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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

आत्माको धर्मज्ञानस्वरूप मानता है, उसके मतमें भी जब ज्ञान क्रिया नहीं है,
तब स्फुरण-स्फुरमाणका स्वरूप क्यों नहीं ?
जो लोग ज्ञानसामान्यको मृत्तिकादिकी तरह नित्य द्रव्य मानते हैं,
स्मृतित्वादि अवस्थाविशेषरूप ज्ञानोको घटादिकी तरह अनित्य मानते हैं, उनका
यह कहना नितान्त असङ्गत है कि 'सुप्तोत्थित पुरुषके इतने समयतक मैने
कुछ नहीं जाना इत्याकारक ज्ञानसामान्याभावबोधक स्मरणसे अनुभवका प्रागभाव
सिद्ध होता है,' क्योकि यदि ज्ञानसामान्य नित्य है, तो उसका प्रागभाव कैसे सिद्ध
हो सकता है ? कोई नित्य वस्तु अभावका प्रतियोगी नहीं होती । यदि ज्ञानसामान्य
भी न हो, तब तो 'मैने कुछ नहीं जाना' यह स्मरण भी असम्भव ही होगा,
क्योकि यत्किञ्चित् ज्ञानाभावका ज्ञान होनेपर ही स्मरण हो सकता है । जागरकालमें
भी 'तुम्हारी बात मै नहीं समझता' इस प्रकार जो बोलता है, उसे विशेष
ज्ञान न रहनेपर भी सामान्य ज्ञान है ही, अन्यथा यदि उच्यमान अर्थज्ञानाभाव-
का ज्ञान न हो, तो वाक्य-प्रयोग भी सम्भव नहीं । अतः सामान्य ज्ञान ही
विशेषज्ञानाभावको ग्रहण करता है, सामान्यज्ञानाभावका ग्रहण नहीं हो सकता ।
कहा जाता है कि 'यदि अनुभव नित्य है, तो 'मुझे यह अनुभव हुआ,
यह अनुभव नष्ट हो गया' इत्यादि व्यवहार कैसे सम्पन्न होगे ?' परन्तु इसका
समाधान किया जा चुका है । विषयसम्बन्धके उत्पत्ति-विनाशसे अनुभवमें उत्पत्ति-
विनाशका व्यवहार उपपन्न होता है । घटोत्पत्तिसे घटाकाशकी उत्पत्तिका जैसा
व्यवहार होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये । घटादि स्वाभाविक जन्मा-
दिविकारवान् हैं, किंतु अनुभूति औपाधिकरूपसे ही जन्मादिविकारवती है तथा
जन्मादिविकारहीन स्वप्रकाश नित्य एक संविद् है । कुछ लोग कहते हैं कि
'संविद् एक नही, किंतु अनेक हैं । जैसे अज आत्मा देहादिसे भिन्न है, अनादि
भी अविद्या आत्मासे भिन्न है, वैसे अनादि एव नित्य भी संविद् परस्पर भिन्न
हो सकती है । यदि अविद्याका और आत्माका विभाग न होगा, तो अविद्यारूप
ही आत्मा ठहरेगा ।' परंतु यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि 'संविद् अज
होनेसे व्यतिरेकेण घटादिके तुल्य अविभक्त है, इस अनुमानसे सविद्की एकता
ही सिद्ध होती है । संविद् ही आत्मा है, अतः आत्मासे देहादिका विभक्तत्व-
दृष्टान्त असङ्गत है । अविद्या भी प्रपञ्चरूपसे जायमान होनेसे अज नहीं है ।
घटादिके समान अन्यसे उसकी उत्पत्ति नहीं होती, इसी दृष्टिसे वह 'अजा'
कहलाती है । अजा (बकरी) के रूपकसे भी वह अजा कहलाती है । जैसे
लोहित-शुक्ल-कृष्ण रंगवाली, अपने समान ही बहुत-से बच्चोको उत्पन्न करनेवाली
अजाका कोई अज भोग करता हुआ अनुमरण करता है, कोई भुक्तभोगा अजाको
छोड़कर उदासीन हो जाता है, तद्वत् कोई जीव प्रकृतिका अनुसरण करता है,

मार्क्स और ज्ञान ६६७
कोई उससे भोग-अपवर्गरूप प्रयोजन सम्पन्न करके उसे छोड़ देता है—
'अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको
जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥' ( श्वेताश्व० उप० ४ । ५ )
जैसे घटादि मृत्तिकासे भिन्न नहीं ठहरते, वैसे ही देहादि प्रपञ्च भी संविद्रूप
आत्माका ही विवर्त्त या कार्य है, अतः वह भी संविद्से भिन्न नहीं है । आत्मशक्ति
होनेसे अविद्या भी आत्मासे अभिन्न ही है । जैसे वह्निशक्ति वह्निसे भिन्न नहीं,
वैसे ही आत्मशक्ति आत्मासे भिन्न नहीं है ।
कहा जा सकता है कि 'यद्यपि कार्य कारणसे अभिन्न है, फिर भी कारण
कार्यसे भिन्न होता है । शक्ति शक्तिमान्‌से भिन्न न होनेपर भी शक्तिमान् शक्तिसे
भिन्न ही है । उसी तरह यहाँ भी संविद्‌को देहादिसे विभक्त कहना उचित है ।'
परंतु यह भी ठीक नहीं, क्योंकि देहादि एवं अविद्यादि परमार्थतः यदि असत्
हैं, तो फिर संविद्में तत्प्रयुक्त भेद कैसे रह सकता है ? एतावता 'आत्मा अविद्या-
रूप ही ठहरेगा' यह आपत्ति भी निर्मूल ही है; क्योंकि वस्तुतः अविद्या है ही नहीं ।
यदि व्यावहारिक भेद कहा जाय, तो यह तो मान्य ही है । यावद्व्यवहार आत्मा
और देहादिका भेद है ही, अतः अज होनेसे संविद् अविभक्त ही है । कहा जाता
है कि 'निर्विकार होनेसे भले ही संविद्में स्वगत भेद न हो, परंतु देहादिसे तो
संविद्में विजातीय भेद एवं संविदोंके नानात्वसे सजातीय भेद मानना उचित ही
है । अबाधित बोधसिद्ध दृश्यके नानात्वसे दर्शनका भी नानात्व सिद्ध होता ही
है । जैसे छेद्यके भेदसे छेदनका भेद सिद्ध होता है, वैसे ही दृश्यके भेदसे दर्शनका
भी नानात्व सिद्ध होता है ।' परंतु यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि जैसे प्रकाश्य
पटादिके भेद होनेपर भी प्रकाशका भेद नहीं होता, वैसे ही दृश्यके नानात्व होने-
पर भी दर्शनका नानात्व सिद्ध नहीं हो सकता । घटादि विषयके भेदसे घटादि-
वृत्तिरूप ज्ञानका भले ही भेद हो, परंतु नित्य संविद् प्रकाशके समान अभिन्न ही
है । संविद् न तो छेदनके समान क्रिया है और न तो वह जन्य ही है । वृत्ति
अवश्य जन्य एवं क्रिया है । संविद् ही जब आत्मा है, तब आत्माका नानात्व
भी इसी तरह खण्डित है । अतः जैसे गगनमें घटादि-उपाधिसे औपाधिक ही भेद
होता है, स्वाभाविक नहीं, वैसे ही संविद्में घटादि एवं वृत्तिके भेदसे ही औपाधिक
भेद प्रतीत होता है, स्वाभाविक भेद नहीं ।
कहा जाता है कि 'गगन तो घट-करकादि व्यतिरेकेण सिद्ध हैं, अतः उसमें
औपाधिक भेद ठीक है, परंतु ज्ञान तो ज्ञेय एवं ज्ञाताके बिना कहीं उपलब्ध ही
नहीं होता, फिर ज्ञानका औपाधिक भेद कैसे माना जाय ? अतः ज्ञानका स्वाभाविक
ही भेद मानना ठीक है ।' परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि
सबकी सत्ता अनुभवके अधीन होती है । फिर अनुभवकी सत्ता ज्ञेय एवं ज्ञाताके

६६८ मार्क्सवाद और रामराज्य
अधीन कैसे हो सकती है ? अनुभवके बिना किसी भी वस्तुकी सत्ता सिद्ध नहीं
होती । ज्ञेय तो ज्ञानाधीन है ही । ज्ञाताका तो वास्तविक रूप ज्ञान ही है । यदि
अनुभवके बिना भी सत्ता मानी जाय, तब तो शश-शृङ्गादिकी भी सत्ता माननी
पड़ेगी । अन्धकारमें रहता हुआ भी घट अनुभवके बिना असत् ही रहता है ।
कहा जाता है कि 'भले ही रज्जु-सर्पादि प्रातीतिक पदार्थकी सत्ता अनु-
भवाधीन हो, क्योंकि उसकी अज्ञात सत्ता नहीं होती, परन्तु घटादिकी सत्ता तो
अनुभवाधीन नहीं होती; क्योंकि घटादि तो अनुभवके पहले और पीछे भी रहते
ही हैं । प्रत्युत अनुभव ही घटादि विषयके अधीन होता है । घटादि जब
होते हैं, तभी चक्षुका उनसे सनिकर्ष होता है, तभी घटानुभव होता
है ।' परन्तु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि स्वप्नमें घटादि विषयों
एवं इन्द्रियोंके न होनेपर भी घटादि-अनुभव होता है । यदि कहा
जाय कि 'स्वाप्निक ज्ञान तो भ्रम है', तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि
अनधिगत, अबाधित अर्थविषयक ज्ञान ही प्रमा है । संविद्ब्रह्मसे भिन्न सभी बाधित
है, अतः घटादि-अनुभव भी वस्तुतः भ्रम ही है । यावद्व्यवहार बाधित न होना
जैसे घटादिका है, वैसे ही स्वाप्निक पदार्थका भी है, स्वप्न भी व्यवहार ही है।
यदि कहा जाय कि 'स्वप्न अस्थिर व्यवहार है', तो यह भी ठीक नहीं है;
क्योंकि व्यवहारगत स्थिरता या अस्थिरता विषयके बाधितत्व-अबाधितत्वपर ही
निर्भर है । बाधितत्व जब स्वप्न-जागर दोनोंमें ही है, तब स्थिरत्व-अस्थिरत्वका भेद
कैसे सिद्ध होगा ? शतायु पुरुष एव दशायु पुरुषके भी बाधितत्व-अंशमें समानता
ही है । अतः जैसे स्वप्नमें विषयेन्द्रियादि न रहनेपर भी विषय-प्रत्यक्ष होता है,
वैसे ही जागरमें भी हो सकता है । निद्रादोषके भावाभावसे ही स्वप्न-जागरमें
भेद है । निद्रा-दोषके हटनेपर स्वप्न हट जाता है । जागरमें पित्रादि-
दर्शनजनक अदृष्टके मिटनेसे पित्रादिका दर्शनाभाव होता है । अनुभवसे
भिन्न पित्रादि हैं ही नहीं, अतः उनकी मृति आदिका प्रसङ्ग ही नहीं उठता।
अतएव मृतके सम्बन्ध नष्ट होनेका व्यवहार होता है । नाशका अदर्शन
ही अर्थ है । इस तरह प्रतीति ही विषय है, प्रतीतिसे भिन्न विषय नहीं है, फिर
प्रतीतिकी सत्ता विषयाधीन कैसे कही जा सकती है ? इसमें अन्वयव्यतिरेक भी है ।
जब प्रतीति है, तभी विषय है । जब प्रतीति नहीं, तब विषय भी नहीं ।
जैसे मिट्टी होनेपर ही घट है । मिट्टी नहीं, तो घट भी नहीं । वैसे ही प्रतीतिसे
भिन्न विषय नहीं ।
कुछ लोग कहते हैं कि 'विषय होनेपर प्रतीति होती है, विषय न रहनेपर
प्रतीति नहीं होती, यही न्याय क्यों न माना जाय ?' परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि
विषय न रहनेपर भी स्वप्नमें प्रतीति होती ही है । मृत पित्रादि स्वप्नमें हैं नहीं,
तब भी प्रतीत होते हैं । जो लोग जन्य ज्ञानकी सत्ता विषयाधीन मानते हैं, वे भी

नित्य ईश्वरज्ञान मानते है। फिर ईश्वरका नित्य ज्ञान अनित्य विषयोके अधीन
कैसे हो सकता है ? नैयायिक तथा विशिष्टाद्वैतवादी नित्य ज्ञान मानते हैं। वेदान्ता-
नुसार तो नित्यज्ञानात्मक ब्रह्म ही अविद्यावशात् जन्य ज्ञान होता है और वही
विषयसत्ताका हेतु बनता है। नित्य ज्ञान ही आत्मा है, आत्माकी सत्तासे ही अन्य
सभी पदार्थ सत्तावान् होते हैं। 'अहमस्मि' इस रूपसे आत्माकी सत्ता आत्मासे
ही सिद्ध है। परंतु 'इदमस्ति' इस रूपसे घटादिकी सिद्धि आत्म-प्रत्ययसे ही
होती है। 'अहं घटोऽस्मि' इस रूपसे घट अपने आपको नहीं जानता, अतः
घटादिकी सत्ता आत्मप्रत्ययके अधीन है। कहा जाता है कि 'घटोऽस्ति' इस
प्रकारके आत्मप्रत्ययसे पहले भी घट तो है ही', परंतु यह ठीक नही, क्योकि
'अस्ति' इस प्रत्ययके अविषय घटमें सत्ता नहीं हो सकती, अन्यथा शश-शृङ्गादिमें
भी सत्ता प्रसक्त होगी। कहा जा सकता है कि 'अहमस्मि' इस बोधके पहले भी
जैसे आत्माकी सत्ता है, वैसे ही घटप्रत्ययके पहले भी घटकी सत्ता होनी चाहिये।'
परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योकि 'अहमस्मि' इस प्रत्ययका जो प्रत्येता है, वह तो
इस प्रत्ययसे भी प्रथम सिद्ध ही है, अतः आत्माकी सत्ता हो सकती है, परंतु
'अयं घटः' इस प्रत्ययके पहले घट सिद्ध नहीं है, अतः घटकी सत्ता सिद्ध नही हो
सकती, अतः अनुभवकी सत्ता विषयाधीन नहीं है। इसी तरहके ज्ञाताके अधीन भी
अनुभवकी सत्ता नहीं है; क्योकि सिद्धान्तमें ज्ञाता ही अनुभव है। यदि अनुभवसे
भिन्न ज्ञाता प्रमाता माना जायगा, तो उस प्रमाताकी सत्ता भी अनुभवके अधीन
माननी पड़ेगी। ज्ञाताका स्वरूप ही अनुभव है, वही अज्ञान, अन्तःकरण आदि
उपाधिसे साक्षी, प्रमाता आदि नामसे भी व्यवहृत होता है।
'अनुभूति दृशिरूप होनेसे व्यतिरेकेण घटादिके तुल्य दृश्यधर्मवाली नहीं है'
इस अनुमानसे अनुभूति दृश्य या वेद्य धर्मसे युक्त नही है, यह भी सिद्ध होता है।
कुछ लोग कहते हैं कि 'जब अनुभूतिमे नित्यत्व, स्वयम्प्रकाशत्वादि धर्म मान्य हैं,
तब उसे दृश्य धर्मरहित कैसे कहा जा सकता है ? नित्यत्वादि भी संवेदनमात्र
हैं, यह नहीं कहा जा सकता, क्योकि संवेदनसे इनका स्वरूप भिन्न ही है।' परंतु
यह कहना ठीक नही; क्योकि जो धर्म जिससे दृश्य होता है, वह उसका धर्म
नहीं कहा जा सकता। जैसे चक्षुसे दृश्यमान रूप चक्षुका धर्म नहीं है। यद्यपि
देवदत्त स्वगत स्थौल्यादि, सुखादि देखता है, तथापि वस्तुतः स्थौल्यादि,
सुखादि देह, मन आदिके ही धर्म हैं, आत्माके धर्म नहीं हैं। आत्मा तो
देह, मन आदिसे भिन्न ही है, अतः यहाँ प्रश्न होता है कि 'यदि स्वधर्म स्वसे
वेद्य नहीं होते, तो अनुभवधर्म नित्यत्वादि किससे वेद्य होंगे ?' अनुभवसे भिन्न
सब जड़ ही है, उससे वेदन असम्भव है। अनुभव एक ही है, उसमें भेद ही नहीं
है, अतः 'अमुक अनुभवसे अमुक अनुभवका नित्यत्वादि गृहीत होगा' यह
भी नहीं कहा जा सकता। आत्मा भी अनुभवरूप ही है, अतः उससे भी नित्य

६७० मार्क्सवाद और रामराज्य
त्वादिका अनुभव नहीं कहा जा सकता । इस तरह यदि नित्यत्वादि अनुभूतिके
धर्म होंगे, तो वेदिता न होनेसे वे अवेद्य ही ठहरेंगे । यदि अवेद्य हैं, तो धर्म ही
कैसे होंगे ? अतः वस्तुतः अनुभूतिके कोई भी धर्म नहीं होते । जो नित्यत्वादि
धर्म अनुभवसे विदित होते हैं, वे अनुभूतिके धर्म नहीं हैं, किंतु माया एवं
मायाकार्य मूर्त्त वस्तुके ही धर्म हैं । मायाके द्वारा ही नित्यत्वादि अनुभूति-धर्म-
त्वेन कल्पित हैं ।
कहा जा सकता है कि 'नित्यत्व, स्वयम्प्रकाशत्वादि यदि अनुभूतिके धर्म
नहीं हैं, तब तो अनुभूति नित्य, स्वप्रकाश, एक सिद्ध नहीं होगी । फिर तो वह
अनित्य, जड, अनेक ही ठहरेगी ।' परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योकि अनुभूतिमें
जैसे पारमार्थिक नित्यत्वादि नहीं हैं, वैसे ही अनित्यत्वादि भी नहीं हो सकते ।
अतः अनुभूति निर्धर्मक ही है; क्योकि यदि परमार्थतः कोई भी भास्य वस्तु होती,
तभी वह भासक होती । यदि परमार्थतः कालत्रय होता, तभी कालत्रयाबाध्यत्व-
रूप नित्यत्व भी होता । इस तरह यदि एकत्वादि संख्या होती, तभी अनुभूतिमें
एकत्व भी होता । अतः व्यावहारिक भास्य आदि पदार्थोंको लेकर ही स्वयम्प्रका-
शत्वादिका व्यवहार अनुभूतिमें होता है। इसलिये अनुभूतिमें कोई भी दृश्यधर्म नही रह
सकता । फिर भी कहा जाता है कि 'यदि दृशिमें दृशित्वधर्म है, तब तो दृशि निर्धर्मक
न हुई, उसमे दृशित्वधर्म है ही। यदि दृशिमे दृशित्व नहीं है तो दृशित्वरहित दृशि ही
कैसी ?' परंतु यह भी शङ्का ठीक नहीं है; क्योकि व्यवहारभूमिमें धर्म और धर्मी
दो पदार्थ हैं या नहीं ? यदि हैं, तो धर्मको निर्धर्मक मानना ही पड़ेगा; क्योंकि
धर्ममें धर्म नहीं माना जाता । यदि धर्ममें भी धर्मान्तर होगा, तब तो वह भी
धर्मी ही होगा, धर्म न रहेगा । इस तरह धर्म जैसे धर्मत्वरूप धर्मरहित सिद्ध होता
है, वैसे ही दृशि भी दृशित्वधर्मरहित सिद्ध होगी । यदि धर्म-धर्मी ये दो पदार्थ
मान्य नहीं हैं, तब तो 'यह धर्म है, यह धर्मी है' इस प्रकारका व्यवहार ही लुप्त
हो जायगा । इसलिये निर्धर्मक दृशिमें कोई भी धर्म नहीं है ।
ज्ञान और आनन्द
ज्ञानके सम्बन्धमें अनेक प्रकारोकी विप्रतिपत्तियोंके रहते हुए भी 'अर्थ-
प्रकाश' को ही 'ज्ञान' कहा जा सकता है । मुक्तिमें यद्यपि अर्थ नहीं होता
तथापि जब अर्थ-ससर्ग सम्भव हो तभी अर्थका प्रकाशक अर्थ ही ज्ञान है ।
अतएव 'ज्ञानत्व जाति-विशेष है, साक्षात् व्यवहारजनकत्व ही ज्ञानत्व है, जड-
विरोधित्व ही ज्ञानत्व है, जडसे भिन्नत्व ही ज्ञानत्व है, अज्ञानविरोधित्व ही ज्ञानत्व
है' आदि भी ज्ञानके लक्षण हैं । इनमेंसे कोई लक्षण वृत्तिप्रतिबिम्बित चिदाभासमें
सङ्गत होता है, तो कोई अखण्ड ब्रह्मरूप ज्ञानमें जाता है, किंतु अर्थप्रकाशत्व
वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्यरूप ज्ञान एव ब्रह्मरूप ज्ञान दोनोंमें ही अनुगत है ।

मार्क्स और ज्ञान ६७१
सर्वावभासक ज्ञान ही ब्रह्म है, क्योंकि यह श्रुति प्रमाण है—'तस्य भासा
सर्वमिदं विभाति ।' (कठोप० २ । २ । १५) सर्वप्रेमास्पदत्व, सर्वानन्दयितृत्वही
आनन्द है । 'एष ह्येवानन्दयति' (तैत्ति० उप० २ । ७) । यह ब्रह्म ही आनन्दित
करता है । यह सर्वावभासक ज्ञान स्वतः भासमान होता है । यदि उसका भी कोई
अन्य भासक माना जायगा, तो उसका भी भासक कोई अन्य मानना पड़ेगा ?
इस तरह अनवस्था-दोष अनिवार्य हो जायगा । इसपर कहा जाता है कि
'यदि ज्ञानस्वरूप ब्रह्म सर्वदा भासमान है, तो उसमें जगत्का अध्यास किस
तरह बन सकेगा ? क्योकि भासमान शुक्तिकामें रजतका अध्यास नहीं होता--
जैसे शुक्तिकाभान रजताध्यासका विरोधी होता है, वैसे ही ज्ञानस्वरूप ब्रह्मका
भासमान होना भी प्रपञ्चाध्यासका विरोधी होगा।' किन्तु यह कहना ठीक नहीं,
क्योंकि सर्वथा अभासमान शुक्तिकामें भी तो रजताध्यास कभी भी नहीं होता,
सामान्यतया भासमान शुक्त्यादि अधिष्ठानमें ही रजतादिका अध्यास होता
है । अभासमान एव विशेषाकारेण भासमान अधिष्ठानमें अध्यास नहीं होता ।
इस तरह सामान्यतया भासमान ज्ञानस्वरूप ब्रह्मसे प्रपञ्चाध्यास बन सकता है ।
इसपर पुनः कहा जा सकता है कि 'निर्विशेष ब्रह्ममें सामान्य-विशेष-
व्यवहार नहीं बन सकता ।' पर यह भी ठीक नहीं; क्योकि जबतक अविद्या है,
तबतक निर्विशेष ब्रह्ममें भी कल्पित विशेष मान्य होता ही है । निर्विशेष ब्रह्ममें
प्रपञ्चाध्यास माना भी नहीं जाता, किंतु अज्ञानावच्छिन्न सविशेषमें ही प्रपञ्चका
अध्यास होता है । तथाच प्रपञ्चाध्यासका अधिष्ठानभूत ब्रह्मका सामान्याकार सन्मात्र
है और विशेषाकार ज्ञान एव आनन्द है । भ्रमकालमें विशेषाकारकी प्रतीति
नहीं होती, सामान्याकार-प्रतीति भ्रमकालमें भी होती है । 'इदं रजतम्' के समान
ही 'सज्जगत्' यह भ्रम-प्रत्यक्ष होता है । जैसे वहाँ 'इदमंश' अधिष्ठान सामान्यांश
है, वैसे ही यहाँ सदंश अधिष्ठान सामान्यांश है । जैसे 'शुक्तौ रजतम्' इस प्रकार
भ्रम नहीं होता, वैसे ही 'ज्ञानमानन्दो वा जगत्' ऐसा भ्रम नहीं होता । जैसे
नीलपृष्ठ, त्रिकोण शुक्तिके साक्षात्कारसे रजतभ्रम दूर हो जाता है, उसी तरह
सत्यज्ञानानन्दस्वरूप ब्रह्मके साक्षात्कारसे जगद्भ्रम मिट जाता है । ज्ञानानन्दरूपसे
अभासमान और सद्रूपसे भासमान ब्रह्ममें जगत्का अध्यास होता है । अघटित-
घटना-पटीयसी मायाके कारण ही ब्रह्ममें जगत्का अध्यास होता है । 'सेयं भगवतो
माया यन्नयेन विरुद्धयते' (श्रीमद्भा० ३।७।९)--भगवान्की माया नयसे विरुद्ध
होनेपर भी प्रत्यक्ष ही प्रपञ्चाध्यास मायाके द्वारा सम्पन्न हो जाता है ।
आनन्दके सम्बन्धमे भी इसी प्रकार कहा जा सकता है—( १ ) आनन्दत्व
जाति आनन्द है या ( २ ) अनुकूलतया वेदनीयत्व आनन्द है या ( ३ )
अनुकूलत्व मात्र आनन्द है या ( ४ ) ज्ञानस्वरूपता ही आनन्द है अथवा ( ५ )
निरुपाधि-इष्टता ही आनन्द है अथवा (६) दुःखनिरोधित्व ही आनन्द है या ( ७ )

६७२ मार्क्सवाद और रामराज्य
दुःखाभावोपलक्षितत्व आनन्द है ? पहला पक्ष इसलिये ठीक नहीं कि वह लक्षण
अखण्डस्वरूप ब्रह्मानन्दमें नहीं जाता । दूसरा भी ठीक नहीं; क्योकि मोक्षमें तो
आनन्दस्वरूप ब्रह्म ही रहता है, उसे जाननेवाला कोई वेदिता रहता ही नहीं ।
आनन्दरवरूप आत्मा वेद्य है भी नही, अतः वह वेदनीय भी हो नहीं सकता,
तब उसमें द्वितीय लक्षण कैसे सङ्गत होगा ? अनुकूलता भी सापेक्ष होती है और
वह भी अन्यके प्रति न होकर अपने प्रति ही कहनी पड़ेगी । तथा च, सविशेषता
अनिवार्य होगी, निर्विशेषमें अपने प्रति अपनेमे अनुकूलवेदनीयता कथमपि
उपपन्न नहीं हो सकती । इसीलिये तीसरा भी पक्ष ठीक नहीं । यदि वेदनस्वभावसे
अधिक अनुकूलता स्वाभाविक है, तब भी सखण्डतापत्ति होगी । यदि अनुकूलता
औपाधिक है, तब तो उस आनन्दकी कभी निवृत्ति भी हो सकती है । चतुर्थ
पक्ष भी ठीक नहीं; क्योकि उक्त रीतिसे अनुकूलता सम्भव नहीं । इस तरह
तो दुःखज्ञानको आनन्द कहना पड़ेगा । निर्विषय ज्ञान अतएव निरुपाधि-इष्टता
ही आनन्द है, यह पाँचवाँ पक्ष भी ठीक नहीं । सुख है, यह भी नहीं कहा जा
सकता; क्योंकि ज्ञान सविषय ही होता है, विषयानुल्लेखि ज्ञान होता ही नहीं ।
छठा पक्ष भी नही कहा जा सकता; क्योकि यदि विरोधनिवर्त्तन ही है, तब तो
आनन्दरूप आत्मामें सदा ही दुःख-निवृत्ति होनी चाहिये । यदि दुःखतादात्म्यकी
अयोग्यता ही दुःखविरोधिता है तब तो घटादि भी दुःखतादात्म्यके अयोग्य हैं, उन्हे
भी आनन्द कहा जाना चाहिये । सप्तम पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि दुःखाभावरूप
वैशेषिकके मोक्षमें -आनन्द न होनेपर भी दुःखाभावोपलक्षितत्वरूप वेदान्तीके
आनन्दका लक्षण चला जायगा ।
इस तरह उपर्युक्त लक्षणोंमें दोष होनेपर भी निरुपाधि-इष्टता अर्थात्
निरुपाधिक निरतिशय प्रेम या इच्छाकी विषयता ही आनन्द है, यह लक्षण
निर्दोष है । इसपर कहा जा सकता है कि 'दुःखाभाव भी निरुपाधि-इच्छाका
विषय होता है, अतः लक्षण अतिव्याप्त है।' किंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि
दुःखाभाव भी एक प्रकारके सुखका शेष ही है, अतः वह लक्ष्य ही है, वहाँ
लक्षण जाना अतिव्याप्ति नहीं । अभाव भी विरोधि-भावान्तर ही है, अतः
दुःखाभाव सुखरूप ही है। कहा जा सकता है कि 'मुक्तिमें तो इच्छा नहीं
रहती, परंतु वहाँ भी आनन्द तो रहता है, अतः अव्याप्ति हुई।' पर यह भी
ठीक नहीं; क्योंकि वहाँ भी इष्टत्वोपलक्षितत्व तो है ही । जब भी इच्छा थी तब
उसका विषय आनन्द था । इच्छाके विषय यद्यपि शब्दादि विषय भी होते हैं,
तथापि वे सुखसाधन होनेसे इच्छाके विषय होते हैं, स्वतः नहीं । वे ही जब
दुःखकारक होते हैं, तब उनमें द्वेष होने लगता है । अतः वे सोपाधिक इच्छाके
ही विषय होते हैं, निरुपाधिक इच्छाके नहीं । उपलक्ष्यमें व्यावर्तक अवच्छेदकता

रहना आवश्यक नहीं, जैसे कभी भी काकके रहनेसे काकोपलक्षित गृहका बोध
होता है, उसी तरह कभी भी होनेवाली इच्छासे इष्टत्वोपलक्षित आनन्दका
बोध हो सकता है ।
यहाँ शङ्का होती है कि 'निरुपाधि-इष्टत्व आनन्दमें स्वाभाविक है या
औपाधिक ?' अन्तिम पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि ब्रह्मस्वरूपमें आनन्दरूपता
औपाधिक नहीं होगी, क्योंकि उसकी इष्टता तो निरुपाधिक ही है । प्रथम पक्ष
भी ठीक नहीं है, क्योंकि इसमें भी विकल्प यह है कि वह निरुपाधि इष्टत्व-
ज्ञानसे भिन्न है या अभिन्न ? यदि पहला पक्ष कहे, तो उसमे सखण्डत्वापत्ति
होगी । यदि ज्ञानसे अभिन्न ही है, तब तो उसमें आनन्द-पदप्रयोग व्यर्थ ही है,
परंतु यह भी कहना ठीक नहीं; क्योंकि ज्ञान और आनन्द दोनोंका यद्यपि अभेद ही
है, तथापि कल्पित भेद लेकर ज्ञानत्व-आनन्दत्व जातिभेदको लेकर दोनों शब्दों-
की प्रवृत्ति होती है । एतावता 'विषयोल्लेखरहित ज्ञान आनन्द है', यह पक्ष भी
निर्दोष ही है । ज्ञान विषयोल्लेखरहित भी होता ही है', यह पीछे सिद्ध किया जा
चुका है । जगत् दृश्यरूप होनेसे सत् नहीं कहा जा सकता, किंतु दृक्रूप होनेसे
आनन्द सद्रूप भी है ।
सुख एवं वेदनका भेद न होनेसे परप्रेमास्पदरूपसे भासमान आत्मा ही
आनन्दरूप है । जैसे वृत्तिरूप ज्ञान अनित्य होनेपर भी वृत्तिभासक स्फुरणरूप
ज्ञान नित्य है, वैसे ही अन्तःकरणवृत्तिरूप सुख भी अनित्य है; परंतु ब्रह्मात्मस्वरूप
सुख नित्य ही है । 'मैं कभी न रहूँ' ऐसा न हो, किंतु सर्वदा बना रहूँ' 'मा न
भूवम् किंतु सर्वदा भूयासम्' इस प्रकार आत्मामें स्वाभाविक ही प्रेम देखा
जाता है । यदि आत्मा सुखरूप न हो, तो वह प्रेमास्पद नहीं हो सकता । यदि
प्राणी अनित्य सुखमें भी प्रेम करता है, तो नित्य सुखमें तो परप्रेम होना ही
चाहिये । सुखमें ही प्रेम होता है । सुखसाधनोंमें भी यद्यपि प्रेम होता है, तथापि
सुखके प्रयोजनसे ही सुखसाधनोंमें प्रेम होता है । सुखसाधनोंमें प्रेम सुखार्थ ही
होता है, परंतु सुखमें प्रेम अन्यार्थ नही होता । इसी तरह आत्मामें भी प्रेम
आत्मार्थ ही होता है, अन्यार्थ नहीं । इसीलिये आत्मा निरुपाधिक प्रेमका आस्पद
है । जैसे चणकचूर्णादि ( बेसन ) में मधुरता शर्करासम्बन्धसे होती है, परंतु
शर्करामें स्वतः मधुरिमा होती है । मोदक आदिमें सातिशय मिठास होती है,
शर्करामें निरतिशय मिठास होती है । उसी तरह अन्यत्र सातिशय प्रेम होता है,
आत्मामें निरतिशय प्रेम होता है । इसीलिये सब कुछ आत्मार्थ है, आत्मा
अन्यार्थ नहीं होता । अतः आत्मा सबका ही शेषी है ।
ससारमें सुख-दुःख एव सुख-दुःख-साधनोंके वैचित्र्यसे यह मानना पड़ता
है कि यह विचित्रता जीवात्माके पिछले शुभाशुभ कर्मोंसे ही उपपन्न होगी । पिछले
मा० रा० ४३-

शुभाशुभ कर्मोंकी उत्पत्ति भी जन्मान्तरीय देहसे माननी पड़ेगी । वह जन्मान्तर भी
उससे प्राचीन कर्मोंसे मानना पड़ेगा । इस तरह बीज एव अङ्कुरकी परम्पराके
समान ही जन्मों एव कर्मोंकी परम्पराको भी अनादि मानना पड़ता है ।
यह अनादि परम्परा सादि देहके आश्रित हो नहीं सकती । अतः अनादि आत्माके
ही आश्रित उसे मानना पड़ता है, अर्थात् अनादि आत्माके ही पूर्व-पूर्व देहोंसे
उत्तरोत्तर कर्म होते हैं एवं पूर्व-पूर्व कर्मोंसे उत्तरोत्तर देह होते हैं । उस आत्मामें
ही कर्म एवं जन्म चलते हैं ।
शय्या, प्रासादादि-संघात जैसे परार्थ (दूसरोंके लिये) होते हैं, वैसे ही
देह, इन्द्रिय, मन आदिका संघात भी स्वविलक्षण किसी चेतनके लिये ही होता
है । शय्यादि जैसे अपनेसे भिन्न देवदत्तादि शरीररूपी संघातके ही लिये दृष्ट हैं
वैसे ही यदि देहादिसंघात भी किसी दूसरे संघातके ही लिये हो, तब तो अनवस्था
प्रसङ्ग होगा, क्योकि उस संघातको भी किसी अन्य संघातके लिये मानना पड़ेगा ।
अतः शरीरादि-संघातको किसी स्वविलक्षण, असंहत चेतनके लिये मानना पड़ेगा ।
इसीलिये त्रिगुणात्मक सुख-दुःख मोहात्मक अव्यक्त, महदादि प्रपञ्चके विपरीत
त्रिगुणातीत, असंहत असङ्ग चेतन आत्मा सिद्ध होता है । त्रिगुणात्मक जड़-प्रपञ्च
रथादि चेतन सारथी या अश्वादिसे अधिष्ठित ही जैसे कार्यकारणक्षम होता है,
वैसे ही अचेतन प्रकृति, बुद्धि आदि भी चेतनसे अधिष्ठित होकर ही कार्यकारण
क्षम होंगी । अतः त्रिगुणात्मक अचेतनसे भिन्न चेतन अधिष्ठाता आवश्यक
है । भोक्ता भी अचेतनसे भिन्न चेतन ही होना चाहिये । सुख-दुःखादि
भोग्य हैं । इनके द्वारा अनुकूलनीय, प्रतिकूलनीय, सुखी, दुखी चेतन ही हो
सकता है । बुद्ध्यादि स्वयं सुख-दुःख-मोहात्मक हैं, अपनेसे ही स्वयं
अनुकूलनीय या प्रतिकूलनीय नहीं हो सकते । इसी तरह द्रष्टाके बिना
दृश्य नहीं हो सकता । बुद्ध्यादि दृश्य हैं, उनका द्रष्टा उनसे भिन्न ही होना
चाहिये । साक्षात् द्रष्टा होनेसे चेतन ही साक्षी हो सकता है । द्रष्टा चेतन
स्वयं अदृश्य होता है । जैसे रूप दृश्य है, चक्षु द्रष्टा है, वैसे ही चक्षु भी दृश्य
है, मन द्रष्टा है ।
संसारमें चेतनके अधीन ही अचेतनकी प्रवृत्ति होती है । भले चेतनसंयुक्त
अचेतनकी प्रवृत्ति होती है, तथापि प्रवृत्ति अचेतनकी ही है, क्योकि दोनों ही
प्रत्यक्ष हैं । फिर भी अचेतन रथादिसे जीवित देहमें अचेतन विलक्षणता स्पष्ट ही
है । काष्ठादिके आश्रित दाह, प्रकाशादि क्रिया केवल अग्निसे उपलब्ध नहीं होती ।
फिर भी दाह, प्रकाशादि क्रिया अग्निका ही धर्म है, क्योकि अग्निसंयोग होनेसे
ही काष्ठादिमें दाहादि उपलब्ध होता है, अग्निसंयोगके बिना उपलब्ध नहीं होता ।
भौतिकवादी भी तो चेतन देहको ही प्रवर्त्तक मानते हैं । वेदान्तानुसार निर्विकार

मार्क्स और ज्ञान [पृ. ६७५]

कूटस्थ आत्मा भी अचेतनका प्रवर्त्तक वैसे ही होता है, जैसे अयस्कान्तमणि स्वयं
प्रवृत्तिरहित होनेपर भी लोहका प्रवर्त्तक होता है या जैसे प्रवृत्तिरहित रूपादि
चक्षुरादिके प्रवर्त्तक होते हैं। यद्यपि जैसे दुग्ध स्वयं वत्सवृद्ध्यर्थ प्रवृत्त होता है,
जैसे जल अचेतन भी प्रवृत्त होता है, वैसे ही अचेतनकी प्रवृत्ति होनी ठीक है,
तथापि वहाँ भी वत्सके चोषण तथा सर्वशासक अन्तर्यामीसे ही दुग्धादिकी प्रवृत्ति
होती है। जैसे कर्त्ताके बिना कुठारादि करणोंका व्यापार नहीं बन सकता, वैसे
ही देह, इन्द्रियादिका देहादिभिन्न कर्त्ताके बिना व्यापार नहीं हो सकता। भौतिक-
वादी शरीरको चेतन कहता है।
कहा जाता है कि 'जैसे नैयायिकके मुक्तात्मामें ज्ञान नहीं होता, वैसे ही मृत
शरीरमे भी ज्ञानका अनुपलम्भ उपपन्न हो जाता है। प्रमाणके अभावसे ज्ञानका
अभाव उपपन्न हो ही जाता है।' परन्तु यह ठीक नहीं, क्योंकि यदि शरीर चेतन
हो, तो बाल्य-यौवनादि भेदसे देहमें भेद सुस्पष्ट उपलब्ध होता है। फिर एक
देह न होनेसे एक आत्मा भी नहीं होगा। फिर 'जिस मैंने बाल्यावस्था मे माताका
अनुभव किया था, वही मै वृद्धावस्था मे पौत्रोका अनुभव करता हूँ' ऐसा अनुभव
न होना चाहिये। बाल, स्थविर-शरीरमें भेद प्रत्यक्ष है। शरीरसम्बन्धी अवयवोंके
उपचय-अपचयद्वारा शरीरका उत्पाद-विनाश सिद्ध है। जो कहा जाता है कि
'पूर्वशरीरोत्पन्न संस्कारसे द्वितीय शरीरमे संस्कार उत्पन्न होता है', तो यह ठीक
नहीं। अनन्त संस्कारोंकी कल्पनामे गौरव होगा। यदि शरीर ही चेतन है, तब
तो वह उत्पन्न होनेवाला शरीर नवीन ही है। फिर बालकोकी माताके स्तन्यपानमें
प्रवृत्ति न होनी चाहिये, क्योकि इष्टसाधनता ज्ञान प्रवृत्तौ हेतु है। सद्यःसमुद्भूत
शिशुको इष्टसाधनताका अनुभावक कुछ भी नहीं है। देहभिन्न आत्मा माननेवाले
तो कह सकते हैं कि जन्मान्तरानुभूत इष्टसाधनताका स्मरण हो सकता है।
परन्तु जहाँ देहभिन्न आत्मा नहीं है, वहाँ तो जन्मान्तरकी बात है ही नहीं।
वहाँ स्तन्यपानमें जन्मान्तरीय इष्टसाधनताका ज्ञान नहीं कहा जा सकता।
शङ्का हो सकती है कि 'यदि जन्मान्तरीय अनुभूत स्तन्यपानकी इष्टसाध-
नताका स्मरण होता है, तो अन्य जन्मान्तरीय अनुभूत पदार्थोंका स्मरण क्यो नहीं
होता?' तो इसका समाधान यह है कि उद्बोधक न होनेसे उनका स्मरण नहीं
होता। स्तन्यपानके सम्बन्धमे तो जीवनका हेतुभूत अदृष्ट ही सस्कारका उद्बोधक
है। यदि स्तन्यपानमें इष्टसाधनताका बोध होकर प्रवृत्ति न हो, तो जीवन ही
असम्भव हो जायगा।
कुछ लोग चक्षु, श्रोत्र आदि इन्द्रियोको ही चेतन मानते हैं, परन्तु चक्षु
आदिके उपघात होनेपर भी स्मृति होती है, अतः यदि चक्षुरादि इन्द्रियाँ चेतन
होतीं, तो उनके उपघातमें स्मृति न होनी चाहिये थी। अन्यके अनुभूतका अन्य

स्मरण नही कर सकता । मन भी चेतन नहीं है । फिर तो वह अणु होनेसे उसकी
प्रत्यक्षता न होगी । कहा जाता है कि 'क्षणिक विज्ञान ही आत्मा है ।' परंतु
'सोऽहं' ( मै वही हूँ ) इस प्रकार अनेकदिनवर्ती आत्माकी प्रत्यभिज्ञा होनेसे
नित्य विज्ञान ब्रह्मको ही आत्मा मानना ठीक है ।
मूल, वस्तु या चेतना ?
"मूल, भूत है चेतना ?' इस प्रश्नके उत्तरमें आधुनिक वैज्ञानिक एडिगटन
भी कहते हैं—'खोजते हुए अन्तमें जहाँ पहुँचा, वहाँ देखता हूँ, मनकी छाया-
मात्र है ।' वैज्ञानिक जोन्स गणितशास्त्रके पण्डित हैं । उनका कथन है—'अन्तमें
देखता हूँ, विज्ञानकी ही विजय है । विश्वका मूलाधार, ईश्वर एक अङ्कशास्त्रवित्
है और यह विश्व उसीके मस्तिष्कका एक अङ्कमात्र है ।' पूछा जा सकता है कि
एडिगटनका मानस और जोन्सका अङ्क क्या उनके मस्तिष्क और शरीरके ऊपर
निर्भर नहीं है ? क्या अपना मस्तिष्क और शरीर उनको अभौतिक या
अतिभौतिक मालूम होता है ? जोन्स, एडिंगटन आदिकी वर्णनशैलीमें
कुछ अन्तर है, उसपर आधुनिकताकी मामूली छाप है, लेकिन बात
पुरानी है—पिथागोरसका अङ्क, प्लेटोका आदर्श, उपनिषदोंका ब्रह्म—केवल
नयी पोशाकमे हमारे सामने आये हैं । वस्तुको लाँघकर उसके पीछे किसी
अवास्तव अलौकिककी प्रतिष्ठाकी चेष्टा हमको अस्वाभाविक नहीं प्रतीत होती ।
श्रेणीविभाजित समाजमें वास्तव-जीवन जब अनिश्चित और जटिल होता है, तब
एक अलौकिक और अन्तिम सत्यकी प्राप्तिसे वास्तव-पीडित मनको सान्त्वना
मिलती है । धर्मकी प्रयोजनीयताका समर्थन करते हुए बड़े-बड़े धार्मिक भी यही
युक्ति पेश करते हैं ।
'पर मनुष्यका शरीरसम्बन्धी ज्ञान जितना ही उन्नत होता गया, आत्माकी
धारणा भी उतनी ही सूक्ष्म होती आयी है और शरीर और आत्माका अविच्छेद्य
सम्बन्ध उन्हे दिखायी देने लगा है । शरीरके साथ ही आत्माका निधन होता है,
इस बातको मनुष्यने सभ्यताके प्राचीन युगमें ही मान लिया था । पश्चात् आत्माके
दो भाग किये गये—जीवात्मा और परमात्मा । जीवात्मा नश्वर है, लेकिन
परमात्मा अमर । देहातीत आत्मा या चैतन्य इस तरह जिंदा रहा । प्लेटो और
अरस्तू, रामानुज और शङ्कर, सभीने विदेही आत्माको इस प्रकार ईश्वर या
ब्रह्मके साथ जोड़ दिया । आत्माको 'विदेह' माननेके अतिरिक्त कोई मार्ग भी
नहीं रहा । असभ्य मनुष्यके निकट प्राकृतिक और अलौकिक दोनों ही प्रत्यक्ष
सत्य हैं, उनका विज्ञान प्रधानतः मन्त्र-तन्त्र है । सभ्यजगत्‌से विज्ञानकी उन्नति
रोकी नहीं जा सकती । विज्ञान अलौकिक शक्तिकी कोई परवा नहीं करता, बल्कि
सतत गवेषणाके जरिए अलौकिकके राज्यको क्रमशः संकीर्ण बना देता है ।

मार्क्स और ज्ञान ६७७
यही कारण है कि विज्ञानके प्रभावस्वरूप दर्शनकी आत्मा क्रमशः विशुद्ध होती
आयी है, यानी इसका प्रमाण प्रयोगके बाहर ले जाकर इन्द्रिय-बुद्धिसे परे रखा
गया है। इसी आत्माको सारे विश्वतत्त्वके मूलमें उन्होंने विराजमान देखा । शाङ्कर-
वेदान्तके अनुसार विश्वका मूलाधार ब्रह्म और आत्मा एक ही चीज है—‘तत्त्वमसि’ ।
“देखा गया है कि प्रत्येक युगमें देश और जातियोंकी सीमा अतिक्रमण कर
मनुष्यकी विचारधारा एक प्रकार रही है। प्रेत-तत्त्व, जादू-विद्या, अनेकेश्वरवाद,
एकेश्वरवाद इत्यादि मनुष्यकी चिन्ताधाराकी सीढ़ियाँ सभी देशोंमें एक ही
प्रकारकी रही हैं। यह भी सन्धान मिलता है कि यह तत्त्व-विचार जीवनकी
गतिके छन्दमें ही बदलता रहा है और सूक्ष्म भी होता आया है। हमारे असभ्य
पूर्व पुरुषोंका प्रेत-विश्वास ही सभ्य मनुष्योंके अध्यात्मवादके मूलमें है, इससे
हमारे सभ्यतागर्वी मनको चोट पहुँचती है, लेकिन इतिहास इसका
साक्षी है । प्रकृति-जगत्का इतिहास हमको यह दिखलाता है कि
चेतनाकी उत्पत्ति भी वस्तु जगत्में ही है । आदर्शवादी दार्शनिक कहता
है कि चेतना ही भूतका मूल है, लेकिन विज्ञानने यह भलीभाँति प्रमाणित किया
है कि चेतना सदासे नहीं रही । वस्तु-जगत्के इतिहासमें ऐसा भी समय था, जब
जीव-जगत्का अस्तित्व नहीं था । वस्तुनिरपेक्ष चेतना, रक्त-मांसविहीन अदृश्य—
ये धारणाएँ मनुष्यकी बुद्धिप्रसूत हैं। लेकिन मनुष्यसे भी पहले, जीव-जगत्के
अस्तित्वके पहले, चेतनाका अस्तित्व है, यह सम्भव नहीं । भूतसे ही चेतनाकी
उत्पत्ति है, इसलिये भूत ही पहले है । चेतना सभी प्रकार भूतके पश्चात् है ।
अध्यात्मवादी वस्तु और चेतनाके सम्पर्कको केवल बुद्धिद्वारा जाँचते हैं,
इतिहासकी ओर ध्यान नहीं देते ।
“आदिम मानवकी अपरिणत विज्ञानबुद्धिने वस्तुजगत्में मनुष्यकी ही
भावनाधारणाकी छाया देखी है । उसीने प्रेत, परमात्मा, देवता, ईश्वर-आदर्श
आदिका रूप लिया है। सदियो पहले चार्वाक और जेनोफेनीजने इसका अनुमान
किया था। शताब्दियोंकी वैज्ञानिक गवेषणासे प्रमाण मिलता है कि भूतसे ही
चेतनाकी उत्पत्ति हुई । चेतना भूतके ही विकासकी एक विशेष अवस्था है। इस
चेतनाका, चाहे यह मनुष्यकी हो चाहे किसी और प्राणीविशेषकी, भूत-जगत्से
अलाहिदा कहीं पता नहीं चलता । अध्यात्मवादी सूर्यविज्ञान, भूतत्त्व और
जीव-विज्ञानके प्रमाणित सिद्धान्तोंको मान भी लेते हैं, लेकिन साथ-ही-साथ कहेंगे
कि ‘अस्फुट चेतनाने तो सारे जगत्को छा रक्खा है, यह विश्व चेतनामय है।’
इस प्रकार भूतजगत्की एक विशेषवस्तु या गुणको वह इसके मूलमें बिठला देते
हैं, मनुष्यकी चेतनाको देश-कालातीत मानकर इसको भूतजगत्की चेतनाका
रूप दे देते हैं ।

६७८ मार्क्सवाद और रामराज्य
“अनुभव ही इस अध्यात्मवादी युक्तिका अन्तिम उत्तर है । शरीरविहीन
चेतनाका कोई अस्तित्व नहीं। बर्बरके प्रेतकी तरह मानव-कल्पनाका यह प्रतिबिम्ब है ।
मार्क्सवाद इसीलिये इतिहासके ऊपर जोर देता है। इस इतिहासका अर्थ राजाओंका
युद्ध नहीं । यह समग्र मानव-समाज और सारे विश्वका इतिहास है । इतिहास
ही चेतनाके ऐतिहासिक जन्मका प्रमाण है । यह चेतना देश और कालसे सीमित
है । अध्यात्मवादी क्या करते हैं, वे मनुष्यकी किसी एक मानसिक क्रियाको
मूल सत्य मानकर इसीको भूतजगत्के मूलमें पहुँचा देते हैं । कोई कहता है कि
भूतके मूलमें प्रज्ञा ( रीजन ) है, कोई कहता है इच्छाशक्ति ( विल ) है और कोई
कहता है प्राणशक्ति ( वाइटल एयर्स ) है । जहाँतक जान पडता है, जीवजगत्में
मनुष्यको ही केवल अमूर्त-भावनाकी क्षमता प्राप्त है । मानव-मस्तिष्क और
शरीरके सगठनकी विशिष्टतासे ही इस क्षमताकी उत्पत्ति है । असंख्य मनुष्योंकी
अभिज्ञतासे ही 'मनुष्य' नामकी साधारण संज्ञा बनती है । लेकिन इन असंख्य
मनुष्योंको छोड़कर इस साधारण सज्ञाका स्वतन्त्र अस्तित्व कहाँ रह जाता है ?
साधारण संज्ञा मनुष्यकी विचारक्रियाकी एक पद्धति है, यह मनुष्यके जीवनधारणके
काम आती है । अन्यान्य जीव बाहरी जगत्की प्रेरणाओको मिलाकर अमूर्त-
भावनाकी सृष्टि नहीं कर सकते और इसीलिये प्रकृतिके सामने उनकी अक्षमता
अधिक है । साधारण संज्ञाकी सृष्टिकी क्षमताने मनुष्यको प्रकृतिके रहस्यको समझनेमें
काफी सहायता पहुँचायी है, लेकिन यही क्षमता मनुष्यके मनमें भ्रान्तिकी सृष्टि कर
सकती है और करती है । साधारण संज्ञा वास्तवकी अभिज्ञतासे ही बनती है,
लेकिन मनुष्यका मन इसको वास्तवसे हटाकर इसके एक स्वतन्त्र अस्तित्वकी
सृष्टि कर सकता है, और करता है, इसीलिये मनुष्यकी विचारधाराको 'चेतना',
'प्रज्ञा' आदि अनेकों साधारण संज्ञाओमें परिवर्तित किया जा सकता है ।
आदर्शवादी यह भूलकर कि 'चेतना', 'प्रज्ञा' आदि साधारण संज्ञाएँ असंख्य
जीवोंकी विशेष अवस्थापर निर्भर हैं, इनको एक स्वतन्त्र शक्तिके रूपमें देखते हैं ।”
परंतु यह सारी कल्पना निरर्थक है । आयुर्वेद, योगशास्त्र तथा
आध्यात्मिक दृष्टिके आधारपर शरीरसम्बन्धी ज्ञान लाखों वर्षोंका पुराना
है । उपनिषदोने लाखो वर्ष पहले घोषित कर दिया है—'अविनाशी वा
अरे अयमात्मा' । ( बृहदा० ) यह आत्मा अविनाशी है । शरीरके विनाशसे
आत्माका भी विनाश होता है' यह भ्रम पहले भी लोगोको था ।
श्रुतिने भी कहा—"एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति ( बृहदा० २।४।
१२) ।" अर्थात् शरीरादि संघातरूपमें परिणत भूतोंसे समुत्थित होकर उनके विनाशके
पश्चात् ही विनष्ट हो जाता है, अर्थात् देहादिका नाश होते ही उसके साथ तादात्म्या-
भिमानमूलक जो औपाधिकरूप है, वह नष्ट हो जाता है । जैसे विशिष्ट तेज

मार्क्स और ज्ञान ६७९
आदिके कारण सामुद्रिक जलमें लवण-कणका रूप बनता है, उपाधिके वियुक्त
होनेपर वह औपाधिकरूप नष्ट हो जाता है। परंतु जैसे लवण कण नष्ट होनेपर
भी सिन्धुजल नहीं मिटता, वैसे ही देहादि उपाधिमूलक औपाधिकरूप नष्ट होनेपर
भी वास्तविक अनौपाधिकरूप बना ही रहता है। जैसे महाकाशका अंश ही घटा-
काश होता है, वैसे ही परमात्माका अंश ही क्षेत्रज्ञ आत्मा है। जीवात्माके औपाधिक
रूपके नश्वर होनेपर भी उसका वास्तविकरूप कभी नश्वर नहीं है।
प्रेतात्माकी कल्पना न केवल शास्त्रीय ही है, अपितु उसके प्रत्यक्ष चमत्कार
आज भी उपलब्ध होते हैं। प्रेत-विद्याके आधारपर ही अन्य लोगोंको अविज्ञात
गुप्त-से-गुप्त रहस्योंका ज्ञान परलोकविद्यावाले बतलाते हैं। अनेक स्थानोंमें
सबके सामने किसी गृह-प्राङ्गणमें ईंट, पत्थर एवं अपवित्र वस्तुओंकी
वर्षा होना, घरकी वस्तुओं, वस्त्रों आदिका देखते-देखते लुप्त होना आदि
घटनाएँ ऐसी हैं कि पुलिसकी छान-बीन भी वहाँ व्यर्थ होती है, केवल साहस-
मात्रसे ऐसी वस्तुओंका अपलाप नहीं किया जा सकता। युक्तिकी दृष्टिसे भी
उत्कट कामनायुक्त मनःप्रधान सूक्ष्म शरीरविशिष्ट प्राणी अपने प्राक्तन कर्मोंके
अनुसार अन्य योनियोंके समान ही प्रेतयोनिमें भी प्राप्त होता है। कर्मोंके उत्कर्ष-
अपकर्षके अनुसार ही उनमें भी ऐश्वर्यका तारतम्य होता है।
आस्तिक प्रत्यक्षानुमानके अतिरिक्त आगम-प्रमाण भी मानते हैं। तदनुसार
पूजा-पाठ, मन्त्र-तन्त्र—सभीका अस्तित्व है। ईश्वर न माननेवाले मीमांसकों एवं
सांख्योंने भी मन्त्रोंका महत्त्व माना है। निरीश्वरवादी बौद्धो एवं जैनियोंमें भी मन्त्रों-
का अस्तित्व मान्य है। सबके ही यहाँ प्रणवादि मन्त्रका जप चलता है। आजके
वैज्ञानिक युगमें भी अधिकांश मनुष्य मन्त्रोंमें विश्वास रखते हैं। जैसे तृण, वीरुध,
ओषधियोंमें भिन्न विचित्र गुण होते हैं, उनके परस्पर संश्लेष-विश्लेषसे उन गुणोंमें
ह्रास-विकास एव उद्गम-अभिभव होता रहता है, वैसे ही मन्त्रोंसे भी। अगणित
ओषधियों .एव उनके अगणित संश्लेष-विश्लेषोंसे उद्भूत एवं अभिभूत होनेवाले
गुणोंको केवल अन्वय-व्यतिरेकसे नहीं समझा जा सकता। अन्वयव्यतिरेकसे एक
संखियाका ही गुण, रस, स्वाद आदि लाखों प्राणियोंके भी बलिदानसे लाखों
वर्षोंमें भी जान सकना असम्भव है। अतएव महातपा महर्षियोंने योगज प्रत्यक्ष-
से ही सब वस्तुओंके गुण जाने हैं। इसी तरह वर्णोंके भी विचित्र संश्लेष-
विश्लेषमें भी विलक्षण प्रकारकी शक्तियाँ निहित होती हैं। वर्णविन्यासोंके चमत्कार
लोकमें भी प्रत्यक्ष हैं ही। राजा-जारा, नदी-दीन, कपि-पिक आदि वर्णोंके व्यत्यास-
मात्रसे अर्थ और प्रभावमें कितना भेद होता है ? कोई वर्णविन्यासज्ञ पाँच
मिनटके लिये सुप्रीमकोर्टमें खडा होकर वर्णविन्यासकी महिमासे दूसरोंका और
अपना महान् लाभ कर लेता है। कोई अननुरूप वर्णविन्यासके कारण कलहका

६८० मार्क्सवाद और रामराज्य
कारण बन अपना और दूसरोका नुकसान कर लेता है । इसीलिये योगियों,
तार्किकों एवं नैयायिकोने भी मन्त्रशक्ति मानी है । कोई भी विधिपूर्वक मन्त्रानुष्ठान
करके आज भी मन्त्रका महत्त्व अनुभव कर सकता है । कुछ वैज्ञानिक भी अलौकिक
शक्ति मानने लगे हैं । दर्शन वैज्ञानिकोंके विज्ञानकी परवा न करके ही अपने सत्य
सिद्धान्तको वैज्ञानिको एव विज्ञानकी उत्पत्तिके पहलेहीसे बतला रहा है । लाखो
वर्ष पहलेसे ही, जब आधुनिक वैज्ञानिक गर्भमें भी नहीं आयेथे, उपनिषदें आत्मा-
को मनोवचनातीत कहती आ रही हैं। वह इसलिये कि आन्तर वस्तुसे बाह्य
वस्तुका ग्रहण होता है, बाह्यसे आन्तरका नहीं। बाह्य प्रकाशका परिज्ञान नेत्रसे
होता है, परतु सूक्ष्म नेत्र-इन्द्रियका बोध बाह्य प्रकाशसे नहीं होता । इन्द्रियोका
व्यापार मनसे विदित होता है, परंतु इन्द्रियोसे मनका व्यापार विदित नहीं होता ।
मन, बुद्धि आदिका बोध सर्वभासक साक्षीसे होता है, परतु स्वप्रकाश साक्षीका
मन आदिके द्वारा बोध नहीं होता । इसी तरह जाति, गुण, क्रिया, सम्बन्धसे
रहित होनेके कारण शब्दकी अभिधावृत्तिका गोचर अद्वितीय ब्रह्म नहीं होता ।
वराक (वेचारे ) विज्ञानके भयसे दार्शनिकोने ब्रह्मको मनोवचनातीत नहीबनाया है ।
आत्मा एवं भूत
मार्क्सवादी 'आत्माकी अपेक्षा प्रकृति या भूतको ही मूल मानते
हैं । भौतिक चिन्त्य वस्तुसे भिन्न चिन्तन या विचार पृथक् नहीं किया जा सकता
है । चेतना या विचार चाहे कितने ही सूक्ष्म क्यो न प्रतीत हों, परंतु हैं वे मस्तिष्क-
की उपज ही । मस्तिष्क एक भौतिक दैहिक इन्द्रिय ही है । यह भौतिक जगत्‌का
सर्वश्रेष्ठ इन्द्रिय है । मार्क्सके शब्दोमें 'पदार्थ मनसे उत्पन्न नही हुआ, किंतु
मन पदार्थकी सर्वोत्कृष्ट सृष्टि है ।' लेनिनने कहा है कि 'सृष्टि-ज्ञानका
अर्थ है—पदार्थकी गति और उसकी चिन्तनशीलताका ज्ञान ।' इस तरह
भौतिक पदार्थ या प्रकृति ही मूल है । विचार या चेतना उसका
प्रतिबिम्ब है। व्यक्तिके विचार उसकी सामाजिक सत्ता या परिस्थितिसे स्वतन्त्र नहीं होते।
कहा जाता है कि 'एक दार्शनिक अपने युगका कीचड़ अपने पैरोके साथ लिये
जाता है । उसके दर्शनपर उसके समाजकी छाप अवश्य ही रहती है ।' लास्कीके
शब्दोमें 'जो जैसा रहता है, वैसा ही सोचता है ।' एमिल वर्नसके शब्दोमें 'वस्तु
अर्थात् वह वास्तविकता, जो अचेतन है, पहले थी । मन जो सचेतन है, बादमें
आया । वस्तु अर्थात् बाह्य पदार्थ मनसे स्वतन्त्र है ।'
यद्यपि पाश्चात्य आदर्शवादी दार्शनिकोने मनस् या सर्वमनस् तत्त्वको ही मूल
माना है । उसीसे अचेतनकी उत्पत्ति माना है । काट, फिक्टे, हीगेल आदि इसी
विचारके हैं । अद्वैतवादी वेदान्ती भी एक हदतक कहते हैं कि सम्पूर्ण विश्वप्रपञ्च
मनका विस्तार है । यह द्वैत मनोमात्र ही है—'मनोमात्रमिदं द्वैतम् ।' मनके

अमनी भाव होनेपर द्वैत कुछ भी नहीं रह जाता- 'मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते'
(माण्डूक्यकारिका ३। ३१) बौद्धोका क्षणिक विज्ञान ही बाह्य अर्थके आकारसे परिणत
होता है । यह भी इन्हीं मतोसे मिलता-जुलता मत है । तथापि क्षणिक विज्ञान या
व्यावहारिक स्थायी मन या अन्तःकरण तथा उसकी इच्छा-द्वेष, सुख-दुःख आदि सब
विकृतियोकी स्थिति, गति, अपचिति ( लय ) जिस नित्य अखण्ड बोधसे भासित
होती हैं, वह अनन्त सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन ब्रह्मात्मा ही वेदान्तमतमें सर्वमूल
है । मन भी उसी अखण्ड बोधका विवर्त्त है । अन्वय-व्यतिरेकसे जैसे मृत्तिकाके
होनेपर ही मृद्विकार घटादि उपलब्ध होते हैं, मृत्तिकाके बिना वे उपलब्ध नहीं
होते, जैसे जलके रहनेपर ही तरङ्गादि प्रतीत होते हैं, जलके बिना वे प्रतीत नहीं
होते, वैसे ही मनके होनेपर ही बाह्य एव आभ्यन्तर भौतिक दृश्यमात्र प्रतीत
होते हैं, मनके बिना कुछ भी भासित नहीं होते हैं । इसी प्रकार सर्वान्तर्द्रष्टाका
अस्तित्व ही सम्पूर्ण दृश्यके अस्तित्वका मूल है । अखण्ड बोधके बिना तो मन,
अन्तःकरण या विज्ञान भी भासित नहीं होते । अतएव मूल पदार्थ अखण्ड
बोध सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है । मनसे भिन्न मस्तिष्क भी कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं
है । मनको श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि दस बाह्य इन्द्रियोसे भिन्न ग्यारहवी आन्तर
इन्द्रिय माननेमें भी कोई आपत्ति नहीं है। उसी मनमें बुद्धि, चित्त, मन, अहङ्कार-
ये चार भेद होते हैं। उसमें इच्छा, द्वेष, सुख-दुःखादि गुण व्यक्त हुआ करते हैं।
भले ही मस्तिष्कके तन्तुविशेषोके निघर्षसे इसकी व्यञ्जना होती हो, परंतु यह
मस्तिष्क एव उसके तन्तु या तन्तुका निघर्षमात्र नहीं है। जैसे ठंडे और गरम
दो तार या दो तारोका सघर्ष ही विद्युत् नहीं है, किंतु उनसे व्यक्त होनेवाली
विद्युत् उनसे भिन्न स्वतन्त्र वस्तु है, वैसे ही मन इन मस्तिष्क, तन्तु एव उनके
निघर्षसे भिन्न वस्तु है । शुद्ध स्फुरण, अखण्ड बोध तो विचारोसे भी भिन्न
स्वतन्त्र वस्तु है ।
मार्क्सवादी कहते हैं कि "विचारोका जन्म बाह्यजगत्से ही होता है। फिर
भी सभी विचार सत्य नहीं होते । वास्तविकताका ठोस अनुभव ही बतलाता है कि
विचार सही है या नहीं । विचार करनेपर यह भी असङ्गत ही प्रतीत होता है।
फिर भी वास्तविकताके जिस ठोस अनुभवसे ही विचारकी सत्यताका निश्चय होता
है, वह अनुभव क्या है ? क्या वह भी जड, बाह्य वस्तु है ? अतः हर दृष्टिसे यह
मानना पड़ेगा कि विचार हो या अनुभव, ठोस हो या पोला, किसी भी वस्तु-
का अस्तित्व निर्दोष अनुभव या विचारके बिना सिद्ध नहीं होता ।” इससे इतना
ही कहा जा सकता है कि पूर्वानुभवका बाधक अनुभवान्तर होनेसे पूर्वानुभवको
भ्रम समझा जाता है । बाधक अनुभव न होनेसे पूर्वानुभवको स्वतः ही सत्य माना
जाता है । सर्वथा अपि अनुभवके बिना बाह्य पदार्थकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होती
है। साधारण विचार, साहित्य आदिपर अवश्य समाजकी छाप होती है । उसमें

६८२ मार्क्सवाद और रामराज्य
भी उच्च श्रेणीके विचारको, लेखकोंके ग्रन्थोंमें उच्च सामाजिक स्थितियोका अङ्कन
होता है। निम्न विचारके ग्रन्थोपर निम्नश्रेणीका ही प्रभाव अङ्कित होता है। इसी
अंशमें लास्कीका कथन सङ्गत है । परंतु प्रामाणिक दर्शनके लिये तो देश, काल,
परिस्थितियोके आवरणोको भेदन करनेसे ही तत्त्वानुभूति होती है। बिना रंगीन चश्मा
उतारे वस्तुका वास्तविक रूप-ज्ञान सर्वथा ही दुर्घट होता है।
देहके समान ही इन्द्रियाँ भी आत्मा नहीं हैं । यदि सम्मिलित होकर
इन्द्रियाँ आत्मा है तब तो एक इन्द्रिय नष्ट होनेपर आत्मनाश-प्रसङ्ग होगा,
क्योंकि एकके नष्ट होनेपर भी समस्तता विनष्ट हो गयी । यदि प्रत्येक इन्द्रियाँ
आत्मा हैं, तो परस्पर विरुद्ध दिक्क्रिया होनेसे शरीर ही उन्मथित हो जायगा ।
‘योऽहं चक्षुषा घटमद्राक्षं सोऽहं घटं त्वचा स्पृशामि’ जिस मैने चक्षुसे घट
देखा था, वही मैं त्वक्से घटका स्पर्श करता हूँ' इस अनुभवसे स्पष्ट प्रतीत
होता है कि नेत्र, श्रोत्र, त्वक्से काम लेनेवाला आत्मा इनसे भिन्न है ।
चक्षु यदि आत्मा है, तो वह स्पर्शका कर्त्ता क्यों नहीं हो सकता । त्वक् आत्मा है
तो वह दर्शन-क्रियाका कर्त्ता क्यों नहीं हो सकता ? अतः यहाँ कोई इन्द्रियोसे भिन्न
ही आत्मा है जो कि दर्शन, घ्राण, स्पर्श, श्रवण आदि सभी क्रियाओंका कर्त्ता है,
उसी एक आत्माकी विभिन्न क्रियाओके कर्त्तारूपसे प्रसिद्धि है ।
क्षणिक विज्ञान भी आत्मा नहीं; क्योकि अनुभव एवं स्मृतिका एक ही
कर्ता होता है । अन्यद्वारा अनुभूतका अन्य स्मरण नही करता । मैंने उसे
देखा था और मै इसे देख रहा हूँ । इस तरह अनेक काल-सम्बन्धी आत्मा
क्षणिक नहीं हो सकता है । पूर्वोत्तरदर्शी एक प्रत्ययी न हो तो स्मृति नही
हो सकती है । ‘सोऽहं’ यह प्रत्यभिज्ञा भी स्थायी आत्माके बिना नही बन सकती ।
यदि स्मरण एवं अनुभवके कर्ता भिन्न हों तो मैने देखा, अन्यने स्मरण किया,
यह व्यवहार होना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि सादृश्यके कारण एकताकी
प्रतीति होती है । जैसे नदी-प्रवाह, दीप, केश आदिमें तत्सदृश होनेसे
‘त एवेमे केशाः, सैवेयं दीपकलिका’ वे ही ये बाल हैं, वही यह दीपशिखा है—
यह प्रत्यभिज्ञा होती है, परंतु यह भी ठीक नहीं है । ‘तेनेदं सदृशम्’ यह उसके
सदृश है, इस प्रकार सादृश्यग्रहणके लिये भी तो पूर्वकालवर्ती तत्का,
वर्तमानकालवर्ती इदंका तथा तदुत्तरवर्ती सादृश्यका ग्राहक एक स्थायी आत्मा
हो तभी सादृश्यबोध भी हो सकता है ।
कुछ लोग कहते हैं कि सादृश्यप्रत्यय भी स्वतन्त्र ही है, परंतु यह भी
ठीक नहीं; क्योकि ऐसी स्थितिमें ‘तेनेदं सदृशम्’ इत्यादि प्रतीति न होनी
चाहिये । बाह्य विषयमें भले ही कभी सादृश्यमूलक-एकत्वका भ्रम भी हो
तथापि उपलब्धि या .अनुभवितामें तो संदेह ही नही होता । मैं वही हूँ या
तत्सदृश अन्य हूँ, किंतु यहाँ तो स्पष्ट ही निश्चित प्रत्यभिज्ञान होता है,
जो मैंने कल देखा था, वही मै आज स्मरण कर रहा हूँ।

एकादश परिच्छेद
मार्क्स और आत्मा
शास्त्र-संस्कारवर्जित जनसाधारण तथा भूतसंघातवादी चार्वाक और
आधुनिक मार्क्सवादी जीवित देहको ही आत्मा कहते हैं, क्योंकि 'मनुष्योऽहं
जानामि' मैं मनुष्य हूँ, जानता हूँ, इस रूपसे ही शरीर ही 'अहं' प्रत्ययका
आलम्बन और ज्ञानके आश्रयरूपसे आत्मा प्रतीत होता है । दूसरे लोग इन्द्रियोंको
ही आत्मा कहते हैं । उनके मतसे चक्षु, श्रोत्रादि इन्द्रियोंके बिना रूपादि-ज्ञान नहीं
होता, अतः वे ही आत्मा हैं ।' अन्य लोग 'स्वप्नमें चक्षुरादि न होनेपर भी ज्ञान
होता है, अतः 'अहं' प्रत्यय और विज्ञानका आश्रय होनेसे मनको ही आत्मा
मानते हैं ।' विज्ञानवादी क्षणिक विज्ञानको और माध्यमिक शून्यको ही आत्मा
कहता है । यहाँ जीवित देहको ही आत्मा माननेवाले मार्क्सवादियोंसे प्रश्न हो
सकता है कि क्या भोक्तृत्व और चैतन्य व्यस्त ( अर्थात् प्रत्येक ) भूतोंका
धर्म है अथवा समस्त ( सम्मिलित ) भूतोंका ? पहले पक्षमें भी क्या सभी
भूत समानकालमें ही भोक्ता हैं ? यदि हाँ, तो स्वार्थके लिये प्रवृत्त सभी चैतन्य
गुणयुक्त भूतोंका परस्पर अङ्गाङ्गिभाव नहीं हो सकेगा, अङ्गाङ्गिभाव बिना
बने संघात नहीं बन सकता । लोकमें देखते ही हैं कि मुञ्ज आदि तृणोंका
अङ्गाङ्गी भाव होनेसे रज्जुरूप संघात निष्पन्न होता है । यदि संघातके बिना
ही पृथक्-पृथक् भूतोंका स्वतन्त्र भोक्तृत्व मान लिया जाय तो देहसे बाहर भी
एक-एक भूतमें भी भोक्ताकी उपलब्धि होनी चाहिये जो कि अदृष्ट ही
है । यदि व्यस्त भूतोंका समानकालमें ही भोक्तृत्व न होकर क्रमेण भोक्तृत्व
हो तो भी संघातकी अनिष्पत्ति बनी ही रहेगी । यदि वर-विवाहादि न्यायसे
जैसे प्रतिविवाहमें एक-एक पुरुष प्रधान और अन्य वरयात्रिक अप्रधान होते
हैं, उसी तरह एक-एक भोगमें एक-एक भूत प्रधान होगा । दूसरे उसके गुण
भूत होंगे, परन्तु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि जैसे एक-एक वरके लिये
असाधारणरूपसे एक-एक कन्या भोग्य वस्तु है, वैसे ही भोग करनेवाले पृथिवी,
जल, तेज, वायुके लिये एक-एक गन्ध, रस, रूप, स्पर्शादि भोग्यवस्तु व्यवस्थित
नहीं हैं, अतएव पृथिवीमें रूप-रसादिकी भी उपलब्धि होती है । यदि किसी
तरह व्यवस्था मान भी ली जाय कि तेजका रूप ही, वायुका स्पर्श ही, जलका
रस ही भोग्य है तो भी एक कालमें शब्द-स्पर्शादि सभी विषयोंका सन्निधान
होनेपर भोगमें क्रम अर्थात् ( अयौगपद्य ) उपपन्न नहीं हो सकेगा ।
जैसे एक ही मुहूर्तमें प्रत्येक भोग्य कन्याके उपस्थित होनेपर वरोंका क्रम

६८४ मार्क्सवाद और रामराज्य
विवाह और गुण-प्रधानभावेन सघात नही बन सकता, अर्थात् भोग्यकी
उपस्थितिमे भोक्ता क्रमकी अपेक्षा न करके ही भोगमें प्रवृत्त होगा ।
उसी तरह प्रत्येक भोक्ता भूत, भोग्य शब्दादिके उपस्थित होनेपर क्रमकी अपेक्षा
न करके ही भोगमें संलग्न होगा । अतः इनका भी अङ्गाङ्गी-भावरूपसे
संघात नहीं बन सकेगा ।
इसी तरह समस्त ( सम्मिलित ) भूतोका भी भोक्तृत्व नही बन
सकता; क्योंकि यदि प्रत्येक भूतोमें चैतन्य नहीं है तो वह संघातमें भी
नहीं हो सकता । अतएव सघातमें भी भोक्तृत्व नही बन सकता । यदि
कहा जाय कि अग्निमें डाले हुए एक-एक तिल ज्वालाके जनक न होनेपर
भी तिलसमूह ज्वालाका जनक होता है, उसी तरह भूतोंका समूह भी चैतन्यका जनक
होगा, परतु यह कहना ठीक नही; क्योकि संघातकी उत्पत्तिमे कोई स्पष्ट हेतु
नही दिखायी देता । कारण, मार्क्सवादीके मतमें संघातात्मक शरीरसे भिन्न
कोई चेतन पदार्थ है ही नहीं, जो कि प्रत्येक अचेतन भूतका चेतनात्मक
संघात उत्पन्न कर सके । यदि भावी भोगको ही संघातका कारण कहा जाय
तो वह भी ठीक नहीं, कारण यदि भोगको अप्रधान माना जाय तो परस्पर
गुणप्रधानभावशून्य भूतोंका संघात कैसे बनेगा ? अर्थात् गुणभूत भोगके
द्वारा प्रधानभूत भूतोका संघात सम्पादन असङ्गत है । यदि भोगको ही
प्रधान माना जाय तो यह भी ठीक नही; क्योंकि भोग सर्वथा ही भोक्ताका
शेष ( अङ्ग ) हुआ करता है । कहा जा सकता है कि शेषी (अङ्गी) अर्थात्
प्रधानभूत भोगके प्रति शेषभूत ( अर्थात् अङ्गभूत ) स्त्री-पुरुष शरीर
भोक्ताओका संहत ( सम्मिलित ) होना देखा गया है । पर यह भी ठीक
नहीं; क्योंकि सिद्धान्तमे वहाँ भी स्त्री-पुरुष शरीरोमे भोक्तृत्व सम्प्रतिपन्न
नहीं, किंतु वहाँ शरीर-भिन्न दोनोंके भोक्ता आत्मा ही भोगके लिये दोनों
शरीरोंको सम्मिलित करते हैं । और ज्वालाके प्रति तिलोंकी संघातापत्तिका
दृष्टान्त भी जडवादीके मतमें असिद्ध है; क्योकि उसके मतमें संघात नामकी
कोई चीज सिद्ध नही होती । वादी-प्रतिवादी उभयसम्मत होनेसे ही कोई
दृष्टान्त किसी सिद्धान्तका साधक हो सकता है ।
संघात क्या है ? यह भी विचारणीय है । 'जैसे अनेक वृक्षोका एक देशमें
आना ही उनका सघातभूत 'वन' कहा जाता है, वैसे ही भोग और भोक्ताका
समानाधिकरणत्व अर्थात् एक देशस्थता सघात है,' यह नहीं कहा जा सकता;
क्योंकि इस तरह तो सर्वव्यापी सभी भूत सर्वत्र हैं । अतएव चैतन्य और
भोग भी सार्वत्रिक ठहरेगा तथा शरीरमे ही भोगका नियम बाधित होगा ।
'उन भूतोंसे आरब्ध अवयवी सघात है', यह भी नही कहा जा सकता; क्योंकि
यदि वह अवयवी चार भूतोंसे भिन्न है, तो उसे पाँचवाँ तत्त्व मानना होगा,

जो भौतिकवादियोंको अस्वीकृत ही है । यदि अवयवी अवयवोंसे अभिन्न है
तब तो भूतमात्र ही होगा। भेद एव अभेद दोनोंका होना असङ्गत ही है ।
यदि कहा जाय कि अवयवी अवयवोंके परतन्त्र है, अतः पञ्चमतत्त्वापत्ति नहीं
होगी, तो यह भी ठीक नहीं, कारण, इस तरह जल आदि भी पृथ्वी आदिके
परतन्त्र होनेसे जलादिमे भी स्वतन्त्र तत्त्वका व्यवहार होता है । फिर तो
पृथिव्यादि भूतचतुष्टय तत्त्व हैं, यह सिद्धान्त बाधित हो गया । कुछ लोग कहते
हैं कि 'एकद्रव्य-बुद्धिका अवलम्बन योग्य होना ही सङ्घात है । देहमें एकबुद्धि-
अवलम्बन-योग्यता है ही', परंतु यह भी ठीक नहीं, क्योंकि वस्तुतः अनेकोंमें
एकत्वबुद्धि विभ्रम ही है । 'एकार्थक्रियामे युगपत् (एक कालमे ) अन्वय ही सङ्घात
है, जैसे प्रमातृत्व आदि व्यवहाररूप एक कार्यके लिये पृथिव्यादि चारों भूतोंका
अन्वय होता है।' पर यह भी ठीक नहीं, कारण, ऐसा माननेपर वायुजन्य वेणुसङ्घर्ष-
जनित काष्ठाश्रित वह्निसे संतप्त जलमें चारों भूतोंका समन्वय है ही, फिर उस
जलमें भोक्तृत्व होना चाहिये । परंतु यह है नहीं। जो कहा जाता है कि 'जैसे
अग्निका लोह-पिण्डके साथ सम्बन्ध होता है, वैसे सम्बन्धको ही संघात कहा
जाता है', वह भी ठीक नहीं । कारण, शरीरमें वायुका सम्बन्ध उस प्रकारका न
होनेसे शरीरमे भोक्तृत्व नहीं बन सकेगा । इसके अतिरिक्त वह्निव्याप्त लोहपिण्डमें
उसके ही द्वारा उसमे जल शुष्क होता है और वायुका भी उसमें सम्पर्क
रहता है। अतः उस लोहपिण्डमें ही भोक्तृत्व एव चैतन्यका उपलब्ध होना
चाहिये । यदि इन सब दोषोंके परिहारके लिये एक-एक भूतको भोक्ता माना
जाय तो यह भी ठीक नहीं; क्योकि सब भूतोंका शब्दादि विषय-संनिधान होनेपर फिर
किसका भोग या चैतन्य है ? इसका निश्चय असम्भव होगा । अतः चारोंको
भोक्ता मानना पडेगा । और उनका संघात बन नहीं सकता, अतः संघात-
भावापन्न भूतोको भोक्ता या चेतन माननेका पक्ष युक्तिहीन है ।
कहा जाता है कि 'शक्तिमद्द्रव्यान्तरकी कल्पनाकी अपेक्षा उन गोलकोंमें
शक्तिमात्रकी कल्पनामें लाघव है', परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि फिर
तो आत्मामें ही क्रमयुक्त सर्वविज्ञानसामर्थ्य माननेमें अत्यन्त लाघव है ।
कुछ लोग 'रूपादिकी उपलब्धि करणपूर्वक होनी चाहिये, कर्ताका व्यापार
होनेसे छिदि क्रियाके तुल्य, अर्थात् जैसे कर्ता कुठारादि करणके द्वारा काष्ठछेदन
करता है, उसी तरह आत्मा चक्षुरादि करणोंके द्वारा रूपादिकी उपलब्धि
करता है', इस अनुमानसे देहभिन्न इन्द्रियाँ सिद्ध करते हैं। और यह भी
कहा जाता है कि 'वे इन्द्रियाँ भौतिक हैं। चक्षु तैजस है, क्योकि तैजसरूपका
ही ग्राहक है । श्रोत्र आकाशीय है, क्योंकि आकाशीय शब्दका ग्राहक है ।
मन शब्द-स्पर्शादि सभीका व्यञ्जक है, अतः वह पञ्चभूतोंका ही कार्य है । इस
तरह इन्द्रियाँ भी भोक्ता नहीं हो सकतीं ।'