लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २१५
प्रश्न—निर्जर शब्द से तृतीया का बहुवचन भिस् करने पर जब अतो भिस
ऐस् (१४२) से भिस् को ऐस् हो जाता है तब जरस् आदेश क्यों नहीं होता ?
उत्तर—सन्निपातलक्षणो विधिरनिमित्तं तद्विघातस्य [सन्निपातः = संयोगः,
लक्षणम् = निमित्तं यस्य स सन्निपातलक्षणो विधिः । तम् = सन्निपातं विहन्तीति—
तद्विघातः, कर्मण्युपपदे कर्त्तर्यण् । तस्य अनिमित्तम्भवति, कारणन्न भवतीत्यर्थः ।] जिस
के विद्यमान होने पर जो कार्य हुआ हो वह कार्य उस निमित्त के विघातक कार्य में
निमित्त नहीं हुआ करता । तथा ह्यत्र—अदन्त अङ्ग निर्जर के होने से अतो भिस ऐस्
(१४२) द्वारा भिस् के स्थान में ऐस् हुआ है । तो यह ऐस् आदेश, अदन्त अङ्ग को
नष्ट करने वाले = जरस् आदेश का निमित्त नहीं होगा—अर्थात् इसे मान कर जरस्
आदेश न हो सकेगा।
प्रश्न—यदि ऐसा है तो 'रामाय' में सुंपि च (१४१) से दीर्घ आदेश भी न
होना चाहिये । क्योंकि अदन्त अङ्ग को निमित्त मान कर उत्पन्न हुआ 'य' आदेश—
अदन्तत्व के विघातक दीर्घ का निमित्त न हो सकेगा।
उत्तर—यह सत्य है; परन्तु पाणिनि के कष्टाय क्रमणे (७२८) और भाष्य-
कार के धर्माय नियमः = धर्मनियमः (पस्पशाह्निके) प्रभृति निर्देशों तथा सम्पूर्ण
संस्कृतसाहित्य के अनुरोध से इस स्थल पर उपर्युक्त परिभाषा प्रवृत्त नहीं होती ।
[यहां अदन्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।]
अब आकारान्त पुंल्लिङ्ग 'विश्वपा' शब्द का वर्णन करते हैं—
[लघु०] विश्वपाः ॥
व्याख्या—विश्वं पातीति विश्वपाः । विश्वकर्मोपपद पा रक्षणे (अदा०) धातु
से अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते (७६६) सूत्र से विँच् प्रत्यय हो उस का सर्वापहार लोप हो
जाता है । संसार के रक्षक—परमात्मा को 'विश्वपा' कहते हैं । प्रथमा के एकवचन
में सुँ प्रत्यय आ कर 'विश्वपा + सुँ' हुआ । अब उकार की इत्सञ्ज्ञा और लोप होने
पर सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग हो कर 'विश्वपाः' प्रयोग सिद्ध होता है ।
'विश्वपा + औ' यहां वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि प्राप्त होने पर उस का बाध
कर प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र
प्रवृत्त होता है—
[लघु०] निषेध-सूत्रम्—(१६२) दीर्घाज्जसि च ।६।१।१०५॥
दीर्घाज्जसि इचि च परे न पूर्वसवर्णदीर्घः । वृद्धिः—विश्वपौ ।
विश्वपाः । हे विश्वपाः ! । विश्वपाम् । विश्वपौ ॥
अर्थः—दीर्घ से जस् वा इच् प्रत्याहार परे हो तो पूर्वसवर्णदीर्घ न हो ।
व्याख्या—दीर्घात् ।५।१। जसि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । इचि ।७।१। (नादिचि
से) । पूर्वपरयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः अधिकृत है)। पूर्वसवर्णः ।१।१।
(प्रथमयोः पूर्वसवर्णः से) । दीर्घः ।१।१। (अकः सवर्णे दीर्घः से) । न इत्यव्ययपदम् ।