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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 866 में से

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पृष्ठ 432

रहना आवश्यक नहीं, जैसे कभी भी काकके रहनेसे काकोपलक्षित गृहका बोध
होता है, उसी तरह कभी भी होनेवाली इच्छासे इष्टत्वोपलक्षित आनन्दका
बोध हो सकता है ।
यहाँ शङ्का होती है कि 'निरुपाधि-इष्टत्व आनन्दमें स्वाभाविक है या
औपाधिक ?' अन्तिम पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि ब्रह्मस्वरूपमें आनन्दरूपता
औपाधिक नहीं होगी, क्योंकि उसकी इष्टता तो निरुपाधिक ही है । प्रथम पक्ष
भी ठीक नहीं है, क्योंकि इसमें भी विकल्प यह है कि वह निरुपाधि इष्टत्व-
ज्ञानसे भिन्न है या अभिन्न ? यदि पहला पक्ष कहे, तो उसमे सखण्डत्वापत्ति
होगी । यदि ज्ञानसे अभिन्न ही है, तब तो उसमें आनन्द-पदप्रयोग व्यर्थ ही है,
परंतु यह भी कहना ठीक नहीं; क्योंकि ज्ञान और आनन्द दोनोंका यद्यपि अभेद ही
है, तथापि कल्पित भेद लेकर ज्ञानत्व-आनन्दत्व जातिभेदको लेकर दोनों शब्दों-
की प्रवृत्ति होती है । एतावता 'विषयोल्लेखरहित ज्ञान आनन्द है', यह पक्ष भी
निर्दोष ही है । ज्ञान विषयोल्लेखरहित भी होता ही है', यह पीछे सिद्ध किया जा
चुका है । जगत् दृश्यरूप होनेसे सत् नहीं कहा जा सकता, किंतु दृक्रूप होनेसे
आनन्द सद्रूप भी है ।
सुख एवं वेदनका भेद न होनेसे परप्रेमास्पदरूपसे भासमान आत्मा ही
आनन्दरूप है । जैसे वृत्तिरूप ज्ञान अनित्य होनेपर भी वृत्तिभासक स्फुरणरूप
ज्ञान नित्य है, वैसे ही अन्तःकरणवृत्तिरूप सुख भी अनित्य है; परंतु ब्रह्मात्मस्वरूप
सुख नित्य ही है । 'मैं कभी न रहूँ' ऐसा न हो, किंतु सर्वदा बना रहूँ' 'मा न
भूवम् किंतु सर्वदा भूयासम्' इस प्रकार आत्मामें स्वाभाविक ही प्रेम देखा
जाता है । यदि आत्मा सुखरूप न हो, तो वह प्रेमास्पद नहीं हो सकता । यदि
प्राणी अनित्य सुखमें भी प्रेम करता है, तो नित्य सुखमें तो परप्रेम होना ही
चाहिये । सुखमें ही प्रेम होता है । सुखसाधनोंमें भी यद्यपि प्रेम होता है, तथापि
सुखके प्रयोजनसे ही सुखसाधनोंमें प्रेम होता है । सुखसाधनोंमें प्रेम सुखार्थ ही
होता है, परंतु सुखमें प्रेम अन्यार्थ नही होता । इसी तरह आत्मामें भी प्रेम
आत्मार्थ ही होता है, अन्यार्थ नहीं । इसीलिये आत्मा निरुपाधिक प्रेमका आस्पद
है । जैसे चणकचूर्णादि ( बेसन ) में मधुरता शर्करासम्बन्धसे होती है, परंतु
शर्करामें स्वतः मधुरिमा होती है । मोदक आदिमें सातिशय मिठास होती है,
शर्करामें निरतिशय मिठास होती है । उसी तरह अन्यत्र सातिशय प्रेम होता है,
आत्मामें निरतिशय प्रेम होता है । इसीलिये सब कुछ आत्मार्थ है, आत्मा
अन्यार्थ नहीं होता । अतः आत्मा सबका ही शेषी है ।
ससारमें सुख-दुःख एव सुख-दुःख-साधनोंके वैचित्र्यसे यह मानना पड़ता
है कि यह विचित्रता जीवात्माके पिछले शुभाशुभ कर्मोंसे ही उपपन्न होगी । पिछले
मा० रा० ४३-