लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २२५
[लघु०] विधि-सूत्रम्- (१७३) ङसिँ-ङसोश्च ।६।१।१०६॥
एङो ङसिँ-ङसोरति पूर्वरूपमेकादेशः । हरेः २ । हर्योः । हरीणाम् ॥
अर्थः-एङ् (ए, ओ) से ङसिँ या ङस् का अकार परे हो तो पूर्व + पर के
स्थान पर पूर्वरूप एकादेश हो ।
व्याख्या - एङः ।५।१। (एङः पदान्तादति मे)। ङसिँ-ङसोः ।६।२। च इत्यव्यय-
पदम् । अति ।७।१। (एङः पदान्तादति मे) । पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः
पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)। पूर्वः ।१।१। (अमि पूर्वः से)। अर्थः- (एङः) एङ् प्रत्या-
हार से (ङसिँ-ङसोः) ङसिँ अथवा ङस् का (अति) अत् परे हो तो (पूर्व-परयोः)
पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (पूर्वः) पूर्व वर्ण आदेश होता है ।
'हरे + अस्' यहां एकार एङ् से ङसिँ का अकार परे है, अतः पूर्व + पर के
स्थान पर एकार पूर्वरूप हो कर सकार को रुत्व विसर्ग करने से 'हरेः' प्रयोग सिद्ध हुआ ।
ओकार का उदाहरण 'भानोः' आगे आयेगा ।
षष्ठी के एकवचन में पूर्ववत् 'हरेः' रूप बनता है ।
द्विवचन में 'हरि + ओस्' इस दशा में इको यणचि (१५) से यण् हो कर
मकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग करने पर 'हर्योः' रूप बनता है ।
बहुवचन में 'हरि + आम्' । यहां ह्रस्वान्त अङ्ग 'हरि' है अतः ह्रस्वनद्यापो
नुट् (१४८) से आम् को नुट् का आगम हो अनुबन्धलोप और नामि (१८४) से
दीर्घ करने पर 'हरी + नाम्' । अब अट्कुप्वाङ्० (१३८) सूत्र से नकार को णकार
करने से - 'हरीणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है ।
सप्तमी के एकवचन में-हरि + इ (ङि) । यहां घिसञ्ज्ञा हो कर घेर्ङिति
(१७२) से गुण प्राप्त होता है । इस पर इस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है-
[लघु०] विधि-सूत्रम् - (१७४) अच घेः ।७।३।११९॥
इदुद्भ्यामुत्तरस्य ङेगौत्, घेरच्च । हरौ । हर्योः । हरिषु । एवं
कवयादयः ॥
अर्थः-ह्रस्व इकार तथा ह्रस्व उकार से परे ङि को औत् और घि को अत्
आदेश हो ।
व्याख्या - इदुद्भ्याम् ।५।२। (इदुद्भ्याम् से)। ङेः ।६।१। (ङेराम्नद्याम्नीभ्यः
मे)। औत् ।१।१। (औत् से)। घेः ।६।१। अत् ।१।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थः-
(इदुद्भ्याम्) ह्रस्व इकार तथा ह्रस्व उकार से परे (ङेः) ङि के स्थान पर (औत्)
औ आदेश हो (च) तथा (घेः) घिसञ्ज्ञक के स्थान पर (अत्) ह्रस्व अकार आदेश
हो । अलोन्त्यपरिभाषा से यह अत् आदेश घि के अन्त्य अल् को ही होगा ।
'हरि + इ' यहां इस सूत्र से ङि (इ) को 'औ' और घिसञ्ज्ञक 'हरि' शब्द के
इकार के स्थान पर अकार आदेश हुआ । तब 'हर् + औ' इस दशा में वृद्धिरेचि (३३)
से वृद्धि एकादेश हो कर 'हरौ' रूप सिद्ध हुआ ।
ल० प्र० (१५)