रगुप्त को लोग चाहते हैं कि नही ?
दूत ।—महाराज ! आप ने पहिले ही से ऐसा प्रबन्ध किया है कि कोई चन्द्रगुप्त से बिराग न करै, इस हेतु सारी प्रजा महाराज चन्द्रगुप्त मे अनुरक्त है, पर राक्षस मन्त्री के दृढ़ मित्र तीन ऐसे है जो चन्द्रगुप्त की वृद्धि नही सह सकते ।

३८ मुद्राराक्षस—

चाणक्य ।—( क्रोध से ) अरे ! कह, कौन अपना जीवन नही सह सकते, उन के नाम तू जानता है ?

दूत ।—जो नाम न जानता तो आप के सामने क्योंकर निवेदन करता ?

चाणक्य । - मै सुना चाहता हूं कि उन के क्या नाम है ?

दूत ।—महाराज सुनिये । पहिले तो शत्रु का पक्षपात करने वाला क्षपणक है ।

चाणक्य ।—(हर्ष से आप ही आप ) हमारे शत्रुओं का पक्ष पाती क्षपणक है ? ( प्रकाश ) उस का नाम क्या है ?

दूत ।—जीवसिद्धि नाम है ।

चाणक्य ।—तू ने कैसे जाना कि क्षपणक मेरे शत्रुओं का पक्ष पाती है ?

दूत ।—क्योंकि उस ने राक्षस मन्त्री के कहने से देव पर्वतेश्वर पर विषकन्या का प्रयोग किया ।

चाणक्य ।—( आप ही आप ) जीवसिद्धि तो हमारा गुप्त दू है ( प्रकाश ) हा, और कौन है ।

दूत ।—महाराज ! दूसरा राक्षस मन्त्री का प्यारा सखा शकट दास कायथ है ।

चाणक्य ।—( हँस कर आप ही आप ) कायथ कोई बडी बात नहीं है तो भी क्षुद्र शत्रु का भी उपेक्षा नही करनी चाहिए, इसी हेतु तो मैने सिद्धार्थक को उस का मित्र बना कर उस के पास रक्खा है, ( प्रकाश ) हा, तीसरा कौन है ?

दूत ।—( हँस कर ) तीसरा तो राक्षस मन्त्री का मानो हृदय ही पुष्पपुरवासी चन्दनदास नामक वह बड़ा जोहरी है जिस के घर मे मन्त्री राक्षस अपना कुटुम्ब छोड़ गया है ।

चाणक्य ।—(आप ही आप) अरे ! यह उस का बड़ा अन्तरग मित्र होगा, क्योंकि पूरे विश्वास बिना राक्षस अपना

प्रथम अङ्क। ३६

प्रथम अङ्क। ३६

कुटुम्ब यों न छोड़ जाता (प्रकाश) भला, तूने यह कैसे
जाना कि राक्षस मन्त्री वहां अपना कुटुम्ब छोड़ गया ?
दूत।—महाराज ! इस “मोहर” की अंगूठी से आप को
विश्वास होगा (अंगूठी देता है)।
चाणक्य।—(अंगूठी लेकर और उस में राक्षस का नाम बांच ५
कर प्रसन्न हो कर आप ही आप) अहा ! मै समझता हूं
कि राक्षस ही मेरे हाथ लगा (प्रकाश) भला, तुम ने
यह अंगूठी कैसे पाई ? मुझ से सब वृत्तान्त तो कहो।
दूत:—सुनिये, जब मुझे आप ने नगर के लोगों का भेद लेने
भेजा तब मै ने यह सोचा कि बिना भेस बदले मै दूसरे के १०
घर मे न घुसने पाऊंगा इससे मै जोगी का भेस कर
के जमराज का चित्र हाथ मे लिये फिरता फिरता चन्दन-
दास जौहरी के घर मे चला गया और वहा चित्र फेला
कर गीत गाने लगा।
चाणक्य। हां तब ? १५
दूत।—तब महाराज ! कौतुक देखने को एक पांच बरस
का बड़ा सुन्दर बालक एक परदे के आड से बाहर
निकला, उस समय परदे के भीतर स्त्रियों में बड़ा
कलकल हुआ कि “लड़का कहा गया”। इतने मे एक स्त्री
ने द्वार के बाहर मुख निकाल कर देखा और लड़के को २०
झट पकड़ ले गई, पर पुरुष की उंगली से स्त्री की उंगली
पतली होती है, उस से द्वार ही पर यह अंगूठी गिर पड़ी,
और मै उस पर राक्षस मन्त्री का नाम देख कर आप के
पास उठा लाया।
चाणक्य।—वाह वाह ! क्यो न हो, अच्छा जाओ, मैं ने २५
सब सुन लिया ! तुम्हे इस का फल शीघ्र ही मिलेगा।
दूत।—जो आज्ञा (जाता है)।
चाणक्य।—शारङ्गरव ! शारङ्गरव ! !

४० मुद्राराक्षस !

शिष्य ।—( आकर ) आज्ञा, गुरुजी ?
चाणक्य ।- बेटा ! कलम, दावात, कागज तो लाओ ।
शिष्य ।—जो आज्ञा, ( बाहर जाकर ले आता है ) गुरुजी !
ले आया ।
५ चाणक्य ।—(लेकर आप ही आप ) क्या लिखू ? इसी पत्र से
राक्षस को जीतना है।

( प्रतिहारी आता है )

प्रतिहारी ।—जय हो महाराज की, जय हो !
चाणक्य ।—(हर्ष से आप ही आप ) वाह वाह ! कैसा सगुन
१० हुआ कि कार्यारम्भ ही में जय शब्द सुनाई पडा ।
( प्रकाश ) कहो, शोणोत्तरा, क्यों आयी हो ?
प्र० ।—महाराज ! राजा चन्द्रगुप्त ने प्रणाम कहा है और पूछा
है कि मै पर्व्वतेश्वर की क्रिया किया चाहता हूं इस से
आप की आज्ञा हो तो उन के पहिरे आभरणों को
१५ पण्डित ब्राह्मणों को दूं ।
चाणक्य ।—( हर्ष से आप ही आप ) वाह चन्द्रगुप्त वाह,
क्यों न हो, मेरे जी की बात सोच कर संदेशा कहला भेजा
है ( प्रकाश ) शोणोत्तरा ! चन्द्रगुप्त से कहो कि “वाह !
बेटा वाह ! क्यों न हो, बहुत अच्छा विचार किया ! तुम
२० व्यवहार में बड़े ही चतुर हो, इस से जो सोचा है सो
करो पर पर्व्वतेश्वर के पहिरे हुए आभरण गुणवान्
ब्राह्मणों को देने चाहिए, इस से ब्राह्मण मै चुन के
भेजूंगा ।”
प्र० ।-- जो आज्ञा महाराज ! ( जाता है ) ।
२५ चाणक्य ।—शार्ङ्गरव ! विश्वावसु आदि तीनों भाइयों से
कहो कि जाकर चन्द्रगुप्त से आभरण ले कर मुझ से
मिलें ।

प्रथम अङ्क । ४१

प्रथम अङ्क । ४१

शिष्य ।—जो आज्ञा ( जाता है ) ।
चाणक्य ।—( आप ही आप ) पोड़े तो यह लिखे पर पहिले क्या लिखे ( सोच कर ) अहा ! दूतों के मुख से ज्ञात हुआ है कि उस म्लेच्छराज-सेना मे से प्रधान पाच राजा परम भक्ति से राक्षस की सेवा करते है । ५
प्रथम चित्रवर्मा कुलूत को राजा भारी ।
मलयदेशपति सिहनाद दूजो बलधारी ॥
तीजो पुस्करनयन अहै कश्मीर देश को ।
सिन्धुसेन पुनि सिन्धु नृपति अति उग्र भेष को ॥
मेघाक्ष पाचवों प्रबल अति, बहु हय जुत पारस नृपति । १०
अब चित्रगुप्त इन नाम कों मेटहि हम जब लिखहि हति* ॥
( कुछ सोच कर ) अथवा न लिखू अभी सब बात योंही रहै ( प्रकाश ) शारगरव २ !
शिष्य ।—( आकर ) आज्ञा गुरुजी !
चाणक्य ।—बेटा ! वैदिक लोग कितना भी अच्छा लिखे तो १५
भी उनके अक्षर अच्छे नही होते, इस से सिद्धार्थक से कहो ( कान मे कहकर ) कि वह शकटदास के पास जाकर यह सब बात यों लिखवाकर और “किसी का लिखा कुछ कोई आप ही बाचे” यह सरनामे पर नाम बिना लिखवा कर हमारे पास आवे और शकटदास से २०
यह न कहे कि चाणक्य ने लिखवाया है ।
शिष्य ।—जो आज्ञा ( जाता है ) ।
चाणक्य ।—( आप ही आप ) अहा ! मलयकेतु को तो जीत लिया ।


* अर्थात अब जब हम इनका नाम लिखते हैं तो निश्चय ये सब मरेंगे । इस से अब चित्रगुप्त अपने खाते से इनका नाम काट दें, न ये जीने रहैंग न चित्रगुप्त को लेखा रखना पड़ेगा ।

४२ मुद्राराक्षस—

(चिट्ठी लेकर सिद्धार्थक आता है)

सि०।—जय हो महाराज की, जय हो, महाराज ! यह शकट दास के हाथ का लेख है।
चाणक्य।—(लेकर देखता है। वह कैसे सुन्दर अक्षर हैं।
५ (पढ कर) बेटा, इस पर यह मोहर कर दो।
सि०।—जो आज्ञा, (मोहर करके) महाराज, इस पर मोहर हो गई, अब और कहिये क्या आज्ञा है।
चाणक्य।—बेटा जी ! हम तुम्हे एक अपने निज के काम मे भेजा चाहते है।
१० सि०।—(हर्ष से) महाराज, यह तो आप की कृपा है, कहिये यह दास आप के कौन काम आ सकता है ?
चाणक्य।—सुनो, पहिले जहां सूली दी जाती है वहां जाकर फांसी देनेवालों को दाहिनी आंख दबाकर समझा देना* और जब वे तेरी बात समझ कर डर से इधर उधर भाग
१५ जाय तब तुम शकटदास को लेकर राक्षस मन्त्री के पास चले जाना। वह अपने मित्र के प्राण बचाने से तुम पर बडा प्रसन्न होगा और तुम्हे पारितोषिक देगा, तुम उस को लेकर कुछ दिनों तक राक्षस ही के पास रहना और जब और भी लोग पहुंच जाय तब यह काम करना
२० (कान मे समाचार कहता है)।
सि०।—जो आज्ञा महाराज।
चाणक्य।—शारंगरव ! शारंगरव !!
शिष्य।—(आकर) आज्ञा गुरुजी !
चाणक्य।—कालपाशिक और दण्डपाशिक से यह कह दो कि चन्द्रगुप्त आज्ञा करता है कि जीवसिद्धि क्षपणक ने


* चाण्डाला को पहले से समझा दिया था कि जो आदमी दाहिनो आंख दबावै उस को हमारा मनुष्य समझ कर तुम लोग चटपट हट जाना।

प्रथम अङ्क । ४३

प्रथम अङ्क । ४३

राक्षस के कहने से विषकन्या का प्रयोग करके पर्वतेश्वर
को मार डाला, यही दोष प्रसिद्ध कर के अपमानपूर्वक उस
को नगर से निकाल दें ।
शिष्य ।- जो आज्ञा ( घूमता है ।
चाणक्य । बेटा ! ठहर—सुन, और वह जो शकटदास ५
कायस्थ है वह राक्षस के कहने से नित्य हमलोगों की
बुराई करता है, यही दोष प्रगट करके उस को सूली दे दे
और उस के कुटुम्ब को कारागार में भेज दे ।
शिष्य ।—जो आज्ञा महाराज ! ( जाता है ) ।
चाणक्य ।—( चिन्ता कर के आप ही आप ) हा ! क्या किसी १०
भांति यह दुरात्मा राक्षस पकड़ा जायगा ?
शि० ।—महाराज ! लिया ।
चाणक्य ।—( हर्ष से आप ही आप ) अहा ! क्या राक्षस को
ले लिया ? ( प्रकाश ) कहो, क्या पाया ?
सि० ।—महाराज ! आप ने जो सन्देशा कहा, वह मैं ने भली १५
भांति समझ लिया, अब काम पूरा करने जाता हूं ।
चाणक्य ।—( मोहर और पत्र देकर ) सिद्धार्थक ! जा तेरा
काम सिद्ध हो ।
सि० । —जो आज्ञा ( प्रणाम करके जाता है ) ।
शिष्य ।—( आकर ) गुरुजी, कालपाशिक डंडपाशिक आप से २०
निवेदन करते हैं कि महाराज चन्द्रगुप्त की आज्ञा पूर्ण
करने जाते हैं ।
चाणक्य ।—अच्छा, बेटा ! मैं चन्दनदास जौहरी को देखा
चाहता हूं ।
शिष्य ।—जो आज्ञा ( बाहर जाकर चन्दनदास को लेकर २५
आता है ) इधर आइये सेठ जी !
चन्दन० ।—(आप ही आप) यह चाणक्य ऐसा निर्दय है कि
यह जो एकाएक किसी को बुलावे तो लोग बिना अपराध

४४ मुद्राराक्षस-

भी इस से डरते है, फिर कहा मै इस का नित्य का अप-
राधी, इसी से मैने वनसेनादिक तीन महाजनों से कह
दिया है कि दुष्ट चाणक्य जो मेरा घर लूट ले तो आश्चर्य
नही, इस से स्वामी राक्षस का कुटुम्ब और कही ले
जाओ, मेरी जो गति होनी है वह हो ।
५ शिष्य ।—इधर आइये साह जी !
चन्दन० ।—आया ( दोनों घूमते हैं ) ।
चाणक्य ।—( देख कर ) आइये साह जी ! कहिये, अच्छे तो
है ? बैठिये, यह आसन है ।
१० चन्दन० ।—( प्रणाम करके ) महाराज ! आप नही जानते कि
अनुचित सत्कार अनादर से भी विशेष दु ख का कारण
होता है, इस से मै पृथ्वी ही पर बैठू गा ।
चाणक्य ।—वाह ! आप ऐसा न कहिए, आप को तो हम
लोगों के साथ यह व्यवहार उचित ही है, इससे आप
१५ आसन ही पर बैठिये ।
चन्दन० ।—( आप ही आप ) कोई बात तो इस ने जानी
( प्रकाश ) जो आज्ञा ( बैठता है ) ।
चाणक्य ।—कहिए साह जी ! चन्दनदास जी ! आप को
व्यापार मे लाभ तो होता है न ?
२० चन्दन० ।—महाराज, क्यो नही, आप की कृपा से सब बनज
ब्यौपार अच्छी भांति चलता है ।
चाणक्य ।—कहिए साहजी ? पुराने राजाओ के गुण चन्द्रगुप्त
के दोषों को देख कर कभी लोगों को स्मरण आते हैं ?
चन्दन० ।—(कान पर हाथ रख कर) राम ! राम ! शरद ऋतु
२५ के पूर्ण चन्द्रमा की भांति शोभित चन्द्रगुप्त को देख कर
कौन नही प्रसन्न होता ?
चाणक्य ।—जो प्रजा ऐसी प्रसन्न है तो राजा भी प्रजा से कुछ
अपना भला चाहते है ।

प्रथम अङ्क । ४५

प्रथम अङ्क । ४५

चन्दन० ।—महाराज ! जो आज्ञा, मुझ से कौन और कितनी
वस्तु चाहते हैं ?
चाणक्य ।—सुनिये साहजी ! यह नन्द का राज * नही है,
चन्द्रगुप्त का राज्य है, धन से प्रसन्न होनेवाला तो वह
लालची नन्द ही था, चन्द्रगुप्त तो तुम्हारे ही भले से ५
प्रसन्न होता है।
चन्दन० ।—( हर्ष से ) महाराज, यह तो आप की कृपा है।
चाणक्य ।—पर यह तो मुझ से पूछिये कि वह भला किस
प्रकार से होगा ?
चन्दन० ।—कृपा कर के कहिये । १०
चाणक्य ।—सौ बात की एक बात यह है कि राजा के विरुद्ध
कर्मों को छोड़ो।
चन्दन० ।—महाराज ! वह कौन अभागा है जिसे आप राज-
विरोधी समझते हैं ?
चाणक्य ।—उस में पहिले तो तुम्ही हो। १५
चन्दन० ।-- ( कान पर हाथ रख कर ) राम ! राम ! राम !
भला तिनके से और अग्नि से कैसा विरोध ?
चाणक्य ।—विरोध यही है कि तुम ने राजा के शत्रु राक्षस
मन्त्री का कुटुम्ब अब तक घर मे रख छोड़ा है।
चन्दन० ।—महाराज ! यह किसी दुष्ट ने आप से झूठ कह २०
दिया है।
चाणक्य ।—सेठ जी ! डरो मत, राजा के भय से पुराने राजा
के सेवक लोग अपने मित्रों के पास बिना चाहे भी कुटुम्ब
छोड़ कर भाग जाते हैं, इस से इस के छिपाने ही में दोष
होगा। २५


* यहा तुच्छता प्रगट करन के लिये 'राज्य' का अपभ्रंश “राज” लिखा गया है।
रा० र० वि० सिंह ।

४६ मुद्राराक्षस-

चन्दन० ।—महाराज ! ठीक है, पहिले मेरे घर पर राक्षस
मन्त्री का कुटुम्ब था ।
चाणक्य ।—पहिले तो कहा कि किसी ने झूठ कहा है । अब
कहते हो था यह गबड़े की बात कैसी ?
५ चन्दन० ।—महाराज ! इतना ही मुझसे बातों मे फेर पड़ गया ।
चाणक्य । सुनो, चन्द्रगुप्त के राज्य मे छल का विचार नहीं
होता, इस से राक्षस का कुटुम्ब दो, तो तुम सच्चे हो
जाओगे ।
चन्दन० ।—महाराज ! मै कहता हूँ न, पहिले राक्षस का
१० कुटुम्ब था ।
चाणक्य ।—तो अब कहा गया ?
चन्दन० ।—न जाने कहा गया ।
चाणक्य ।—( हसकर ) सुनो सेठजी ! तुम क्या नहीं जानते
कि सांप तो सिर पर दवो पहाड़ पर । और जैसा चाण-
१५ क्य ने नन्द को ( इतना कह कर लाज से चुप रह जाता
है ) ।
चन्दन० ।—( आप ही आप )
प्रिया दूर घन गरजही, अहो दुख अतिघोर ।
औषधि दूर हिमाद्रि पै, सिर पै सर्प कठोर ॥
२० चाणक्य ।—चन्द्रगुप्त को अब राक्षस मन्त्री राज पर से उठा-
देगा यह आशा छोड़ो, क्योंकि देखो —
नृप नन्द जीवत नीतिबल सों, मति रही जिन की भली ।
ते “वक्रनासादिक” सचिव नहि, थिर सके करि न सि चली ॥
सो श्री सिमिटि अब आय लिपटी, चन्द्रगुप्त नरेस सों ॥
२५ तेहि दूर को करि सकै चादनि, छुटत कहु राकेस सों ? ॥

और भी
“सदा दन्ति के कुम्भ को” इत्यादि फिर से पढता है ।

प्रथम अङ्क । ४७

प्रथम अङ्क । ४७

चन्दन०।—(आप ही आप) अब मुझ को सब कहना फबता है ।

(नेपथ्य मे) हटो हटो—

चाणक्य।—शार्ङ्गरव ! यह क्या कोलाहल है देख तो ?
शि०।—जो आज्ञा (बाहर जाकर फिर आकर) महाराज, ५
राजा चन्द्रगुप्त की आज्ञा से राजद्वेषी जीवसिद्धि क्षपणक निरादरपूर्वक नगर से निकाला जाता ह ।
चाणक्य।—क्षपणक ! हा ! हा ! अथवा राजविरोध का फल भोगै। सुनो चन्दनदास ! देखो, राजा अपने द्वेषियों को कैसा कड़ा दण्ड देता है, मैं तुम्हारे भले की कहता हूं, १०
सुनो, और राक्षस का कुटुम्ब देकर जन्म भर राजा की कृपा से सुख भोगो।
चन्दन०।—महाराज ! मेरे घर राक्षस मन्त्री का कुटुम्ब नहीं है ।

(नेपथ्य में कलकल होता है) १५
चाणक्य।—शार्ङ्गरव ! देख तो यह क्या कलकल होता है ?
शिष्य।—जो आज्ञा (बाहर जाकर फिर आता है) महाराज !
राजा की आज्ञा से राजद्वेषी शकटदास कायस्थ को सूली देने ले जाते हैं ।
चाणक्य।—राजविरोध का फल भोगै। देखो, सेठ जी ! राजा २०
अपने विरोधियों को कैसा कड़ा दण्ड देता है, इस से राक्षस का कुटुम्ब छिपाना वह कभी न सहैगा, इसी से उस का कुटुम्ब देकर तुम को अपना प्राण और कुटुम्ब बचाना हो तो बचाओ ।
चन्दन०।—महाराज ! क्या आप मुझे डर दिखाते हैं, मेरे यहा २५
अमात्य राक्षस का कुटुम्ब हई नहीं है, पर जो होता तो भी मैं न देता ।

४८ मुद्राराक्षस—

चाणक्य ।—क्या चन्दनदास ! तुम ने यहा निश्चय किया हे ?
चन्दन० ।—हा ! मैने यही दृढ निश्चय किया हे ।
चाणक्य ।—( आप ही आप) वाह चन्दनदास ! वाह, क्यों न हो !
५ दूजे के हित प्राण दे, करै धर्म प्रतिपाल ।
भो ऐसो शिबि के बिना, दूजो है या काल ॥
( प्रकाश ) क्या चन्दनदास, तुमने यही निश्चय किया है ?
चन्दन० ।—हा ! हा ! मैने यही निश्चय किया है ।
चाणक्य ।—( क्रोध से ) दुरात्मा दुष्ट बनिया ! देख राजकोप
१० का कैसा फल पाता है !
चन्दन० ।—( बांह फैलाकर ) मै प्रस्तुत हूं, आप जो चाहिए अभी दण्ड दीजिए ।
चाणक्य ।—(क्रोध से) शारङ्गरव ! कालपाशिक, दण्डपाशिक से मेरी आज्ञा कहो कि अभी इस दुष्ट बनिये को दण्ड
१५ दें । नही, ठहरो, दुगपाल विजयपाल से कहो कि इस के घर का सारा धन ले लें और इसको कुटुम्ब समेत पकड़ कर बांध रक्खें, तब तक मै चन्द्रगुप्त से कहूं, वह आप ही इस के सर्वस्व और प्राणहरण की आज्ञा देगा ।
शिष्य ।—जो आज्ञा महाराज । सेठ जी इधर आइये ।
२० चन्दन० ।—लीजिए महाराज ! यह मै चला ( उठकर चलता है ) ( आप ही आप ) अहा ! मै धन्य हूं कि मित्र के हेतु मेरे प्राण जाते हैं, अपने हेतु तो सभी मरते हैं ।
( दोनों बाहर जाते हैं )
चाणक्य ।—( हर्ष से ) अब ले लिया है राक्षस को, क्योंकि
२५ जिमि इन तृन सम प्रान तजि, कियो मित्र का त्रान ।
तिमि सोहू निज मित्र अरु, कुल रखि है दै प्रान ॥
( नेपथ्य मे कलकल )

प्रथम अङ्क । ४६

प्रथम अङ्क । ४६

चाणक्य ।—शार्ङ्गरव !
शिष्य ।—( आकर ) आज्ञा गुरु जी !
चाणक्य ।—देख तो यह कैसी भीड़ है ।
शिष्य ।—( बाहर जाकर फिर आश्चर्य से आकर ) महाराज !
शकटदास को सूली पर से उतार कर सिद्धार्थक लेकर ५
भाग गया ।
चाणक्य ।— ( आप ही आप ) वाह सिद्धार्थक ! काम का
आरम्भ तो किया ( प्रकाश ) हैं क्या ले गया ? ( क्रोध से )
बेटा ! दौड़ कर भागुरायण से कहो कि उस को
पकड़े । १०
शिष्य ।—( बाहर जाकर आता है ) ( विषाद से ) गुरुजी !
भागुरायण तो पहिले ही से कही भाग गया है ।
चाणक्य ।—( आप ही आप ) निज काज साधने के लिये जाय
( क्रोध से प्रकाश ) भद्रभट, पुरुषदत्त, हिगुराज, बलगुप्त
राजसेन, रोहिताक्ष और विजयवर्मा से कहो कि दुष्ट १५
भागुरायण को पकड़े ।
शिष्य ।—जो आज्ञा ( बाहर जाकर फिर आकर विषाद से )
महाराज ! बड़े दुख की बात है कि सब बेड़े का बेड़ा
हलचल हो रहा है । भद्रभट इत्यादि तो सब पिछली
ही रात भाग गये । २०
चाणक्य ।—( आप ही आप ) सब काम सिद्ध करै ( प्रकाश )
बेटा, सोच मत करो ।
जे बात कछु जिय धारि भागे भले सुख सों भागहीं ।
जे रहे तेहू जाहि तिन को, सोच मोहि जिय कछु नहीं ॥
सत सैन हूं सो अधिक साधिनि, काज की जेहि जग कहै । २५
सो नन्दकुल की खननहारी, बुद्धि नित मो मैं रहै ॥