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सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 866 में से

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पृष्ठ 442

एकादश परिच्छेद
मार्क्स और आत्मा
शास्त्र-संस्कारवर्जित जनसाधारण तथा भूतसंघातवादी चार्वाक और
आधुनिक मार्क्सवादी जीवित देहको ही आत्मा कहते हैं, क्योंकि 'मनुष्योऽहं
जानामि' मैं मनुष्य हूँ, जानता हूँ, इस रूपसे ही शरीर ही 'अहं' प्रत्ययका
आलम्बन और ज्ञानके आश्रयरूपसे आत्मा प्रतीत होता है । दूसरे लोग इन्द्रियोंको
ही आत्मा कहते हैं । उनके मतसे चक्षु, श्रोत्रादि इन्द्रियोंके बिना रूपादि-ज्ञान नहीं
होता, अतः वे ही आत्मा हैं ।' अन्य लोग 'स्वप्नमें चक्षुरादि न होनेपर भी ज्ञान
होता है, अतः 'अहं' प्रत्यय और विज्ञानका आश्रय होनेसे मनको ही आत्मा
मानते हैं ।' विज्ञानवादी क्षणिक विज्ञानको और माध्यमिक शून्यको ही आत्मा
कहता है । यहाँ जीवित देहको ही आत्मा माननेवाले मार्क्सवादियोंसे प्रश्न हो
सकता है कि क्या भोक्तृत्व और चैतन्य व्यस्त ( अर्थात् प्रत्येक ) भूतोंका
धर्म है अथवा समस्त ( सम्मिलित ) भूतोंका ? पहले पक्षमें भी क्या सभी
भूत समानकालमें ही भोक्ता हैं ? यदि हाँ, तो स्वार्थके लिये प्रवृत्त सभी चैतन्य
गुणयुक्त भूतोंका परस्पर अङ्गाङ्गिभाव नहीं हो सकेगा, अङ्गाङ्गिभाव बिना
बने संघात नहीं बन सकता । लोकमें देखते ही हैं कि मुञ्ज आदि तृणोंका
अङ्गाङ्गी भाव होनेसे रज्जुरूप संघात निष्पन्न होता है । यदि संघातके बिना
ही पृथक्-पृथक् भूतोंका स्वतन्त्र भोक्तृत्व मान लिया जाय तो देहसे बाहर भी
एक-एक भूतमें भी भोक्ताकी उपलब्धि होनी चाहिये जो कि अदृष्ट ही
है । यदि व्यस्त भूतोंका समानकालमें ही भोक्तृत्व न होकर क्रमेण भोक्तृत्व
हो तो भी संघातकी अनिष्पत्ति बनी ही रहेगी । यदि वर-विवाहादि न्यायसे
जैसे प्रतिविवाहमें एक-एक पुरुष प्रधान और अन्य वरयात्रिक अप्रधान होते
हैं, उसी तरह एक-एक भोगमें एक-एक भूत प्रधान होगा । दूसरे उसके गुण
भूत होंगे, परन्तु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि जैसे एक-एक वरके लिये
असाधारणरूपसे एक-एक कन्या भोग्य वस्तु है, वैसे ही भोग करनेवाले पृथिवी,
जल, तेज, वायुके लिये एक-एक गन्ध, रस, रूप, स्पर्शादि भोग्यवस्तु व्यवस्थित
नहीं हैं, अतएव पृथिवीमें रूप-रसादिकी भी उपलब्धि होती है । यदि किसी
तरह व्यवस्था मान भी ली जाय कि तेजका रूप ही, वायुका स्पर्श ही, जलका
रस ही भोग्य है तो भी एक कालमें शब्द-स्पर्शादि सभी विषयोंका सन्निधान
होनेपर भोगमें क्रम अर्थात् ( अयौगपद्य ) उपपन्न नहीं हो सकेगा ।
जैसे एक ही मुहूर्तमें प्रत्येक भोग्य कन्याके उपस्थित होनेपर वरोंका क्रम