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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

तृतीय अङ्क । ७६

तृतीय अङ्क । ७६

राजा और मन्त्री दोनों के भरोसे, सो तुम्हारा राज तो केवल सचिव के भरोसे है, फिर इन बातों के पूछने से क्या ? व्यर्थ मुह दुखाना है, यह सब हम लोगों के भरोसे है, हम लोग जानें ।

( राजा क्रोध से मुह फेर लेता है )
( नेपथ्य में दो वैतालिक गाते हैं )

प्रथम वै० ।—( राग बिहाग ) अहो यह शरद शम्भु ह्वै आई ।
कास फूल फूले चहु दिसि ते सोइ मनु भस्म लगाई ॥
चन्द उदित सोइ सीस अभूषण सोभा लगत सुहाई ।
तासों रजित घन पटली सोइ मनु गज खाल बनाई ॥
फूले कुसुम मुण्ड माला सोइ सोहत अति धवलाई ।
राजहंस सोभा सोइ मानों हास विभव दरसाई ॥
अहो यह शरद शम्भु बनि आई ।

( और भी )

( राग कलिगड़ा ) हरौ हरि नयन तुम्हारी बाधा ।
सरदागम लखि सेस अंक तैं जगे जगत शुभ साधा ।
कछु कछु खुले मुदे कछु सोभित आलस भरि अनियारे ॥
अरुन कमल से मद के माते थिर भे जदपि डरारे ॥
सेस सीस मनि चमक चकौंधन तनिकहु नहि सकुचाही ।
नींद भरे श्रम जगे चुभत जे नित कमला उर माही ॥
हरौ हरि नैन तुम्हारी बाधा ।

दूसरा वै० ।—( कड़खे की चाल में )
अहो, जिन कों बिधि सब जीव सों, बढ़ि दीनो जग काज ।
अरे, दान सलिल वारे सदा जे जीतहि गजराज ॥
अहो, झुक्यो न जिन को मान ते, नृपवर जग सिरताज ।
अरे, सहहि न आज्ञा भग जिमि दन्तपात मृगराज ॥

८० मुद्राराक्षस—

( और भी )

अरे, केवल बहु गहिना पहिरि राजा होइ न कोय ।
अहो, जाकी नहि आज्ञा टरै, सो नृप तुम सम होय ॥

चाणक्य ।—( सुन कर आप ही आप ) भला पहिले ने तो
५ देवता रूप शरद के वर्णन मे आशीर्वाद दिया, पर इस
दूसरे ने क्या कहा ? [कुछ सोच कर ] अरे जाना, यह
सब राक्षस की करतूत है । अरे दुष्ट राक्षस ! क्या तू नहीं
जानता कि अभी चाणक्य सो नहीं गया है ?

चन्द्रगुप्त ।—अजो वैहीनर ! इन दोनों गानेवालों को लाख
१० लाख मोहर दिलवा दो ।
वैहीनर ।—जो आज्ञा महाराज ( उठ कर जाना चाहता है ) ।
चाणक्य ।—वैहीनर, ठहर अभी मत जा । वृषल, यह अर्थ
कुपात्र को इतना क्यों देते हो ?
चन्द्रगुप्त ।—आप मुझे सब बातों में योंही रोक दिया करते
१५ ह, तब यह मेरा राज क्या है वरन उलटा बन्धन है ।
चाणक्य । - वृषल ! जो राजा आप असमर्थ होते हैं उन म
इतना ही तो दोष है, इस से जो ऐसी इच्छा हो तो तुम
अपने राज का प्रबन्ध आप कर लो ।
चन्द्रगुप्त । बहुत अच्छा, आज से मैं ने सब काम सम्हाला ।
२० चाणक्य ।—इस से अच्छी और क्या बात है, तो मे भी
अपने अधिकार पर सावधान हू ।
चन्द्रगुप्त ।—जब यही है तो पहिले मै पूछता ह कि कौमुदी-
महोत्सव का निषेध क्यों किया गया ?
चाणक्य ।—मै भी यही पूछता हू कि उस के होने का प्रयोजन
२५ क्या था ?
चन्द्रगुप्त ।—पहिले तो मेरी आज्ञा का पालन ।