लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंज्ञा-प्रकरणम् २१
नोट न हि सर्वः सर्वं जानाति (हर एक पुरुष हर एक बात का ज्ञाता नहीं
हुआ करता) इस न्यायानुसार मुनिवर पाणिनि से जो कुछ छूट गया उसकी पूर्ति
करने तथा मुनिवर पाणिनि के सूत्रपाठ का तात्पर्य समझाने के लिये महामुनि कात्या-
यन ने वार्त्तिक-पाठ का निर्माण किया है। इस वार्त्तिक-पाठ की भी त्रुटियों को दूर
करने के लिये तथा कात्यायन का आशय स्पष्ट करने के लिये महामुनि पतञ्जलि ने
महाभाष्य नामक अति-सुन्दर वृहत्काय ग्रन्थ रचा है। यही तीनों मुनि इस व्याकरण
के मुनित्रय कहलाते हैं और इन के कारण ही इस पाणिनीय-व्याकरण को त्रिमुनि
व्याकरणम् कहते हैं। इन मुनियों में उत्तरोत्तर मुनि अर्थात् पाणिनि से कात्यायन
तथा कात्यायन से पतञ्जलि अधिक प्रामाणिक हैं। इस का कारण यह है कि जगत्
में यह नियम है कि सब से पहले पुरुष को जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता
है वैसा उत्तरोत्तर पुरुषों को नहीं, क्योंकि पहले पुरुष की सम्पूर्ण विचारधारा उत्तर-
पुरुष को अनायास प्राप्त हो जाती है इस से वह उस से आगे के लिये यत्न किया
करता है, अत एव बुद्धिमान् लोग उत्तरोत्तर को अधिक प्रामाणिक माना करते हैं।
उत्तरोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम् यह उक्ति भी इसी आधार पर आश्रित है।
सूचना—इस ग्रन्थ में कात्यायन की वार्त्तिकों के आदि में वा० ऐसा चिह्न कर
दिया गया है और इन की क्रमसंख्या भी सूत्रक्रम से पृथक् निर्दिष्ट की गई है।
सवर्णसंज्ञा में स्थान और प्रयत्न का उपयोग होने से अब उन का विवेचन
किया जाता है—
[लघु०] अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः॥
अर्थः—अठारह प्रकार के अवर्ण, कवर्ग, हकार तथा विसर्ग का कण्ठ स्थान
होता है।
व्याख्या—अकुहविसर्जनीयानाम् ।६।३। कण्ठः ।१।१। समासः—अश्च कुश्च
हश्च विसर्जनीयश्च अकुहविसर्जनीयाः, तेषाम् = अकुहविसर्जनीयानाम्, इतरेतरद्वन्द्वः।
यहां 'अ' से लोकप्रसिद्धनुसार सारे का सारा अवर्णकुल तथा 'कु' से कवर्ग का ग्रहण
समझना चाहिये। विसर्जनीय और विसर्ग पर्याय अर्थात् एकार्थवाची शब्द हैं। यहां
यह ध्यान रहे कि विसर्ग का कण्ठस्थान तभी होता है जब वह अकाराश्रित अर्थात्
अकार से परे होता है; जैसा कि पाणिनि के नाम से प्रचलित पाणिनीय-शिक्षा में कहा
गया है—
अयोगवाहा विज्ञेया आश्रयस्थानभागिनः। (श्लोक २२)
अयोगवाहों (यम, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय) का
वही स्थान होता है जिस के वे आश्रित होते हैं। यम और अनुस्वार नासिकास्थानीय
ही रहते हैं, क्योंकि शिक्षा में कहा गया है—
अनुस्वारयमानाञ्च नासिकास्थानमुच्यते। (श्लोक २२)