मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
द्वितीय अङ्क। ६५
द्वितीय अङ्क। ६५
दिक नियत किये थे यह दोष लगा कर शकटदास को
सूली दे दी।
राक्षस ।—(दु ख से) हा मित्र ! शकटदास ! तुम्हारी
बड़ी अयोग्य मृत्यु हुई। अथवा स्वामी के हेतु तुम्हारे
प्राण गए। इस से कुछ शोच नही है, शोच हमी लोगों ५
का है कि स्वामी के मरने पर भी जीना चाहते है।
**विराधगुप्त ।—**मन्त्री ! ऐसा न सोचिये, आप स्वामी का
काम कीजिये।
**राक्षस ।—**मित्र !
केवल है यह लोक, जीव लोभ अब लौ बचे। १०
स्वामि गयो पर लोक, पै कृतघ्न इतही रहे॥
**विराधगुप्त ।—**महाराज ! ऐसा नही (केवल यह ऊपर
का छन्द फिर से पढ़ता है) *।
**राक्षस ।—**मित्र ! कहो, और भी सैकड़ों मित्र का नाश सुनने
को ये पापी कान उपस्थित है। १५
**विराधगुप्त ।—**यह सब सुन कर चन्दनदास ने बड़े कष्ट से
आप के कुटुम्ब को छिपाया।
**राक्षस ।—**मित्र ! उस दुष्ट चाणक्य के तो चन्दनदास ने
विरुद्ध ही किया।
**विराधगुप्त ।—**तो मित्र का बिगाड़ करना तो अनुचित ही २०
था।
**राक्षस ।—**हा, फिर क्या हुआ ?
**विराधगुप्त ।—**तब चाणक्य ने आप के कुटुम्ब को चन्दनदास
से बहुत मांगा पर उस ने नही दिया, इस पर उस दुष्ट
ब्राह्मण ने— २५
* अर्थात जो लोग जीवलोभ से बचे हैं, वे कृतघ्न हैं, आप तो स्वामी के कार्य्य साधन को जीते हैं, आप क्यो कृतघ्न हैं।
६६ मुद्राराक्षस-
राक्षस ।- (घबड़ा कर) क्या चन्दनदास को मार डाला ?
विराधगुप्त ।-नहीं, मारा तो नहीं, पर स्त्री पुत्र धन समेत
बाध कर बन्दी घर में भेज दिया।
राक्षस ।-तो क्या ऐसा सुखी हो कर कहते हो कि बन्धन
५ मे भेज दिया ? अरे ! यह कहो कि मन्त्री राक्षस को
कुटुम्ब सहित बाघ रक्खा है।
( प्रियम्वदक आता है। )
प्रियम्वदक ।-जय जय महाराज ! बाहर शकटदास खड़े हैं।
राक्षस ।-( आश्चर्य से ) सच ही !
१० प्रियम्वदक ।-महाराज ! आप के सेवक कभी मिथ्या
बोलते हैं ?
राक्षस ।-मित्र विराधगुप्त ! यह क्या ?
विराधगुप्त ।-महाराज ! होनहार जो बचाया चाहे तो कौन
मार सकता है ?
१५ राक्षस ।-प्रियम्वदक ! अरे जो सच ही कहता है तो उन
को झटपट लाता क्यों नहीं ?
प्रियम्वदक ।-जो आज्ञा (जाता है) ।
(सिद्धार्थक के संग शकटदास आता है)
शकटदास ।-देख कर (आप ही आप)
२० वह सूली गड़ी जो बड़ी दृढ़ कै,
सोई चन्द्र को राज थिर्यो प्रन तैं।
लपटी वह फास की डोर सोई,
मनु श्री लपटी वृषलै मन ते ॥
बजी डौड़ी निरादर की नृप नन्द के,
२५ सोऊ लख्यो इन आखन ते।
नहि जानि परै इतनोहूं भए,
केहि हेत न प्रान कढ़े तन तैं ॥