लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (१६८) जसि च ।७।३।१०६॥
ह्रस्वान्तस्याङ्गस्य गुणः । हरयः ॥
अर्थः—जस् परे होने पर ह्रस्वान्त अङ्ग को गुण आदेश हो जाता है ।
व्याख्या—जसि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । ह्रस्वस्य ।६।१। अङ्गस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है) । गुणः ।१।१। (ह्रस्वस्य गुणः से) । विशेषण होने से 'ह्रस्वस्य'
से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थ — (जसि) जस् परे होने पर (ह्रस्वस्य) ह्रस्वान्त (अङ्ग-
स्य) अङ्ग के स्थान पर (गुणः) गुण हो जाता है । अलोऽन्त्यपरिभाषा से यह गुण
अङ्ग के अन्त्य वर्ण के स्थान पर होगा ।
'हरि+अस्' यहां ह्रस्वान्त अङ्ग 'हरि' है । इस से परे जस् वर्तमान है ।
अतः प्रकृतसूत्र द्वारा अङ्ग के अन्त्य अल् —इकार के स्थान पर एकार गुण हो गया—
'हरे + अस्' । यहां एकार पदान्त नहीं अतः एङ् पदान्तादति (८१) का विषय नहीं ।
अब एचोऽयवायावः (२७) सूत्र से एकार को अय् आदेश हो कर रुत्व-विसर्ग करने से
—'हरयः' प्रयोग सिद्ध होता है ।
सम्बोधन के एकवचन में—'हे हरि+स्' । एकवचनं सम्बुद्धिः (१३२) से
सम्बुद्धिसंज्ञा हो कर एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः (१३४) से सकार का लोप प्राप्त होता है।
इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम् — (१६६) ह्रस्वस्य गुणः ।७।३।१०८॥
सम्बुद्धौ । हे हरे ! । हरिम् । हरीन् ॥
अर्थः—सम्बुद्धि परे होने पर ह्रस्वान्त अङ्ग को गुण आदेश हो जाता है ।
व्याख्या—सम्बुद्धौ ।७।१। (सम्बुद्धौ च मे) । ह्रस्वस्य ।६।१। अङ्गस्य ।६।१।
(यह अधिकृत है) । गुणः ।१।१। 'ह्रस्वस्य' से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थ —
(सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि परे होने पर (ह्रस्वस्य) ह्रस्वान्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर
(गुणः) गुण आदेश हो जाता है । अलोऽन्त्यपरिभाषा द्वारा यह गुण अङ्ग के अन्त्य
अल् के स्थान पर होगा ।
'हे हरि+स्' यहां सम्बुद्धि परे है, अतः ह्रस्वान्त अङ्ग 'हरि' के अन्त्य इकार
को एकार गुण हो जाता है । तब अङ्ग के एङन्त हो जाने से एङ्घ्रस्वात् सम्बुद्धेः
(१३४) सूत्र से सम्बुद्धि का लोप हो कर 'हे हरे !' प्रयोग सिद्ध होता है ।
द्वितीया के एकवचन में 'हरि+अम्' इस अवस्था में अमि पूर्वः (१३५) से
पूर्वरूप एकादेश हो कर 'हरिम्' प्रयोग सिद्ध होता है ।
द्वितीया के द्विवचन में प्रथमावत् 'हरी' रूप बनता है ।
बहुवचन में 'हरि+अस्' (शस्) इस दशा में प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६)
से पूर्वसवर्णदीर्घ ईकार हो कर तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) से सकार को नकार
करने पर 'हरीन्' प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि यहां पदान्तस्य (१३६) से
नकार को णकार का निषेध हो जाता है ।
'हरि+आ(टा)' यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—