सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 435, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 435

स्मरण नही कर सकता । मन भी चेतन नहीं है । फिर तो वह अणु होनेसे उसकी
प्रत्यक्षता न होगी । कहा जाता है कि 'क्षणिक विज्ञान ही आत्मा है ।' परंतु
'सोऽहं' ( मै वही हूँ ) इस प्रकार अनेकदिनवर्ती आत्माकी प्रत्यभिज्ञा होनेसे
नित्य विज्ञान ब्रह्मको ही आत्मा मानना ठीक है ।
मूल, वस्तु या चेतना ?
"मूल, भूत है चेतना ?' इस प्रश्नके उत्तरमें आधुनिक वैज्ञानिक एडिगटन
भी कहते हैं—'खोजते हुए अन्तमें जहाँ पहुँचा, वहाँ देखता हूँ, मनकी छाया-
मात्र है ।' वैज्ञानिक जोन्स गणितशास्त्रके पण्डित हैं । उनका कथन है—'अन्तमें
देखता हूँ, विज्ञानकी ही विजय है । विश्वका मूलाधार, ईश्वर एक अङ्कशास्त्रवित्
है और यह विश्व उसीके मस्तिष्कका एक अङ्कमात्र है ।' पूछा जा सकता है कि
एडिगटनका मानस और जोन्सका अङ्क क्या उनके मस्तिष्क और शरीरके ऊपर
निर्भर नहीं है ? क्या अपना मस्तिष्क और शरीर उनको अभौतिक या
अतिभौतिक मालूम होता है ? जोन्स, एडिंगटन आदिकी वर्णनशैलीमें
कुछ अन्तर है, उसपर आधुनिकताकी मामूली छाप है, लेकिन बात
पुरानी है—पिथागोरसका अङ्क, प्लेटोका आदर्श, उपनिषदोंका ब्रह्म—केवल
नयी पोशाकमे हमारे सामने आये हैं । वस्तुको लाँघकर उसके पीछे किसी
अवास्तव अलौकिककी प्रतिष्ठाकी चेष्टा हमको अस्वाभाविक नहीं प्रतीत होती ।
श्रेणीविभाजित समाजमें वास्तव-जीवन जब अनिश्चित और जटिल होता है, तब
एक अलौकिक और अन्तिम सत्यकी प्राप्तिसे वास्तव-पीडित मनको सान्त्वना
मिलती है । धर्मकी प्रयोजनीयताका समर्थन करते हुए बड़े-बड़े धार्मिक भी यही
युक्ति पेश करते हैं ।
'पर मनुष्यका शरीरसम्बन्धी ज्ञान जितना ही उन्नत होता गया, आत्माकी
धारणा भी उतनी ही सूक्ष्म होती आयी है और शरीर और आत्माका अविच्छेद्य
सम्बन्ध उन्हे दिखायी देने लगा है । शरीरके साथ ही आत्माका निधन होता है,
इस बातको मनुष्यने सभ्यताके प्राचीन युगमें ही मान लिया था । पश्चात् आत्माके
दो भाग किये गये—जीवात्मा और परमात्मा । जीवात्मा नश्वर है, लेकिन
परमात्मा अमर । देहातीत आत्मा या चैतन्य इस तरह जिंदा रहा । प्लेटो और
अरस्तू, रामानुज और शङ्कर, सभीने विदेही आत्माको इस प्रकार ईश्वर या
ब्रह्मके साथ जोड़ दिया । आत्माको 'विदेह' माननेके अतिरिक्त कोई मार्ग भी
नहीं रहा । असभ्य मनुष्यके निकट प्राकृतिक और अलौकिक दोनों ही प्रत्यक्ष
सत्य हैं, उनका विज्ञान प्रधानतः मन्त्र-तन्त्र है । सभ्यजगत्‌से विज्ञानकी उन्नति
रोकी नहीं जा सकती । विज्ञान अलौकिक शक्तिकी कोई परवा नहीं करता, बल्कि
सतत गवेषणाके जरिए अलौकिकके राज्यको क्रमशः संकीर्ण बना देता है ।