लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
द्विवचन में पूर्ववत् 'हर्योः' रूप सिद्ध होता है।
सप्तमी के बहुवचन में आदेशप्रत्यययो (१५०) से प्रत्यय के अवयव सकार
को षकार हो 'हरिषु' प्रयोग सिद्ध होता है। हरिशब्द की समग्र रूपमाला यथा--
प्र० हरि हरी हरयः | पं० हरेः हरिभ्याम् हरिभ्यः
द्वि० हरिम् , हरीन् | ष० ,, हर्योः हरीणाम्
तृ० हरिणा हरिभ्याम् हरिभिः | स० हरौ ,, हरिषु
च० हरये हरिभ्यः | सं० हे हरे! हे हरी! हे हरयः!
इसी प्रकार 'कवि' आदि ह्रस्व इकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों की प्रक्रिया होती है।
बालकोपयोगी कुछ शब्दों का सङ्ग्रह यथा--
शब्द = अर्थ | शब्द = अर्थ | शब्द = अर्थ
अग्नि = आग | कुक्षि* = पेट | पयोधि = समुद्र
अङ्घ्रि* = चरण | कृपीटयोनि = अग्नि | पयोराशि = समुद्र
अञ्जलि = जुड़े हुए हाथ | कृमि* = कीड़ा | परिधि = घेरा
अतिथि = मेहमान | गिरि* = पहाड़ | पवि = वज्र
अद्रि* = पहाड़ | ग्रन्थि = गाँठ | पशुपति = शिव
अरनि = दानु | चक्रपाणि = विष्णु | पाणि = हाथ
अरि* = शत्रु | चरणग्रन्थि = गिट्टा | पाणिनि = प्रसिद्ध मुनि
अलि = भ्रमर | चूडामणि = शिरोरत्न | प्रजापति = ब्रह्मा
अवधि = सीमा | जठराग्नि = पेट की अग्नि | प्रणिधि = दूत
असि = तलवार | जलधि = समुद्र | प्रतिनिधि = नुमाइन्दा
अहि = साप | ज्ञाति = रिश्तेदार | वालधि = पूँछ
आधि = मानसिक पीड़ा | तरणि = सूर्य | वृहस्पति = देवगुरु
इषुधि = तरकस | दिनमणि = सूर्य | भर्तृहरि* = प्रसिद्ध राजा
उडुपति = चन्द्र | दिवाकीर्ति = नापित | भागुरि* = एक मुनि
उदधि = समुद्र | दुन्दुभि = नगारा | भारवि* = एक कवि
उपधि = छल | दुर्मति = दुष्ट-बुद्धि | भूपति = राजा
उपाधि = उपाधि | धन्वन्तरि* = प्रसिद्ध वैद्य | मणि = मणि
उषापति = सूर्य | धूर्जटि = शिव | मरीचि = किरण
ऊर्मि* = लहर | ध्वनि = आवाज | मातलि = इन्द्र का सारथी
ऋषि* = मन्त्रद्रष्टा | नमुचि = एक दैत्य | मारुति = हनुमान्
कपि = वानर | निधि = खजाना | मुनि = मुनि
कलानिधि = चन्द्र | निशापति = चन्द्र | मृगपति = शेर
कलि = झगड़ा | नृपति = राजा | मौलि = सिर
कवि = कविताकार | पति = पैदल सेना | यति = सन्यासी