मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
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मुद्राराक्षस
राजनीति विषयक अपूर्व नाटक
विशाखदत्त के संस्कृत ग्रन्थ का भाषानुवाद,
भारतभूषण भारतेन्दु श्रीहरिश्चन्द्र रचित
त्रियपत्रिका सम्पादक ˘ म०कु० बाबू रामदीन सिंह संकलित
राय रामरणविजय सिंह बहादुर द्वारा प्रकाशित.
ह० स० ४१—१६२५
बाकीपुर—खड्गविलास प्रेस में रामप्रसाद सिंह द्वारा मुद्रित ।
आठवी बार
परमश्रद्धास्पद
श्रीयुक्त राजा शिवप्रसाद बहादुर सी० एस० आइ०
के
चरण कमलों में
केवल उन्ही के उत्साहदान से
उन के
वात्सल्यभाजन छात्र द्वारा बना हुआ
यह ग्रन्थ
सादर समर्पित हुआ।
नाटक के पात्र ।
चन्द्रगुप्त—पटने का राजा ( नाटक का नायक )
राक्षस—नन्द का मन्त्री— ( नाटक का मुख्य पात्र )
चाणक्य—चन्द्रगुप्त का मन्त्री ( तथा )
मलयकेतु—पर्वतेश्वर राजा का पुत्र (नाटक का प्रतिनायक)
सिद्धार्थक—चाणक्य का भेदिया ।
चन्दनदास—पटने का जौहरी महाजन, राक्षस का मित्र ।
शकटदास—राक्षस का मित्र ।
विराधगुप्त—सपेरा बना हुआ राक्षस का भेदिया ।
प्रियम्बदक—राक्षस का सेवक ।
भागुरायण—चाणक्य का भेदिया ( प्रकट में मलयकेतु का मित्र ) ।
करभक—राक्षस का भेदिया ।
क्षपणक—जैनी फकीर बना हुआ चाणक्य का भेदिया ।
भासुरक—भागुरायण का सेवक ।
समिद्धार्थक—सिद्धार्थक का मित्र ।
और भी—सूत्रधार, नटी, द्वारपाल, द्वारपालिका, प्रतिहारी शिष्य, कंचुकी, चन्दनदास की स्त्री, चन्दनदास का पुत्र, पुरुष, चाण्डाल, बन्दीजन और सेवक ।
पूर्व्वकथा
पूर्व्व काल में भारतवर्ष मे मगधराज्य एक बड़ा भारी जनस्थान था। जरासन्ध आदि अनेक प्रसिद्ध पुरुवंशी राजा यहा बड़े प्रसिद्ध हुए हैं। इस देश की राजधानी पाटलिपुत्र अथवा पुष्पपुर थी। इन लोगों ने अपना प्रताप और शौर्य्य इतना बढ़ाया था कि आज तक इनका नाम भूमण्डल पर प्रसिद्ध है। किन्तु कालचक्र बड़ा प्रबल है कि किसी को भी एक अवस्था मे रहने नही देता। अन्त में नन्दवंश * ने पौरवों को निकाल कर वहा अपनी जयपताका उड़ाई। वरच सारे भारतवर्ष मे अपना प्रबल प्रताप विस्तारित कर दिया।
इतिहासग्रन्थों मे लिखित है कि एक सौ अड़तीस बरस नन्दवंश ने मगध देश का राज्य किया। इसी वंश में महानन्द का जन्म हुआ। यह बड़ा प्रसिद्ध और अत्यन्त प्रतापशाली राजा हुआ। जब जगद्विजयी सिकन्दर (अलक्षेन्द्र) ने भारतवर्ष पर चढ़ाई किया था तब असंख्य हाथी, बीस हजार सवार और दो लाख पैदल लेकर महानन्द ने उस के विरुद्ध प्रयाण किया था ×। सिद्धान्त यह कि भारतवर्ष में उस समय महानन्द सा प्रतापी और कोई राजा न था।
महानन्द के दो मन्त्री थे। मुख्य का नाम शकटार और दूसरे
* यह वंश सम्मिलित क्षत्रियों का वंश था। ये लोग शुद्ध क्षत्री नहीं थे।
× सिकन्दर के कान्यकुब्ज से आगे न बढने से महानन्द से उस से मुक़ाबिल नहीं हुआ।
| १० | मुद्राराक्षस। |
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का राक्षस था। शकटार शूद्र और राक्षस * ब्राह्मण था। ये दोनों अत्यन्त बुद्धिमान् और महाप्रतिभासम्पन्न थे। केवल भेद इतना था कि राक्षस धीर और गम्भीर था, उस के विरुद्ध शकटार अत्यन्त उद्धतस्वभाव था। यहां तक कि अपने प्राचीनपने के अभिमान से कभी कभी यह राजा पर भी अपना प्रभुत्व जमाना चाहता। महानन्द भी अत्यन्त उग्रस्वभाव, असहनशील और क्रोधी था, जिस का परिणाम यह हुआ कि महानन्द ने अन्त को शकटार को क्रोधान्ध हो कर बड़े निबिड़ बन्दीखाने में कैद किया और सपरिवार उस के भोजन का केवल दो सेर सत्तू देता था + ।
* बृहत्कथा में राक्षस मन्त्री का नाम कहीं नहीं है, केवल वररुचि से एक मन्त्री राक्षस से मैत्री की कथा यों लिखी है—एक बड़े प्रचण्ड राक्षस पाटलिपुत्र में फिरा करता था। वह एक रात्रि वररुचि से मिला और पूछा कि "इस नगर में कौन स्त्री सुन्दर है ? वररुचि ने उत्तर दिया— जो जिस को रुचे वही सुन्दर है। इस पर प्रसन्न हो कर राक्षस मन्त्री से मित्रता की और कहा कि हम सब बात में तुम्हारी सहायता करेंगे और फिर सदा राजकाज में ध्यान में प्रत्यक्ष होकर राक्षस वररुचि की सहायता करता।
+ बृहत्कथा में यह कहानी और ही चाल पर लिखी है। वररुचि व्याडि और इन्द्रदत्त तीनों को गुरुदक्षिणा देने के हेतु करोड़ों रुपये के सोने की आवश्यकता हुई। तब इन लोगों ने सलाह किया कि नन्द (सत्यनन्द) राजा के पास चल कर उस से माँगना ले। उन दिनों राजा का डेरा अयोध्या में था ये तीनों ब्राह्मण वहां गये, किन्तु दुर्भाग्य से उन्हीं दिनों राजा मर गया। तब आपस में सलाह करके इन्द्रदत्त योगबल से अपना शरीर छोड़ कर राजा के शरीर में चला गया, जिस से राजा फिर जी उठा। तभी से उसका नाम योगानन्द हुआ। योगानन्द ने वररुचि को करोड़ रुपये देने की आज्ञा किया। शकटार बड़ा बुद्धिमान था उस ने सोचा कि राजा का मरकर जीना और यकबारगी एक अपरिचित को करोड़ रुपया देना इस में हो न हो कोई भेद है। ऐसा न हो कि अपना काम कर के फिर राजा का शरीर छोड़ कर यह चला जाय, यह सोच कर शकटार ने राज्य भर में जितने मुरदे मिले उन को जलवा दिया, उसी में इन्द्रदत्त का भी शरीर जल गया। तब व्याडि ने यह वृत्तान्त योगानन्द से कहा कि
पूर्व्वकथा । ११
शकटार ने बहुत दिन तक महा-मात्य का अधिकार भोगा
था, इस से यह अनादर उस के पक्ष मे अत्यन्त दुखदाई हुआ।
नित्य सत्तू का बरतन हाथ मे लेकर अपने परिवार से कहता
कि जो एक भी नन्दवंश के जड़ से नाश करने मे समर्थ हो वह
यह सत्तू खाय । मन्त्री के इस वाक्य से दुःखित हो कर उस के ५
परिवार का कोई भी सत्तू न खाया । अन्त मे कारागार की
पीड़ा से एक एक कर के उस के परिवार के सब लोग
मर गए ।
एक तो अपमान का दुख, दूसरे कुटुम्ब का नाश, इन दोनो
कारणो से शकटार अत्यन्त तनछीन मनमलीन दीन हीन हो १०
गया। किन्तु अपने मनसूबे का ऐसा पक्का था कि शत्रु से
बदला लेने की इच्छा से अपने प्राण नही त्याग किए और थोड़े
बहुत भोजन इत्यादि से शरीर को जीवित रक्खा । रात दिन
इसी सोच मे रहता कि किस उपाय से वह अपना बदला ले
सकेगा। १५
कहते है कि राजा महानन्द एक दिन हाथ मुह धोकर
हंसते हसते जनाने मे आ रहे थे। विचक्षणा नाम की एक
दासी जो राजा के मुह लगने के कारण कुछ धृष्ट हो गई थी,
राजा को हसता देख कर हस पड़ी । राजा उस की ढिठाई से
बहुत चिढ़ा और उस से पूछा—तू क्यों हसी ? उस ने उत्तर २०
दिया—"जिस बात पर महाराज हँसे उसी पर मै भी हसी"।
महानन्द इस बात पर और भी चिढ़ा। और कहा कि अभी
बतला मैं क्यों हंसा, नही तो तुझ को प्राणदण्ड होगा । दासी
से और कुछ उपाय न बन पड़ा और उसने घबड़ा कर इस के
यह सुन कर पहिले तो दुःखी हुआ फिर वररुचि को अपना मत्री बनाया। परन्तु
अन्त में शकटार की उग्रता से सन्तप्त हो कर उस को अन्धे कुए में कैद किया । बृह-
कथा में शकटार के स्थान पर शकटाल नाम लिखा है।
१२ मुद्राराक्षस ।
उत्तर देने को एक महीने की मुहलत चाही। राजा ने कहा—
आज से ठीक एक महीने के भीतर जो उत्तर न देगी तो कभी
तेरे प्राण न बचेंगे।
विचक्षणा के प्राण उस समय तो बचगए, परन्तु महीने के
५ जितने दिन बीतते थे, मारे चिन्ता के वह मरी जाती थी।
कुछ सोच विचार कर वह एक दिन कुछ खाने पीने की
सामग्री लेकर शकटार के पास गई और रो रो कर अपनी
सब विपत्ति कहने लगी। मत्री ने कुछ देर तक सोच कर
उस अवसर की सब घटना पूछी और हस कर कहा— 'मै
१० जान गया राजा क्यों हसे थे। कुल्ला करने के समय पानी
के छोटे छीटों पर राजा को वटबीज की याद आई, और
यह भी ध्यान हुआ कि ऐसे बड़े बड़ के वृक्ष इन्ही छोटे
बीजों के अन्तर्गत है। किन्तु भूमि पर पडते ही वह जल
के छींटे नाश हो गए। राजा अपनी इसी भावना को याद कर
१५ के हसते थे।' विचक्षणा ने हाथ जोड कर कहा— "यदि
आप के अनुमान से मेरे प्राण की रक्षा होगी तो मै जिस
तरह से होगा, आप को कैदखाने से छुड़ाऊगी और जन्म
भर आप की दासी हो कर रहूंगी।"
राजा ने विचक्षणा से एक दिन फिर हसने का कारण
२० पूछा, तो विचक्षणा ने शकटार से जैसा सुना था कह
सुनाया। राजा ने चमत्कृत हो कर पूछा— "सच बता,
तुझ से यह भेद किस ने कहा?" दासी ने शकटार का
सब वृत्त कहा और राजा को शकटार की बुद्धि की प्रशंसा
करते देख अवसर पाकर उस के मुक्त होने की प्रार्थना भी
२५ की। राजा ने शकटार को बन्दी से छुडा कर राक्षस के नीचे
मन्त्री बना कर रक्खा।
ऐसे अवसर पर राजा लोग बहुत चूक जाते हैं।
पूर्व्वकथा । १३
पहिले तो किसी की अत्यन्त प्रतिष्ठा बढ़ानी ही नीतिविरुद्ध
है। यदि संयोग से बढ़ जाय तो उस की बहुत सी बातों
को तरह देकर टालना चाहिए, और जो कदाचित् बड़े प्रतिष्ठित
मनुष्य का राजा अनादर करै तो उस की जड़ काट कर
छोड़ै, फिर उस का कभी विश्वाश न करै । ५
प्राय अमीर लोग पहले तो मुसाहिब या कारिन्दों को
बेतरह सिर चढ़ाते हैं, और फिर छोटी छोटी बातो पर उन की
प्रतिष्ठा हीन कर देते हैं। इसी से ऐसे लोग राजाओं के प्राण के
गाहक हो जाते हैं और अन्त मे नन्द की भांति उन का सर्वनाश
होता है। १०
शकटार यद्यपि बन्दीखाने से छूटा और छोटा मन्त्री भी
हुआ, किन्तु अपनी अप्रतिष्ठा और परिवार के नाश का शोक उस
के चित्त मे सदा पहिले ही सा जागता रहा। रात दिन
वह यही सोचता कि किस उपाय से ऐसे अव्यवस्थित-चित्त
उद्धत राजा का नाश करके अपना बदला लें। एक दिन घोड़े १५
पर वह हवा खाने जाता था। नगर के बाहर एक स्थान पर
देखता है कि एक काला सा ब्राह्मण अपनी कुटी के सामने मार्ग
की कुशा उखाड़ उखाड़कर उस की जड़ मे मठा डालता
जाता है। पसीने से लथपथ है, परन्तु कुछ भी शरीर की ओर
ध्यान नहीं देता। चारो ओर कुशा के बड़े २ ढेर लगे हुए हैं। २०
शकटार ने आश्चर्य्य से ब्राह्मण से इस श्रम का कारण पूछा।
उसने कहा—"मेरा नाम विष्णुगुप्त चाणक्य है। मैं ब्रह्मचर्य्य
मे नीति, वैद्यक, ज्योतिष, रसायन आदि संसार की उपयोगी
सब विद्या पढ कर विवाह की इच्छा से नगर की ओर आया
था, किन्तु कुश गड़ जाने से मेरे मनोरथ मे विघ्न हुआ, इस २५
से जब तक इन बाधक कुशाओं का सर्वनाश न कर लूंगा
और काम न करूंगा। मठा इस वास्ते इन की जड़ मे देता
हूं जिस से पृथ्वी के भीतर इन का मूल भी भस्म हो जाय।"
१८ मुद्राराक्षस ।
शकटार के जी में यह ध्यान आया कि ऐसा पक्का ब्राह्मण जो किसी प्रकार राजा से क्रुद्ध हो जाय तो उस का जड़ से नाश कर के छोड़े । यह सोच कर उस ने चाणक्य से कहा कि जो आप नगर में चल कर पाठशाला स्थापित करें तो ५ अपने को मैं बड़ा अनुगृहीत समझूं । मैं इस के बदले बेलदार लगा कर यहां की सब कुशाओं को खुदवा डालूंगा । चाणक्य इस पर सम्मत हुआ और नगर में आकर एक पाठशाला स्थापित की । बहुत से विद्यार्थी लोग पढ़ने आने लगे और पाठशाला बड़े धूमधाम से चल निकली ।
१० अब शकटार इस सोच में हुआ कि चाणक्य से राजा में किस चाल से बिगाड़ हो । एक दिन राजा के घर में श्राद्ध था उस अवसर को शकटार ने अपने मनोरथ सिद्ध होने का अच्छा समय सोच कर चाणक्य को श्राद्ध का न्यौता दे कर अपने साथ ले आया और श्राद्ध के आसन पर बिठला कर १५ चला गया । क्योंकि वह जानता था कि चाणक्य का रंग काला, आंखें लाल और दांत काले होने के कारण नन्द उस को आसन पर से उठा देगा, जिस से चाणक्य अत्यन्त क्रुद्ध हो कर उस का सर्वनाश करेगा ।
और ठीक ऐसा ही हुआ—जब राक्षस के साथ नन्द २० श्राद्धशाला में आया और एक अनिमन्त्रित ब्राह्मण को आसन पर बैठा हुआ और श्राद्ध के अयोग्य देखा तो चिढ़ कर आज्ञा दिया कि इस के बाल पकड़ कर यहां से निकाल दो । इस अपमान से ठोकर खाए हुए सर्प की भांति अत्यन्त क्रोधित हो कर शिखा खोल कर चाणक्य ने सब के सामने प्रतिज्ञा २५ की कि जब तक इस दुष्ट राजा का सत्यानाश न कर लूंगा तब तक शिखा न बांधूंगा । यह प्रतिज्ञा कर के बड़े क्रोध से राज-भवन से चला गया ।
पूर्व्वकथा । १५
शकटार अवसर पाकर चाणक्य को मार्ग में से अपने घर ले आया और राजा की अनेक निन्दा कर के उस का क्रोध और भी बढ़ाया और अपनी सब दुर्दशा कह कर नन्द के नाश में सहायता करने की प्रतिज्ञा किया। चाणक्य ने कहा कि जब तक हम राजा के घर का भीतरी हाल न जानें कोई उपाय नहीं सोच सकते। शकटार ने इस विषय में विचक्षणा की सहायता देने का वृत्तान्त कहा और रात को एकान्त में बुला कर चाणक्य के सामने उस से सब बात का करार ले लिया।
महानन्द के नौ पुत्र थे। आठ विवाहिता रानी से और एक चन्द्रगुप्त मुरा नाम की नाइन स्त्री से। इसी से चन्द्रगुप्त को मौर्य और वृषल भी कहते हैं। चन्द्रगुप्त बड़ा बुद्धिमान् था इसी से और आठो भाई इस से भीतरी द्वेष रखते थे। चन्द्रगुप्त की बुद्धिमानी की बहुत सी कहानियां हैं। कहते हैं कि, एक बेर रूम के बादशाह ने महानन्द के पास एक कृत्रिम सिंह लोहे की जाली के पिजड़े में बन्द करके भेजा और कहला दिया कि पिजड़ा टूटने न पावे और सिंह इस में से निकल जाय। महानन्द और उस के आठ औरस पुत्रों ने इस को बहुत कुछ सोचा, परन्तु बुद्धि ने कुछ काम न किया। चन्द्रगुप्त ने विचारा कि यह सिंह अवश्य किसी ऐसे पदार्थ का बना होगा जो या तो पानी से या आग से गल जाय यह सोच कर पहले उसने उस पिजड़े को पानी के कुण्ड में रक्खा और जब वह पानी से न गला तो उस पिजड़े के चारो तरफ आग बलवाई, जिस की गर्मी से वह सिंह, जो लाह और राल का बना था, गल गया। एक बेर ऐसे ही किसी बादशाह ने एक अगीठी में दहकती हुई आग * एक बोरा सरसों और
* दहकती आग की कथा—"रासन्धमहाकाव्य" में लिखा है कि जरासन्ध ने उग्रसेन के पास अगीठी भेजी थी, शायद उसी से यह कथा निकाली गई हो।