लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
२१४ भैमीव्याख्ययोपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
होनी, क्योंकि वहाँ 'निर्जर' शब्द है 'जरा' नहीं। अब इस परिभाषा से तदन्तघटित
'निर्जर' के जरा में भी आदेश की प्रवृत्ति हो जाती है—यह यहाँ लाभ है।
अब यहाँ यह सन्देह होता है कि 'निर्जर' शब्द में 'जरा' नहीं 'जर' है। आदेश
जरा के स्थान पर ही होता है अतः यहाँ जरस् नहीं होना चाहिये। इस अड़चन को
दूर करने के लिये अग्रिम-परिभाषा प्रवृत्त होती है—
[लघु०] एकदेशविकृतमनन्यवत् (प०)। इति जराशब्दस्य जरस्—निर्जरसौ।
निर्जरसः । इत्यादि। पक्षे हलादौ च रामवत् ॥
अर्थ — अवयव के विकृत हो जाने पर अवयवी अन्य के समान नहीं हो जाता।
व्याख्या यह परिभाषा लोकन्याय पर आश्रित है अर्थात् जैसे लोक में किसी
कुत्ते की पूँछ कट जाने पर वह अन्य नहीं हो जाता, कुत्ता ही रहता है, इसी
प्रकार यहाँ शास्त्र में भी यदि किसी शब्द में व्याकरणजन्य कुछ विकृति आ जाये तो
वह वही शब्द रहता है अन्य शब्द नहीं हो जाता। तो इस प्रकार 'निर्जर' के अन्तर्गत
'जरा' के 'जर' हो जाने पर भी वह 'जरा' ही रहता है कुछ अन्य नहीं हो जाता।
इस से 'जर' को भी जरस् आदेश हो जाता है।
'निर्जर + औ' यहाँ 'जर' को जरस् आदेश होकर—निर्जरस् + औ = 'निर्ज-
रसौ' रूप सिद्ध हो जाता है। पक्ष में रामशब्दवत् प्रक्रिया होकर 'निर्जरौ' रूप बनता
है। इसी प्रकार आगे भी अजादि विभक्तियों में समझ लेना चाहिये। 'निर्जर' शब्द की
सम्पूर्ण रूपमाला यथा—
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्र० निर्जर निर्जरसौ, निर्जरौ निर्जरसः, निर्जराः
द्वि० निर्जरसम्, निर्जरम् " " निर्जरसः, निर्जरान्
तृ० निर्जरसा, निर्जरेण निर्जराभ्याम् निर्जरैः
च० निर्जरसे, निर्जराय " निर्जरेभ्यः
प० निर्जरसः, निर्जरात् " "
ष० निर्जरसः, निर्जरस्य निर्जरसोः, निर्जरयोः निर्जरसाम्, निर्जराणाम्
स० निर्जरसि, निर्जरे " " निर्जरेषु
सं० हे निर्जर ! हे निर्जरसौ!, निर्जरौ ! हे निर्जरसः !, निर्जराः !
इसी प्रकार जराशब्दान्त 'दुर्ज्जर' प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं।
ध्यान रहे कि— इन, आत्, स्य, य तथा नुट् आदियों से जरस् आदेश पर है;
अतः प्रथम जरस् आदेश प्रवृत्त होकर तदनन्तर उन की बारी आयेगी। परन्तु जरस्
हो चुकने पर अङ्ग के अदन्त या अजन्त न रहने से उन की प्रवृत्ति न होगी। यदि
प्रथम 'इन' आदि आदेश हो जाते तो टा में 'निर्जरसिन', ङसिं में 'निर्जरसात्' तथा
ङस्, ङे और आम् में हलादि हो जाने से जरस् आदेश न हो— 'निर्जरस्य', निर्जराय'
और 'निर्जराणाम्' यह एक-एक रूप बन कर अनिष्ट हो जाता।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २१५
प्रश्न—निर्जर शब्द से तृतीया का बहुवचन भिस् करने पर जब अतो भिस
ऐस् (१४२) से भिस् को ऐस् हो जाता है तब जरस् आदेश क्यों नहीं होता ?
उत्तर—सन्निपातलक्षणो विधिरनिमित्तं तद्विघातस्य [सन्निपातः = संयोगः,
लक्षणम् = निमित्तं यस्य स सन्निपातलक्षणो विधिः । तम् = सन्निपातं विहन्तीति—
तद्विघातः, कर्मण्युपपदे कर्त्तर्यण् । तस्य अनिमित्तम्भवति, कारणन्न भवतीत्यर्थः ।] जिस
के विद्यमान होने पर जो कार्य हुआ हो वह कार्य उस निमित्त के विघातक कार्य में
निमित्त नहीं हुआ करता । तथा ह्यत्र—अदन्त अङ्ग निर्जर के होने से अतो भिस ऐस्
(१४२) द्वारा भिस् के स्थान में ऐस् हुआ है । तो यह ऐस् आदेश, अदन्त अङ्ग को
नष्ट करने वाले = जरस् आदेश का निमित्त नहीं होगा—अर्थात् इसे मान कर जरस्
आदेश न हो सकेगा।
प्रश्न—यदि ऐसा है तो 'रामाय' में सुंपि च (१४१) से दीर्घ आदेश भी न
होना चाहिये । क्योंकि अदन्त अङ्ग को निमित्त मान कर उत्पन्न हुआ 'य' आदेश—
अदन्तत्व के विघातक दीर्घ का निमित्त न हो सकेगा।
उत्तर—यह सत्य है; परन्तु पाणिनि के कष्टाय क्रमणे (७२८) और भाष्य-
कार के धर्माय नियमः = धर्मनियमः (पस्पशाह्निके) प्रभृति निर्देशों तथा सम्पूर्ण
संस्कृतसाहित्य के अनुरोध से इस स्थल पर उपर्युक्त परिभाषा प्रवृत्त नहीं होती ।
[यहां अदन्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।]
अब आकारान्त पुंल्लिङ्ग 'विश्वपा' शब्द का वर्णन करते हैं—
[लघु०] विश्वपाः ॥
व्याख्या—विश्वं पातीति विश्वपाः । विश्वकर्मोपपद पा रक्षणे (अदा०) धातु
से अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते (७६६) सूत्र से विँच् प्रत्यय हो उस का सर्वापहार लोप हो
जाता है । संसार के रक्षक—परमात्मा को 'विश्वपा' कहते हैं । प्रथमा के एकवचन
में सुँ प्रत्यय आ कर 'विश्वपा + सुँ' हुआ । अब उकार की इत्सञ्ज्ञा और लोप होने
पर सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग हो कर 'विश्वपाः' प्रयोग सिद्ध होता है ।
'विश्वपा + औ' यहां वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि प्राप्त होने पर उस का बाध
कर प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र
प्रवृत्त होता है—
[लघु०] निषेध-सूत्रम्—(१६२) दीर्घाज्जसि च ।६।१।१०५॥
दीर्घाज्जसि इचि च परे न पूर्वसवर्णदीर्घः । वृद्धिः—विश्वपौ ।
विश्वपाः । हे विश्वपाः ! । विश्वपाम् । विश्वपौ ॥
अर्थः—दीर्घ से जस् वा इच् प्रत्याहार परे हो तो पूर्वसवर्णदीर्घ न हो ।
व्याख्या—दीर्घात् ।५।१। जसि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । इचि ।७।१। (नादिचि
से) । पूर्वपरयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः अधिकृत है)। पूर्वसवर्णः ।१।१।
(प्रथमयोः पूर्वसवर्णः से) । दीर्घः ।१।१। (अकः सवर्णे दीर्घः से) । न इत्यव्ययपदम् ।
२१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
(नादिचि से)। अर्थ—(दीर्घात्) दीर्घ से (जसि) जस् (च) अथवा (इचि) इच्छ
प्रत्याहार परे होने पर (पूर्वपरयोः) पूर्व+पर के स्थान पर (पूर्वसवर्ण, दीर्घः, एव)
पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेश (न) नहीं होता।
‘विश्वपा+औ’ यहां पकारोत्तर आकार दीर्घ है। इस से परे औकार=इच्
वर्त्तमान है। अतः पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो गया। तब वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि
एकादेश हो कर 'विश्वपौ' रूप सिद्ध हुआ।
प्रथमा के बहुवचन में—विश्वपा+जस्=विश्वपा+अस्। इस अवस्था में
प्रकृतसूत्र से पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो जाता है। तब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से
सवर्णदीर्घ हो कर 'विश्वपाः' प्रयोग सिद्ध होता है।
प्रश्न—'विश्वपा+औ' में नादिचि (१२७) से भी पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध
हो सकता है, तथा जस् में उस के हो जाने से भी कोई अनिष्ट नहीं होता, तो पुनः
दीर्घाज्जसि च (१६२) सूत्र के बनाने की क्या आवश्यकता है?
उत्तर—यद्यपि इस सूत्र का फल यहां कुछ प्रतीत नहीं होता, तथापि 'पप्यौ,
पप्यः' आदि में इस का फल स्पष्ट होगा। यहां न्यायवशात् इस लिया गया है।
द्वितीया में—विश्वपा+अम्। पूर्वसवर्णदीर्घ के बाधक अमि पूर्वः (१३५)
से पूर्वरूप हो—'विश्वपाम्' प्रयोग बना। द्विवचन में 'विश्वपौ' प्रथमा के समान
बनता है। बहुवचन में—विश्वपा+शस्=विश्वपा+अस्। यहां पूर्वसवर्णदीर्घ को
बाध कर अग्रिम कार्य होता है—
[लघु०] संज्ञासूत्रम्—(१६३) सुँडनपुंसकस्य ।१।१।४२॥
स्वादिपञ्चवचनानि सर्वनामस्थानसंज्ञानि स्युरक्लीबस्य ॥
अर्थ—नपुंसकलिङ्ग से भिन्न अन्य लिङ्ग के सुँ आदि पञ्च प्रत्यय सर्वनाम-
स्थान संज्ञक होते हैं।
व्याख्या—सुँट् ।१।१। अनपुंसकस्य ।६।१। सर्वनामस्थानम् ।१।१। (शि सर्व-
नामस्थानम् से)। समासः—न नपुंसकस्य=अनपुंसकस्य, नञ्समासः। पर्युदासप्रति-
षेधः। अर्थ—(अनपुंसकस्य) नपुंसक से भिन्न अन्य लिङ्ग का (सुँट्) सुँट् प्रत्याहार
(सर्वनामस्थानम्) सर्वनामस्थानसंज्ञक होता है।
स्वौजसमौट्० (११८) सूत्र के सुँ से लेकर औट् के टकार तक सुँट् प्रत्याहार
बनता है। इस में 'सुँ, औ, जस्, अम्, औट्' इन पञ्च प्रत्ययों का ग्रहण होता है।
ये पञ्च प्रत्यय पुंल्लिङ्ग या स्त्रीलिङ्ग से परे हों तो इन की सर्वनामस्थानसंज्ञा
होती है। अब अग्रिमसूत्र में इस संज्ञा का उपयोग दर्शाते हैं—
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(१६४) स्वादिष्वसर्वनामस्थाने ।१।४।१७॥
कप्रत्ययावधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु पूर्वं पदं स्यात् ॥
अर्थः—सर्वनामस्थानसंज्ञक प्रत्ययों को छोड़ कर 'सुँ' से लेकर 'कप्' पर्यन्त
प्रत्ययों के परे होने पर पूर्वशब्दस्वरूप पदसंज्ञक हो।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २१७
व्याख्या—स्वादिषु ।७।३। असर्वनामस्थाने ।७।१। पदम् ।१।१। (सुप्तिङन्तं
पदम् से)। समासः—सुंप्रत्यय आदिर्येषान्ते स्वादयः, तेषु = स्वादिषु, बहुव्रीहिसमासः।
न सर्वनामस्थाने = असर्वनामस्थाने, नञ्समासः। 'असर्वनामस्थाने' यह 'स्वादिषु' का
विशेषण है। इस मे एकवचन आर्ष समझना चाहिये। 'स्वादिषु' यह सप्तम्यन्त है।
अतः तस्मिन्निति० (१६) इस परिभाषा से पूर्वशब्दसमुदाय ही पदसञ्ज्ञक होगा।
अर्थः—(असर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान-भिन्न (स्वादिषु) सुँ आदि प्रत्ययो के परे होने
पर पूर्वशब्दसमुदाय (पदम्) पदसञ्ज्ञक होता है।
चतुर्थ अध्याय के प्रथम प्रत्यय 'सुँ' से लेकर पञ्चवें अध्याय के अन्तिम प्रत्यय
'कप्' तक सब प्रत्यय 'स्वादि' कहलाते हैं। इस प्रकार चतुर्थ और पञ्चम अध्याय के
सब प्रत्यय स्वादियो मे सगृहीत हो जाते हैं। इन स्वादि प्रत्ययो मे 'सुँ, औ, जस्, अम्,
औट्' इन प्रत्ययो की सर्वनामस्थान सञ्ज्ञा है। इन सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक पञ्च प्रत्ययों
से भिन्न अन्य स्वादि प्रत्यय यदि परे हो तो उन से पूर्वशब्दसमुदाय पदसञ्ज्ञक
होता है।
'विश्वपा+अस्' (शस्) यहां शस् प्रत्यय सर्वनामस्थान से भिन्न स्वादि है;
अतः इस के परे होने से पूर्वशब्दसमुदाय 'विश्वपा' की पदसञ्ज्ञा प्राप्त होती है। इस
पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१६५) यचि भम् ।१।४।१८॥
यकारादिष्वजादिषु च कप्रत्ययावधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु पूर्वं
भसञ्ज्ञं स्यात्॥
अर्थः—सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक प्रत्ययो को छोड़ कर 'सुँ' से लेकर 'कप्' प्रत्यय
पर्यन्त यकारादि और अजादि प्रत्यय परे होने पर पूर्वशब्दसमुदाय भसञ्ज्ञक होता है।
व्याख्या—असर्वनामस्थाने ।७।१। स्वादिषु ।७।३। (स्वादिष्वसर्वनामस्थाने से)।
यचि ।७।१। भम् ।१।१। समासः—य् च अच् च = यच्, तस्मिन् = यचि, समाहार-
द्वन्द्वः। समासान्तविधिरनित्यः इति द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात्समाहारे (६८६) इति टच् न।
यस्मिन् विधिः० परिभाषा से तदादिविधि हो कर 'यकारादिषु अजादिषु' ऐसा बन
जायेगा। यहा भी पूर्ववत् तस्मिन्निति० (१६) परिभाषा से पूर्वशब्दसमुदाय की ही
भसञ्ज्ञा होगी। अर्थ.—(असर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान से भिन्न (यचि) यकारादि
या अजादि (स्वादिषु) स्वादि प्रत्यय परे हो तो (भम्) पूर्वशब्दसमुदाय भसञ्ज्ञक
होता है।
'विश्वपा+अस्' (शस्) यहां 'अस्' प्रत्यय अजादि है अतः इस के परे होने
से पूर्वशब्दसमुदाय 'विश्वपा' की भसञ्ज्ञा प्राप्त होती है।
अब यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या जैसे लोक मे एक व्यक्ति की दो सञ्ज्ञाएं
देखी जाती हैं वैसे यहां भी शस् आदियो के परे होने पर पूर्व की पद और भ दोनो
सञ्ज्ञाएं की जाये या कोई एक ? यदि एक की जाये तो कौन सी एक ? इस पर
अग्रिमसूत्र निर्णय करता है—
२१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
[लघु०] अधिकार सूत्रम्—(१६६) आकडारादेका संज्ञा ।१।४।१॥
इत ऊर्ध्वं 'कडारा कर्मधारये' (२।२।३८) इत्यतः प्राग् एकस्यैकैव
संज्ञा ज्ञेया, या परानवकाशा च ॥
अर्थ — इस सूत्र से लेकर 'कडारा कर्मधारये' (२।२।३८) सूत्र तक एक की एक
ही संज्ञा हो ।
व्याख्या—यह प्रथमाध्याय के चतुर्थ पाद का पहला सूत्र है। यह अधिकार-
सूत्र है। इसका अधिकार दूसरे अध्याय के दूसरे पाद के अन्तिमसूत्र 'कडारा कर्मधारये'
(२।२।३८) तक जाता है। इस प्रकार इस के अधिकार में तीन पाद होते हैं। आ
इत्यव्ययपदम्। कडारात् ।५।१। एका ।१।१। संज्ञा ।१।१। अर्थ — (कडारात्) कडाराः
कर्मधारये सूत्र (आ) तक (एका) एक (संज्ञा) संज्ञा हो।
'कडारा कर्मधारये' सूत्र तक यदि एक ही संज्ञा करेंगे तो शेष सब संज्ञाएं
जो मुनि ने उस सूत्र तक की हैं व्यर्थ हो जायेंगी, अतः यहां 'एक की एक ही संज्ञा
हो दो न हों' ऐसा मुनि का अभिप्राय समझना चाहिये ।
अब पुनः संशय उठता है कि इस सूत्र से 'एक की एक संज्ञा हो दो न हों'
यह तो निर्णीत हो गया, परन्तु कौन सी संज्ञा हो ? यह सन्देह वैसे का वैसा बना
रहता है। इसका ग्रन्थकार समाधान करते हैं कि—
या परानवकाशा च । अर्थात् जो संज्ञा पर या निरवकाश हो—वह हो। यदि
दोनों संज्ञाएं सावकाश (भिन्न भिन्न स्थान पर प्रवृत्त हो चुकी) हों तो पर संज्ञा
और यदि एक सावकाश और एक अनवकाश (जिसे प्रवृत्त होने के लिये कोई स्थान
नहीं मिला) हो तो वह अनवकाश संज्ञा ही हो ।
ग्रन्थकार का ऐसा लिखना युक्त ही है। जहां दोनों संज्ञाएं सावकाश होंगी
वहां विप्रतिषेध होने से 'विप्रतिषेधे परं कार्यम्' (११३) द्वारा पर संज्ञा ही होनी
चाहिये। जहां एक सावकाश और एक निरवकाश होगी वहां निरवकाश संज्ञा को
ही स्थान देना युक्तिगत है¹। क्योंकि यदि सावकाश संज्ञा वहां पर भी अनवकाश-
संज्ञा को न होने दे तो उस अनवकाश संज्ञा का करना ही व्यर्थ हो जाये । अतः
अनवकाश और सावकाश दोनों के एक साथ एक ही स्थान पर प्राप्त होने पर अन-
वकाश संज्ञा ही होगी²।
प्रकृत में पद संज्ञा को 'भ्याम्' आदि में अवकाश=स्थान प्राप्त है, क्योंकि
वहां अजादि और यकारादि के न होने से भ-संज्ञा प्राप्त नहीं हो सकती । परन्तु
१ लोक में भी ऐसा देखा जाता है। यथा—यदि भूखे और तृप्त के मध्य अन्नदान
का प्रश्न उपस्थित हो तो भूखे को ही अन्न देना उचित समझा जाता है, क्योंकि
वही अन्न का उचित अधिकारी होता है ।
२ दो अनवकाश संज्ञाओं की किसी एक रूप में युगपत् प्राप्ति इस प्रकरण में कहीं
नहीं देखी जाती, अतः उस की चर्चा नहीं की गई है ।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २१६
भ सञ्ज्ञा अनवकाश है अर्थात् इसे कोई स्थान नहीं मिलता; क्योंकि जब यह यकारा-
दियों और अजादियों में प्रवृत्त होने लगती है तब पद सञ्ज्ञा भी उपस्थित हो जाती
है। अतः यहां पूर्वविप्रतिषेधनियमानुसार अनवकाशसञ्ज्ञा का होना ही युक्त है। तो इस
प्रकार यह निर्णय हुआ कि—यकारादि और अजादि प्रत्यय परे होने पर भ सञ्ज्ञा
तथा शेष हलादि प्रत्ययों के परे होने पर पद सञ्ज्ञा हो। हम बालकों के ज्ञान के लिये
इसे और अधिक स्पष्ट करते हैं—
(१) 'सुँ, औ, जस्, अम्, औट्' इन पञ्चों के परे रहते न तो पदसञ्ज्ञा
होती है और न भसञ्ज्ञा। परन्तु ध्यान रहे कि पुंल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग तक ही यह
नियम सीमित है नपुंसकलिङ्ग में नहीं; क्योंकि इन की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा इन दो
ही लिङ्गों में की गई है। नपुंसक में सुँ परे रहते 'पद' तथा औ, अम् परे रहते 'भ'
सञ्ज्ञा होती है। जस् और शस् के स्थान पर नपुंसक में 'शि' आदेश हो जाया करता
है; उस की शि सर्वनामस्थानम् (२३८) से सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा होती है, अतः उस
के परे रहते न तो पदसञ्ज्ञा होती है और न भसञ्ज्ञा।
(२) शस्, टा, ङे, ङसिँ, ङस्, ओस् और ङि—इन के परे रहने पर पूर्व की
भसञ्ज्ञा होती है; क्योंकि ये सर्वनामस्थान से भिन्न होते हुए अजादि स्वादि हैं।
ध्यान रहे कि अनुबन्धों का लोप कर देने से शस् आदि प्रत्यय अजादि हो जाते हैं।
(३) यदि आम् विशुद्ध अर्थात् नुट् आगम से रहित हो तो उस से पूर्व भ
सञ्ज्ञा होती है। नुट् आगम होने पर अजादि न होने से पदसञ्ज्ञा ही हो जाती है।
यथा 'षण्णाम्' में पदसञ्ज्ञा हुई है।
(४) उपर्युक्त सुँप् प्रत्ययों के अतिरिक्त अन्य सुँप् प्रत्ययों (भ्याम्, भिस्,
भ्यस्, नुट् सहित आम्, सुप्) के परे रहते पूर्व की पदसञ्ज्ञा होती है।
यहां यह सुँबन्तप्रक्रियोपयोगी विवरण ही लिखा है। विद्यार्थियों को चतुर्थ
तथा पञ्चम अध्यायों में स्थित अन्य प्रत्ययों के विषय में भी पूर्वोक्त आधार से व्यवस्था
समझ लेनी चाहिये। पद और भसञ्ज्ञा का विषय व्याकरण में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है
अतः छात्रों को इस का पुनः पुनः अभ्यास करना आवश्यक है।
तो इस प्रकार 'विश्वपा + अस्' यहां भसञ्ज्ञा हुई। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त
होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम् — (१६७) आतो धातोः ।६।४।१४०॥
आकारान्तो यो धातुस्तदन्तस्य भस्याङ्गस्य लोपः। अलोऽन्त्यस्य (२१)
—विश्वपः। विश्वपा। विश्वपाभ्याम् इत्यादि॥
अर्थः—आकारान्त धातु जिस के अन्त में हो ऐसे भसंज्ञक अङ्ग का लोप हो
जाता है। अलोऽन्त्यपरिभाषा से अङ्ग के अन्त्य अल्—आकार का ही लोप होगा।
व्याख्या-आतः ।६।१। धातोः ।६।१। भस्य ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (ये दोनों
अधिकृत हैं)। लोपः ।१।१। (अल्लोपोऽनः से)। 'आतः' यह 'धातोः' का तथा 'धातोः'
यह 'भस्य' का विशेषण है, अतः विशेषणों से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः- (आतः)
२२० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
आकारान्त (धातो ) धातु जिस के अन्त में हो ऐसे (भस्य) भसञ्ज्ञक (अङ्गस्य) अङ्ग
का (लोप) लोप हो जाता है। अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा से अङ्ग के अन्त्य
अल्—आकार का ही लोप होगा।
'विश्वपा + अस्' यहां आकारान्त धातु 'पा' है, तदन्त भसञ्ज्ञक अङ्ग
'विश्वपा' है। इस के अन्त्य अल् आकार का लोप कर—विश्वप् + अस् = विश्वपस्।
अब सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग करने से 'विश्वपः' प्रयोग सिद्ध होता है।
'विश्वपा + आ' (टा) यहां भी अन्त्य आकार का लोप हो कर विश्वप् + आ
= 'विश्वपा' रूप सिद्ध होता है। इसी प्रकार अजादि विभक्तियों में आकार का लोप
होगा, हलादि विभक्तियों में कोई विशेष कार्य नहीं होगा। विश्वपाशब्द की समग्र
रूपमाला यथा—
प्र० विश्वपा विश्वपौ विश्वपाः प० विश्वपः * विश्वपाभ्याम् विश्वपाभ्यः
द्वि० विश्वपाम् ,, विश्वपः * ष० ,, * विश्वपोः * विश्वपाम्*
तृ० विश्वपा* विश्वपाभ्याम् विश्वपाभिः स० विश्वपि* ,, * विश्वपासु
च० विश्वपे* ,, विश्वपाभ्यः स० हे विश्वपा ! हे विश्वपौ ! हे विश्वपा !
- इन स्थानों पर भसञ्ज्ञक आकार का लोप होता है।
[लघु०] एव शङ्खध्मादयः ॥
व्याख्या—शङ्खं धमतीति—शङ्खध्मा, शङ्ख बजाने वाला। 'शङ्खध्मा' आदि
शब्दों के रूप भी 'विश्वपा' के समान होते हैं। आदि से—सोमपा, मधुपा, कीलालपा
(जल पीने वाला) आदि शब्दों का ग्रहण जानना चाहिये।
[लघु०] धातोः किम् ? हाहान्। हाहाः। हाहा . २। हाहाै २। हाहाम्।
हाहाै ॥
व्याख्या—धातोः धातो (१६७) में—धातु के आकार का लोप होता है—
यह क्यों कहा गया है ? इसलिये कि 'हाहान्' आदि में 'हाहा' शब्द के आकार का
लोप न हो जाये। तथाहि—'हाहा' शब्द अव्युत्पन्न प्रातिपदिक है, इस का अर्थ है
—'गन्धर्व विशेष'। हाहा हूहूश्चैवमाद्या गन्धर्वास्त्रिदिवौकसाम् इत्यमरः। यह शब्द किसी
धातु से निष्पन्न नहीं होता अतः शसादियों में भसंज्ञा होने पर भी इस के आकार का
लोप नहीं होता। 'हाहा' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० हाहा हाहाै हाहाः प० हाहाः † हाहाभ्याम् हाहाभ्यः
द्वि० हाहाम् ,, हाहान्* ष० ,, † हाहाै ‡ हाहानाम्‡
तृ० हाहा† हाहाभ्याम् हाहाभिः स० हाहे@ ,, ‡ हाहासु
च० हाहाै‡ ,, हाहाभ्यः स० हे हाहा ! हे हाहाै ! हे हाहा !
सर्वनामस्थानप्रत्ययों में विश्वपावत् प्रक्रिया होती है। - पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर शस् के सकार को नकार हो जाता है।
† इन सब स्थानों पर अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ प्रवृत्त होता है।
‡ इन स्थानों पर वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश हो जाता है।
@ यहां आद् गुणः (२७) से गुण एकादेश हो जाता है।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २२१
अभ्यास (२८)
(१) निम्नलिखित वचनों का सोदाहरण विवेचन करें—
१. या पराऽनवकाशा च। २. पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च।
३. निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति। ४. एकदेशविकृतमनन्यवत्। ५.
सन्निपातलक्षणो विधिरनिमित्तं तद्विघातस्य।
(२) (क) 'निर्जरै:' मे जरस् आदेश क्यों नहीं होता ?
(ख) 'हाहा:' प्रयोग किस किस विभक्ति मे बनता है ?
(ग) सर्वनाम और सर्वनामस्थान संज्ञाओ में भेद बताएं।
(घ) 'हाहान्' में आकारलोप क्यों नहीं हुआ ?
(ङ) सुँपों में अजादि प्रत्यय कितने और कौन कौन मे हैं ?
(३) निम्नलिखित अधिकारों की अवधि बताएं—
१. पदाधिकार। २. अङ्गाधिकार। ३. एकसंज्ञाधिकार। ४.
प्रत्ययाधिकार। ५. एकादेशाधिकार।
(४) सुँप् प्रत्ययों के परे रहते कहां भसंज्ञा और कहां पदसंज्ञा होती है ?
(५) दीर्घाज्जसि च के विना भी क्या 'विश्वपौ' आदि प्रयोग सिद्ध हो सकते
हैं ? यदि हां ! तो सूत्र रचने की क्या आवश्यकता है ?
(६) निर्जर, हाहा और सोमपा शब्दों की रूपमाला लिखें।
(७) 'विश्वपौः, निर्जरसम्, हाही:' प्रयोगों की ससूत्र साधनप्रक्रिया लिखें।
[यहां आकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है]
— -:: ० ::- —
[लघु०] हरिः। हरीं॥
व्याख्या—अथ ह्रस्व इकारान्त शब्दों की सुबन्तप्रक्रिया का विवेचन प्रारम्भ
करते हुए सर्वप्रथम 'हरि' शब्द की प्रक्रिया दर्शाते हैं। कोषों में 'हरि' शब्द के अनेक
अर्थ लिखे हैं। यथा—
हरिर्विष्णावहाविन्द्रे भेके सिंहे हये रवौ।
चन्द्रे कोले प्लवङ्गे च यमे वाते च कीर्तितः ॥
हरि शब्द के बारह अर्थ प्रसिद्ध हैं—(१) भगवान् विष्णु, (२) सांप, (३)
इन्द्र, (४) मेंढक, (५) शेर, (६) घोडा, (७) सूर्य, (८) चन्द्र, (६) सूअर,
(१०) वानर, (११) यमराज, (१२) वायु।
प्रथमा के एकवचन में—हरि+सुँ=हरि+स्। मकार की इँत्त्व और रेफ
को विसर्ग करने मे 'हरिः' प्रयोग सिद्ध होता है।
प्रथमा के द्विवचन में 'हरि+औ' इस अवस्था में प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६)
से पूर्वसवर्णदीर्घ ईकार हो कर 'हरी' रूप बनता है।
प्रथमा के बहुवचन में—हरि + अस् (जस्)। इस अवस्था में पूर्वसवर्णदीर्घ का
बाध कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
२२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (१६८) जसि च ।७।३।१०६॥
ह्रस्वान्तस्याङ्गस्य गुणः । हरयः ॥
अर्थः—जस् परे होने पर ह्रस्वान्त अङ्ग को गुण आदेश हो जाता है ।
व्याख्या—जसि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । ह्रस्वस्य ।६।१। अङ्गस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है) । गुणः ।१।१। (ह्रस्वस्य गुणः से) । विशेषण होने से 'ह्रस्वस्य'
से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थ — (जसि) जस् परे होने पर (ह्रस्वस्य) ह्रस्वान्त (अङ्ग-
स्य) अङ्ग के स्थान पर (गुणः) गुण हो जाता है । अलोऽन्त्यपरिभाषा से यह गुण
अङ्ग के अन्त्य वर्ण के स्थान पर होगा ।
'हरि+अस्' यहां ह्रस्वान्त अङ्ग 'हरि' है । इस से परे जस् वर्तमान है ।
अतः प्रकृतसूत्र द्वारा अङ्ग के अन्त्य अल् —इकार के स्थान पर एकार गुण हो गया—
'हरे + अस्' । यहां एकार पदान्त नहीं अतः एङ् पदान्तादति (८१) का विषय नहीं ।
अब एचोऽयवायावः (२७) सूत्र से एकार को अय् आदेश हो कर रुत्व-विसर्ग करने से
—'हरयः' प्रयोग सिद्ध होता है ।
सम्बोधन के एकवचन में—'हे हरि+स्' । एकवचनं सम्बुद्धिः (१३२) से
सम्बुद्धिसंज्ञा हो कर एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः (१३४) से सकार का लोप प्राप्त होता है।
इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम् — (१६६) ह्रस्वस्य गुणः ।७।३।१०८॥
सम्बुद्धौ । हे हरे ! । हरिम् । हरीन् ॥
अर्थः—सम्बुद्धि परे होने पर ह्रस्वान्त अङ्ग को गुण आदेश हो जाता है ।
व्याख्या—सम्बुद्धौ ।७।१। (सम्बुद्धौ च मे) । ह्रस्वस्य ।६।१। अङ्गस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है) । गुणः ।१।१। 'ह्रस्वस्य' से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थ —
(सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि परे होने पर (ह्रस्वस्य) ह्रस्वान्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर
(गुणः) गुण आदेश हो जाता है । अलोऽन्त्यपरिभाषा द्वारा यह गुण अङ्ग के अन्त्य
अल् के स्थान पर होगा ।
'हे हरि+स्' यहां सम्बुद्धि परे है, अतः ह्रस्वान्त अङ्ग 'हरि' के अन्त्य इकार
को एकार गुण हो जाता है । तब अङ्ग के एङन्त हो जाने से एङ्घ्रस्वात् सम्बुद्धेः
(१३४) सूत्र से सम्बुद्धि का लोप हो कर 'हे हरे !' प्रयोग सिद्ध होता है ।
द्वितीया के एकवचन में 'हरि+अम्' इस अवस्था में अमि पूर्वः (१३५) से
पूर्वरूप एकादेश हो कर 'हरिम्' प्रयोग सिद्ध होता है ।
द्वितीया के द्विवचन में प्रथमावत् 'हरी' रूप बनता है ।
बहुवचन में 'हरि+अस्' (शस्) इस दशा में प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६)
से पूर्वसवर्णदीर्घ ईकार हो कर तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) से सकार को नकार
करने पर 'हरीन्' प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि यहां पदान्तस्य (१३६) से
नकार को णकार का निषेध हो जाता है ।
'हरि+आ(टा)' यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २२३
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१७०) शेषो घ्यसखि ।१।४।७॥
शेष इति स्पष्टार्थम् । अनदीसञ्ज्ञौ ह्रस्वौ याविदुतौ तदन्तं सखिवर्जं
घिसञ्ज्ञम् ॥
अर्थः—जिन की नदीसंज्ञा नहीं ऐसे जो ह्रस्व इकार और ह्रस्व उकार, तदन्त
शब्दों की घिसंज्ञा होती है परन्तु ‘सखि’ शब्द की नहीं होती ।
व्याख्या—शेषः ।१।१। ह्रस्वः ।१।१। (ङिति ह्रस्वश्च से)। यू ।१।२। (यूस्त्र्याख्यौ
नदी से) । घि ।१।१। असखि ।१।१। समासः—इच्च उश्च यू, इतरेतरद्वन्द्वः । न सखि
= असखि, नञ्तत्पुरुष । इस सूत्र से पूर्व विशेष विशेष अवस्थाओं में ह्रस्व की नदी
संज्ञा की गई है, अतः जिस ह्रस्व की नदी संज्ञा नहीं की गई वह ह्रस्व यहां ‘शेषः’
पद से गृहीत किया गया है । ‘शेषः ह्रस्वः’ ये ‘यू’ के प्रत्येक के साथ अन्वित होते हैं ।
अर्थात् ‘शेष ह्रस्व इकार, शेष ह्रस्व उकार’ यह इन का अर्थ है । शब्दस्वरूपम् इस
विशेष्य का ऊपर से अध्याहार कर लिया जाता है । ‘शेषः ह्रस्वः यू’ ये इस के विशे-
षण बना दिये जाते हैं । तब विशेषण से तदन्तविधि हो जाती है । अर्थ—(शेषः)
जिन की नदीसञ्ज्ञा नहीं ऐसे (ह्रस्वः) ह्रस्व (यू) इकार उकार जिन के अन्त में हैं
वे शब्दस्वरूप (घि) घिसञ्ज्ञक होते हैं परन्तु (असखि) सखि शब्द नहीं होता ।
कहां कहां नदी सञ्ज्ञा नहीं होती ?
(१) पुंल्लिङ्ग तथा नपुंसक में ह्रस्व इकारान्त तथा ह्रस्व उकारान्त शब्द
नदीसञ्ज्ञक नहीं होते । पुं० में यथा—हरि, अरि, भानु, गुरु आदि । नपुं० में यथा—
वारि, मधु आदि ।
(२) स्त्रीलिङ्ग में ङित् विभक्तियों के परे रहते जिस पक्ष में ङिति ह्रस्वश्च
(२२२) द्वारा नदीसञ्ज्ञा नहीं होती ।
इन दो स्थानों के अतिरिक्त अन्य सब स्थानों पर ह्रस्व इकारान्त उकारान्त
शब्दों की नदीसञ्ज्ञा हो जाती है अतः उपर्युक्त दो स्थान ही इस सूत्र के विषय हो
सकते हैं ।
सूत्र में ‘शेषः’ ग्रहण का यह प्रयोजन है कि नदी सञ्ज्ञा करने से जो शेष ह्रस्व
इकारान्त और ह्रस्व उकारान्त शब्द रहें उन की ही घिसञ्ज्ञा हो अन्यों की न हो । परन्तु
यह प्रयोजन ‘शेषः’ ग्रहण के बिना भी सिद्ध हो सकता है । क्योंकि घिसञ्ज्ञा सामान्य
होने से उत्सर्ग और ङिति ह्रस्वश्च (२२२) द्वारा विहित नदीसञ्ज्ञा विशेष होने से
अपवाद है । अपवाद के विषय को छोड़कर ही उत्सर्ग प्रवृत्त हुआ करते हैं । इस से
प्रथम नदीसञ्ज्ञा हो कर शेष अवशिष्टों की ही घिसञ्ज्ञा सुतरां प्राप्त हो जायेगी;
इस के लिये ‘शेषः’ पद के ग्रहण की कोई आवश्यकता नहीं । तथापि यहां मुनि ने बात
को बिलकुल स्पष्ट करने के लिये ‘शेषः’ का ग्रहण कर दिया है । अर्थात् मुनि ने यह
समझा कि कदाचित् मन्दमति लोग इस बात को न समझ सकें अतः ‘शेष.’ पद लिख
कर स्पष्ट कर देना उचित है—शेष इति स्पष्टार्थम् ।
२२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
'हरि' शब्द की नदीसञ्ज्ञा नहीं होती अतः प्रकृतसूत्र से इस की घि-सञ्ज्ञा
हुई। अब घिसञ्ज्ञा का फल दर्शाते हैं-
[लघु०] विधि-सूत्रम्- (१७१) आङो नाऽस्त्रियाम् ।७।३।१२०॥
घेः परस्याङो ना स्यादस्त्रियाम् । आङ् इति टासञ्ज्ञा । हरिणा ।
हरिभ्याम् । हरिभिः ॥
अर्थ :-घिसञ्ज्ञक से परे आङ् को ना आदेश हो, परन्तु स्त्रीलिङ्ग में नहीं।
'आङ्' यह टा की (प्राचीन) सञ्ज्ञा है।
व्याख्या-घेः ।६।१। (अच्च घेः से) । आङः ।६।१। ना ।१।१। (विभक्तिलोप
आर्ष) । अस्त्रियाम् ।७।१। समासः-न स्त्रियाम् = अस्त्रियाम्, नञ्सुप्सुप् । अर्थः -
(अस्त्रियाम्) स्त्रीलिङ्ग से भिन्न अन्य लिङ्ग में (घेः) घिसञ्ज्ञा से परे (आङः)
आङ् के स्थान पर (ना) ना आदेश होता है। पाणिनि से पूर्ववर्ती आचार्य टा को
'आङ्' कहते चले आ रहे थे। पाणिनि ने भी यहां उसी प्राचीन सञ्ज्ञा का व्यवहार
किया है।
'हरि + आ' यहां घिसञ्ज्ञक है 'हरि' । इस से परे टा को ना हो अट्कुप्वाङ्०
(१३८) सूत्र से नकार को णकार करने पर 'हरिणा' प्रयोग सिद्ध होता है।
द्विवचन में 'हरिभ्याम्' और बहुवचन में 'हरिभिः' सिद्ध होते हैं।
चतुर्थी के एकवचन में-- हरि + ए (ङे) । यहां पूर्वोक्त घिसञ्ज्ञा होकर
अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है-
[लघु०] विधि-सूत्रम् - (१७२) घेर्ङिति ।७।३।१११॥
घिसञ्ज्ञकस्य ङिति सुपि गुणः । हरये ॥
अर्थ :-ङित् सुँप् परे रहते घिसञ्ज्ञक को गुण हो।
व्याख्या-घेः ।६।१। गुणः ।१।१। (ह्रस्वस्य गुणः से) । ङिति ।७।१। सुँपि
।७।१। (सुँपि च से)। अर्थः- (ङिति) ङित् (सुँपि) सुँप् परे होने पर (घेः) घिसञ्ज्ञक
के स्थान पर (गुणः) गुण आदेश होता है। अलोऽन्त्यपरिभाषा से गुण घिसञ्ज्ञ अङ्ग
के अन्त्य वर्ण को ही होगा।
'हरि + ए' यहां घिसञ्ज्ञक 'हरि' है। इस से परे ङित् सुँप् 'ए' है। अतः घि
के अन्त्य वर्ण इकार के स्थान पर एकार गुण होकर- 'हरे + ए' बना। अब इस
स्थिति में एचोऽयवायावः (२२) से रेफोत्तर एकार को अय् होकर 'हरये' प्रयोग
सिद्ध हुआ।
द्विवचन में 'हरिभ्याम्' और बहुवचन में 'हरिभ्यः' रूप बनते हैं।
पञ्चमी के एकवचन में 'हरि + अस्' (ङसिँ) । यहां घिसञ्ज्ञा होकर घेर्ङिति
(१७२) सूत्र से इकार को एकार गुण हुआ। तब 'हरे + अस्' इस स्थिति में पदान्त
न होने से एङः पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप नहीं हो सकता। एचोऽयवायावः (२२)
से अय् आदेश प्राप्त होता है। इस पर इस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है-
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २२५
[लघु०] विधि-सूत्रम्- (१७३) ङसिँ-ङसोश्च ।६।१।१०६॥
एङो ङसिँ-ङसोरति पूर्वरूपमेकादेशः । हरेः २ । हर्योः । हरीणाम् ॥
अर्थः-एङ् (ए, ओ) से ङसिँ या ङस् का अकार परे हो तो पूर्व + पर के
स्थान पर पूर्वरूप एकादेश हो ।
व्याख्या - एङः ।५।१। (एङः पदान्तादति मे)। ङसिँ-ङसोः ।६।२। च इत्यव्यय-
पदम् । अति ।७।१। (एङः पदान्तादति मे) । पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः
पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)। पूर्वः ।१।१। (अमि पूर्वः से)। अर्थः- (एङः) एङ् प्रत्या-
हार से (ङसिँ-ङसोः) ङसिँ अथवा ङस् का (अति) अत् परे हो तो (पूर्व-परयोः)
पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (पूर्वः) पूर्व वर्ण आदेश होता है ।
'हरे + अस्' यहां एकार एङ् से ङसिँ का अकार परे है, अतः पूर्व + पर के
स्थान पर एकार पूर्वरूप हो कर सकार को रुत्व विसर्ग करने से 'हरेः' प्रयोग सिद्ध हुआ ।
ओकार का उदाहरण 'भानोः' आगे आयेगा ।
षष्ठी के एकवचन में पूर्ववत् 'हरेः' रूप बनता है ।
द्विवचन में 'हरि + ओस्' इस दशा में इको यणचि (१५) से यण् हो कर
मकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग करने पर 'हर्योः' रूप बनता है ।
बहुवचन में 'हरि + आम्' । यहां ह्रस्वान्त अङ्ग 'हरि' है अतः ह्रस्वनद्यापो
नुट् (१४८) से आम् को नुट् का आगम हो अनुबन्धलोप और नामि (१८४) से
दीर्घ करने पर 'हरी + नाम्' । अब अट्कुप्वाङ्० (१३८) सूत्र से नकार को णकार
करने से - 'हरीणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है ।
सप्तमी के एकवचन में-हरि + इ (ङि) । यहां घिसञ्ज्ञा हो कर घेर्ङिति
(१७२) से गुण प्राप्त होता है । इस पर इस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है-
[लघु०] विधि-सूत्रम् - (१७४) अच घेः ।७।३।११९॥
इदुद्भ्यामुत्तरस्य ङेगौत्, घेरच्च । हरौ । हर्योः । हरिषु । एवं
कवयादयः ॥
अर्थः-ह्रस्व इकार तथा ह्रस्व उकार से परे ङि को औत् और घि को अत्
आदेश हो ।
व्याख्या - इदुद्भ्याम् ।५।२। (इदुद्भ्याम् से)। ङेः ।६।१। (ङेराम्नद्याम्नीभ्यः
मे)। औत् ।१।१। (औत् से)। घेः ।६।१। अत् ।१।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थः-
(इदुद्भ्याम्) ह्रस्व इकार तथा ह्रस्व उकार से परे (ङेः) ङि के स्थान पर (औत्)
औ आदेश हो (च) तथा (घेः) घिसञ्ज्ञक के स्थान पर (अत्) ह्रस्व अकार आदेश
हो । अलोन्त्यपरिभाषा से यह अत् आदेश घि के अन्त्य अल् को ही होगा ।
'हरि + इ' यहां इस सूत्र से ङि (इ) को 'औ' और घिसञ्ज्ञक 'हरि' शब्द के
इकार के स्थान पर अकार आदेश हुआ । तब 'हर् + औ' इस दशा में वृद्धिरेचि (३३)
से वृद्धि एकादेश हो कर 'हरौ' रूप सिद्ध हुआ ।
ल० प्र० (१५)
२२६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
द्विवचन में पूर्ववत् 'हर्योः' रूप सिद्ध होता है।
सप्तमी के बहुवचन में आदेशप्रत्यययो (१५०) से प्रत्यय के अवयव सकार
को षकार हो 'हरिषु' प्रयोग सिद्ध होता है। हरिशब्द की समग्र रूपमाला यथा--
प्र० हरि हरी हरयः | पं० हरेः हरिभ्याम् हरिभ्यः
द्वि० हरिम् , हरीन् | ष० ,, हर्योः हरीणाम्
तृ० हरिणा हरिभ्याम् हरिभिः | स० हरौ ,, हरिषु
च० हरये हरिभ्यः | सं० हे हरे! हे हरी! हे हरयः!
इसी प्रकार 'कवि' आदि ह्रस्व इकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों की प्रक्रिया होती है।
बालकोपयोगी कुछ शब्दों का सङ्ग्रह यथा--
शब्द = अर्थ | शब्द = अर्थ | शब्द = अर्थ
अग्नि = आग | कुक्षि* = पेट | पयोधि = समुद्र
अङ्घ्रि* = चरण | कृपीटयोनि = अग्नि | पयोराशि = समुद्र
अञ्जलि = जुड़े हुए हाथ | कृमि* = कीड़ा | परिधि = घेरा
अतिथि = मेहमान | गिरि* = पहाड़ | पवि = वज्र
अद्रि* = पहाड़ | ग्रन्थि = गाँठ | पशुपति = शिव
अरनि = दानु | चक्रपाणि = विष्णु | पाणि = हाथ
अरि* = शत्रु | चरणग्रन्थि = गिट्टा | पाणिनि = प्रसिद्ध मुनि
अलि = भ्रमर | चूडामणि = शिरोरत्न | प्रजापति = ब्रह्मा
अवधि = सीमा | जठराग्नि = पेट की अग्नि | प्रणिधि = दूत
असि = तलवार | जलधि = समुद्र | प्रतिनिधि = नुमाइन्दा
अहि = साप | ज्ञाति = रिश्तेदार | वालधि = पूँछ
आधि = मानसिक पीड़ा | तरणि = सूर्य | वृहस्पति = देवगुरु
इषुधि = तरकस | दिनमणि = सूर्य | भर्तृहरि* = प्रसिद्ध राजा
उडुपति = चन्द्र | दिवाकीर्ति = नापित | भागुरि* = एक मुनि
उदधि = समुद्र | दुन्दुभि = नगारा | भारवि* = एक कवि
उपधि = छल | दुर्मति = दुष्ट-बुद्धि | भूपति = राजा
उपाधि = उपाधि | धन्वन्तरि* = प्रसिद्ध वैद्य | मणि = मणि
उषापति = सूर्य | धूर्जटि = शिव | मरीचि = किरण
ऊर्मि* = लहर | ध्वनि = आवाज | मातलि = इन्द्र का सारथी
ऋषि* = मन्त्रद्रष्टा | नमुचि = एक दैत्य | मारुति = हनुमान्
कपि = वानर | निधि = खजाना | मुनि = मुनि
कलानिधि = चन्द्र | निशापति = चन्द्र | मृगपति = शेर
कलि = झगड़ा | नृपति = राजा | मौलि = सिर
कवि = कविताकार | पति = पैदल सेना | यति = सन्यासी
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २२७
शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ
ययाति = प्रसिद्ध राजा | वाल्मीकि = प्रसिद्ध मुनि | सभापति = सभा का प्रधान
रमापति = विष्णु | विधि = दैव | समाधि = समाधि
रवि* = सूर्य | व्याधि = शारीरिक रोग | सारथि = रथ-वाहक
रश्मि = किरण | व्रीहि* = चावल | सुगन्धि = सुगन्धयुक्त
राशि = ढेर | शकुनि = पक्षी | सुमति = श्रेष्ठ बुद्धि वाला
वकवृत्ति = स्वार्थी | शीतरश्मि = चन्द्र | सुरभि* = वसन्त
वह्नि = आग | सनाभि = जात भाई | सूरि* = विद्वान्
वाक्पति = वृहस्पति | सन्धि = मेल | सेनापति = सेना-नायक
वारिधि = सागर | सप्तसप्ति = सूर्य | हिमगिरि* = हिमालय
वारिराशि = समुद्र | सप्ति = घोड़ा |
हरि शब्द की अपेक्षा सखि, पति, कति, त्रि और द्वि शब्दों में कुछ अन्तर
पड़ता है; अतः अब इन का क्रमशः वर्णन किया जाता है । प्रथम सखि (मित्र)
शब्द यथा—
शेषो घ्यसखि (१७०) सूत्र में 'असखि' कहने से 'सखि' शब्द की घिसञ्ज्ञा
नहीं होती । प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर इस से स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं । प्रथमा
के एकवचन में—सखि+सुँ=सखि+स् । इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम् —(१७५) अनँङ् सौ ।७।१।९३॥
सख्युरङ्गस्यानँङादेशोऽसम्बुद्धौ सौ ॥
अर्थः—सम्बुद्धिभिन्न सुँ परे हो तो अङ्गसञ्ज्ञक सखि शब्द के स्थान पर अनँङ्
आदेश हो ।
व्याख्या-- सख्युः ।६।१। (सख्युरसम्बुद्धौ से) । अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत
है) । अनँङ् ।१।१। असम्बुद्धौ ।७।१। (सख्युरसम्बुद्धौ से) । सौ ।७।१। यहां 'सौ' से
प्रथमा के एकवचन का ग्रहण होता है सप्तमी के बहुवचन का नहीं; क्योंकि सप्तमी
का बहुवचन मानने मे 'असम्बुद्धौ' निषेध व्यर्थ हो जाता है । अर्थः—(असम्बुद्धौ)
सम्बुद्धिभिन्न (सौ) सुँ परे होने पर (अङ्गस्य) अङ्गसञ्ज्ञक (सख्युः) सखि शब्द के
स्थान पर (अनँङ्) अनँङ् आदेश हो ।
अनँङ् मे ङकार इत् है । नकारोत्तर अकार उच्चारणार्थ है । ङित् होने के
कारण ङिच्च (४६) द्वारा यह अनँङ् आदेश सखि शब्द के अन्त्य अल् = इकार के
स्थान पर होगा ।
'सखि+स्' यहां सुँ परे है; अतः इकार को अनँङ् आदेश हो अँङ् के चले
जाने पर—सख् अन्+स् = 'सखन्+स्' हुआ । इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता
है—
२२८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१७६) अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा ।१।१।६४॥
अन्त्यादल पूर्वो वर्ण उपधा-सञ्ज्ञ ॥
अर्थ —अन्त्य अल् से पूर्व वर्ण उपधासञ्ज्ञक हो।
व्याख्या—अन्त्यात् ।५।१। अल् ।१।१। पूर्व ।१।१। उपधा ।१।१। अर्थ—
(अन्त्यात्) अन्त्य (अल्) अल् से (पूर्व) पूर्व वर्ण (उपधा) उपधासञ्ज्ञक हो।
अल् प्रत्याहार में सब वर्ण आ जाते हैं, अतः अल् और वर्ण पर्यायवाची हैं।
समुदाय के अन्तिम वर्ण से पूर्व वर्ण की उपधा सञ्ज्ञा होती है। यथा—पठ्, पच्, पत्,
अत् इत्यादि में अन्त्य वर्ण से पूर्व अकार उपधासञ्ज्ञक है। बुध्, युध्, रुध् इत्यादि में
अन्तिम वर्ण से पूर्व उकार उपधासञ्ज्ञक है। वृत्, वृध् इत्यादि में अन्त्य वर्ण से पूर्व
ऋकार उपधासञ्ज्ञक है।
'सखन् + स्' यहां अङ्ग में अन्त्य अल् नकार है इससे पूर्व वर्ण खकारोत्तर
अकार है, इस की उपधासञ्ज्ञा हुई। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१७७) सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौ ।६।४।८॥
नान्तस्योपधाया दीर्घोऽसम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने ॥
अर्थ —सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे हो तो नकारान्त अङ्ग की उपधा को
दीर्घ हो जाता है।
व्याख्या—न ।६।१। (नोपधाया मे। यहां सुपां सुलुक० सूत्र द्वारा षष्ठी का
लुक हुआ है। अङ्गस्य का विशेषण होने से इस से तदन्तविधि हो 'नान्तस्य' बन जाता
है)। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। उपधाया ।६।१। (नोपधाया मे)। दीर्घ
।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽण मे)। असम्बुद्धौ ।७।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। च इत्य-
व्ययपदम् । समास—न सम्बुद्धौ = असम्बुद्धौ नञ्तत्पुरुष । अर्थ—(असम्बुद्धौ)
सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (न) नान्त (अङ्गस्य) अङ्ग
की (उपधाया) उपधा के स्थान पर (दीर्घ) दीर्घ आदेश होता है। सर्वनामस्थान-
सञ्ज्ञा का निरूपण पीछे (१६३) सूत्र पर कर चुके हैं।
'मखन् + स्' यहां नान्त अङ्ग 'मखन्' है, इस से परे सर्वनामस्थान है 'स्' ।
यह सम्बुद्धिभिन्न भी है। अतः प्रकृतसूत्र से नान्त अङ्ग की उपधा अकार को दीर्घ
हो—'मखान् + स्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१७८) अपृक्त एकाल् प्रत्ययः ।१।२।४१॥
एकाल् प्रत्ययो यः, सोऽपृक्तसञ्ज्ञ स्यात् ॥
अर्थ —एक अल् रूप प्रत्यय अपृक्तसञ्ज्ञक होता है।
व्याख्या—अपृक्त ।१।१। एकाल् ।१।१। प्रत्यय ।१।१। समास—एकश्चासा-
वल्=एकाल्, कर्मधारयसमास । एकशब्दोऽत्र असहायवाची। अर्थ—(एकाल्) एक
अल् रूप (प्रत्यय) प्रत्यय (अपृक्त) अपृक्तसञ्ज्ञक हो। भाव—जो प्रत्यय केवल एक
अल् रूप हो या एक अल् रूप हो गया हो, उस की अपृक्तसञ्ज्ञा होती है।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २२६
'सखान्+स्' यहां 'स्' यह एक अल् रूप प्रत्यय है, अतः प्रकृत सूत्र से इस
की अपृक्तसञ्ज्ञा हुई। अब अग्रिमसूत्र से इस का लोप करते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१७६) हल्ड्·याब्भ्यो दीर्घात् सुँतिस्यपृक्तं हल्
। ६। १। ६६ ॥
हलन्तात् परम्, दीर्घौ यौ ङ्यापौ तदन्ताच्च परम्, 'सुँ-ति-सि' इत्ये-
तद् अपृक्तं हल् लुप्यते ॥
अर्थः—हलन्त अङ्ग से अथवा दीर्घ 'ङी' या 'आप्' जिस के अन्त में हो उस
अङ्ग से परे 'सुँ, ति, सि' प्रत्ययों के अपृक्त हल् का लोप होता है।
व्याख्या—हल्ड्·याब्भ्यः ।५।३। दीर्घात् ।५।१। सुँ-ति-सि ।१।१। अपृक्तम् ।१।१।
हल् ।१।१। लोपः ।१।१। (लोपो व्योर्वलि से) । समासः—हल् च ङी च आप् च =
हल्ड्·यापः, तेभ्यः=हल्ड्·याब्भ्यः, इतरेतरद्वन्द्वः । यहां 'शब्दस्वरूपम्' अथवा 'अङ्गम्'
का अध्याहार कर उस के ये हलादि विशेषण बना दिये जाते हैं। इस से तदन्तविधि
हो कर 'हलन्तात् ङ्यन्ताद् आवन्तात्' ऐसा बन जाता है। सूत्रस्थ 'दीर्घात्' पद 'ङी'
और 'आप्' के साथ ही सम्बद्ध हो सकता है, 'हल्' के साथ नहीं; क्योंकि हल् दीर्घ
नहीं हुआ करता। तो अब 'हलन्तात् दीर्घङ्यन्तात् दीर्घावन्तात्' ऐसा हो जायेगा।
'हल्ड्·याब्भ्यः' में पञ्चमी विभक्ति दिग्योग में हुई है, अतः तस्मादित्युत्तरस्य (७१)
की सहायता से 'परम्' का अध्याहार कर लेंगे। सुँश्च तिश्च सिश्च = सुँ-ति-सि,
समाहारद्वन्द्वः। 'सुँतिसि अपृक्तं हल्' इस का अर्थ है —'सुँ, ति, सि जो अपृक्त हल्'।
यहां सन्देह होता है कि अपृक्तसञ्ज्ञा तो एक अल् रूप प्रत्यय की ही की जाती है पुनः
'सुँ, ति, सि' ये कैसे हल् और अपृक्त बन सकते हैं। इस का समाधान यह है कि जब
'सुँ, ति, सि' के उकार तथा इकार का लोप हो जाता है तब अवशिष्ट 'स्, त्, स्' को
ही 'सुँ, ति, सि' समझ लेना चाहिये; क्योंकि वे उन से ही शेष बचे हैं। इस प्रकार
वे अपृक्त भी होंगे और हल् भी होंगे। कई लोग —'सुँतिसेरपृक्तम् = सुँतिस्यपृक्तम्'
ऐसा षष्ठीतत्पुरुषसमास मान कर 'सुँ, ति सि के अपृक्त हल् का लोप हो' इस प्रकार
अर्थ किया करते हैं। यह अर्थ भी शुद्ध तथा स्पष्ट है। 'लोपः' यहां कर्म में 'घञ्'
प्रत्यय हुआ है—लुप्यत इति लोपः। जो लुप्त किया जाये उसे 'लोप' कहते हैं। यह
'हल्' पद का विशेषण है। अर्थः—(हल्ड्·याब्भ्यः दीर्घात्) हलन्त से परे तथा दीर्घ ङी
और आप् जिस के अन्त में है उस से परे (सुँतिसि) सुँ, ति, सि ये (अपृक्तम्) अपृक्त-
सञ्ज्ञक (हल्) हल् (लोपः) लुप्त हो जाते हैं। उदाहरण यथा—
हलन्त से परे—'राजन्+स्' (सुँ) यहां नकार हल् से परे अपृक्त सुं का
लोप हो जाता है। 'अहन्+त्' [इतश्च (४२४) इति तिप इकारलोपः] यहां नकार
हल् से परे अपृक्त ति का लोप हो जाता है। 'अहन्+स्' [इतश्च (४२४) इति
सिप इकारलोपः] यहां हल् से परे अपृक्त सि का लोप हो जाता है।
दीर्घ ङी¹ से परे—'कुमारी+स्' (सुँ) यहां दीर्घ ङी (ङीप्) से परे अपृक्त
१. भेदक अनुबन्धों से रहित होने के कारण 'ङी' से ङीप्, ङीष्, ङीन् का तथा 'आप्'
२३० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
सुँ का लोप हो जाता है। दीर्घ ङी से परे ति और सि का आना असम्भव है।
दीर्घ आप् से परे—'बाला + स्' (सुँ) यहां दीर्घ आप् (टाप्) से परे अपृक्त सुँ
का लोप हो जाता है। दीर्घ आप् से परे भी ति और सि नहीं आया करते।
यद्यपि ङी और आप् स्वतः ही दीर्घ हुआ करते हैं, इन के लिये पुनः दीर्घ का
कथन व्यर्थ सा प्रतीत होता है, तथापि समास में इन के ह्रस्व हो जाने पर उन से
परे लोप न हो जाये—इसलिये सूत्र में दीर्घ का ग्रहण किया है। यथा—निष्कौशाम्बि
[ निष्क्रान्त कौशाम्ब्या ' इति विग्रह, निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या (वा० ५६) इति
वार्त्तिकेन समास, गोस्त्रियो० (६५२) इत्युपसर्जनह्रस्व ]। यहां ङी के ह्रस्व हो जाने
से उस से पर सुँ का लोप नहीं होता। एवम्—अतिखट्व, अतिमाल आदि में भी
ह्रस्व आप् से परे सुँलोपाभाव समझ लेना चाहिये।
शङ्का—हलन्त से परे हल् के लोप की कुछ आवश्यकता नहीं, क्योंकि वहां
संयोगान्तस्य लोप (२०) से भी लोप सिद्ध हो सकता है।
समाधान—संयोगान्तलोप करने से निम्नलिखित दोष प्राप्त होते हैं। तथाहि—
(१) 'राजन् + स्' यहां संयोगान्तलोप करने पर उस के असिद्ध होने से न
लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) द्वारा नकार का लोप न हो सकेगा।
(२) 'उखास्रस् + स्, पर्णध्वस् + स्' यहां संयोगान्तलोप के अपवाद स्कोः
संयोगाद्योरन्ते च (३०६) द्वारा संयोग के आदि प्रकृतित्सकार के लोप हो जाने पर
अवशिष्ट प्रत्ययसकार के वस्वादि का अवयव न होने से वसुंस्त्रसुं० (२६२) सूत्र से
दत्व न हो सकेगा।
(३) भिदिर् विदारणे (रुधा०) धातु के लङ् लकार के मध्यमपुरुष के एक-
वचन में सिप्, श्नम्, और दश्च (५७३) सूत्र से दकार को रुँ आदेश करने पर
'अभिनद् + स्' हुआ। अब यदि यहां संयोगान्तलोप करते हैं तो 'अभिनर् + अत्र' यहां
अतो रोरप्लुतादप्लुते (१०६) सूत्र से उत्व नहीं हो सकता, क्योंकि सकारलोप के
असिद्ध होने से उस का व्यवधान पड़ता है। इस से 'अभिनोऽत्र' सिद्ध नहीं होता।
(४) 'अबिभर् + त्' (इतश्चेति तिप इकारलोप)। यहां संयोगान्तलोप से
कार्य सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि रात्सस्य (२०६) सूत्र द्वारा रेफ से परे सकार के
लोप का ही नियम है।
अतः हल् से परे भी हल् का लोप अवश्य विधान करना चाहिए—यह यहां
सुतरां सिद्ध होता है। इस विषय पर एक प्राचीन श्लोक प्रसिद्ध है—
संयोगान्तस्य लोपे हि नलोपादिर्न सिध्यति ।
रात्तु तेनैव लोपः स्याद् हलस्तस्माद्विधीयते ॥ (काशिका)
'सम्राज् + स्' यहां नकार हल् से परे अपृक्त सुँ का लोप हो कर 'सम्राज्' बना।
अब अग्रिमसूत्र में नकार का लोप करते हैं—
से टाप्, डाप्, चाप् का ग्रहण होता है। इन प्रत्ययों का विवेचन स्त्रीप्रत्यय-
प्रकरण में देखें।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३१
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१८०) न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य ।८।२।७॥
प्रातिपदिकसञ्ज्ञकं यत्पदं तदन्तस्य नस्य लोपः स्यात् । सखा ॥
अर्थः—प्रातिपदिकसञ्ज्ञक जो पद उस के अन्त्य नकार का लोप हो जाता है।
व्याख्या—प्रातिपदिक ।६।१। (यहां सुपां सुलुकू० सूत्र से षष्ठी का लुक् हुआ
है)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अन्तस्य ।६।१। न ।६।१। (यहां भी षष्ठी का
लुक् हुआ है)। लोपः ।१।१। अर्थः—(प्रातिपदिक) प्रातिपदिकसञ्ज्ञक (पदस्य) पद
के अवयव (अन्तस्य) अन्त्य (नः) न् का (लोपः) लोप हो जाना है।१
यदि सूत्र में 'प्रातिपदिक' का ग्रहण न करके केवल 'पद' का ही ग्रहण करते
तो 'अहन्' (हन् धातु के लँङ् में प्रथम वा मध्यमपुरुष का एकवचनान्त प्रयोग) यहां
भी नकार का लोप हो जाना; क्योंकि यहां पदसंज्ञा अक्षुण्ण है। इसी प्रकार यदि
'पद' का ग्रहण न करके केवल 'प्रातिपदिक' का ही ग्रहण करते तो 'राजन् + औ =
राजानौ' यहां भी नकार का लोप हो जाता; क्योंकि प्रातिपदिकसंज्ञा तो यहां भी है।
अतः दोनों का ग्रहण किया गया है।
'सखान्' यह प्रातिपदिकसंज्ञक पद है। यद्यपि प्रातिपदिकसंज्ञा 'सखि' शब्द
की ही थी तो भी एकदेशविकृतमनन्यवत् ने यहां भी प्रातिपदिकसंज्ञा विद्यमान है।
इसी प्रकार सुं—सुँप् का लोप होने पर भी आगे आने वाले प्रत्यय-लोपे प्रत्यय-लक्षणम्
(१६०) सूत्र की सहायता से सुबन्त हो जाने के कारण सुप्तिङन्तं पदम् (१४) द्वारा
पदसंज्ञा हो जाती है। तो प्रकृत-सूत्र से इस के नकार का लोप हो—'सखा' प्रयोग
सिद्ध होता है।
'सखि + औ' यहां पूर्वसवर्णदीर्घ का बाध कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] अतिदेश-सूत्रम्—(१८१) सख्युरसम्बुद्धौ ।७।१।९२॥
सख्युरङ्गात् परं सम्बुद्धिवर्जं सर्वनामस्थानं णिद्वत् स्यात् ॥
अर्थः—अङ्गसंज्ञक सखि शब्द से परे सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान णिद्वत्—
णित् के समान हो, अर्थात् णित् के परे होने पर जो कार्य होते हैं उस के परे होने पर
भी वे कार्य हों।
व्याख्या—अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह अधिकृत है। यहां विभक्ति का विपरि-
णाम हो जाता है)। सख्युः ५।१। असम्बुद्धौ ।७।१। (यह प्रथमान्त हो जायेगा)। सर्व-
१. इस सूत्र में 'नस्य लोपः—नलोपः' ऐसा षष्ठीतत्पुरुषसमास नहीं समझना चाहिये।
क्योंकि 'नस्य' का सम्बन्ध 'अन्तस्य' के साथ है जो समासावस्था में घटित नहीं
हो सकता। अतएव 'ऋद्धस्य राज्ञः पुरुषः' के स्थान पर 'ऋद्धस्य राजपुरुषः'
प्रयुक्त नहीं होता। इसी प्रकार 'प्रातिपदिकान्तस्य' में भी 'प्रातिपदिक' को पृथक्
पद समझना चाहिये। षष्ठीसमास मानने पर उस का 'पदस्य' के साथ अन्वय
नहीं हो सकेगा।
२३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
नामस्थानम् । १।१। (इतोऽत् सर्वनामस्थाने से) । णित् ।१।१। (गोतो णित् से) ।
समास — न सम्बुद्धि = असम्बुद्धि, नञ्तत्पुरुष । अर्थ — (अङ्गात्) अङ्गसञ्ज्ञक
(सख्यु ) सखिशब्द से परे (असम्बुद्धि) सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थानम्) सर्वनामस्थान
(णित्) णित् हो ।
यह अतिदेश-सूत्र है । अतिदेशसूत्रों का यह काम होता है कि जो, जो नहीं
उसे वह बना देते हैं । यथा सिंहो माणवक (बालक शेर है)। बालक शेर नहीं होता,
परन्तु उसे शेर कह दिया जाना है । इस का तात्पर्य अन्ततोगत्वा सादृश्य म समाप्त
होता है—बालक शेर के समान (शूर) है । यहां सर्वनामस्थान को णित् कहा गया
है, परन्तु उस में न तो ण् है और न ही उस की इत्सञ्ज्ञा होती है । तो यहां ‘णित्’
अतिदेश का तात्पर्य ‘णिद्वत्’ से होगा । अर्थात् णित् के परे रहने पर जो कार्य होते हैं,
उस के पर रहने पर भी होंगे ।
‘सखि + औ’ यहां अङ्गसञ्ज्ञक सखि से परे सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान ‘औ’
है । यह णित् = णिद्वत् हुआ । अब अग्रिमसूत्र में इस का फल दर्शाते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१८२) अचो ञ्णिति ।७।२।११५॥
अजन्ताङ्गस्य वृद्धि, जिति णिति च परे । सखायौ, सखाय ।
हे सखे ! । सखायम्, सखायौ, सखीन् । सख्या । सख्ये ॥
अर्थः—ञित् अथवा णित् परे रहते अजन्त अङ्ग के स्थान पर वृद्धि हो ।
व्याख्या—अच ६।१। अङ्गस्य ।६।१। (अधिकृत है) । ञ्णिति ।७।१। वृद्धि
।१।१। (मृजेर्वृद्धिः से) । समास — ञ् च ण् च ञ्णौ, तावितौ यस्य तत् ञ्णित्,
तस्मिन् = ञ्णिति, द्वन्द्वगर्भबहुव्रीहिसमास । अर्थः— (ञ्णिति) ञित् अथवा णित् परे
रहते (अच ) यजन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (वृद्धि ) वृद्धि हो । अलोन्त्य-
परिभाषा से अन्त्य अल् के स्थान पर वृद्धि होगी ।
‘सखि + औ’ यहां ‘औ’ णित् परे है, अतः सखि के अन्त्य अल् = इकार को
ऐकार वृद्धि हो — ‘सखै + औ’ हुआ । अब एचोऽयवायाव. (२२) से ऐकार को आय्
आदेश हो कर ‘सखायौ’ प्रयोग सिद्ध होता है ।
‘सखि + अस्’ (जस्) यहां भी पूर्ववत् णिद्द्भाव, वृद्धि और आय् आदेश हो
कर सकार को रुँत्व विसर्ग करने पर ‘सखाय’ प्रयोग सिद्ध होता है ।
‘हे सखि + स्’ यहां सम्बुद्धि में हरिशब्द के समान ह्रस्वस्य गुण. (१६६) से
इकार को एवार गुण हो एडन्त हो जाने से एङ्ह्रस्वात् सबुद्धेः (१३४) सूत्र द्वारा
सम्बुद्धि के हल् का लोप करने पर ‘हे सखे’ सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि (१८१)
सूत्र में ‘असम्बुद्धौ’ कथन के कारण यहा सबुद्धि मे णिद्द्भाव नहीं होता ।
‘सखि + अम्’ यहा भी पूर्ववत् सर्वनामस्थान को णिद्द्भाव, उस के परे रहते
वृद्धि तथा ऐकार को आय् आदेश हो कर—‘सखायम्’ प्रयोग सिद्ध होता है ।
द्वितीया के द्विवचन में ‘सखायौ’ प्रथमावत् बनता है ।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३३
बहुवचन में 'सखि + अस्' (शस्) इस दशा में पूर्वसवर्णदीर्घ होकर तस्माच्छसो
नः पुंसि (१३७) द्वारा सकार को नकार करने पर—'सखीन्' प्रयोग सिद्ध हुआ।
ध्यान रहे कि शस् के सर्वनामस्थान न होने से णिद्वद्भाव नहीं होगा।
तृतीया के एकवचन में 'सखि + आ' (टा) इस स्थिति में इको यणचि (१५) से
यण् आदेश हो—'सख्या' प्रयोग सिद्ध होता है। स्मरण रहे कि सखि की घिसञ्ज्ञा न
होने से आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा 'टा' को 'ना' नहीं होता।
तृतीया के द्विवचन में 'सखिभ्याम्'। बहुवचन में 'सखिभिः'।
'सखि + ए' (ङे) यहां घिसञ्ज्ञा के न होने से घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण नहीं
होता। इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'सख्ये' प्रयोग बनता है।
'सखि + अस्' (ङसि) यहां इको यणचि (१५) से इकार को यकार हो—
'सख्य् + अस्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम् — (१८३) ख्यत्यात्परस्य ।६।१।१०८॥
'खि-ति'शब्दाभ्यां 'खी-ती'शब्दाभ्यां कृतयणादेशाभ्यां परस्य ङसिँ-
ङसोरत उः । सख्युः २ ॥
अर्थः—जिन के स्थान पर यण् किया गया हो ऐसे खिशब्द, तिशब्द, खीशब्द
अथवा तीशब्द से परे ङसिँ और ङस् के अकार को उकार आदेश हो जाता है।
व्याख्या—ख्यत्यात् ।५।१। परस्य ।६।१। ङसिँ-ङसोः ।६।२। (ङसिँ-ङसोश्च
से)। अतः ।६।१। (एङः पदान्तादति से, विभक्तिविपरिणाम कर के)। उत् ।१।१।
(ऋत उत् से)। समासः—ख्यञ्च त्यञ्च = ख्यत्यम्, तस्मात् = ख्यत्यात्, समाहार-
द्वन्द्वः। यकारादकार उच्चारणार्थः¹। 'खि' या 'खी' शब्द के इवर्ण को यण् करने से ख्य्
और 'ति' या 'ती' शब्द के इवर्ण को यण् करने ये त्य् रूप बनता है। उसी का यहां
ग्रहण करना चाहिये। 'ख्यत्यात्' यह पञ्चम्यन्त है; अतः तस्मादित्युत्तरस्य (७१)
सूत्र से स्वयं ही ख्य् और त्य् से परे कार्य होना था, पुनः मुनि का 'परस्य' ग्रहण
करना एकः पूर्वपरयोः (६.१.८१)अधिकार की निवृत्ति के लिये है। अर्थः—(ख्यत्यात्)
यणादेश किये हुए खि, खी और ति, ती शब्दों से (परस्य) परे (ङसिँ-ङसोः) ङसिँ
और ङस् के (अतः) अकार के स्थान पर (उत्) उकार आदेश होता है।
'सख्य् + अस्' यहां यणादेश किया हुआ 'खि' शब्द है; अतः इस से परे ङसिँ
के अकार को उकार हो—'सख्य् + उस्' बना। अब सकार को रुत्व विसर्ग करने से
'सख्युः' प्रयोग सिद्ध हुआ।
द्विवचन में चतुर्थी के समान 'सखिभ्याम्'। बहुवचन में 'सखिभ्यः'।
१ ध्यान रहे कि यदि यहां अकार को उच्चारणार्थ न मान 'ख्य' और 'त्य' शब्दों का
ग्रहण कर 'सङ्ख्य' 'अपत्य' आदि शब्दों में इस की प्रवृत्ति मानेंगे तो सख्य्युर्यः
(११५७) पत्युर्नो यज्ञसंयोगे (४.१.३३), आपत्यस्य च तद्धितेऽनाति (६.४.१५१)
इत्यादि निर्देश विपरीत पड़ेंगे।