लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
१४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
समास —उश्च ऊश्च ऊ३श्च =व । इतरेतरद्वन्द्व । व कालो यस्य स =ऊकाल ।
बहुव्रीहि-समास । (एकमात्रिक उकार द्विमात्रिक उकार तथा त्रिमात्रिक उकार का
द्वन्द्व करने से 'जस्' विभक्ति मे 'व' रूप निष्पन्न होता है। यहां सब उकार लक्षणा-
शक्ति मे अपने २ उच्चारणकाल के सदृश अर्थ वाले हैं)। ह्रस्वश्च दीर्घश्च प्लुतश्च =
ह्रस्वदीर्घप्लुत । इतरेतरद्वन्द्व । (यहा इतरेतरद्वन्द्व होने से यद्यपि बहुवचन होना
चाहिये था तथापि सौत्र होने के कारण एकवचन हो गया है) । अर्थ —(ऊकाल )
एकमात्रिक उकार के सदृश उच्चारणकाल वाला, द्विमात्रिक उकार के सदृश उच्चारण-
काल वाला तथा त्रिमात्रिक उकार के सदृश उच्चारणकाल वाला (अच् ) अच्, क्रमशः
(ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत ) ह्रस्व दीर्घ तथा प्लुत संज्ञक होता है। भाव --यदि एकमात्रिक¹
उकार के उच्चारणकाल के समान किसी अच् का उच्चारण-काल होगा तो वह ह्रस्व,
यदि द्विमात्रिक उकार के उच्चारण-काल के समान किसी अच् का उच्चारण-काल
होगा तो वह दीर्घ और यदि त्रिमात्रिक उकार के उच्चारणकाल के समान किसी अच्
का उच्चारण-काल होगा तो वह प्लुत संज्ञक होगा ।
कुक्कुट के 'कु कू कू३' शब्द मे क्रमशः ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत उकार का
उच्चारण स्पष्ट प्रतीत होता है अतः यहां दृष्टान्त के लिये उकार को उपयुक्त समझा
गया है वरन् 'आकाल' आदि भी कहा जा सकता था ।
इस प्रकार अचों के ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत ये तीन २ भेद हो जाते हैं (ध्यान
रहे कि यहां सामान्यतः कथन किया गया है, सब अचों के तीन तीन भेद नही होते,
पर हां यह तीनों भेद अचों के ही होते हैं अन्य वर्णों के नही) । अब अग्रिम तीन सूत्रो
से प्रत्येक के उदात्त, अनुदात्त और स्वरित तीन २ भेद कहे जाते हैं—
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(६) उच्चैरुदात्तः ।१।२।२६॥
(ताल्वादिषु सभागेषु स्थानेषूर्ध्वभागे निष्पन्नोऽजुदात्तसंज्ञ स्यात् ॥)
संज्ञा-सूत्रम्—(७) नीचैरनुदात्तः ।१।२।३०॥
(ताल्वादिषु सभागेषु स्थानेष्वधोभागे निष्पन्नोऽजनुदात्तसंज्ञ स्यात् ॥)
अर्थ — भागो वाले तालु आदि स्थानो मे जो अच् ऊपरले भाग में बोला जाय
वह उदात्त होता है ॥६॥
१. कई लोग -जितनी देर मे आंख झपकती है उसे 'मात्रा' कहते हैं । कुछ लोग—
जितनी देर में बिजली चमकती है उसे 'मात्रा' कहते हैं । अन्य लोग —जितनी
देर मे झरोखे के बीच कण दिखाई देता है उसे 'मात्रा' कहते हैं । इतर लोग—
चाष—नीलकण्ठ पक्षी जितनी देर में बोलता है उसे 'मात्रा' मानते हैं। ये सब
प्राचीन शिक्षाकार आचार्यों के मत हैं । परन्तु आजकल एक सैकेण्ड के समय
को मात्रा-समय मानना सरल प्रतीत होता है । ह्रस्व के बोलने में एक सैकेण्ड,
संज्ञा-प्रकरणम् १५
भागों वाले तालु आदि स्थानों में जो अच् निचले भाग में बोला जाय वह
अनुदात्त होता है ॥७॥
व्याख्या—उच्चैः इत्यव्ययपदम् । उदात्तः ।१।१। अच् ।१।१। (ऊकालोऽज्झ्र-
स्वदीर्घप्लुतः सूत्र से) ॥६॥ नीचैः इत्यव्ययपदम् । अनुदात्तः ।१।१। अच् ।१।१।
(ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः सूत्र से) ॥७॥ 'उच्चैस्' शब्द का अर्थ ऊँचा तथा 'नीचैस्'
शब्द का अर्थ नीचा है । भाष्य के प्रमाणानुसार वर्णों का अपने २ स्थानों में ही ऊँचा
या नीचापन समझना चाहिये । यदि स्थान अखण्ड हों अर्थात् उन के भाग न हो सकते
हों तो ऊँचापन या नीचापन नहीं बन सकता । अतः स्थानों के दो भाग मानने पड़ेंगे
एक ऊँचा भाग दूसरा नीचा भाग । वृत्ति में इसीलिये 'सभाग' शब्द लिखा गया है ;
अर्थः—(उच्चैः) अपने स्थान के ऊपर वाले भाग में उच्चार्यमाण (अच्) अच् (उदात्तः)
उदात्तसंज्ञक होता है ॥६॥ (नीचैः) अपने स्थान के नीचे वाले भाग में उच्चार्यमाण
(अच्) अच् (अनुदात्त) अनुदात्तसंज्ञक होता है ॥७॥ यथा अकार का 'कण्ठ' स्थान
है । यदि अकार कण्ठ में ऊपरले भाग से बोला जायेगा तो उदात्त और यदि निचले
भाग में बोला जायेगा तो अनुदात्त संज्ञक होगा । एवम् आगे इकार आदियों के विषय
में भी जान लेना चाहिये ।
कुछ लोग 'जो ऊँची स्वर से बोला जाय वह उदात्त होता है' ऐसा अनर्थ
किया करते हैं । उनके अनर्गल-प्रलाप से सावधान रहना चाहिये; क्योंकि तब
मानसिक जप में उदात्तत्व आदि न माना जा सकेगा, पर यह अनिष्ट है ।
नोटः---इन सूत्रों की तथा अगले सूत्र की वृत्ति 'लघुकौमुदी' में नहीं दी गई ।
हम ने सुगमता के लिये 'सिद्धान्तकौमुदी' से ले कर कोष्ठ में दे दी है ।
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम्— (८) समाहारः स्वरितः ।१।२।३१॥
(उदात्तानुदात्तत्वे वर्णधर्मौ समाह्रियेते यस्मिन् सोऽच् स्वरितसंज्ञः
स्यात्) । स नवविधोऽपि प्रत्येकम्अनुनासिकाननुनासिकत्वाभ्यां द्विधा ॥
अर्थः—उदात्त और अनुदात्त वर्णों के धर्म जो उदात्तत्व और अनुदात्तत्व ये
दोनों जिस अच् में विद्यमान हों वह अच् 'स्वरित' संज्ञक होता है। स नवविधोऽपि--
इस तरह नौ प्रकार का वह अच् पुनः अनुनासिक तथा अननुनासिकधर्मों के कारण दो
प्रकार का हो जाता है ।
व्याख्या—उदात्तस्य ।६।१। अनुदात्तस्य ।६।१। (उच्चैरुदात्तः से 'उदात्तः' तथा
नीचैरनुदात्तः से 'अनुदात्तः' पद का अनुवर्त्तन होता है । इन दोनों का यहां षष्ठी-
विभक्ति में विपरिणाम हो जाता है । ये दोनों पद भाष्य के प्रमाणानुसार धर्मप्रधान
हैं, अर्थात् इन का अर्थ उदात्तत्व और अनुदात्तत्व है। समाहारः ।१।१। [समाहरणम्
=समाहारः, भावे घञ् । समाहारोऽस्त्यस्मिन्निति समाहारः, अर्शआदिभ्योऽच्
दीर्घ के बोलने में दो सकेण्ड तथा प्लुत के बोलने में तीन सैकेण्ड का समय लगाना
चाहिये ।
१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
(१।१६१) इति मत्वर्थीयोऽच् प्रत्यय ] । स्वरितः १।१। अर्थ -(उदात्तस्य = उदा-
त्तत्वस्य) उदात्तपन (अनुदात्तस्य = अनुदात्तत्वस्य) और अनुदात्तपने के (समाहारः )
मेल वाला (अच्) अच् (स्वरितः ) स्वरितसञ्ज्ञक होता है। पूर्व-सूत्रों में स्थानी के
दो भाग कह आये हैं एक ऊपर वाला भाग और दूसरा नीचे वाला भाग । जो अच्
इन दोनों भागों में बोला जाय उसे 'स्वरित' कहते हैं। यथा अकार का 'कण्ठ' स्थान
होता है यदि अकार कण्ठ के ऊपरी और निचले दोनों भागों से बोला जायेगा तो
'स्वरित' सञ्ज्ञक होगा । इसी प्रकार अपने २ स्थानों के दोनों भागों से बोले जाने
वाले इकार आदि भी स्वरितसञ्ज्ञक होंगे।
अब इस प्रकार ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत प्रत्येक के उदात्त, अनुदात्त तथा स्व-
रित २ भेद होकर प्रत्येक अच् के नौ २ भेद हो जाते हैं (ध्यान रहे कि यह
सामान्यतः कथन किया गया है यद्यपि जिन अचों के ह्रस्व या दीर्घ नहीं होते उन के
तो छः २ भेद ही होते हैं) । ये नौ भेद निम्नलिखित हैं-
| (१) ह्रस्व उदात्त | (४) दीर्घ उदात्त | (७) प्लुत उदात्त |
| (२) ह्रस्व अनुदात्त | (५) दीर्घ अनुदात्त | (८) प्लुत अनुदात्त |
| (३) ह्रस्व स्वरित | (६) दीर्घ स्वरित | (९) प्लुत स्वरित |
इन नौ भेदों में भी हर एक के पुनः अनुनासिक तथा अननुनासिक धर्मों के
कारण दो २ भेद होकर प्रत्येक अच् के अठारह २ भेद हो जाते हैं यह सब अग्रिम सूत्र
में प्रतिपादन किया गया है।
कोई समय था जब उदात्त आदि स्वरों का प्रयोग लोक में भी किया जाता
था, पर अब इन का प्रचार लोक में सर्वथा नष्ट हो गया है। ये प्रायः वेद में ही
प्रयुक्त होते हैं। वेद में इन का सङ्केत चिह्नों द्वारा किया जाता है। उदात्त के लिये
कोई चिह्न नहीं होता, अनुदात्त के नीचे पड़ी रेखा तथा स्वरित के ऊपर खड़ी रेखा
का चिह्न होता है। यथा-
उदात्त - अ । इ । उ । इत्यादि ।
अनुदात्त - अ॒ । इ॒ । उ॒ । इत्यादि ।
स्वरित - अ॑ । इ॑ । उ॑ । इत्यादि ।
सामवेद आदि में अन्य प्रकार के भी चिह्न होते हैं जो वैदिक ग्रन्थों से जानने
चाहियें।
संज्ञा-प्रकरणम् १७
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (६) मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः । १।१।८॥
मुख-सहित-नासिकयोच्चार्यमाणो वर्णोऽनुनासिकसंज्ञः स्यात्¹ ।
तदित्थम् - अ इ उ ऋ एषां वर्णानां प्रत्येकष्टादश भेदाः । लृ-वर्णस्य द्वादश,
तस्य दीर्घाभावात् । एचामपि द्वादश, तेषां ह्रस्वाभावात् ॥
अर्थः - मुखसहित नासिका से बोला जाने वाला वर्ण अनुनासिक-संज्ञक
होता है । इस प्रकार - 'अ, इ, उ, ऋ' इन वर्णों में प्रत्येक के अठारह २ भेद हो जाते
हैं । 'लृ' वर्ण के - दीर्घ न होने से बारह भेद होते हैं। एचों (ए, ओ, ऐ, औ) के भी
- ह्रस्व न होने से बारह २ भेद होते हैं ।
व्याख्या - मुख-नासिका-वचनः ।१।१। अनुनासिकः ।१।१। समासः - मुखेन
सहिता मुख-सहिता, तृतीया-तत्पुरुष-समासः, मुख-सहिता नासिका मुखनासिका,
शाकपार्थिवादीनां सिद्धय उत्तरपदलोपस्योपसङ्ख्यानम् इति वार्त्तिकेन समासः । उच्चत
इति वचनः (वर्ण इत्यर्थः), कर्मणि ल्युट् । मुखनासिकया वचनः = मुखनासिकावचनः ।
तृतीया-तत्पुरुष-समासः । अर्थः - (मुख-नासिका-वचनः) मुखसहित नासिका से बोला
जाने वाला वर्ण (अनुनासिकः) अनुनासिक-संज्ञक होता है।
भाव यह है कि मुख से तो प्रत्येक वर्ण बोला ही जाता है, पर जो मुख और
नासिका दोनों से बोला जाये वह अनुनासिक होता है । यथा ङ्, ञ्, ण्, न्, म् इत्यादि
मुख और नासिका दोनों से बोले जाते हैं अतः 'अनुनासिक' संज्ञक हैं। इसी प्रकार यदि
अच् मुख और नासिका दोनों से बोला जायेगा तो 'अनुनासिक' होगा और यदि केवल
मुख से ही बोला जायेगा तो 'अननुनासिक' (न अनुनासिकः, जो अनुनासिक नहीं)
होगा । इस प्रकार पीछे कहे नौ २ भेदों के अनुनासिक और अननुनासिक धर्म के कारण
अठारह २ भेद हो जाते हैं ।
अब अचों का सामान्यतः भेद-निरूपण करके पुनः प्रत्येक का विशेषतः भेद-
निरूपण करते हैं ।
'अ, इ, उ, ऋ' इन में से प्रत्येक वर्ण के अठारह भेद होते हैं । 'लृ' वर्ण के
बारह भेद होते हैं । इस के दीर्घ न होने से छः भेद कम हो जाते हैं । 'एचू' अर्थात्
'ए, ओ, ऐ, औ' वर्णों के भी बारह २ भेद होते हैं, क्योंकि इन का ह्रस्व नहीं होता ।
ह्रस्व न होने से छः २ भेद कम हो जाते हैं। यह ध्यान रहे कि 'ए, ऐ' तथा 'ओ,
औ' परस्पर ह्रस्व दीर्घ नहीं, किन्तु सब दीर्घ और भिन्न २ जाति वाले हैं। इन सब
की तालिका यथा -
१. अत्र मुखसहितया नासिकया इति व्यास एव न्याय्यः । समासे तु शाकपार्थिवादि-
त्वात् सहितपदलोपप्राप्तिः ।
ल० प्र० (२)
१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
| अ, इ, उ, ऋ, ऌ | अ, इ, उ, ऋ, ए, ओ, ऐ, औ | अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ |
|---|---|---|
| १ ह्रस्व उदात्त अनुनासिक | ७ दीर्घ उदात्त अनुनासिक | १३ प्लुत उदात्त अनुनासिक |
| २ ,, ,, अननुनासिक | ८ ,, अननुनासिक | १४ ,, अननुनासिक |
| ३ ,, अनुदात्त अनुनासिक | ९ ,, अनुदात्त अनुनासिक | १५ ,, अनुदात्त अनुनासिक |
| ४ , ,, अननुनासिक | १० ,, अननुनासिक | १६ , ,, अननुनासिक |
| ५ ,, स्वरित अनुनासिक | ११ , स्वरित अनुनासिक | १७ , स्वरित अनुनासिक |
| ६ ,, ,, अननुनासिक | १२ ,, अननुनासिक | १८ , ,, अननुनासिक |
| प्रकरण का सार— | ||
| इस प्रकरण का सार यह है कि सजातीय (एक ही स्थान वाले) अचों में | ||
| परस्पर तीन प्रकार के भेद होते हैं। १ कालकृत भेद। २ स्थानभागकृत भेद। | ||
| ३ नासिक्याकृत भेद। | ||
| ऊँ३कालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुत (५) सूत्र कालकृत भेद करता है। उच्चैरुदात्तः, | ||
| नीचैरनुदात्तः, समाहारः स्वरितः (६, ७, ८) ये सब स्थानभागकृत भेद करते हैं। मुख- | ||
| नासिकावचनोऽनुनासिकः (६) यह सूत्र नासिकाकृत भेद करता है। उदाहरणार्थ | ||
| अकार के अठारह भेदों की आकृति यथा— | ||
| ह्रस्व—अँ, अ, $\underline{अँ}$, $\underline{अ}$, अँ॑, अ॑ ॥ | ||
| दीर्घ—आँ, आ, $\underline{आँ}$, $\underline{आ}$; आँ॑, आ॑ ॥ | ||
| प्लुत—आँ३, आ३; $\underline{आँ३}$, $\underline{आ३}$, आँ॑३, आ॑३ ॥ | ||
| (१) अँ और अ में केवल नासिकाकृत भेद है क्योंकि पहला अनुनासिक और | ||
| दूसरा अननुनासिक है। दोनों एकमात्रिक हैं अतः कालकृत भेद नहीं है। दोनों | ||
| उदात्त होने के कारण स्थान के ऊर्ध्वभाग में निष्पन्न होते हैं अतः स्थानभागकृत भेद | ||
| भी नहीं है। | ||
| (२) अ और $\underline{अँ}$ में नासिकाकृत तथा स्थानभागकृत दो प्रकार का भेद है। | ||
| क्योंकि पहला अननुनासिक तथा कण्ठ स्थान के ऊर्ध्वभाग में निष्पन्न होता है, दूसरा | ||
| अनुनासिक तथा कण्ठ स्थान के अधोभाग में निष्पन्न होता है। इन दोनों में कालकृत | ||
| भेद नहीं है क्योंकि दोनों एकमात्रिक हैं। |
संज्ञा-प्रकरणम् १६
(३) अ और आँ में तीनों प्रकार का भेद है। पहला एकमात्रिक तथा दूसरा
द्विमात्रिक है अतः कालकृत भेद हुआ; पहला उदात्त होने से ऊर्ध्वभाग से निष्पन्न होने
वाला तथा दूसरा अनुदात्त होने से अधोभाग में निष्पन्न होने वाला है अतः स्थान-
भागकृत भेद हुआ; पहला अननुनासिक तथा दूसरा अनुनासिक है अतः नासिकाकृत
भेद हुआ।
(४) सजातीय अर्थात् एक स्थान वाले अचों में इन तीन भेदों से अतिरिक्त
अन्य कोई भेद नहीं हो सकता, पर विजातीय अर्थात् भिन्न २ स्थानों वाले अचों में
चौथा 'स्थानकृत' भेद भी हुआ करता है। यथा—अ और ई॒ में; पहला कण्ठस्थानीय
तथा दूसरा तालुस्थानीय है अतः स्थानकृत भेद है।
नोट—विद्यार्थियों को अचों के परस्पर इन चार प्रकार के भेदों का सुचारु
रूप से अभ्यास कर लेना चाहिये।
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् —(१०) तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् १।१।९॥
ताल्वादिस्थानमाभ्यन्तरप्रयत्नश्चेत्येतद् द्वयं यस्य येन तुल्यं तन्मिथः
सवर्ण-संज्ञं स्यात् ॥
अर्थ.—तालु आदि स्थान तथा आभ्यन्तर-प्रयत्न ये दोनों जिस वर्ण के जिस
वर्ण के साथ तुल्य हों वह वर्णजात (अक्षर-समुदाय) परस्पर सवर्णसंज्ञक होता है।
व्याख्या—तुल्यास्यप्रयत्नम् १।१। सवर्णम् १।१। समासः—आस्ये (मुखे)
भवम् = आस्यम्, शरीरावयवाच्च (१०६१) इति भवार्थे यत्प्रत्ययः। यस्येति च
(२३६) इत्यकारलोपे हलो यमां यमि लोपः (६६७) इति यकारलोपः। प्रकृष्टो यत्नः
प्रयत्नः, यद्वा प्राक्तनो यत्नः प्रयत्नः, कुगतिप्रादयः (६४६) इति प्रादिसमासः।
आस्यञ्च प्रयत्नश्च आस्यप्रयत्नौ, इतरेतरद्वन्द्वः। तुल्यौ आस्य-प्रयत्नौ यस्य (वर्णजा-
तस्य) तत् = तुल्यास्यप्रयत्नम्, बहुव्रीहिसमासः। अर्थः—(तुल्यास्य-प्रयत्नम्) जिस
वर्ण समूह का पारस्परिक ताल्वादिस्थान तथा आभ्यन्तर प्रयत्न तुल्य हो वह (सवर्णम्)
परस्पर सवर्ण-संज्ञक होता है।
स्थान कण्ठ से शुरू होते हैं अतः 'ताल्वादि' की अपेक्षा 'कण्ठादि' कहना ही
अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। कई लोग—'तालुन आदिस्ताल्वादिः (कण्ठः)। तालु
आदिर्येषान्तानीमानि ताल्वादीनि, ताल्वादिश्च ताल्वादीनि च ताल्वादीनि, एकशेषः।
इस प्रकार विग्रह कर के कण्ठ को भी ला घसीटते हैं, परन्तु हमारी सम्मति में सीधा
'कण्ठादि' न कह कर 'ताल्वादि' कहना द्रविड़-प्राणायाम से कम नहीं।
लोक में आभ्यन्तर तथा बाह्य यत्नों के लिये सामान्यतया 'प्रयत्न' शब्द प्रयुक्त
होता है, पर शास्त्र में इन दोनों के लिये यत्न' शब्द का ही प्रयोग होता है। इस
सूत्र में 'यत्न' शब्द के साथ 'प्र' जुड़ा हुआ है, जो बाह्ययत्न को हटा कर आभ्यन्तर-
२० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्या
यत्न का ही बोध कराता है। तथाहि-- प्राक्तनो यत्न प्रयत्नः, अथवा प्रकृष्टो यत्न
प्रयत्न' जो पहला यत्न अथवा उत्कृष्ट यत्न हो उस 'प्रयत्न' कहते हैं। इस रीति से
'आभ्यन्तर' ही 'प्रयत्न' ठहरता है क्योंकि वह वर्णोत्पत्ति से पूर्व होता है तथा
वर्णोत्पत्ति का कारण होने से उत्कृष्ट है। बाह्ययत्न वर्णोत्पत्ति के पश्चात् होने तथा
वर्णोत्पत्ति में कारण न होने से वैसा नहीं है।
यहां यह ध्यान रखना चाहिये कि जब तक सम्पूर्ण स्थान और सम्पूर्ण प्रयत्न
तुल्य न हों तब तक 'सवर्ण' संज्ञा नहीं होती। यथा 'इ' और 'ए' वर्णों का प्रयत्न तुल्य
है तालुस्थान भी तुल्य है, परन्तु 'ए' का 'इ' से कण्ठस्थान अधिक है अतः इन की
सवर्णसंज्ञा नहीं होती। सवर्णसंज्ञा न होने से 'भवन्ति + एव' इत्यादि में अनिष्ट सवर्ण-
दीर्घ की निवृत्ति हो जाती है। यह सब मुनिवर पाणिनि के 'यजुष्येकेषाम्' (८।३।१०४)
सूत्र में (यजुषि + एकेषाम्) सवर्णदीर्घ न कर के यण् करने से विदित होता है।
अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि सम्पूर्ण स्थान + प्रयत्न के साम्य
होने से ही सावर्ण्य माना जायेगा तो 'क' और 'ङ' की सवर्णसंज्ञा न हो सकेगी,
क्योंकि कण्ठस्थान और स्पृष्ट प्रयत्न के तुल्य होने पर भी ङकार का नासिकास्थान
अधिक होता है। और यदि इन की सवर्ण-संज्ञा न होगी तो क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०६)
सूत्र से ककार ङकार का ग्रहण न करायेगा इस से 'प्राङ्' आदि प्रयोगों में नकार को
ङकार न हो कर अनिष्ट प्रयोग निष्पन्न होंगे। इस का समाधान यह है कि सूत्र में
आस्य+प्रयत्न के तुल्य होने का उल्लेख है। 'आस्य' का अर्थ 'मुख में होने वाला
स्थान' है। क्कार और ङ्कार का मुख में होने वाला स्थान कण्ठ तुल्य ही है।
'नासिका' तो मुख से बाहर का स्थान है, फिर चाहे वह तुल्य हो या न हो चिन्ता
नहीं, सवर्णसंज्ञा हो जाती है। निष्कर्ष यह है कि--
यदि किसी वर्ण के मुखगत कण्ठादि स्थान तथा आभ्यन्तर यत्न अन्य वर्ण से
पूरी तरह से तुल्य हों तो वे परस्पर 'सवर्ण' संज्ञक होते हैं।
स्मरण रहे कि 'ए' और 'ऐ' की तथा 'ओ' और 'औ' की सम्पूर्ण स्थान और
प्रयत्न के साम्य होने पर भी सवर्णसंज्ञा नहीं होती, इस का कारण यह है कि मुनिवर
पाणिनि ने एओङ्, ऐऔच् सूत्रों में दोनों का पृथक् २ निर्देश किया है।
[लघु०] वा०-- (१) ऋलृवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम् ॥
अर्थः--ऋकार और लृकार वर्णों की परस्पर 'सवर्ण' संज्ञा कहनी चाहिये।
व्याख्या--तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१०) सूत्र के अनुसार ऋकार और लृकार
की परस्पर सवर्ण-संज्ञा नहीं हो सकती, क्योंकि ऋकार का स्थान मूर्धा और
लृकार का स्थान दन्त है। परन्तु 'तवल्कार' आदि प्रयोगों के लिये इन की सवर्ण संज्ञा
करना अतीव आवश्यक है। इस त्रुटि की पूर्ति मुनिवर कात्यायन ने उपर्युक्त वार्त्तिक
द्वारा कर दी है। अब दोनों का स्थानसाम्य न होने पर भी सवर्णसंज्ञा सिद्ध हो
जाती है।
संज्ञा-प्रकरणम् २१
नोट न हि सर्वः सर्वं जानाति (हर एक पुरुष हर एक बात का ज्ञाता नहीं
हुआ करता) इस न्यायानुसार मुनिवर पाणिनि से जो कुछ छूट गया उसकी पूर्ति
करने तथा मुनिवर पाणिनि के सूत्रपाठ का तात्पर्य समझाने के लिये महामुनि कात्या-
यन ने वार्त्तिक-पाठ का निर्माण किया है। इस वार्त्तिक-पाठ की भी त्रुटियों को दूर
करने के लिये तथा कात्यायन का आशय स्पष्ट करने के लिये महामुनि पतञ्जलि ने
महाभाष्य नामक अति-सुन्दर वृहत्काय ग्रन्थ रचा है। यही तीनों मुनि इस व्याकरण
के मुनित्रय कहलाते हैं और इन के कारण ही इस पाणिनीय-व्याकरण को त्रिमुनि
व्याकरणम् कहते हैं। इन मुनियों में उत्तरोत्तर मुनि अर्थात् पाणिनि से कात्यायन
तथा कात्यायन से पतञ्जलि अधिक प्रामाणिक हैं। इस का कारण यह है कि जगत्
में यह नियम है कि सब से पहले पुरुष को जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता
है वैसा उत्तरोत्तर पुरुषों को नहीं, क्योंकि पहले पुरुष की सम्पूर्ण विचारधारा उत्तर-
पुरुष को अनायास प्राप्त हो जाती है इस से वह उस से आगे के लिये यत्न किया
करता है, अत एव बुद्धिमान् लोग उत्तरोत्तर को अधिक प्रामाणिक माना करते हैं।
उत्तरोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम् यह उक्ति भी इसी आधार पर आश्रित है।
सूचना—इस ग्रन्थ में कात्यायन की वार्त्तिकों के आदि में वा० ऐसा चिह्न कर
दिया गया है और इन की क्रमसंख्या भी सूत्रक्रम से पृथक् निर्दिष्ट की गई है।
सवर्णसंज्ञा में स्थान और प्रयत्न का उपयोग होने से अब उन का विवेचन
किया जाता है—
[लघु०] अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः॥
अर्थः—अठारह प्रकार के अवर्ण, कवर्ग, हकार तथा विसर्ग का कण्ठ स्थान
होता है।
व्याख्या—अकुहविसर्जनीयानाम् ।६।३। कण्ठः ।१।१। समासः—अश्च कुश्च
हश्च विसर्जनीयश्च अकुहविसर्जनीयाः, तेषाम् = अकुहविसर्जनीयानाम्, इतरेतरद्वन्द्वः।
यहां 'अ' से लोकप्रसिद्धनुसार सारे का सारा अवर्णकुल तथा 'कु' से कवर्ग का ग्रहण
समझना चाहिये। विसर्जनीय और विसर्ग पर्याय अर्थात् एकार्थवाची शब्द हैं। यहां
यह ध्यान रहे कि विसर्ग का कण्ठस्थान तभी होता है जब वह अकाराश्रित अर्थात्
अकार से परे होता है; जैसा कि पाणिनि के नाम से प्रचलित पाणिनीय-शिक्षा में कहा
गया है—
अयोगवाहा विज्ञेया आश्रयस्थानभागिनः। (श्लोक २२)
अयोगवाहों (यम, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय) का
वही स्थान होता है जिस के वे आश्रित होते हैं। यम और अनुस्वार नासिकास्थानीय
ही रहते हैं, क्योंकि शिक्षा में कहा गया है—
अनुस्वारयमानाञ्च नासिकास्थानमुच्यते। (श्लोक २२)
२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अर्थात् अनुस्वार और यमों का 'नासिका' स्थान होता है। अब अयोगवाहों
में शेष रहे जिह्वामूलीय, उपध्मानीय और विसर्ग। इन में से जिह्वामूलीय का
'जिह्वामूल' ही स्थान निश्चित है, इसी प्रकार उपध्मानीय भी सदैव पकार या फकार
के आश्रित होने से ओष्ठस्थानीय ही रहते हैं। तो अब विसर्ग के सिवाय अयोगवाहों
में अन्य कोई अनियतस्थान वाला नहीं रहा। उदाहरण यथा—'कविः' यहां इकारा-
श्रित होने से विसर्जनीय का तालुस्थान होता है। 'भानुः' यहां उकाराश्रित होने से
विसर्जनीय का ओष्ठस्थान है। 'रामयोः' यहां ओकाराश्रित होने से विसर्जनीय का
कण्ठ+ओष्ठ स्थान है। इसी प्रकार अन्यत्र भी जिस २ के आश्रित विसर्ग होगा उस २
का वह २ स्थान विसर्ग का भी होगा।
[लघु०] इचुयशानां तालु ॥
अर्थ.—अठारह प्रकार के इवर्ण, चवर्ग, दो प्रकार के यकार तथा शकार का
'तालु' स्थान होता है।
व्याख्या—इचुयशानाम् ।६।३। तालु ।१।१। समास—इश्च चुश्च यश्च शश्च
इचुयशाः, तेषाम् = इचुयशानाम्, इतरेतरद्वन्द्व। यहां लोकप्रसिद्धयनुसार 'इ' से
इवर्णकुल, 'चु' से चवर्ग 'य्' से अनुनासिक और अननुनासिक दोनों प्रकार के यकारों
का ग्रहण होता है। दांतों के पीछे जो कठिन मुख की छत है उसे 'तालु' कहते हैं।
[लघु०] ऋ-टुर-षाणां मूर्धा ॥
अर्थ—अठारह प्रकार के ऋवर्ण, टवर्ग, रेफ तथा षकार का 'मूर्धा' स्थान
होता है।
व्याख्या—ऋटुरषाणाम् ।६।३। मूर्धा ।१।१। समास—ऋ च टुश्च रश्च षश्च
ऋटुरषाः, तेषाम् = ऋटुरषाणाम्, इतरेतरद्वन्द्व। 'तालु' स्थान से पीछे मुख की छत
का जो कोमल भाग है उसे 'मूर्धा' कहते हैं। आजकल षकार का उच्चारण सम्यग्-
रीत्या नहीं हुआ करता अतः इस का विशेष ध्यान रखना चाहिये।
[लघु०] ऌ-तुल-सानां दन्ताः ॥
अर्थ—बारह प्रकार के ऌकार, तवर्ग, दो प्रकार के लकार तथा सकार का
'दन्त' स्थान होता है।
व्याख्या—ऌतुलसानाम् ।६।३। दन्ताः ।१।३। समास—ऌ च तुश्च लश्च
सश्च = ऌतुलसाः, तेषाम् = ऌतुलसानाम्, इतरेतरद्वन्द्व। यहां 'दन्त' से तात्पर्य ऊपर
वाले दांतों के पीछे साथ लगे हुए मांस से है, अतः एवं भग्न दांतों वाला पुरुष भी
इन वर्णों का उच्चारण कर सकता है।
[लघु०] उपूपध्मानीयानामोष्ठौ ॥
अर्थ—अठारह प्रकार के उकार, पवर्ग तथा उपध्मानीय का ओष्ठ (होठ)
स्थान होता है।
संज्ञा-प्रकरणम् २३
व्याख्या — उपूपध्मानीयानाम् ।६।३। ओष्ठौ ।१।२। समासः — उश्च पुश्च
उपध्मानीयश्च उपूपध्मानीयाः, तेषाम् = उपूपध्मानीयानाम् । इतरेतरद्वन्द्वः । अच् से
परे तथा पकार फकार से पूर्व '≍' इस प्रकार उपध्मानीय होता है । इस का विवेचन
आगे उसी प्रकरण में किया जायेगा ।
[लघु०] ञ-म-ङ-ण-नानां नासिका च ॥
अर्थः—ञ्, म्, ङ्, ण्, न् इन पाञ्च वर्णों का 'नासिका' स्थान भी होता है ।
व्याख्या—ञमङणनानाम् ।६।३। नासिका ।१।१। च इत्यव्ययपदम् । समासः—
ञश्च मश्च ङश्च णश्च नश्च = ञमङणनाः, तेषाम् = ञमङणनानाम्, इतरेतरद्वन्द्वः ।
आदिश्चकार उच्चारणार्थः । यहाँ मूल में 'च' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि इन वर्णों
का अपने-अपने वर्गों का स्थान भी होता है। यथा - ञकार का तालुस्थान और
नासिकास्थान दोनों हैं । उस प्रकार मकारादि में भी समझ लेना चाहिये ।
[लघु०] एदैतोः कण्ठ-तालु ॥
अर्थः—बारह प्रकार के एकार तथा ऐकार का कण्ठ और तालु स्थान होता है ।
व्याख्या—एदैतोः ।६।२। कण्ठतालु ।१।१। एच ऐच्च = एदैतौ, तयोः=
एदैतोः, इतरेतरद्वन्द्वः । कण्ठश्च तालु च = कण्ठतालु । प्राण्यङ्गत्वात् समाहार-द्वन्द्वः ।
मूल में तकार सुखपूर्वक उच्चारण के लिये ग्रहण किया गया है, इसे तपर नहीं समझना
चाहिये ।
[लघु०] ओदौतोः कण्ठोष्ठम् ॥
अर्थः—बारह प्रकार के ओकार तथा औकार का 'कण्ठ' और 'ओष्ठ' स्थान
होता है ।
व्याख्या—ओदौतोः ।६।२। कण्ठोष्ठम् ।१।१। समासः—ओच्च औच्च ओदौतौ,
तयोः = ओदौतोः, इतरेतर-द्वन्द्वः । कण्ठश्च ओष्ठौ च कण्ठोष्ठम्, प्राण्यङ्गत्वात् समा-
हारद्वन्द्वः । ओत्वोष्ठयोः समासे वा इति वार्तिकेन पररूपता । यहां भी मूल में तकार
मुख-सुखार्थ ही समझना चाहिये ।
[लघु०] वकारस्य दन्तोष्ठम् ॥
अर्थः—वकार का दन्त और ओष्ठ स्थान होता है ।
व्याख्या—वकारस्य ।६।१। दन्तोष्ठम् ।१।१। समासः—दन्ताश्च ओष्ठौ च =
दन्तोष्ठम्, प्राण्यङ्गत्वात् समाहारद्वन्द्वः । ओत्वोष्ठयोः समासे वा इति वार्तिकेन
पररूपता । जो लोग वकार के उच्चारण में दोनों ओष्ठों का प्रयोग करके उसे बकार
बना देते हैं उन्हें यह वचन ध्यान से पढ़ना चाहिये ।
[लघु०] जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् ॥
अर्थः—जिह्वामूलीय का स्थान जिह्वा की जड़ होता है ।
व्याख्या—जिह्वामूलीयस्य ।६।१। जिह्वामूलम् ।१।१। जिह्वा का मूल स्थान
२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
प्राय कण्ठ के ही निकट होता है । अच् से परे तथा ककार खकार से पूर्व 'ᳵ' ऐसा
चिह्न जिह्वामूलीय का होता है इस का विवेचन आगे इसी प्रकरण में मूल में ही किया
जायेगा ।
[लघु०] नासिकाऽनुस्वारस्य ॥
अर्थ —अनुस्वार का नासिका-स्थान होता है ।
व्याख्या—नासिका ।१।१। अनुस्वारस्य ।६।१। अच् से परे '—' इस प्रकार
के चिह्न को 'अनुस्वार' कहते हैं । इस का विवेचन आगे मूल में ही किया जायेगा ।
[लघु०] इति स्थानानि ॥
अर्थः—ये स्थान समाप्त हुए ।
[लघु०] यत्नो द्विधा, आभ्यन्तरो बाह्यश्च । आद्यः पञ्चधा, स्पृष्टेषत्स्पृष्टे-
षद्द्विवृतविवृतसंवृतभेदात् । तत्र स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम् । ईषत्स्पृष्टमन्त -
स्थानाम् । ईषद्विवृतमूष्मणाम् । विवृतं स्वराणाम् । ह्रस्वस्यावर्णस्य प्रयोगे
संवृतम् । प्रक्रिया-दशायान्तु विवृतमेव ॥
अर्थ.—यत्न दो प्रकार का होता है, एक 'आभ्यन्तर' और दूसरा 'वाह्य' ।
पहला आभ्यन्तर-यत्न पांच प्रकार का होता है, १ स्पृष्ट, २ ईषत्स्पृष्ट, ३ ईषद्विवृत,
४ विवृत, ५ संवृत । इन में से स्पृष्ट-प्रयत्न स्पर्श अक्षरों का होता है । ईषत्स्पृष्ट-
प्रयत्न अन्त स्थ अक्षरों का होता है । ईषद्विवृत-प्रयत्न ऊष्म अक्षरों का होता है ।
स्वरों का विवृत-प्रयत्न होता है । ह्रस्व अवर्ण का उच्चारण-काल में संवृत-प्रयत्न और
प्रयोग-सिद्धि के समय केवल विवृत-प्रयत्न होता है ।
व्याख्या—कोशिश को 'यत्न' कहते हैं । वह यत्न यहां दो प्रकार का होता
है । एक वर्ण की उत्पत्ति से पूर्व और दूसरा वर्ण की उत्पत्ति के पश्चात् । जो यत्न
वर्णोत्पत्ति से पूर्व किया जाता है उसे 'आभ्यन्तर' तथा जो वर्णोत्पत्ति के अनन्तर किया
जाता है उसे 'बाह्य' कहते हैं । इन में प्रथम 'आभ्यन्तर' यत्न पांच प्रकार का होता
है। यथा—१ स्पृष्ट, २ ईषत्स्पृष्ट, ३ ईषद्विवृत, ४ विवृत, ५ संवृत । वर्णों की उत्पत्ति
में जिह्वा के अग्र, उपाग्र, मध्य तथा मूल भागों का उपयोग हुआ करता है । जिह्वा
का स्थान को छूना 'स्पृष्ट', थोड़ा छूना 'ईषत्स्पृष्ट', थोड़ा दूर रहना 'ईषद्विवृत', दूर
रहना 'विवृत' तथा हट कर समीप रहना 'संवृत' यत्न कहलाता है ।
स्पर्श अर्थात् 'क्' से लेकर 'म्' पर्यन्त वर्णों का 'स्पृष्ट' प्रयत्न है, अर्थात् इन
के उच्चारण में जिह्वा (यह उपलक्षणमात्र है, पवर्ग के उच्चारण में ओष्ठ भी समझ
लेना चाहिये) को स्थान के साथ स्पर्शरूप यत्न करना पड़ता है । अन्त स्थ अर्थात्
य्, व्, र्, ल् वर्णों का 'ईषत्स्पृष्ट' प्रयत्न है, अर्थात् इन के उच्चारण में जिह्वा (ओष्ठ
भी) को स्थान के साथ थोड़ा स्पर्शरूप यत्न करना पड़ता है । ऊष्म अर्थात् श्, ष्,
स्, ह् वर्णों का 'ईषद्विवृत' प्रयत्न है, अर्थात् इन के उच्चारण में जिह्वा को स्थान से
संज्ञा-प्रकरणम् २५
थोड़ी दूर रखना चाहिये । स्वरों का 'विवृत' प्रयत्न है; अर्थात् उनके उच्चारण में
जिह्वा (उकार के उच्चारण में ओष्ठ) को स्थान से दूर रखना चाहिये । ह्रस्व अवर्ण
का 'संवृत' प्रयत्न है; अर्थात् इस के उच्चारण में जिह्वा को स्थान से हटा कर उसके
समीप रखना चाहिये ।
उन सब प्रयत्नों का शिक्षा-ग्रन्थों में यथावत् वर्णन किया गया है वहीं देखें ।
उन प्रयत्नों से व्याकरण में और तो कोई दोष नहीं आता किन्तु ह्रस्व अकार दीर्घ
आकार का सवर्णी नहीं हो सकता; क्योंकि ह्रस्व अकार का संवृत और दीर्घ आकार
का विवृत प्रयत्न होता है । सावर्ण्य न होने से 'दण्ड + आनयन' इत्यादि में अकः सवर्णे
दीर्घः (४७) द्वारा सवर्णदीर्घ न हो सकेगा । इस दोष की निवृत्ति के लिये महामुनि
पाणिनि ने इस शास्त्र में प्रक्रिया-अवस्था में ह्रस्व अकार को विवृत माना है, इस से
दोनों की सवर्ण-संज्ञा हो जाने से कोई दोष नहीं आता । इस विषय का विस्तार
अ अ (८.४.६७) सूत्र पर 'काशिका' आदि व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में देखें ।
अब बाह्य-यत्न का वर्णन किया जाता है -
[लघु०] बाह्ययत्नस्त्वेकादशधा । विवारः संवारः श्वासो नादोऽघोषो
घोषोऽल्पप्राणो महाप्राण उदात्तोऽनुदात्तः स्वरितश्चेति । खरो विवाराः श्वासा
अघोषाश्च । हशः संवारा नादा घोषाश्च । वर्गाणां प्रथम-तृतीय-पञ्चमा यण-
श्चाल्पप्राणाः । वर्गाणां द्वितीय-चतुर्थौ शलश्च महाप्राणाः ॥
अर्थः-बाह्ययत्न ग्यारह प्रकार का होता है । १-विवार, २-संवार, ३-श्वास,
४-नाद, ५-अघोष, ६-घोष, १ ७-अल्पप्राण, ८-महाप्राण, ९-उदात्त, १०-अनुदात्त,
११-स्वरित । 'खर्' प्रत्याहार के अन्तर्गत वर्ण विवार, श्वास तथा अघोष यत्न वाले
होते हैं । 'हश्' प्रत्याहार के अन्तर्गत वर्ण संवार, नाद तथा घोष यत्न वाले होते हैं ।
वर्गों के प्रथम, तृतीय, पञ्चम और यण् अल्पप्राण यत्न वाले होते हैं । वर्गों के द्वितीय,
चतुर्थ और शल् महाप्राण यत्न वाले होते हैं ।
व्याख्या-हशः संवारा नादा घोषाश्च तथा यणश्चाल्पप्राणाः इन दोनों स्थानों
पर 'च' से 'अच्' का ग्रहण होता है । अतः अच्-संवार, नाद, घोष तथा अल्पप्राण
यत्न वाले हैं । उदात्त, अनुदात्त और स्वरित भी अचों के ही यत्न हैं इन का वर्णन
पीछे हो चुका है अतः यहां इन के विषय में कुछ नहीं कहा गया ।
यद्यपि यह वर्णन ध्वनिशास्त्र का विषय है तथापि यहां विवार आदि का
सङ्क्षिप्त सरलार्थ लिख देना अनुचित न होगा ।
विवार-वर्णोच्चारण के समय मुख के खुलने को विवार कहते हैं । जिन वर्णों
१. यहां पर अघोषः, घोषः ऐसा उपर्युक्त पाठ मानने से अन्वय ठीक हो जाता है,
फिर एक २ को छोड़ देने से “विवार, श्वास, अघोष" तथा "संवार, नाद, घोष"
यह क्रम भी ठीक हो जाता है।
२६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
के उच्चारण करते समय मुख खुलता है वे विवार-यत्न वाले कहाते हैं। संवार -
वर्णोच्चारण के समय मुख के विकास न होने को संवार कहते हैं। श्वास - वर्णोच्चा-
रण के समय श्वास चलने को श्वास यत्न कहते हैं। नाद - वर्णोच्चारण के समय नाद
अर्थात् गम्भीर ध्वनि होने को नाद यत्न कहते हैं। घोष-अघोष—वर्णोच्चारण के
समय घोष अर्थात् गूंज का उठना घोष तथा गूंज का न उठना अघोष यत्न कहाता है।
अल्पप्राण-महाप्राण—वर्णोच्चारण के समय प्राणवायु के अल्प उपयोग को अल्पप्राण
तथा अधिक उपयोग को महाप्राण यत्न कहते हैं।
अब उपर्युक्त स्थान-यत्न-प्रकरण में आए हुए १ १ स्पर्श २ अन्तस्थ या अन्तस्था,
३ ऊष्म, ४ स्वर, ५ जिह्वामूलीय ६ उपध्मानीय ७ अनुस्वार और ८ विसर्ग इन
आठ शब्दों की व्याख्या स्वयं ग्रन्थकार करते हैं—
[लघु०] कादयो मावसानाः स्पर्शाः। यणोऽन्तस्थाः। शल ऊष्माणः। अच
स्वराः। ≍ क ≍ ख इति कखाभ्यां प्रागर्धविसर्गसदृशो जिह्वामूलीयः।
≍ प ≍ फ इति पफाभ्यां प्रागर्धविसर्गसदृश उपध्मानीयः। 'अं अः' इत्यच
परावनुस्वारविसर्गौ॥
अर्थ — 'क्' से ले कर 'म्' पर्यन्त स्पर्श वर्ण हैं। यण् अर्थात् 'य्, व्, र्, ल्'
ये चार वर्ण अन्तस्थ वा अन्तस्था२ हैं। शल् अर्थात् 'श्, ष्, स्, ह्' ये चार वर्ण ऊष्म
हैं। अच् प्रत्याहार स्वर होता है। 'क्' अथवा 'ख्' वर्ण से पूर्व (तथा अच् से परे)
आधे विसर्ग के तुल्य जिह्वामूलीय होता है। 'प्' अथवा 'फ्' वर्ण से पूर्व (तथा अच्
से परे) आधे विसर्ग के तुल्य उपध्मानीय होता है। 'अं, अः' यहां अकार स्वर से परे
क्रमशः अनुस्वार तथा विसर्ग हैं।
व्याख्या—'क्' से 'म्' तक स्पर्श वर्ण हैं। यहां लौकिक क्रम का आश्रयण
किया गया है जो आज तक प्रसिद्ध चला आ रहा है। प्रत्याहारसूत्रों में 'क्' से 'म्'
तक मिलना असम्भव है अतः कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग ये पच्चीस वर्ण ही
स्पर्शसंज्ञक होते हैं। इन का नाम स्पर्श इस कारण से है क्योंकि इन का उच्चारण
जिह्वा (ओष्ठ भी) का स्थान के साथ स्पर्श होने से होता है। 'य्, व्, र्, ल्' इन चार
वर्णों को अन्तस्थ या अन्तस्था इसलिये कहते हैं क्योंकि ये स्वर और व्यञ्जनों के
बीच के रहते हैं। प्रत्याहारसूत्रों में भी स्वरों और व्यञ्जनों के मध्य इन को पढ़ा
गया है। ये व्यञ्जन भी हैं और स्वर भी। अंग्रेजी में इन को अर्धस्वर (Semi
Vowel) भी इसीलिये कहा जाता है। इको यणचि (१५), इग्यणः सम्प्रसारणम्
१ तत्र स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम्; ईषत्स्पृष्टम् अन्तस्थानाम्; ईषद्विवृतम् ऊष्मणाम्;
⁕विवृतं स्वराणाम्; जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम्; उपूपध्मानीयानामोष्ठौ; नासि-
काऽनुस्वारस्य, अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः।
२ अन्तस्थ' शब्द का उच्चारण रामशब्दवत् तथा 'अन्तस्था' शब्द का उच्चारण
विश्वपाशब्दवत् होता है।
संज्ञा-प्रकरणम् २७
(२५६) आदि सूत्र भी यही प्रकट करते हैं। कुछ लोगों का विचार है कि प्रसिद्ध-
लिपिक्रम में स्पर्शों और ऊष्मों के मध्य में वर्त्तमान होने से इन का नाम अन्तस्थ पड़
गया है। 'श्, ष्, स्, ह्' ये चार वर्ण ऊष्म कहाते हैं। इन को ऊष्म कहने का कदाचित्
यह प्रयोजन है कि इन के उच्चारण में गरम वायु निकलती है। कुछ लोगों की राय
है कि इन के उच्चारण में शरीर में उष्णता - गरमी का अधिक सञ्चार होता है
अतः ये ऊष्म कहाते हैं। 'क्' या 'ख्' परे होने पर विसर्ग के स्थान पर जिह्वामूलीय
तथा 'प्' या 'फ्' परे होने पर उपध्मानीय आदेश होते हैं यह आगे कुप्वोः ≍ क ≍
पौ च (६८) सूत्र पर स्पष्ट करेंगे। ये जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय आधे विसर्ग के
सदृश होते हैं। यहां सादृश्य उच्चारण की अपेक्षा से नहीं किन्तु लिपि की अपेक्षा से
समझना चाहिये। यथा विसर्ग का स्वरूप ' ः ' इन ऊपर नीचे लिखे दो गोल शून्य
चिह्नों से प्रकट किया जाता है, इनका आधा ' ≍ ' यही उपध्मानीय और जिह्वा-
मूलीय का स्वरूप समझना चाहिये। अनुस्वार की आकृति ' ं ' इस प्रकार ऊपर
एक बिन्दुरूप होती है। यह सदा स्वर के ऊपर लिखा जाता है परन्तु इस की स्थिति सदा
स्वर के अनन्तर स्वीकार की जाती है। अनुस्वार का चिह्न यथा—अं, इं, उं, कं, किं,
कुं इत्यादि। विसर्ग की आकृति ' ः ' इस प्रकार दो गोल चिह्नों से प्रकट की जाती है।
यह सदा स्वर के आगे प्रयुक्त किया जाता है। इसकी स्थिति भी स्वर के अनन्तर ही
स्वीकार की जाती है। विसर्ग का उदाहरण यथा—अः, इः, उः, कः, किः, कुः इत्यादि।
(१) अथ स्थान-बोधक-चक्रम्
| कण्ठः | तालु | ओष्ठौ | मूर्धा | दन्ताः | नासिका | कण्ठतालु | कण्ठोष्ठम् | दन्तोष्ठम् | जिह्वा० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | इ | उ | ऋ | ऌ | ङ् | ए | ओ | व् | ≍क |
| क् | च् | प् | ट् | त् | म् | ऐ | औ | ≍ख | |
| ख् | छ् | फ् | ठ् | थ् | ञ् | ||||
| ग् | ज् | ब् | ड् | द् | ण् | ||||
| घ् | झ् | भ् | ढ् | ध् | न् | ||||
| ङ् | ञ् | म् | ण् | न् | ं | ||||
| ह् | य् | ≍प् | र् | ल् | |||||
| ः | श् | ≍फ् | ष् | स् |
२८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्या
(२) अथ आभ्यन्तर-यत्न-बोधक-चक्रम्
| स्पृष्टम् | ईषत्स्पृष्टम् | विवृतम् | ईषद्विवृतम् | संवृतम् |
|---|---|---|---|---|
| क्, ख्, ग्, घ्, ङ् | य् | अ ए | श् | ह्रस्वस्य |
| च्, छ्, ज्, झ्, ञ् | व् | इ ओ | ष् | अवर्णस्य |
| ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण् | र् | उ ऐ | स् | उच्चारणकाले |
| त्, थ्, द्, ध्, न् | ल् | ऋ औ | ह् | केवलम् |
| प्, फ्, ब्, भ्, म् | ऌ |
(३) अथ बाह्य-यत्न-बोधक-चक्रम्
| विवारः, श्वासः, अघोष | संवार, नाद., घोष | अल्पप्राण | महाप्राण | उदात्तानुदात्त-स्वरिताः |
|---|---|---|---|---|
| क्, ख्, | ग्, घ्, ङ् | क्, ग्, ङ् | ख्, घ् | अ |
| च्, छ् | ज्, झ्, ञ् | च्, ज्, ञ् | छ्, झ् | इ |
| ट्, ठ् | ड्, ढ्, ण् | ट्, ड्, ण् | ठ्, ढ् | उ |
| त्, थ् | द्, ध्, न् | त्, द्, न् | थ्, ध् | ऋ |
| प्, फ् | ब्, भ्, म् | प्, ब्, म् | फ्, भ् | ऌ |
| श् | य्, व् | य् ⎫ | श् | ए |
| ष् | र्, ल् | व् ⎪ | ष् | ओ |
| स् | ह्, | र् ⎬ [सर्व स्वर] | स् | ऐ |
| [सर्व स्वर] | ल् ⎭ | ह् | औ |
संज्ञा-प्रकरणम् २६
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् (-११) अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः ।१।१।६८॥
प्रतीयते-विधीयत इति प्रत्ययः । अविधीयमानोऽण् उदिच्च सवर्णस्य
सञ्ज्ञा स्यात् । अत्रैवाण् परेण णकारेण । कुँ, चुँ, टुँ, तुँ, पुँ—एत उदितः ।
तदेवम्—अ इत्यष्टादशानां सञ्ज्ञा, तथेकारोकारौ । ऋकारस्त्रिंशतः, एवम्
लृकारोऽपि । एचो द्वादशानाम् । अनुनासिकाऽननुनासिकभेदेन यवला द्विधा,
तेनाऽननुनासिकास्ते द्वयोर्द्वयोः सञ्ज्ञा ॥
अर्थः- जिस का विधान किया जाये उसे 'प्रत्यय' कहते हैं। अप्रत्यय अर्थात्
न विधान किया हुआ अण् और उदित् सवर्णों की तथा अपनी सञ्ज्ञा वाला हो।
अत्रैवाण्—केवल इसी सूत्र में अण् प्रत्याहार पर णकार से गृहीत होता है। 'कुँ, चुँ,
टुँ, तुँ, पुँ' इन को उदित् कहते हैं। इस प्रकार 'अ' यह अठारह प्रकार की सञ्ज्ञा वाला
हो जाता है। इसी प्रकार 'इ' और 'उ' भी। ऋकार तीस प्रकार की सञ्ज्ञा वाला
होता है। इसी प्रकार लृकार भी। एच् प्रत्याहार का प्रत्येक बारह २ प्रकार की
सञ्ज्ञा है। अनुनासिक और अननुनासिक भेद से य्, व्, ल् दो प्रकार के होते हैं, अतः
अननुनासिक य्, व्, ल् ही दो २ की सञ्ज्ञा होंगे।
व्याख्या- अण् ।१।१। उदित् ।१।१। सवर्णस्य ।६।१। च इत्यव्ययपदम्।
अप्रत्ययः ।१।१। स्वस्य ।६।१। (चकार के बल से स्वं रूपं शब्दस्याऽशब्दसञ्ज्ञा सूत्र
में 'स्वम्' पद आ कर षष्ठ्यन्त में परिणत हो जाता है)। समासः- उद्=ह्रस्व
उवर्णः इत् यस्मात् स उदित्, बहुव्रीहि-समासः । प्रतीयते==विधीयते इति प्रत्ययः,
प्रतिपूर्वाद् इणः कर्मणि अच्प्रत्ययः। न प्रत्ययः = अप्रत्ययः, नञ्तत्पुरुषसमासः । अर्थः-
(अप्रत्ययः) न विधान किया हुआ (अण्) अण् और (उदित्) उदित् (सवर्णस्य)
सवर्णियों की (च) तथा (स्वस्य) अपने स्वरूप की सञ्ज्ञा होता है।
'प्रत्यय' शब्द यहाँ यौगिक है, इस का अर्थ है 'विधान किया हुआ'। यथा-
इको यण् अचि (१५) सूत्र में 'यण्' और सनाद्यंसभिक्ष उः (८४०) सूत्र में 'उ'
विधान किया गया है। अतः ये दोनों प्रत्यय हैं।
अण् तथा इण् प्रत्याहार दो प्रकार से बन सकते हैं। एक-अ इ उ ण् के
णकार से और दूसरा लँण् के णकार से। कहां पूर्व णकार से तथा कहां पर णकार
से इन का ग्रहण करना चाहिये ? इस विषय में ऊहापोह द्वारा निश्चित भाष्य-सम्मत
निर्णय यह है-
परेणैवेण्ग्रहाः सर्वे, पूर्वेणैवाण्ग्रहा मताः ।
ऋतेऽणुदित्सवर्णस्येत्येतदेकं परेण तु ॥
अर्थात् इण् प्रत्याहार सर्वत्र पर लँण् वाले णकार से तथा अण् प्रत्याहार अणु-
दित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः (११) को छोड़ सर्वत्र अइउण् वाले णकार से ग्रहण करना
चाहिये । अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः सूत्र में अण् प्रत्याहार लँण् वाले णकार से ग्रहण
किया जाता है। इस नियम के अनुसार यहां 'अण्' पर णकार से ग्रहण होता है । तो
३० भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
इस प्रकार यहां 'अण्' में 'अ इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह्, य्, व्, र्, ल्' इन
चौदह वर्णों का ग्रहण होता है। यदि ये वर्ण अविधीयमान (न विधान किये हुए)
होंगे तो अपनी तथा अपने सवर्णियों की सञ्ज्ञा होंगे। यथा—इको यण् अचि (१५)
यहां इक् और अच् अविधीयमान हैं—विधान नहीं किये गये (विधान तो यण् ही
किया गया है), इस से इक्-प्रत्याहारान्तर्गत 'इ, उ, ऋ, ऌ' ये चार वर्ण अपनी तथा
अपने सवर्णियों की सञ्ज्ञा होंगे। इस से 'सुधी +उपास्य' यहां दीर्घ ईकार के स्थान
पर भी यण् हो जाता है। एवम् अच् प्रत्याहार के अन्तर्गत 'अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए,
ओ, ऐ, औ' ये नौ वर्ण भी अपनी तथा अपने सवर्णियों की सञ्ज्ञा होंगे। इस से 'दधि
+आनय = दध्यानय' यहां दीर्घ आकार के परे होने पर भी यण् सिद्ध हो जाता है।
'कुं, चुं, टुं, तुं, पुं' ये इस शास्त्र में उदित् माने जाते हैं। इन के उकार की
उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से इत्सञ्ज्ञा होती है। यद्यपि 'कुं, चुं, टुं, तुं, पुं'
इन समुदायों का कोई सवर्ण नहीं होता तथापि इन समुदायों के आदि वर्ण 'क्, च्,
ट्, त्, प्' के सवर्णों का तथा उन के स्वरूप का यहां ग्रहण समझना चाहिये। 'क्' के
सवर्ण 'ख्, ग्, घ्, ङ्' ये चार वर्ण हैं अतः 'कुं' कहने से इन चार वर्णों तथा पांचवें
अपने रूप 'क्' अर्थात् कुल मिला कर पांच वर्णों का ग्रहण होगा। इसी प्रकार 'चुं'
से चवर्ग, 'टुं' से टवर्ग, 'तुं' से तवर्ग तथा 'पुं' से पवर्ग का ग्रहण होगा।
उदित् के साथ 'अप्रत्यय' का सम्बन्ध नहीं है, अतः उदित् चाहे विधीयमान
हो या अविधीयमान, प्रत्येक अवस्था में अपनी तथा अपने सवर्णों की सञ्ज्ञा होगा।
यथा—चोः कुः (३०६) यहां 'चुं' अविधीयमान और 'कुं' विधीयमान है, दोनों अपने
तथा अपने सवर्णों के ग्राहक होंगे। 'अण्' के साथ 'अप्रत्यय' का सम्बन्ध इस लिये
किया गया है कि सनाशंसभिक्ष उः (८४०) इत्यादि स्थानों में विधीयमान उकार
आदि सवर्णों के ग्राहक न हों, इस से दीर्घ ऊकार आदि प्रसक्त न होंगे।
अब अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह्, य्, व्, र्, ल् ये सञ्ज्ञाएं हैं, इन
के सञ्ज्ञी निम्नप्रकार से होते हैं।
अ, इ, उ
इन सञ्ज्ञाओं के पीछे लिखे अनुसार अठारह २ सञ्ज्ञी होते हैं।
ऋ, ऌ
वार्त्तिक (१) से इन दोनों की सवर्णसञ्ज्ञा हो जाने के कारण प्रत्येक वर्ण
के तीस २ सञ्ज्ञी होते हैं। ('ऋ' के १८ + 'ऌ' के १२ = ३०)।
ए, ओ, ऐ, औ
ह्रस्व न होने के कारण इन सञ्ज्ञाओं में से प्रत्येक वर्ण के पीछे लिखे अनु-
सार बारह २ सञ्ज्ञी होते हैं।
य्, व्, ल्
ये दो प्रकार के होते हैं, एक अनुनासिक और दूसरे अननुनासिक। अण् प्रत्या-
हार में अननुनासिक य्, व्, ल् का पाठ है, अतः अननुनासिक ही अपनी तथा दूसरे
संज्ञा-प्रकरणम् ३१
अनुनासिकों की संज्ञा होते हैं। यहां यह भी समझ लेना चाहिये कि दीर्घ तथा प्लुत
वर्ण अण्प्रत्याहारान्तर्गत न होने से सवर्णों के ग्राहक नहीं हुआ करते। ह्रस्व वर्ण ही
(एच् दीर्घ ही) अणों में गृहीत होते हैं, अतः वे ही सवर्णों के ग्राहक हैं।
रेफ और हकार अणों के अन्तर्गत होते हुए भी किसी अन्य वर्ण के ग्राहक
नहीं होते, क्योंकि शिक्षाकारों का कथन है कि-रेफोष्मणां सवर्णा न सन्ति अर्थात्
रेफ और ऊष्म वर्णों के सवर्ण नहीं हुआ करते।
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (१२) परः संनिकर्षः संहिता ।१।४।१०८॥
वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहिता-सञ्ज्ञः स्यात् ॥
अर्थः-वर्णों की अत्यन्त समीपता संहिता-सञ्ज्ञक होती है।
व्याख्या-परः ।१।१। सन्निकर्षः ।१।१। संहिता ।१।१। अर्थः- (परः) अत्यन्त
(सन्निकर्षः) सामीप्य (संहिता) 'संहिता' सञ्ज्ञक होता है। दो वर्णों के मध्य आधी
मात्रा से कम का व्यवधान सम्भव नहीं हो सकता; यही अत्यन्त समीपता 'संहिता'
कहाती है। संहितासंज्ञा का सोदाहरण विवेचन आगे (१५) सूत्र पर देखें।
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (१३) हलोऽनन्तराः संयोगः ।१।१।७॥
अजिभिरव्यवहिता हलः संयोग-सञ्ज्ञाः स्युः ॥
अर्थः-अचों के व्यवधान से रहित हलों की 'संयोग' सञ्ज्ञा हो।
व्याख्या-हलः ।१।३। अनन्तराः ।१।३। संयोगः ।१।१। समासः--अविद्य-
मानम् अन्तरम् = व्यवधानं येषान्तेऽनन्तराः, बहुव्रीहि-समासः। अर्थः- (अनन्तराः)
जिन में अन्तर अर्थात् व्यवधान नहीं ऐसे (हलः) हल् (संयोगः) संयोग-सञ्ज्ञक होते
हैं। व्यवधान (परदा) सदा विजातियों का ही हुआ करता है; सजातियों का नहीं।
हल् के विजातीय अच् हैं। अतः यदि हल्, अचों के व्यवधान से रहित होंगे तो उन
की संयोग सञ्ज्ञा होगी। सूत्र में 'हलः' पद में बहुवचन विवक्षित नहीं, किन्तु जाति
में बहुवचन किया गया है। इस से दो या दो से अधिक हलों की संयोग-सञ्ज्ञा सिद्ध
हो जाती है। उदाहरण यथा--मृट् । यहां 'भृस्ज्' शब्द के आगे 'सुँ' प्रत्यय के अपृक्त
सकार का लोप होने पर स् और ज् की संयोग-सञ्ज्ञा हो कर स्कोः संयोगाद्योरन्ते च
(३०६) सूत्र से संयोग के आदि सकार का लोप हो जाता है। इसी प्रकार 'इन्द्रः' में
नकार दकार और रेफ की, 'उष्ट्रः' में षकार टकार और रेफ की संयोगसञ्ज्ञा समझनी
चाहिये।
नोट-ध्यान रहे कि प्रत्येक हल् की संयोगसञ्ज्ञा नहीं होती किन्तु सम्पूर्ण
हल्-समुदाय की ही हुआ करती है। फिर चाहे वह हल्-समुदाय दो हलों का हो अथवा
दो से अधिक हलों का।
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम् - (१४) सुँप्तिङन्तं पदम् ।१।४।१४॥
सुबन्तं तिङन्तञ्च पदसञ्ज्ञं स्यात् ॥
अर्थः-सुँबन्त और तिङन्त शब्द-स्वरूप पद-सञ्ज्ञक होते हैं।
३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
व्याख्या — सुप्तिङन्तम् १।१। पदम् १।१। समास — सुप च तिङ् च सुप्तिङौ, इतरे-
तरद्वन्द्वः । सुप्तिङौ अन्तो यस्य तत्—सुप्तिङन्तम् (शब्दस्वरूपम्), बहुव्रीहि समास ।
अर्थ — (सुप्तिङन्तम्) सुबन्त और तिङन्त शब्द-स्वरूप (पदम्) पद-सञ्ज्ञक होते हैं ।
यहां शब्दानुशासन-शास्त्र के प्रस्तुत होने से सुप्तिङन्तम् पद का 'शब्द-स्वरूपम्' विशेष्य
अध्याहार कर लिया जाता है । स्वौजसमौट्० (११८) सूत्र से विधान किये गये इक्कीस
प्रत्यय 'सुप्' तथा तिप्तस्झिसिप्० (३७५) सूत्र से विधान किये गये अठारह प्रत्यय
'तिङ्' कहाते हैं । ये सुप् वा तिङ् प्रत्यय जिसके अन्त में हों उन की पद-सञ्ज्ञा होती
है । यहां यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि इन प्रत्ययों से युक्त सम्पूर्ण समुदाय
की ही पद सञ्ज्ञा होती है । केवल प्रकृति वा प्रत्यय की नहीं । उदाहरण यथा—
‘रामः पुष्प, देवस्य पुष्पस्य’ इत्यादि सुप् अन्त में होने के कारण ‘पदसञ्ज्ञक’ हैं ।
पचति, पठति अपचत् अपठत् —इत्यादि तिङ् अन्त में होने के कारण पदसञ्ज्ञक हैं ।
पदसञ्ज्ञा का प्रयोजन आगे (७७ ८० ६३ १०५ आदि) सूत्रों से स्पष्ट होगा । इस सूत्र
में 'अन्त' ग्रहण का प्रयोजन आगे (१५४) सूत्र पर स्पष्ट करेंगे ।
[लघु०] इति सञ्ज्ञा-प्रकरणं समाप्तम् ॥
अर्थ —यह सञ्ज्ञा प्रकरण समाप्त होता है ।
व्याख्या —इस प्रकरण में यद्यपि व्याकरण-गत सम्पूर्ण सञ्ज्ञाओं का समावेश
नहीं किया गया तथापि सन्धि-प्रकरण के लिये उपयोगी प्रायः सभी सञ्ज्ञाओं का
इस में वर्णन आ गया है । 'प्रायः' कथन का यह तात्पर्य है कि अदेङ् गुण (२५),
वृद्धिरादैच् (३२), अचोऽन्त्यादि टि (३६), तस्य परमाम्रेडितम् (६६) प्रभृति सूत्रों
से गुण, वृद्धि, टि और आम्रेडित आदि अन्य भी सन्ध्युपयोगी सञ्ज्ञाएं आगे कही
गई हैं ।
अभ्यास (१)
(१) 'क्, श्, ए, व्, ऌ, म्, ख्, ह्, अ, र्, औ, ऋ' इन वर्णों के स्थान तथा
दोनों प्रकार के यत्न लिख कर यथासम्भव सवर्णों का भी निर्देश करें ।
(२) 'अण्, टव्, रल्, जश्, यण्, छव्, मय्, झय्, रँ' इन प्रत्याहारों की प्रसून
सिद्धि कर तदन्तर्गत वर्णों का संक्षिप्तरीत्या उल्लेख करें ।
(३) अचों में परस्पर कितने प्रकार का अन्तर सम्भव है, उदाहरण द्वारा
स्पष्ट करें ।
(४) कौन सूत्र 'ऋ' सञ्ज्ञा करता है ? इस के कितने और कौन से सञ्ज्ञी
होते हैं ?
(५) अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय सूत्र में 'अप्रत्यय' पद का क्या अभिप्राय है
और इस का किस के साथ सम्बन्ध है ? सोदाहरण स्पष्ट करें ।
(६) सञ्ज्ञा और सञ्ज्ञी स्पष्ट करते हुए अदर्शनं लोप सूत्र के 'अदर्शनम्'
पद का विवेचन करें ।
संज्ञा-प्रकरणम् ३३
(७) 'इतः' पद के पीछे से प्राप्त होने पर भी तस्य लोपः सूत्र में 'तस्य' पद
के ग्रहण का क्या प्रयोजन है ?
(८) उदात्त, अनुदात्त और स्वरित में परस्पर भेद बताएं ।
(६) 'उपदेश' किसे कहते हैं ? यथाधीन स्पष्ट करें ।
(१०) अष्टाध्यायी किस ने बनाई है ? इस में कितने अध्याय और कितने
पाद हैं ? लघु-सिद्धान्त-कौमुदी के साथ अष्टाध्यायी का क्या संबन्ध है ?
(११) त्रिमुनि व्याकरणम् और उत्तरोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम् का भाव स्पष्ट
करें ।
(१२) लघु-सिद्धान्त-कौमुदी शब्द का अर्थ लिख कर इस के कर्त्ता के विषय
में संक्षिप्त नोट लिखें ।
(१३) 'उ' और 'ई' में, 'ऋ' और 'ऌ' में, 'ए' और 'ओ' में, 'ओ' और 'औ'
में पारस्परिक भेद बताएं ।
(१४) आभ्यन्तर और बाह्य यत्नों के भेद लिख कर उन का सार्थ विवेचन
करें ।
(१५) यदि सम्पूर्ण स्थान तुल्य होने पर ही सवर्ण-सञ्ज्ञा होती है तो क्या
'क्' और 'ङ्' की सवर्णसञ्ज्ञा नहीं होगी ?
(१६) 'ऌ' और 'ऐ' के बारह-बारह भेद सूत्रों द्वारा सिद्ध करें ।
(१७) 'संयोग' सञ्ज्ञा क्या प्रत्येक वर्ण की है या समुदाय की ? स्पष्ट करें ।
(१८) अर्ध-विसर्ग-सदृश उपध्मानीयः इस वचन का विवेचन करें ।
(१६) निम्न-लिखित सूत्रों का सूत्रस्थ पदों द्वारा अर्थ निकाल कर व्याख्यान
करें—तुल्यास्य-प्रयत्नं सवर्णम् । अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः । हलोऽ-
नन्तराः संयोगः । ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः । समाहारः स्वरितः ।
(२०) पद, संहिता, अनुनासिक और लोप सञ्ज्ञा करने वाले सूत्र सार्थ लिखें ।
(२१) इति सञ्ज्ञा-प्रकरणं समाप्तम् इस वचन की विस्तृत समालोचना करें ।
(२२) विसर्जनीय के स्थान का शास्त्रीत्या विवेचन करें ।
(२३) सूत्रों के आगे मुद्रित तीन संख्याओं का क्या तात्पर्य होता है ?
(२४) किस २ प्रत्याहार के अन्तर्गत निम्नस्थ वर्ण आते हैं ?
श्, ष्, स्; य्, व्, र्, ल्; च्, ट्, त्, क्, प्; वर्गतृतीय; वर्गपञ्चम ।
इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त-
कौमुद्यां सन्ध्युपयोगिसंज्ञानां
प्रायोवर्णनं समाप्तम् ॥
ल० प्र० (३)