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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

तृतीय अङ्क । ८७

तृतीय अङ्क । ८७

चाणक्य । —देव तो मूर्ख लोग मानते है ।
चन्द्रगुप्त ।—और विद्वान् लोग भी यद्वा तद्वा करते है ।
चाणक्य ।—( क्रोध नाट्य कर के ) अरे वृषल ! क्या नौकरों की तरह मुझ पर आज्ञा चलाता है ?
खुली सिखाह बांधिबे चञ्चल भे पुनि हाथ ।
( क्रोध से पैर पृथ्वी पर पटक कर )
घोर प्रतिज्ञा पुनि चरन करन चहत कर साथ ॥
नन्द नसे सौं निरज ह्‌वै तू फूल्यौ गरबाय ।
सो अभिमान मिटाइहौं तुरतहि तोहि गिराय ॥
चन्द्रगुप्त ।—( घबड़ा कर ) अरे ! क्या आर्य्य को सचमुच क्रोध आ गया !
फर फर फरकत अधर पुट, भए नयन जुग लाल ।
चढ़ी जाति भौंहै कुटिल, स्वास तजत जिमि ब्याल ॥
मनहुँ अचानक रुद्रदृग खुल्यौ त्रितिय दिखरात ।
( आवेग सहित )
धरनी बार्यौ बिनु धसे हा हा किमि पदघात ॥
चाणक्य ।—(नकली क्रोध रोक कर) तो वृषल ! इस कोरी बकवाद से क्या लाभ है ! जो राक्षस चतुर है तो यह शस्त्र उसी को दे । (शस्त्र फेंक कर और उठ कर) (आप ही आप) ह ह ह ! राक्षस ! यही तुम ने चाणक्य को जीतने का उपाय किया ।
तुम जानौ चाणक्य सों नृप चन्दहि लरवाय ।
सहजहि लैहै राज हम निज बल बुद्धि उपाय ॥
सो हम तुमही कह छलन कियो क्रोध परकास ।
तुमरोई करिहै उलटि यह तुव भेद बिनास ॥
( क्रोध प्रकट करता हुआ चला जाता है )
चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य वैहीनार ! “चाणक्य का अनादर कर के

८८ मुद्राराक्षस--

आज से हम सब काम काज आपही सम्हालेंगे' यह लोगों से कह दो।
कञ्चुकी।-- (आप ही आप) अरे ! आज महाराज ने चाणक्य के पहले आर्य्य शब्द नहीं कहा ! क्यों ? क्या सच ५ मुच अधिकार छीन लिया ? वा इस में महाराज का क्या दोष है।

सचिव दोष सों होत हैं, नृपहु बुरे तत्काल।
हाथीवान प्रमाद सों, गज कहवावत व्याल ॥

चन्द्रगुप्त ।--क्यों जी ? क्या सोच रहे हो ?
१० कञ्चुकी ।--यही कि महाराज को महाराज शब्द अब यथार्थ शोभा देता है।
चन्द्रगुप्त ।--(आप ही आप) इन्ही लोगों के धोखा खाने से आर्य्य का काम होगा। (प्रगट) शोणोत्तरे ! इस सूखी कलह से हमारा सिर दुखने लगा, इस से शयनगृह का १५ मार्ग दिखलाओ।
प्रतिहारी।--इधर आवें महाराज, इधर आवें।
चन्द्रगुप्त ।--(उठ कर चलता हुआ आप ही आप)

गुरु आयसु छल सों कलह, करिहू जीय डराय।
किमि नर गुरुनन सों लरहि, यहै सोच जिय हाय ॥

२० (सब जाते हैं--जवनिका गिरती है,

॥ तृतीय अङ्क समाप्त हुआ ॥

चतुर्थ अंक

स्थान—मन्त्री राक्षस के घर के बाहर का प्रान्त।

(करभक घबड़ाया हुआ आता है)

करभक ।— अहाहा हा ! अहाहा हा !
अतिशय दुरगम ठाम मै, सत जोजन सौं दूर। ५
कौन जात है धाइ बिनु, प्रभु निदेस भरपूर॥
अब राक्षस मन्त्री के घर चलूं (थका सा घूम कर)
अरे कोई चौकीदार है? स्वामी राक्षस मन्त्री से जाकर कहो कि 'करभक काम पूरा कर के पटने से दौड़ा आता है'। १०

(दौवारिक आता है)
दौवारिक ।— अजी ! चिल्लाओ मत, स्वामी राक्षस मन्त्री को राजकाज सोचने २ सिर मे ऐसी बिथा हो गई है कि अब तक सोने के बिछोने से नहीं उठे, इस से एक घड़ी भर ठहरो, अवसर मिलता है तो मै निवेदन किये देता हूं। १५
(परदा उठता है और सोने के बिछौने पर चिन्ता में भरा राक्षस और शकटदास दिखाई पड़ते हैं)

राक्षस ।— (आप ही आप) -
कारज उलटो होत है, कुटिल नीति के जोर।
का कीजै सोचत यही, जागि होय है भोर॥ २०

और भी।
आरम्भ पहिले साचि रचना चेरा की करि लावहीं।
इक बात मै गर्भित बहुत फल गूढ़ भेद दिखावहीं॥
कारन अकारन सोचि फैली क्रियन कों सकुचावहीं।
जे करहि नाटक बहुत दुख हम सरिस तेऊ पावहीं॥ २५

६० मुद्राराक्षस

और भी वह दुष्ट ब्राह्मण चाणक्य —
दौवारिक ।—जय जय ।
राक्षस । - किसी भांति मिलाया या पकड़ा जा सकता है ?
दौवारिक । - अमात्य—
५ राक्षस ।—( बाए नेत्र के फड़कने का अपशकुन देख कर आप ही आप ) 'ब्राह्मण चाणक्य जय जय' और 'पकड़ा जा सकता है ? अमात्य' यह उलटी बात हुई और उसी समय असगुन भी हुआ । तौ भी क्या हुआ, उद्यम नही छोड़ेंगे ( प्रकाश ) भद्र ! क्या कहता है ?
१० दौवारिक ।—अमात्य ! पटने से करभक आया है सो आप से मिला चाहता है ।
राक्षस ।—अभी लाओ ।
दौवारिक ।—जो आज्ञा ( करभक के पास जाकर, उसको संग ले आकर ) भद्र ! मन्त्री जी वह बैठे हे, उधर जाओ
१५ ( जाता है ) ।
करभक ।—( मन्त्री को देख कर ) जय हो, जय हो ।
राक्षस ।—अजी करभक ! आओ आओ, अच्छे हो ?—बैठो ।
करभक ।—जो आज्ञा ( पृथ्वी पर बैठ जाता है ) ।
राक्षस ।—( आप ही आप ) अरे ! मै ने इस को किस काम का भेद लेने को भेजा था यह भूला जाता है ( चिन्ता-
२० करता है ) ।
( बेत हाथ में लेकर एक पुरुष आता है )
पुरुष ।— हटे रहना—बचे रहना—अजी दूर रहो—दूर रहो, क्या नही देखते ?
२५ नृप द्विजादि जिन नरन को, मंगल रूप प्रकास ।
ते न नीच मुखह लखहि, कैसो पास निवास ॥*


* प्राचीनकाल में आचार्य, राजा आदि नीचो को नही दखते थे।