लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
नामस्थानम् । १।१। (इतोऽत् सर्वनामस्थाने से) । णित् ।१।१। (गोतो णित् से) ।
समास — न सम्बुद्धि = असम्बुद्धि, नञ्तत्पुरुष । अर्थ — (अङ्गात्) अङ्गसञ्ज्ञक
(सख्यु ) सखिशब्द से परे (असम्बुद्धि) सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थानम्) सर्वनामस्थान
(णित्) णित् हो ।
यह अतिदेश-सूत्र है । अतिदेशसूत्रों का यह काम होता है कि जो, जो नहीं
उसे वह बना देते हैं । यथा सिंहो माणवक (बालक शेर है)। बालक शेर नहीं होता,
परन्तु उसे शेर कह दिया जाना है । इस का तात्पर्य अन्ततोगत्वा सादृश्य म समाप्त
होता है—बालक शेर के समान (शूर) है । यहां सर्वनामस्थान को णित् कहा गया
है, परन्तु उस में न तो ण् है और न ही उस की इत्सञ्ज्ञा होती है । तो यहां ‘णित्’
अतिदेश का तात्पर्य ‘णिद्वत्’ से होगा । अर्थात् णित् के परे रहने पर जो कार्य होते हैं,
उस के पर रहने पर भी होंगे ।
‘सखि + औ’ यहां अङ्गसञ्ज्ञक सखि से परे सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान ‘औ’
है । यह णित् = णिद्वत् हुआ । अब अग्रिमसूत्र में इस का फल दर्शाते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(१८२) अचो ञ्णिति ।७।२।११५॥
अजन्ताङ्गस्य वृद्धि, जिति णिति च परे । सखायौ, सखाय ।
हे सखे ! । सखायम्, सखायौ, सखीन् । सख्या । सख्ये ॥
अर्थः—ञित् अथवा णित् परे रहते अजन्त अङ्ग के स्थान पर वृद्धि हो ।
व्याख्या—अच ६।१। अङ्गस्य ।६।१। (अधिकृत है) । ञ्णिति ।७।१। वृद्धि
।१।१। (मृजेर्वृद्धिः से) । समास — ञ् च ण् च ञ्णौ, तावितौ यस्य तत् ञ्णित्,
तस्मिन् = ञ्णिति, द्वन्द्वगर्भबहुव्रीहिसमास । अर्थः— (ञ्णिति) ञित् अथवा णित् परे
रहते (अच ) यजन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (वृद्धि ) वृद्धि हो । अलोन्त्य-
परिभाषा से अन्त्य अल् के स्थान पर वृद्धि होगी ।
‘सखि + औ’ यहां ‘औ’ णित् परे है, अतः सखि के अन्त्य अल् = इकार को
ऐकार वृद्धि हो — ‘सखै + औ’ हुआ । अब एचोऽयवायाव. (२२) से ऐकार को आय्
आदेश हो कर ‘सखायौ’ प्रयोग सिद्ध होता है ।
‘सखि + अस्’ (जस्) यहां भी पूर्ववत् णिद्द्भाव, वृद्धि और आय् आदेश हो
कर सकार को रुँत्व विसर्ग करने पर ‘सखाय’ प्रयोग सिद्ध होता है ।
‘हे सखि + स्’ यहां सम्बुद्धि में हरिशब्द के समान ह्रस्वस्य गुण. (१६६) से
इकार को एवार गुण हो एडन्त हो जाने से एङ्ह्रस्वात् सबुद्धेः (१३४) सूत्र द्वारा
सम्बुद्धि के हल् का लोप करने पर ‘हे सखे’ सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि (१८१)
सूत्र में ‘असम्बुद्धौ’ कथन के कारण यहा सबुद्धि मे णिद्द्भाव नहीं होता ।
‘सखि + अम्’ यहा भी पूर्ववत् सर्वनामस्थान को णिद्द्भाव, उस के परे रहते
वृद्धि तथा ऐकार को आय् आदेश हो कर—‘सखायम्’ प्रयोग सिद्ध होता है ।
द्वितीया के द्विवचन में ‘सखायौ’ प्रथमावत् बनता है ।