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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 173 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 41

४६ मुद्राराक्षस-

चन्दन० ।—महाराज ! ठीक है, पहिले मेरे घर पर राक्षस
मन्त्री का कुटुम्ब था ।
चाणक्य ।—पहिले तो कहा कि किसी ने झूठ कहा है । अब
कहते हो था यह गबड़े की बात कैसी ?
५ चन्दन० ।—महाराज ! इतना ही मुझसे बातों मे फेर पड़ गया ।
चाणक्य । सुनो, चन्द्रगुप्त के राज्य मे छल का विचार नहीं
होता, इस से राक्षस का कुटुम्ब दो, तो तुम सच्चे हो
जाओगे ।
चन्दन० ।—महाराज ! मै कहता हूँ न, पहिले राक्षस का
१० कुटुम्ब था ।
चाणक्य ।—तो अब कहा गया ?
चन्दन० ।—न जाने कहा गया ।
चाणक्य ।—( हसकर ) सुनो सेठजी ! तुम क्या नहीं जानते
कि सांप तो सिर पर दवो पहाड़ पर । और जैसा चाण-
१५ क्य ने नन्द को ( इतना कह कर लाज से चुप रह जाता
है ) ।
चन्दन० ।—( आप ही आप )
प्रिया दूर घन गरजही, अहो दुख अतिघोर ।
औषधि दूर हिमाद्रि पै, सिर पै सर्प कठोर ॥
२० चाणक्य ।—चन्द्रगुप्त को अब राक्षस मन्त्री राज पर से उठा-
देगा यह आशा छोड़ो, क्योंकि देखो —
नृप नन्द जीवत नीतिबल सों, मति रही जिन की भली ।
ते “वक्रनासादिक” सचिव नहि, थिर सके करि न सि चली ॥
सो श्री सिमिटि अब आय लिपटी, चन्द्रगुप्त नरेस सों ॥
२५ तेहि दूर को करि सकै चादनि, छुटत कहु राकेस सों ? ॥

और भी
“सदा दन्ति के कुम्भ को” इत्यादि फिर से पढता है ।