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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 633 में से

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पृष्ठ 242

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २२७
शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ
ययाति = प्रसिद्ध राजा | वाल्मीकि = प्रसिद्ध मुनि | सभापति = सभा का प्रधान
रमापति = विष्णु | विधि = दैव | समाधि = समाधि
रवि* = सूर्य | व्याधि = शारीरिक रोग | सारथि = रथ-वाहक
रश्मि = किरण | व्रीहि* = चावल | सुगन्धि = सुगन्धयुक्त
राशि = ढेर | शकुनि = पक्षी | सुमति = श्रेष्ठ बुद्धि वाला
वकवृत्ति = स्वार्थी | शीतरश्मि = चन्द्र | सुरभि* = वसन्त
वह्नि = आग | सनाभि = जात भाई | सूरि* = विद्वान्
वाक्पति = वृहस्पति | सन्धि = मेल | सेनापति = सेना-नायक
वारिधि = सागर | सप्तसप्ति = सूर्य | हिमगिरि* = हिमालय
वारिराशि = समुद्र | सप्ति = घोड़ा |
हरि शब्द की अपेक्षा सखि, पति, कति, त्रि और द्वि शब्दों में कुछ अन्तर
पड़ता है; अतः अब इन का क्रमशः वर्णन किया जाता है । प्रथम सखि (मित्र)
शब्द यथा—
शेषो घ्यसखि (१७०) सूत्र में 'असखि' कहने से 'सखि' शब्द की घिसञ्ज्ञा
नहीं होती । प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर इस से स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं । प्रथमा
के एकवचन में—सखि+सुँ=सखि+स् । इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम् —(१७५) अनँङ् सौ ।७।१।९३॥
सख्युरङ्गस्यानँङादेशोऽसम्बुद्धौ सौ ॥
अर्थः—सम्बुद्धिभिन्न सुँ परे हो तो अङ्गसञ्ज्ञक सखि शब्द के स्थान पर अनँङ्
आदेश हो ।
व्याख्या-- सख्युः ।६।१। (सख्युरसम्बुद्धौ से) । अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत
है) । अनँङ् ।१।१। असम्बुद्धौ ।७।१। (सख्युरसम्बुद्धौ से) । सौ ।७।१। यहां 'सौ' से
प्रथमा के एकवचन का ग्रहण होता है सप्तमी के बहुवचन का नहीं; क्योंकि सप्तमी
का बहुवचन मानने मे 'असम्बुद्धौ' निषेध व्यर्थ हो जाता है । अर्थः—(असम्बुद्धौ)
सम्बुद्धिभिन्न (सौ) सुँ परे होने पर (अङ्गस्य) अङ्गसञ्ज्ञक (सख्युः) सखि शब्द के
स्थान पर (अनँङ्) अनँङ् आदेश हो ।
अनँङ् मे ङकार इत् है । नकारोत्तर अकार उच्चारणार्थ है । ङित् होने के
कारण ङिच्च (४६) द्वारा यह अनँङ् आदेश सखि शब्द के अन्त्य अल् = इकार के
स्थान पर होगा ।
'सखि+स्' यहां सुँ परे है; अतः इकार को अनँङ् आदेश हो अँङ् के चले
जाने पर—सख् अन्+स् = 'सखन्+स्' हुआ । इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता
है—