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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 633 में से

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पृष्ठ 29

१४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
समास —उश्च ऊश्च ऊ३श्च =व । इतरेतरद्वन्द्व । व कालो यस्य स =ऊकाल ।
बहुव्रीहि-समास । (एकमात्रिक उकार द्विमात्रिक उकार तथा त्रिमात्रिक उकार का
द्वन्द्व करने से 'जस्' विभक्ति मे 'व' रूप निष्पन्न होता है। यहां सब उकार लक्षणा-
शक्ति मे अपने २ उच्चारणकाल के सदृश अर्थ वाले हैं)। ह्रस्वश्च दीर्घश्च प्लुतश्च =
ह्रस्वदीर्घप्लुत । इतरेतरद्वन्द्व । (यहा इतरेतरद्वन्द्व होने से यद्यपि बहुवचन होना
चाहिये था तथापि सौत्र होने के कारण एकवचन हो गया है) । अर्थ —(ऊकाल )
एकमात्रिक उकार के सदृश उच्चारणकाल वाला, द्विमात्रिक उकार के सदृश उच्चारण-
काल वाला तथा त्रिमात्रिक उकार के सदृश उच्चारणकाल वाला (अच् ) अच्, क्रमशः
(ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत ) ह्रस्व दीर्घ तथा प्लुत संज्ञक होता है। भाव --यदि एकमात्रिक¹
उकार के उच्चारणकाल के समान किसी अच् का उच्चारण-काल होगा तो वह ह्रस्व,
यदि द्विमात्रिक उकार के उच्चारण-काल के समान किसी अच् का उच्चारण-काल
होगा तो वह दीर्घ और यदि त्रिमात्रिक उकार के उच्चारणकाल के समान किसी अच्
का उच्चारण-काल होगा तो वह प्लुत संज्ञक होगा ।
कुक्कुट के 'कु कू कू३' शब्द मे क्रमशः ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत उकार का
उच्चारण स्पष्ट प्रतीत होता है अतः यहां दृष्टान्त के लिये उकार को उपयुक्त समझा
गया है वरन् 'आकाल' आदि भी कहा जा सकता था ।
इस प्रकार अचों के ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत ये तीन २ भेद हो जाते हैं (ध्यान
रहे कि यहां सामान्यतः कथन किया गया है, सब अचों के तीन तीन भेद नही होते,
पर हां यह तीनों भेद अचों के ही होते हैं अन्य वर्णों के नही) । अब अग्रिम तीन सूत्रो
से प्रत्येक के उदात्त, अनुदात्त और स्वरित तीन २ भेद कहे जाते हैं—
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(६) उच्चैरुदात्तः ।१।२।२६॥
(ताल्वादिषु सभागेषु स्थानेषूर्ध्वभागे निष्पन्नोऽजुदात्तसंज्ञ स्यात् ॥)
संज्ञा-सूत्रम्—(७) नीचैरनुदात्तः ।१।२।३०॥
(ताल्वादिषु सभागेषु स्थानेष्वधोभागे निष्पन्नोऽजनुदात्तसंज्ञ स्यात् ॥)
अर्थ — भागो वाले तालु आदि स्थानो मे जो अच् ऊपरले भाग में बोला जाय
वह उदात्त होता है ॥६॥
१. कई लोग -जितनी देर मे आंख झपकती है उसे 'मात्रा' कहते हैं । कुछ लोग—
जितनी देर में बिजली चमकती है उसे 'मात्रा' कहते हैं । अन्य लोग —जितनी
देर मे झरोखे के बीच कण दिखाई देता है उसे 'मात्रा' कहते हैं । इतर लोग—
चाष—नीलकण्ठ पक्षी जितनी देर में बोलता है उसे 'मात्रा' मानते हैं। ये सब
प्राचीन शिक्षाकार आचार्यों के मत हैं । परन्तु आजकल एक सैकेण्ड के समय
को मात्रा-समय मानना सरल प्रतीत होता है । ह्रस्व के बोलने में एक सैकेण्ड,