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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 866 में से

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पृष्ठ 433

शुभाशुभ कर्मोंकी उत्पत्ति भी जन्मान्तरीय देहसे माननी पड़ेगी । वह जन्मान्तर भी
उससे प्राचीन कर्मोंसे मानना पड़ेगा । इस तरह बीज एव अङ्कुरकी परम्पराके
समान ही जन्मों एव कर्मोंकी परम्पराको भी अनादि मानना पड़ता है ।
यह अनादि परम्परा सादि देहके आश्रित हो नहीं सकती । अतः अनादि आत्माके
ही आश्रित उसे मानना पड़ता है, अर्थात् अनादि आत्माके ही पूर्व-पूर्व देहोंसे
उत्तरोत्तर कर्म होते हैं एवं पूर्व-पूर्व कर्मोंसे उत्तरोत्तर देह होते हैं । उस आत्मामें
ही कर्म एवं जन्म चलते हैं ।
शय्या, प्रासादादि-संघात जैसे परार्थ (दूसरोंके लिये) होते हैं, वैसे ही
देह, इन्द्रिय, मन आदिका संघात भी स्वविलक्षण किसी चेतनके लिये ही होता
है । शय्यादि जैसे अपनेसे भिन्न देवदत्तादि शरीररूपी संघातके ही लिये दृष्ट हैं
वैसे ही यदि देहादिसंघात भी किसी दूसरे संघातके ही लिये हो, तब तो अनवस्था
प्रसङ्ग होगा, क्योकि उस संघातको भी किसी अन्य संघातके लिये मानना पड़ेगा ।
अतः शरीरादि-संघातको किसी स्वविलक्षण, असंहत चेतनके लिये मानना पड़ेगा ।
इसीलिये त्रिगुणात्मक सुख-दुःख मोहात्मक अव्यक्त, महदादि प्रपञ्चके विपरीत
त्रिगुणातीत, असंहत असङ्ग चेतन आत्मा सिद्ध होता है । त्रिगुणात्मक जड़-प्रपञ्च
रथादि चेतन सारथी या अश्वादिसे अधिष्ठित ही जैसे कार्यकारणक्षम होता है,
वैसे ही अचेतन प्रकृति, बुद्धि आदि भी चेतनसे अधिष्ठित होकर ही कार्यकारण
क्षम होंगी । अतः त्रिगुणात्मक अचेतनसे भिन्न चेतन अधिष्ठाता आवश्यक
है । भोक्ता भी अचेतनसे भिन्न चेतन ही होना चाहिये । सुख-दुःखादि
भोग्य हैं । इनके द्वारा अनुकूलनीय, प्रतिकूलनीय, सुखी, दुखी चेतन ही हो
सकता है । बुद्ध्यादि स्वयं सुख-दुःख-मोहात्मक हैं, अपनेसे ही स्वयं
अनुकूलनीय या प्रतिकूलनीय नहीं हो सकते । इसी तरह द्रष्टाके बिना
दृश्य नहीं हो सकता । बुद्ध्यादि दृश्य हैं, उनका द्रष्टा उनसे भिन्न ही होना
चाहिये । साक्षात् द्रष्टा होनेसे चेतन ही साक्षी हो सकता है । द्रष्टा चेतन
स्वयं अदृश्य होता है । जैसे रूप दृश्य है, चक्षु द्रष्टा है, वैसे ही चक्षु भी दृश्य
है, मन द्रष्टा है ।
संसारमें चेतनके अधीन ही अचेतनकी प्रवृत्ति होती है । भले चेतनसंयुक्त
अचेतनकी प्रवृत्ति होती है, तथापि प्रवृत्ति अचेतनकी ही है, क्योकि दोनों ही
प्रत्यक्ष हैं । फिर भी अचेतन रथादिसे जीवित देहमें अचेतन विलक्षणता स्पष्ट ही
है । काष्ठादिके आश्रित दाह, प्रकाशादि क्रिया केवल अग्निसे उपलब्ध नहीं होती ।
फिर भी दाह, प्रकाशादि क्रिया अग्निका ही धर्म है, क्योकि अग्निसंयोग होनेसे
ही काष्ठादिमें दाहादि उपलब्ध होता है, अग्निसंयोगके बिना उपलब्ध नहीं होता ।
भौतिकवादी भी तो चेतन देहको ही प्रवर्त्तक मानते हैं । वेदान्तानुसार निर्विकार