मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
प्रथम अङ्क । ४३
प्रथम अङ्क । ४३
राक्षस के कहने से विषकन्या का प्रयोग करके पर्वतेश्वर
को मार डाला, यही दोष प्रसिद्ध कर के अपमानपूर्वक उस
को नगर से निकाल दें ।
शिष्य ।- जो आज्ञा ( घूमता है ।
चाणक्य । बेटा ! ठहर—सुन, और वह जो शकटदास ५
कायस्थ है वह राक्षस के कहने से नित्य हमलोगों की
बुराई करता है, यही दोष प्रगट करके उस को सूली दे दे
और उस के कुटुम्ब को कारागार में भेज दे ।
शिष्य ।—जो आज्ञा महाराज ! ( जाता है ) ।
चाणक्य ।—( चिन्ता कर के आप ही आप ) हा ! क्या किसी १०
भांति यह दुरात्मा राक्षस पकड़ा जायगा ?
शि० ।—महाराज ! लिया ।
चाणक्य ।—( हर्ष से आप ही आप ) अहा ! क्या राक्षस को
ले लिया ? ( प्रकाश ) कहो, क्या पाया ?
सि० ।—महाराज ! आप ने जो सन्देशा कहा, वह मैं ने भली १५
भांति समझ लिया, अब काम पूरा करने जाता हूं ।
चाणक्य ।—( मोहर और पत्र देकर ) सिद्धार्थक ! जा तेरा
काम सिद्ध हो ।
सि० । —जो आज्ञा ( प्रणाम करके जाता है ) ।
शिष्य ।—( आकर ) गुरुजी, कालपाशिक डंडपाशिक आप से २०
निवेदन करते हैं कि महाराज चन्द्रगुप्त की आज्ञा पूर्ण
करने जाते हैं ।
चाणक्य ।—अच्छा, बेटा ! मैं चन्दनदास जौहरी को देखा
चाहता हूं ।
शिष्य ।—जो आज्ञा ( बाहर जाकर चन्दनदास को लेकर २५
आता है ) इधर आइये सेठ जी !
चन्दन० ।—(आप ही आप) यह चाणक्य ऐसा निर्दय है कि
यह जो एकाएक किसी को बुलावे तो लोग बिना अपराध
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भी इस से डरते है, फिर कहा मै इस का नित्य का अप-
राधी, इसी से मैने वनसेनादिक तीन महाजनों से कह
दिया है कि दुष्ट चाणक्य जो मेरा घर लूट ले तो आश्चर्य
नही, इस से स्वामी राक्षस का कुटुम्ब और कही ले
जाओ, मेरी जो गति होनी है वह हो ।
५ शिष्य ।—इधर आइये साह जी !
चन्दन० ।—आया ( दोनों घूमते हैं ) ।
चाणक्य ।—( देख कर ) आइये साह जी ! कहिये, अच्छे तो
है ? बैठिये, यह आसन है ।
१० चन्दन० ।—( प्रणाम करके ) महाराज ! आप नही जानते कि
अनुचित सत्कार अनादर से भी विशेष दु ख का कारण
होता है, इस से मै पृथ्वी ही पर बैठू गा ।
चाणक्य ।—वाह ! आप ऐसा न कहिए, आप को तो हम
लोगों के साथ यह व्यवहार उचित ही है, इससे आप
१५ आसन ही पर बैठिये ।
चन्दन० ।—( आप ही आप ) कोई बात तो इस ने जानी
( प्रकाश ) जो आज्ञा ( बैठता है ) ।
चाणक्य ।—कहिए साह जी ! चन्दनदास जी ! आप को
व्यापार मे लाभ तो होता है न ?
२० चन्दन० ।—महाराज, क्यो नही, आप की कृपा से सब बनज
ब्यौपार अच्छी भांति चलता है ।
चाणक्य ।—कहिए साहजी ? पुराने राजाओ के गुण चन्द्रगुप्त
के दोषों को देख कर कभी लोगों को स्मरण आते हैं ?
चन्दन० ।—(कान पर हाथ रख कर) राम ! राम ! शरद ऋतु
२५ के पूर्ण चन्द्रमा की भांति शोभित चन्द्रगुप्त को देख कर
कौन नही प्रसन्न होता ?
चाणक्य ।—जो प्रजा ऐसी प्रसन्न है तो राजा भी प्रजा से कुछ
अपना भला चाहते है ।