मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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यही कारण है कि विज्ञानके प्रभावस्वरूप दर्शनकी आत्मा क्रमशः विशुद्ध होती
आयी है, यानी इसका प्रमाण प्रयोगके बाहर ले जाकर इन्द्रिय-बुद्धिसे परे रखा
गया है। इसी आत्माको सारे विश्वतत्त्वके मूलमें उन्होंने विराजमान देखा । शाङ्कर-
वेदान्तके अनुसार विश्वका मूलाधार ब्रह्म और आत्मा एक ही चीज है—‘तत्त्वमसि’ ।
“देखा गया है कि प्रत्येक युगमें देश और जातियोंकी सीमा अतिक्रमण कर
मनुष्यकी विचारधारा एक प्रकार रही है। प्रेत-तत्त्व, जादू-विद्या, अनेकेश्वरवाद,
एकेश्वरवाद इत्यादि मनुष्यकी चिन्ताधाराकी सीढ़ियाँ सभी देशोंमें एक ही
प्रकारकी रही हैं। यह भी सन्धान मिलता है कि यह तत्त्व-विचार जीवनकी
गतिके छन्दमें ही बदलता रहा है और सूक्ष्म भी होता आया है। हमारे असभ्य
पूर्व पुरुषोंका प्रेत-विश्वास ही सभ्य मनुष्योंके अध्यात्मवादके मूलमें है, इससे
हमारे सभ्यतागर्वी मनको चोट पहुँचती है, लेकिन इतिहास इसका
साक्षी है । प्रकृति-जगत्का इतिहास हमको यह दिखलाता है कि
चेतनाकी उत्पत्ति भी वस्तु जगत्में ही है । आदर्शवादी दार्शनिक कहता
है कि चेतना ही भूतका मूल है, लेकिन विज्ञानने यह भलीभाँति प्रमाणित किया
है कि चेतना सदासे नहीं रही । वस्तु-जगत्के इतिहासमें ऐसा भी समय था, जब
जीव-जगत्का अस्तित्व नहीं था । वस्तुनिरपेक्ष चेतना, रक्त-मांसविहीन अदृश्य—
ये धारणाएँ मनुष्यकी बुद्धिप्रसूत हैं। लेकिन मनुष्यसे भी पहले, जीव-जगत्के
अस्तित्वके पहले, चेतनाका अस्तित्व है, यह सम्भव नहीं । भूतसे ही चेतनाकी
उत्पत्ति है, इसलिये भूत ही पहले है । चेतना सभी प्रकार भूतके पश्चात् है ।
अध्यात्मवादी वस्तु और चेतनाके सम्पर्कको केवल बुद्धिद्वारा जाँचते हैं,
इतिहासकी ओर ध्यान नहीं देते ।
“आदिम मानवकी अपरिणत विज्ञानबुद्धिने वस्तुजगत्में मनुष्यकी ही
भावनाधारणाकी छाया देखी है । उसीने प्रेत, परमात्मा, देवता, ईश्वर-आदर्श
आदिका रूप लिया है। सदियो पहले चार्वाक और जेनोफेनीजने इसका अनुमान
किया था। शताब्दियोंकी वैज्ञानिक गवेषणासे प्रमाण मिलता है कि भूतसे ही
चेतनाकी उत्पत्ति हुई । चेतना भूतके ही विकासकी एक विशेष अवस्था है। इस
चेतनाका, चाहे यह मनुष्यकी हो चाहे किसी और प्राणीविशेषकी, भूत-जगत्से
अलाहिदा कहीं पता नहीं चलता । अध्यात्मवादी सूर्यविज्ञान, भूतत्त्व और
जीव-विज्ञानके प्रमाणित सिद्धान्तोंको मान भी लेते हैं, लेकिन साथ-ही-साथ कहेंगे
कि ‘अस्फुट चेतनाने तो सारे जगत्को छा रक्खा है, यह विश्व चेतनामय है।’
इस प्रकार भूतजगत्की एक विशेषवस्तु या गुणको वह इसके मूलमें बिठला देते
हैं, मनुष्यकी चेतनाको देश-कालातीत मानकर इसको भूतजगत्की चेतनाका
रूप दे देते हैं ।