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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 866 में से

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पृष्ठ 427

६६८ मार्क्सवाद और रामराज्य
अधीन कैसे हो सकती है ? अनुभवके बिना किसी भी वस्तुकी सत्ता सिद्ध नहीं
होती । ज्ञेय तो ज्ञानाधीन है ही । ज्ञाताका तो वास्तविक रूप ज्ञान ही है । यदि
अनुभवके बिना भी सत्ता मानी जाय, तब तो शश-शृङ्गादिकी भी सत्ता माननी
पड़ेगी । अन्धकारमें रहता हुआ भी घट अनुभवके बिना असत् ही रहता है ।
कहा जाता है कि 'भले ही रज्जु-सर्पादि प्रातीतिक पदार्थकी सत्ता अनु-
भवाधीन हो, क्योंकि उसकी अज्ञात सत्ता नहीं होती, परन्तु घटादिकी सत्ता तो
अनुभवाधीन नहीं होती; क्योंकि घटादि तो अनुभवके पहले और पीछे भी रहते
ही हैं । प्रत्युत अनुभव ही घटादि विषयके अधीन होता है । घटादि जब
होते हैं, तभी चक्षुका उनसे सनिकर्ष होता है, तभी घटानुभव होता
है ।' परन्तु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि स्वप्नमें घटादि विषयों
एवं इन्द्रियोंके न होनेपर भी घटादि-अनुभव होता है । यदि कहा
जाय कि 'स्वाप्निक ज्ञान तो भ्रम है', तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि
अनधिगत, अबाधित अर्थविषयक ज्ञान ही प्रमा है । संविद्ब्रह्मसे भिन्न सभी बाधित
है, अतः घटादि-अनुभव भी वस्तुतः भ्रम ही है । यावद्व्यवहार बाधित न होना
जैसे घटादिका है, वैसे ही स्वाप्निक पदार्थका भी है, स्वप्न भी व्यवहार ही है।
यदि कहा जाय कि 'स्वप्न अस्थिर व्यवहार है', तो यह भी ठीक नहीं है;
क्योंकि व्यवहारगत स्थिरता या अस्थिरता विषयके बाधितत्व-अबाधितत्वपर ही
निर्भर है । बाधितत्व जब स्वप्न-जागर दोनोंमें ही है, तब स्थिरत्व-अस्थिरत्वका भेद
कैसे सिद्ध होगा ? शतायु पुरुष एव दशायु पुरुषके भी बाधितत्व-अंशमें समानता
ही है । अतः जैसे स्वप्नमें विषयेन्द्रियादि न रहनेपर भी विषय-प्रत्यक्ष होता है,
वैसे ही जागरमें भी हो सकता है । निद्रादोषके भावाभावसे ही स्वप्न-जागरमें
भेद है । निद्रा-दोषके हटनेपर स्वप्न हट जाता है । जागरमें पित्रादि-
दर्शनजनक अदृष्टके मिटनेसे पित्रादिका दर्शनाभाव होता है । अनुभवसे
भिन्न पित्रादि हैं ही नहीं, अतः उनकी मृति आदिका प्रसङ्ग ही नहीं उठता।
अतएव मृतके सम्बन्ध नष्ट होनेका व्यवहार होता है । नाशका अदर्शन
ही अर्थ है । इस तरह प्रतीति ही विषय है, प्रतीतिसे भिन्न विषय नहीं है, फिर
प्रतीतिकी सत्ता विषयाधीन कैसे कही जा सकती है ? इसमें अन्वयव्यतिरेक भी है ।
जब प्रतीति है, तभी विषय है । जब प्रतीति नहीं, तब विषय भी नहीं ।
जैसे मिट्टी होनेपर ही घट है । मिट्टी नहीं, तो घट भी नहीं । वैसे ही प्रतीतिसे
भिन्न विषय नहीं ।
कुछ लोग कहते हैं कि 'विषय होनेपर प्रतीति होती है, विषय न रहनेपर
प्रतीति नहीं होती, यही न्याय क्यों न माना जाय ?' परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि
विषय न रहनेपर भी स्वप्नमें प्रतीति होती ही है । मृत पित्रादि स्वप्नमें हैं नहीं,
तब भी प्रतीत होते हैं । जो लोग जन्य ज्ञानकी सत्ता विषयाधीन मानते हैं, वे भी