खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
३४ ] सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
न च तैर्दोषैर्नास्त्येव ज्ञानमित्यास्थेयम्, स्वतः सर्वसिद्धस्य दुरुपह्नवत्वात् ।
स्वप्रकाशाङ्गीकारादेव चाऽनुभवस्य सर्वदोषहानेर्वक्ष्यमाणत्वात् । प्रकाशात्ममात्रस्यैव
स्वतःसिद्धिसम्भवे जडात्मनां धर्माणां केषामपि तदन्तर्भावानुपपत्तिः ।
अत एव धर्मोपग्रहप्रवर्त्तिष्णुवाग्व्यवहाराविषयत्वम्, कालानवच्छेदमादाय च
नित्यत्वोपचारः । देशानवच्छेदमादाय विभुत्वव्यपदेशः । प्रकारावच्छेदविग्रह-
निबन्धनश्च सर्वात्मत्वाऽद्वैतादिव्यवहारः । सौगतप्राभाकरादिवद् भावे, नैयायिक-
वच्च अभावे अभावानतिरेकस्वीकारादेव चाद्वैताऽव्याघातः । भ्रमविषयनिषेधस्य च
प्रतियोगिनः सर्वथैवासिद्ध्याऽपि न काचित् क्षतिः ।
तदेतत्तु श्रुत्या प्रमाणेनोपलक्षणन्यायात् तात्पर्यतः प्रकाश्यते । तेन
पदार्थों में अन्तर्भाव न होने से विषय-विषयीभाव असम्भव है, अतः वह भी
नहीं हो सकता । ज्ञान असम्बद्ध का ही ग्रहण करता है, यह भी नहीं कह सकते,
क्योंकि यदि ज्ञान असम्बद्ध का ग्रहण करे, तो अन्य का भी ग्रहण हो जाय ।
प्रश्न — उक्त दोषों से ज्ञान भी नहीं है, ऐसा ही क्यों न मानें ? उत्तर — ज्ञान
सब मनुष्यों के अपने अनुभव से ही सिद्ध है, अतः उसका अस्वीकार नहीं हो
सकता । स्वप्रकाश होने से ही अनवस्था, असम्बन्ध आदि दोष नहीं होते, यह
आगे ‘तत्स्वप्रकाशपरमार्थचिदेव’ आदिसे ( २६ वीं कारिका से ) कहेंगे; एकमात्र
अभानापादक अज्ञान का विरोधी ज्ञान ही स्वतःसिद्ध हो सकता है और जडात्मक
कोई भी अन्तःकरणधर्म उपर्युक्त प्रकाशात्मक ज्ञानसे अभिन्न नहीं । फलतः उन
धर्मों से रहित स्वतः सिद्ध ज्ञानमात्र के रहने में कोई अनुपपत्ति नहीं है । मानमेय
खण्डन प्रकरणोक्त दोष पराधीनसिद्धिक वस्तुओंका ही निरास कर सकते हैं, स्वतः
सिद्ध वस्तु के निरास में उनकी सामर्थ्य ही नहीं, यह भाव है ।
इसीलिए ज्ञानस्वरूप ब्रह्म सत्ता, गुणत्व, ज्ञानत्व आदि जड़धर्मों के
सम्बन्ध से प्रवृत्त वाग्व्यवहार का अगोचर कहा गया है । प्रश्न—यदि
ब्रह्म में कोई धर्म नहीं, तो ‘सत्यं ज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ इस श्रुति में नित्यत्व
धर्म का व्यवहार कैसे होता है ? उत्तर—काल के सम्बन्ध से वस्तु में
अनित्यत्व का व्यवहार होता है और वह ब्रह्म में नहीं है । अतः अनित्यत्व
के अभाव को मानकर उपचार ( आरोप से ) नित्यत्व-व्यवहार होता है ।
जैसे लाल, पीले आदि रूपों का अभाव के होने से आकाश में नीलरूपता का
व्यवहार होता है ।
परिच्छेद ] स्वप्रकाश-विज्ञानवाद-विचार ३५
परमार्थतोऽभिधानाभिधेयभावविरहे तात्पर्यतः श्रुतिस्तस्मिन्नविद्यादशायां पराभ्यु-
पगमरीत्या प्रमाणमित्युच्यते । वस्तुतस्तु स्वात्मसिद्धमेव चिद्रूपम् ।
प्रश्न—'जगद् बृंहयति ( व्याप्नोति ) इति ब्रह्म' इस व्युत्पत्ति से तथा 'महतो
महीयान्' इस श्रुति से ब्रह्म में परममहत् परिमाण अवश्य मानना पड़ेगा । उत्तर—देश
के सम्बन्ध से मूर्त्तत्व ( परिमितत्व ) का व्यवहार होता है । ब्रह्म में मूर्त्तत्व नहीं
है, अतः आरोप से ही विभुत्व ( व्यापकत्व ) का व्यवहार होता है । प्रश्न—घटत्वादि
एक-एक धर्म के सम्बन्ध से घटादि घटत्वाद्यात्मक एवं द्वैत हैं, परन्तु ब्रह्म सर्वधर्मों के
सम्बन्ध से सर्वात्मक तथा अद्वैत है । इस रीति से ब्रह्म में सर्वधर्मों का सम्बन्ध
मानना पड़ेगा । उत्तर—घटत्वादि एक-एक धर्म के सम्बन्ध से घटादि असर्व-धर्मात्मक
हैं । किन्तु ब्रह्म में असर्व-धर्मात्मकत्व का अभाव होने से आरोपित सर्वधर्मात्मकत्व
का व्यवहार होता है ।
प्रश्न—द्वैत के अभाव को 'अद्वैत' कहते हैं । ब्रह्म में द्वैत का अभाव है और वह
अधिकरणरूप नहीं है । अतः निर्धर्मक ब्रह्म सिद्ध नहीं हुआ । उत्तर—जैसे बौद्ध तथा
प्राभाकर अभावमात्र को और नैयायिक अभाव में स्थित अभाव को अधिकरणरूप
मानते हैं, वैसे ही हम भी अभाव को अधिकरणरूप ही मानते हैं । प्रश्न—यदि द्वैत के
अभाव को 'अद्वैत' कहते हैं, तब तो प्रतियोगी रूप से द्वैत भी मानना पड़ेगा । अतः
ब्रह्म अद्वैत है, यह कथन नहीं बनता । उत्तर—जैसे भ्रमस्थल में असत् रजत का ही 'नेदं
रजतम्' निषेध होता है, वैसे ही असत् या कल्पित द्वैत का ही निषेध होता है ।
अभाव-ज्ञान में प्रतियोगी का सामान्य ज्ञान अपेक्षित है, प्रतियोगी की प्रमा नहीं ।
यहां द्वैत का भ्रमात्मक ज्ञान है ही ।
प्रश्न—ब्रह्म यदि वाणी का अगोचर है, तो उसमें श्रुति-प्रमाण कैसे हो सकती
है ? उत्तर—यद्यपि धर्म का सम्बन्ध न होने से ब्रह्म 'पद-वाच्य' नहीं और योग्यता-ज्ञान
न होने से वाक्यार्थ भी नहीं है; तथापि जैसे 'काकवन्तो देवदत्तस्य गृहाः' इस वाक्य में
काकपद उपलक्षण रूप से तृणाच्छादन ( छप्पर ) का प्रतिपादन करता है, वैसे ही श्रुति
भी जगत्कर्तृत्वादि विशेषणों को त्यागकर तात्पर्य-बल से ब्रह्म का ही प्रतिपादन करती
है । तस्मात् वाच्य-वाचकभाव से रहित उस ब्रह्म में अविद्या-दशा में नैयायिकादि
की रीति से श्रुति प्रमाण है । वास्तव में अपने आप सिद्ध चिद्रूप ब्रह्म है ।
३६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
ननु च स्वप्रकाशत्वं ज्ञानस्येत्यनुपपन्नमिदम्, क्रियाकर्मभावस्य भेदव्यति-
रेकेणानुपपत्तेः । कार्या क्रिया हि कर्मणो भवति, कर्म च कारणं क्रियायाः । न च
स्वेनैव स्वनिष्पादनं शक्यम्, पूर्वापरभावविशेषस्य हेतुहेतुमद्भावरूपत्वात् । न च
तस्मादेव तदेव पूर्वमपरं च सम्भवति, तदनवच्छिन्नकालविशेषस्य तत्पूर्व-
शब्दार्थत्वात् । तदा च तस्य सद्भावस्वीकारे स एव कालस्तदवच्छिन्नः, तदन-
वच्छिन्नश्चेति विरोधात् ।
मैवम्; क्रियायाः कर्मजन्यतानियमानङ्गीकारात् । भवत्येव अनागतविषयविज्ञाने
तदसम्भवात् । क्वचिज्जनकतामादाय च कर्मणि कारकत्वव्यपदेशात् । करण-
व्यापारविषयत्वाद् वा परसमवेतक्रियाफलभागित्वाद्वा कर्मलक्षणात् विनापि
क्रियाजनकत्वेन कर्मव्यवहारोपपत्तेः ।
किञ्च तत्कर्मत्वं यत्स्वं प्रति विरुद्धयते ? परसमवेतक्रियाफलभागित्वमिति
प्रश्न—ज्ञान स्व-प्रकाश है, यह बात युक्त नहीं; क्योंकि क्रिया-कर्मभाव भेद
के विना नहीं होता। क्रिया कर्म का कार्य है और कर्म क्रिया का कारण। स्व से
स्व की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि पूर्व-परभाव कार्य-कारणभावरूप है और अपने
से आप पूर्व तथा पर नहीं हो सकता। अपने से अनवच्छिन्न (रहित) काल
'पूर्व' शब्द का अर्थ है। यदि पूर्वकाल में भी कार्य को मानें, तो वही काल उस
कार्य से युक्त और अयुक्त है, ऐसा विरोध हो जायगा।
उत्तर—'क्रिया कर्म से जन्य है'- यह नियम हम नहीं मानते; क्योंकि 'घटं
ज्ञास्यति' इस भावी स्थल में व्यभिचार है। प्रश्न—यदि कर्म क्रिया का कारण नहीं,
तो कर्म की कारक में गणना क्यों होती है ? उत्तर—'आत्मानं जानाति' आदि किसी-
किसी स्थल में कर्म क्रिया का जनक होता है, अतएव कर्म की कारक में गणना
की जाती है। प्रश्न—अतीत और अनागत कर्मों में भी रहनेवाले किसी एक शक्यताव-
च्छेदक (कर्म-लक्षण) के न होने से अनुगत कर्म-व्यवहार कैसे होगा ? उत्तर—
करण के व्यापार का जो विषय हो, उसे 'कर्म' कहते हैं। अथवा अन्य में रहनेवाली
क्रिया के फल से युक्त को 'कर्म' कहते हैं। इन्हीं लक्षणों के अनुसार 'घटं ज्ञास्यति'
आदि स्थल में क्रिया का जनक न होने पर भी घट में कर्मत्व का व्यवहार होता है।
प्रश्न—वह कर्मत्व क्या है, जो स्व का स्व में विरुद्ध है ? निबंधकर्ता—अन्य
में विद्यमान क्रिया-फल से युक्तत्व ही वह है। खंडनकर्ता—तब तो 'वृक्षात् पर्ण
परिच्छेद ] स्वप्रकाश-विज्ञानवाद-विचार ३७
चेन्न । अपादानस्यापि व्याप्तेः अपादानं कर्मापीति चेन्न । 'वृक्षात्पतति पर्णमि'तिवत्
'वृक्षं पर्णं पतती'त्यपि स्यात् ।
विवक्षातः कारकाणि भवन्तीति तदविवक्षया नैवमिति चेन्न । वस्तुतः सतस्ता-
द्रूप्यस्य यदि विवक्षा स्यात्तदा तदपि स्यात् । अपादानस्य कर्मत्वं न विवक्ष्यत
इति शाब्दिकसम्प्रदायोऽयमिति चेत्, तर्हि तत्र निवृत्तसर्वकर्मव्यवहारेऽपि स्वकृत-
कर्मलक्षणानुरोधेन कर्मत्वमभ्युपगच्छता वस्तुमात्रं कर्मेत्यपि लक्षणं सावकाशितं स्यात् ।
कथञ्च लोकोत्तरप्रज्ञेन निवृत्तसर्वकर्मव्यवहारेऽपि स्वकृतकर्मत्वमस्तीत्यधिगतम् ?
अपादानेतरद् ईदृशं कर्मेति चेन्न । तत्रापि 'नदी वर्धते' इत्यादौ तद्वृद्धे-
रप्राप्ततीरभागादिप्राप्तिफलायाः सकर्मकत्वापत्तेः । अपादानेतरदिति स्थाने क्रिया-
पतति' यहाँ वृक्षरूप अपादान पर्णनिष्ठ-पतन-क्रिया के विभागरूप फल से युक्त
है, अतः उसमें भी कर्म-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । निर्वचन—अपादान कर्म भी
है । खंडन—फिर तो जैसे 'वृक्षात् पतति' प्रयोग होता है, वैसे ही 'वृक्षं पतति'
यह भी प्रयोग हो जायगा ।
निर्वचन—कारक वक्ता की इच्छा से होते हैं । यहाँ वक्ता को कर्मत्व की इच्छा
नहीं है, अतः द्वितीया नहीं होती । खंडन—यदि वस्तुतः अपादान भी कर्म हो, तब तो
जिस काल में उसे कर्मत्वरूप से कहने की इच्छा हो, उस काल में 'वृक्षं पतति' ऐसा
भी प्रयोग हो जायगा । निर्वचन—अपादान की कर्मत्वरूप से विवक्षा नहीं होती,
ऐसा वैयाकरणों का सम्प्रदाय है । खंडन—जिसमें कर्मत्व का कभी भी व्यवहार नहीं
होता, उसमें भी स्वकल्पित लक्षण के अनुरोध से कर्मत्व माननेवाले आप 'वस्तुमात्र
कर्म है' ऐसे ही लक्षण की कल्पना क्यों न करें ? जब कोई दोष दे, तो वैयाकरणों
के सम्प्रदाय का आश्रयण कीजिये । इसके अतिरिक्त जिसमें कर्मत्वकृत कोई भी
व्यवहार नहीं होता, उस अपादान में कर्मत्व को लोकोत्तर बुद्धिवाले आपने कैसे
जाना ? अर्थात् जब कि अपादान में वृद्धों द्वारा कर्मत्वव्यवहार नहीं होता,
तब उसे कर्म मानना ठीक नहीं ।
निर्वचन---'अपादान से इतर जो पर-समवेत क्रिया के फल का आश्रय हो, वह
कर्म है' ऐसा निवेश करने पर कोई दोष नहीं होगा । खंडन---फिर भी 'नदी वर्धते'
इस स्थल में तीर को कर्मत्व होने लगेगा, क्योंकि वह नदीवृद्धिरूप क्रिया के फल
( अप्राप्त तीरभाग में प्राप्ति ) का आश्रय है । निर्वचन—'क्रिया का नाशक जो
पर-समवेतक्रियाफल है, उसका भागी कर्म है' ऐसा लक्षण करेंगे । इससे 'वृक्षं पतति'
३८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
नाशकेति करणेऽप्यस्य दोषस्य तादवस्थ्यात् । विनाशलक्षणायां 'वृद्धौ तदसम्भ-
वाच्च । 'वृक्षं त्यजती'त्यादौ अकर्मत्वप्रसङ्गाच्च ।
'आत्मानं जानामी'त्यत्र परत्वाभावादव्याप्तेः । तत्राप्युपाधिभेदात्परत्वम्,
कर्तृत्वभोक्तृत्वादुपहितस्यैवात्मनो ज्ञेयत्वाम्युपगमादिति चेन्न । यतोऽस्तु तावद्व
यथा कथंचिदेवम्, तथाप्यध्यात्मविदो निरुपाधिमात्मानं जानतो ज्ञानं नात्मकर्मकं
स्यात् । 'पच्यते फलं स्वयमेवेत्यादौ कर्मकर्तरि का गतिः स्यात् ?
सर्वज्ञमीश्वरं मन्यमानेन च नित्यज्ञाने तस्मिन् भगवति फलनाशकत्वस्या-
ऐसे प्रयोग की आपत्ति भी न होगी, क्योंकि वृक्षनिष्ठ विभाग पतन-क्रिया का नाशक
नहीं, किन्तु अधःसंयोग ही नाशक है । खंडन — इस लक्षण में भी 'नदी वर्धते'
इसी स्थल में दोष है, क्योंकि नीर-तीर-संयोगरूप फल वृद्धिरूप क्रिया का नाशक
है, अतः तद्-भागी ( उसका आश्रय ) होने से तीर कर्म होने लगेगा । किञ्च, जहाँ
नाशरूप वृद्धि है, वहाँ असम्भव हो जायगा । अर्थात् जहाँ 'वृध' धातु का छेदन अर्थ है,
उस स्थल ( 'वृक्षं वर्धते वर्धकिः' ) में नाशरूप फल क्रिया का अनाशक है, अतः
वृक्ष कर्म न होने पायेगा । किञ्च 'वृक्षं त्यजति' में विभागरूप फल क्रिया का नाशक
नहीं है, अतः वृक्ष में कर्मत्व नहीं होगा ।
'आत्मानं जानाति' यहाँ भी इतर के न होने से कर्मत्व न होगा । निर्वचन—
शरीर-इन्द्रिय ( स्थूलशरीर ) से युक्त आत्मा कर्ता है और कर्तृत्वादिविशिष्ट
( सूक्ष्मशरीरयुक्त ) आत्मा कर्म है, इस प्रकार औपाधिक भेद हो जाने से दोष
न होगा । खंडन—यद्यपि उपाधि भिन्न-भिन्न हैं, फिर भी उपहित आत्मा एक ही
है । अतः कर्ता और कर्म दोनों में भेद दुर्लभ ही है । किञ्च, निरुपाधि आत्मतत्त्व को
जाननेवाले अध्यात्मविदों के अभिप्राय से 'आत्मानं' ज्ञान का कर्म नहीं होगा । किञ्च,
'पच्यते फलं स्वयमेव' इस प्रयोग में जहाँ कर्म की कर्तृत्व रूप से विवक्षा है अर्थात्
कर्म को ही कर्ता मान लिया है, वहाँ 'पर' न होने से फल में कर्मत्व नहीं बनेगा ।
किञ्च, जो ईश्वर को सर्वज्ञ मानते हैं, उनके मत में ईश्वर का ज्ञान नित्य
है, फलनाश्य नहीं । अतः 'ईश्वरः सर्वं जानाति' यहाँ 'सर्व' को कर्मत्व न
होगा । इस तरह स्पष्ट है कि कर्म का कोई निर्दुष्ट लक्षण बन नहीं सकता । अतः
यही मानना उचित है वैयाकरणों ने 'नदी, वृद्धि' आदि के तुल्य 'कर्म' का भी
शब्दसिद्धयर्थ केवल संकेत किया है कर्म के अनुगत लक्षण का अन्वेषण व्यर्थ है ।
१. 'वर्ध छेदने' चुरादिगणीय धातु है । वहाँ 'वृध' इस पाठान्तर के अनुसार यह ग्रन्थ है ।
परिच्छेद ] स्वप्रकाश-विज्ञानवाद-विचार ३६
नभ्युपगमात् तं प्रत्येतानल्लक्षणाऽसिद्धेः । तस्माद् व्याकरणकारैः शब्दसिद्धयर्थं
नदीवृद्ध्यादिवत् कर्मापि परिभाषितमित्यलं तदनुगतलक्षणगवेषणया ।
करणव्यापारविषयः कर्म इति चेन्न । 'हस्तेन रामेण शरेण' इत्यादावति-
प्रसङ्गात् । लक्षणं विनापि क्रियाजनकत्वे सति व्यापारोद्देश्यत्वेन कर्मव्यवहारोपपत्तेः।
शेषञ्च ईश्वराभिसन्धौ स्वप्रकाशवादे १निर्वक्ष्यामः ।
ननु चाऽभेदे विषयविषयिभावस्यैवासङ्गतत्वम्, विषयित्वं हि विषयसम्बन्धिता,
सम्बन्धश्च भेदमन्तरेणासम्भवदवस्थितिः, सम्बन्धमितेः सम्बन्धिस्वरूपभेदमिति
व्यतिरेके वैपरीत्यावधारणात् ।
मैवम्; विषयविषयिभावसम्बन्धो हि न सम्बन्धिरूपाद्भिन्नः तथाभूतत्वेऽपि
चान्ततः तत्सम्बन्धस्यापि स्वाश्रयात्मकत्वमभ्युपगम्यम्, अनवस्थाभयात् । तथा सति
च सैव यथा सम्बन्धमितिः सम्बन्धस्वरूपात् सम्बन्धिनोर्भेदमानादायैव पर्यवस्यती-
त्यभ्युपगन्तव्यं स्वभावसम्बन्धस्य इतरसम्बन्धमर्यादातिशायित्वात् । तथा विनाऽपि
निर्वचन—करण के व्यापार का विषय कर्म है। खण्डन—‘हस्तेन रामेण
शरेण बाली हतः' यहाँ हस्तरूप करण के व्यापार का विषय होने से शर कर्म हो
जायगा । किञ्च, लक्षण के बिना भी ‘क्रियाजनकत्वे सति व्यापारोद्देश्यत्व'-रूप
( सब कर्मों में रहनेवाले ) अनुगत धर्मत्व से ही कर्म का व्यवहार हो जायगा । शेष
‘ईश्वराभिसन्धि’ ग्रन्थ के स्वप्रकाश-प्रकरण में कहेंगे ।
शङ्का—अभेद में विषय-विषयिभाव असङ्गत है, क्योंकि विषयित्व विषय की
सम्बन्धिता है और सम्बन्ध की स्थिति सम्बन्धियों के भेद के बिना हो नहीं
सकती । क्योंकि जहाँ-जहाँ सम्बन्धी के भेद की प्रमा है, वहीं सम्बन्ध की प्रमा होती
है । स्व-प्रकाश-ज्ञानस्थल में सम्बन्धी के भेद की प्रमा नहीं है, अतः विषय-विषयि-
भाव भी नहीं होगा ।
समाधान—विषय-विषयिभाव सम्बन्धी के स्वरूप से भिन्न नहीं है। यदि उसे
सम्बन्धी के रूप से भिन्न मानें, तब भी अन्त में उसके सम्बन्ध को अवश्यमेव
सम्बन्धीरूप मानना पड़ेगा। यदि उसे सम्बन्धीरूप न मानें, तो सम्बन्ध का सम्बन्ध,
१ यहाँ भविष्यत्कालिक प्रयोगकर आगे 'अवोचाम च जल्पे' इत्यादि भूतकालिक प्रयोग
किया गया है। इससे यह सन्देह होता है कि ग्रन्थकार ने प्रथम 'ईश्वराभिसन्धि' का निर्माणकर
फिर 'खण्डन' का निर्माण किया, 'खण्डन' का निर्माणकर ईश्वराभिसन्धि' रची या दोनों का निर्माण
एककाल में हुआ ? मेरे विचार में तो दोनों का निर्माण एक साथ ही हुआ है ।
४० सानुवाद-खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
सम्बन्धिभेदं विषयविषयिभावात्माऽयं सम्बन्धः पर्यवसास्यति, तदवगमोऽपि
तथावगमव्यतिरेकेणैव भविष्यति को विरोधः ?
मचैवं घट-तज्ज्ञानयोर्यादृग्विषयविषयिभावः ततो मात्रयाऽपि स्वप्रकाशे
विषयविषयिभावान्यत्वे बाध्यतैकत्र स्यात् । अस्त्येव ह्यविद्याविद्यमाने घट-तज्ज्ञाने
बाध्यत्वम्, परमार्थसति तु स्वप्रकाशे पारमार्थिकत्वमिति द्वयोरननुगमेऽपि न दोषः ।
अथवा स्वात्मना सह क्रियाकर्मभावो विषयविषयिभावो वा स्वप्रकाशार्थ
इति नाभ्युपेयमेव, यथा तु भवतां सत्तासम्बन्धादितरत्र सद्व्यवहारव्यवस्था [ सत्ता
तु स्वयमेव सद्रूपा, न चैतावता स्वात्माश्रयतः तस्याः ], तथा ज्ञानमपि स्वत एव
सिद्धस्वरूपम् ।
अथवा यथा बहुव्रीहिसमासे तद्गुणसंविज्ञाने गुणमादायैव प्रधानस्यान्य-
पदार्थस्य बहुव्रीहिसिद्धपदप्रतिपाद्यता, तथा विज्ञानस्याऽविषयमपि स्वात्मान-
फिर उसका सम्बन्ध—इस प्रकार अनवस्था हो जायगी । ऐसा होने पर जैसे
विषय-विषयिभावरूप सम्बन्ध-ज्ञान सम्बन्धी के भेद-ज्ञान के बिना होता है—क्योंकि
स्वरूपसम्बन्ध का स्वभाव इतर सम्बन्धों के स्वभाव से भिन्न होता है—वैसे ही
विषय-विषयिभावरूप यह सम्बन्ध भी सम्बन्धी के भेद के बिना ही सिद्ध होगा और
उसका ज्ञान भी सम्बन्धी के भेद-ज्ञान के बिना ही होगा । फिर इसमें विरोध क्या है ?
प्रश्न—जैसे घट और उसके ज्ञान का विषय-विषयिभाव होता है, स्वप्रकाश
ज्ञान के विषय-विषयिभाव में यदि उससे थोड़ा भी भेद हो, तो एकस्थल में वह
अवश्य बाध्य होगा । उत्तर—अविद्या से कल्पित घट एवं घटज्ञान के बाधित होने
से उसका सम्बन्ध विषय-विषयिभाव भी बाधित ही है । किन्तु परमार्थतः सत् स्वप्रकाश
में वह संबन्ध भी परमार्थ-सत् है । दोनों में अनुगत एक रूप के न होने पर भी
कोई हानि नहीं है ।
अथवा स्वं के साथ क्रिया-कर्मभाव या विषय-विषयिभाव 'स्वप्रकाश' शब्द का
अर्थ नहीं मानना चाहिए । किन्तु जैसे आपके मत में सत्ता के सम्बन्ध से द्रव्यादि
में सत्त्वव्यवहार होता है और सत्ता स्वयं सद्रूप होनेसे उसमें आत्माश्रय दोष
भी नहीं होता, वैसे ही ज्ञान अपने विषय घटादि का और अपना साधक है ।
अथवा जैसे तद्गुण-संविज्ञान बहुव्रीहि-समास में गुण (समास के अन्तर्गत पद
के अर्थ) का ग्रहण करके ही प्रधानभूत अन्य पदार्थ कुटादिपद का वाच्य होता है,
वैसे ही विज्ञान भी, अपने अविषय अपने को ग्रहण करके ही, स्व-
परिच्छेद ] स्वप्रकाश-विज्ञानवाद-विचार ४१
मादायैव स्वविषयव्यवहारप्रवर्तनं समर्थ्यताम् । सोऽयं गुरूणां सविषयक-
स्वप्रकाशतापक्षो न ब्रह्मस्वप्रकाशतापक्षः, तत्र विषयाभावात् । एतावन्मात्रेण तु
स्यात्, यथा स्वाविषयेऽपि कुटादौ बहुव्रीहिवाक्यं व्यवहारं प्रवर्तयतीति तथा
ज्ञानमविषयेऽप्यात्मनि अविद्यादशायामिति ।
तदेवं यद् यदन्यत्र दृष्टवैधर्म्यं स्वप्रकाशे पर्यवसास्यति, तत्सर्वमन्यथानुपपत्ति-
रेव स्वप्रकाशसाधकत्या प्रदर्शिता स्वीकारयिष्यति । तद्यथा—अन्यो ज्ञाताऽन्यश्च
ज्ञेय इत्यन्यत्र दृष्टमहमिति व्यवहारान्यथानुपपत्त्या त्याज्यम् । तथा अन्यज्ज्ञान-
मन्यज्ज्ञेयमिति जानामीति व्यवहारान्यथानुपपत्त्या त्याज्यम् । सर्वतो बलवती
ह्यन्यथानुपपत्तिस्तथा दृष्टतामात्रबलमवलम्ब्य प्रवृत्तं तर्कशतमपि बाधते । तदिद-
माहुः—'प्रमाणवन्त्यदृष्टानि कल्प्यानि सुबहून्यपि।'—इति । तस्मात्—
विषय में व्यवहार की प्रवृत्ति कराता है । यह गुरु ( प्रभाकर ) का सत्य विषय से
युक्त विज्ञान-स्वप्रकाशता पक्ष है, ब्रह्म-स्वप्रकाशता पक्ष नहीं; क्योंकि उस पक्ष में
विषय असत् होता है । केवल इतना ही साम्य है कि जैसे 'लम्बकर्ण' और 'कुटादि'
पद अपने अवाच्य कर्ण, कुट आदि के व्यवहार के प्रवर्तक होते हैं, वैसे ही ज्ञान
अविद्या-दशा में अपने अविषय आत्मस्वरूप के व्यवहार का प्रवर्तक है ।
जैसे 'अहं' इस व्यवहार की अन्यथानुपपत्ति से घटादि-व्यवहार में दृष्ट 'ज्ञाता
अन्य होता है और ज्ञेय अन्य' यह नियम त्याग दिया जाता है और इसी तरह
'जानामि' इस व्यवहार की अन्यथानुपपत्ति से 'ज्ञान अन्य होता है और ज्ञेय अन्य'
यह नियम त्यागा जाता है, वैसे ही स्वप्रकाश के साधन में प्रदर्शित अन्यथानुपपत्ति
ही उन सबका अभेद में क्रिया-कर्मभाव, विषय-विषयीभाव आदि का स्वीकार
करा देगी, जिनका घटादि-व्यवहार में अभाव और स्वप्रकाश में भाव देखा गया है ।
अन्यथानुपपत्ति ( अर्थापत्ति ) सभी प्रमाणों से बलवती है । अतः लोक में यही
देखा गया है कि यह ( अर्थापत्ति ) केवल इसी बल का अवलम्बन कर प्राप्त तर्क-शत का
भी बाध कर सकती है । किसी आचार्य ने कहा भी है—"प्रमाण रहने पर
लोक में अदृष्ट भी बहुत-सी वस्तुओं का स्वीकार किया जाता है ।"
'अदृष्टशतभागोऽपि न कल्प्यो निष्प्रमाणकः' इति अस्योत्तरार्धम् ।
६
४२ : सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
'अन्यथानुपपत्तिश्चेदस्ति वस्तुप्रसाधिका ।
पिनष्टि दृष्टवैषम्यं सैव सर्वबलाधिका ॥'
वाच्याऽन्यथोपपत्तिर्वा त्याज्यो वा दृष्टताग्रहः ।
न ह्येकत्र समावेशः, छायातपवदेतयोः ॥'—इति ।
तदित्थं त्वदङ्गीकृतसद्विचारलक्षणोपपन्नैरेवंविधैर्विचारैः स्वप्रकाशता भवता
सुप्रतिपदा, अस्माभिस्तु स्वसंवेदनबलादेव स्वतःसिद्धरूपं विज्ञानमास्थीयत इति ।
शून्यवाद-स्वप्रकाशवादयोर्भेदः
एवं च सति सौगतब्रह्मवादिनोरयं विशेषः – यदादिमः सर्वमेवानिर्वचनीयं
वर्णयति । तदुक्तं भगवता लङ्कावतारे२—
'बुद्ध्या विविच्यमानानां स्वभावो नावधार्यते ।
अतो निरभिलाप्यास्ते निःस्वभावाश्च देशिताः ॥'—इति ।
अर्थापत्ति पदार्थ का, साधक यदि है मान ।
वे ही दृष्टि-विरोध का चूर्ण करेगी मान ॥
उपपत्ति हि तुम अन्यथा, करो या छोड़ो दृष्टि ।
एक जगह कस होयगी, छायाऽऽतप की सृष्टि ॥
इस प्रकार आप द्वारा अङ्गीकृत सद्विचार ( कथा ) के लक्षण से युक्त विचार द्वारा
आप ज्ञान की स्वप्रकाशता भलीभाँति जान सकते हैं । हम तो अपने अनुभव से ही
स्वतःसिद्ध ब्रह्मरूप विज्ञान को प्राप्त हैं ।
शून्यवाद और स्वप्रकाश-विज्ञानवाद का भेद
ऐसा होने पर बौद्ध और वेदान्तियों में यह भेद है कि बौद्ध तो सब वस्तुओं
को ही 'अनिर्वचनीय' कहते हैं । 'लङ्कावतार' नामक ग्रन्थ में भगवान् बुद्ध के
शिष्यों ने कहा है कि 'बुद्धि से विचारने पर वस्तु के स्वभाव निश्चित नहीं होते ।
अतः सम्पूर्ण वस्तुएँ स्वभाव से रहित और अनिर्वचनीय हैं।'
१. बौद्धों के चार भेद हैं—माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभाषिक । इनमें
प्रथम शून्यवादी, द्वितीय क्षणिक-विज्ञानवादी, तृतीय क्षणिक विज्ञान से अनुमेय क्षणिक बाह्य-
पदार्थवादी और चतुर्थ क्षणिक विज्ञान से अभिन्न क्षणिक बाह्य-पदार्थवादी हैं। यहाँ शून्यवादी
और वेदान्तियों का भेद दिखाया गया है ।
२. 'अलंकारावतारे इति पाठः' इति विद्यासागरः । पुस्तकस्यानुपलम्भात कः सन्पाठ इति
निर्णेतुं न शक्यते ।
परिच्छेद ] शून्यवाद् और स्वप्रकाश-विज्ञानवाद का भेद ४३
विज्ञानव्यतिरिक्तं पुनरिदं विश्वं सदसद्भ्यां विलक्षणं ब्रह्मवादिनः
संगिरन्ते । तथाहि—नेदं सत् भवितुमर्हति, वक्ष्यमाणदूषणग्रस्तत्वात् ।
नाप्यसदेव, तथा सति लौकिकविचारकाणां सर्वव्यवहारव्याहत्यापत्तेः ।
यदपि 'निर्वक्तुमसामर्थ्ये गुरव उपास्यन्ताम्, येभ्यो निरुक्तयः
शिष्यन्ते' इत्युपालम्भवचनं; तत्तदा शोभेत, यदि मेयस्वभावानुगामिनीयम-
निर्वचनीयतेति न ब्रूयुः, वक्तृदोषादिति च वदेयुः । यस्तु वादी निरुक्त्यभिमानं
धत्ते, स निर्वक्तुं न तु शक्ष्यति वक्तव्यदोषात् ।
न च ते दोषाः स्वकमपि घ्नन्तः जातयः कथं न स्युरिति वाच्यम्; यतो
निर्वचनीयत्वं बाध्यते तैर्दोषैः स्वयमप्यनिर्वचनीयैरेव । अनिर्वचनीयैरव च
तैर्व्यवह्रियत एवेति कुतोऽस्मान् प्रति व्याघातः स्यात् । तज्जातित्वस्य च
निरूप्य योजयितुमशक्यत्वात् ।
'विज्ञान से भिन्न सब वस्तुएँ सत्-असत् से विलक्षण हैं', यह ब्रह्मवादी कहते हैं ।
देखिये—यह प्रपञ्च सत् नहीं है, क्योंकि वस्तु की सिद्धि लक्षण से होती है और
लक्षण वक्ष्यमाण दूषणों से दूषित है । वह असत् भी नहीं है, क्योंकि लौकिक तथा
परीक्षक के व्यवहार का विषय होता है ।
प्रश्न—यदि निरुक्ति ( लक्षण ) नहीं कर सकते, तो उन गुरुओं की सेवा
कीजिये, जिनसे निरुक्ति की शिक्षा मिलती है । उत्तर—यह निन्दागर्भित प्रश्न तब
शोभा देता, यदि आप मेय के स्वभाव को ही अनिर्वचनीय न कहकर 'वक्ता के दोष
से अनिर्वचनीय है' ऐसा कहते । जो वादी निरुक्ति ( लक्षण ) करने का अभिमान
करते हैं, वे भी वक्तव्य ( मेय ) के दोष से निरुक्ति नहीं कर सकते ।
प्रश्न—अव्याप्ति, अतिव्याप्ति आदि जैसे प्रमाण, प्रमेय आदि के लक्षणों को दूषित
करते हैं, वैसे ही अपने लक्षणों को भी दूषित करते हैं । अतः प्रमाण आदि के लक्षणों
का खण्डन जाति-उत्तर है । स्वव्याघातक ( अपने स्वरूप को नष्ट करनेवाले ) असत्
उत्तर को 'जाति' कहते हैं । उत्तर—अव्याप्ति आदि भी स्व-लक्षण में अव्याप्ति आदि
दोष होने से सत्-असत् से विलक्षण अनिर्वचनीय अवश्य हैं । किन्तु अनिर्वचनीय
दोषों से ही लक्षणों के खण्डन द्वारा जगत् की अनिर्वचनीयता बोधित होती है ।
आप तो अनिर्वचनीय अव्याप्त्यादि दोषों से भी व्यवहार करते ही हैं । फिर मेरे कथन
में व्याघात कैसे हो सकता है ? किञ्च, आप जाति की निरुक्ति ( लक्षण ) भी नहीं
४४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
ननु सदसत्पक्षयोर्दोषदर्शनाद् अनिर्वचनीयतेति ब्रुवाणस्य किं सदसत्त्व-
संशयः, किं वा सदसत्पक्षपक्षबहिर्भावाभ्युपगमः ? आद्ये भवितव्यं तावत्सदसत्त्व-
योरन्यतरेणेति एकपक्षदोषस्याभासत्वम्, तच्च सत्त्वपक्षदोषस्यैवाभ्युपेयमावश्यक-
त्वात् । यदि तावत्सत्त्वपक्षस्तदा सत्त्वपक्षदोषः कथं संगच्छेत । अथाऽसत्त्वपक्ष-
स्तदा सर्वासत्त्वे तद्दोषः कथं सद्भाववान् भवितुं प्रभवेत् ? द्वितीयस्तु
व्याघातादेवासम्भवो, 'परस्परविरोधे हि न प्रकारान्तरस्थितिरि'ति ।
तदेतदनाकलितपराभिसन्धेः प्रत्यवस्थानम् । यो हि सर्वमनिर्वचनीयसद-
सत्त्वं ब्रूते, स कथमनिर्वचनीयतासत्त्वव्यवस्थितौ पर्यनुयुज्येत, साऽपि हि
कृत्स्नप्रपञ्चपरसर्वशब्दाभिधेयमध्यनिविष्टैव ।
परस्यैव व्यवस्थयैवं पर्यवस्यति—निर्वचनप्रतिषेपादनिर्वचनीयत्वम्,
विधिनिषेधयोरेकतरनिरासस्य इतरपर्यवसायितायास्तेनाभ्युपगमात् । ततः परकीय-
रीत्येदमुच्यते—अनिर्वचनीयत्वं विश्वस्य पर्यवस्यतीति ।
कर सकते, अतः जाति भी असत् है । फिर मेरे कथन में आप 'जाति' कैसे दे
सकते हैं ?
प्रश्न—'सत्, असत् दोनों पक्षों में दोष है', इस युक्ति से अनिर्वचनीय कहनेवाले
आपको सत्-असत्-विषयक सन्देह है या तृतीय पक्ष का स्वीकार ? यदि सन्देह है,
तो सत्त्व और असत्त्व दोनों में से एक अवश्य सिद्ध होगा और दूसरे पक्ष के दोष को
आभास कहना पड़ेगा । आवश्यक होने से सत्त्व-पक्ष के दोषों को ही आभास कहा
जायगा, क्योंकि यदि सत्त्व-पक्ष है, तब तो उस पक्ष के दोष आभास हैं ही और
यदि असत्त्व पक्ष है, तब भी सब के असत् होने से सत्त्व-पक्ष के दोष भी असत् ही
हैं । सत्-असत् से विलक्षण तृतीय पक्ष का आश्रयण तो व्याघात होने के कारण
असंगत है । सत्त्व-असत्त्व दोनों आपस में विरुद्ध हैं । अतः इनसे भिन्न तृतीय पक्ष
नहीं है; क्योंकि जो सत् नहीं, वह असत् अवश्य है और जो असत् नहीं, वह सत् है ।
उत्तर—जबतक इस प्रकार साफ़-साफ़ दोष न दें कि इस-इस दोष से सत्-पक्ष
का दोष आभास है, तबतक सत्त्व-पक्ष का स्थापन या अनिर्वचनीयत्व का खण्डन नहीं
हो सकता । फिर यदि अनिर्वचनीयत्व का खण्डन हो भी जाय, तो हानि क्या है ?
जो सम्पूर्ण जगत् को अनिर्वचनीय कहता है, वह अनिर्वचनीयत्व को भी अनिर्वचनीय
ही कहेगा, क्योंकि जगत् के भीतर अनिर्वचनीयत्व भी आ ही जाता है ।
प्रश्न—आप यदि अनिर्वचनीयत्व का साधन न करेंगे, तो वह सिद्ध कैसे होगा ?
परिच्छेद ] शून्यबाद और स्वप्रकाश-विज्ञानवाद का भेद ४५
वस्तुतस्तु वयं सर्वप्रपञ्चसत्त्वासत्त्वव्यवस्थापनविनिवृत्ताः स्वतःसिद्धे
चिदात्मनि ब्रह्मतत्त्वे केवले भरमवलम्ब्य चरितार्थाः सुखमास्महे । ये तु
स्वपरिकल्पितसाधनदूषणव्यवस्थया विचारमवतार्य तत्त्वं निर्णेतुमिच्छन्ति,
तान् प्रति ब्रूमः—'न साध्वीयं भवतां विचार-व्यवस्था, भवत्कल्पितव्यवस्थयैव
व्याहतत्वात् ।
अत एवास्मदुपन्स्यमानदूषणस्थितिविषयाः पर्यनुयोगा निरवकाशाः,
त्वदूप्यव्यवस्थयैव त्वदूष्यव्यवस्थाया व्याहत्युपन्यासात् । न चोपन्यास एव निर्बन्ध-
कारणम् ; १विचारोपन्यासस्य सदसत्त्वोपगमाद्युदासीनैर्विचार्यमित्युपेत्यैव परं
विचारप्रवर्तनायाः शक्यत्वमित्यावेदितत्वात् ।
उत्तर—परपक्षी की व्यवस्था के अनुरोध से इस प्रकार निर्वचनीयत्व ( लक्षण ) का
खण्डन करने पर अनिर्वचनीयत्व सिद्ध हो ही जाता है । क्योंकि विधि या निषेध इन दोनों
में से एक के खण्डन से अन्य की सिद्धि अर्थात् ही फलित होती है, इसे परपक्षी
भी मानते हैं । अतः संसार अनिर्वचनीय है, यह कथन भी दूसरों की रीति से है ।
वस्तुतः सारे संसार के सत्त्व या असत्त्व के साधन से निवृत्त हम लोग तो
स्वतःसिद्ध चिद्रूप केवल ब्रह्मतत्त्व का निश्चय पाकर कृतकृत्य हो सुख से स्थित हैं । किन्तु
जो परीक्षक स्वकल्पित साधन और दूषण की व्यवस्था द्वारा कथा आरम्भकर तत्त्व-
निर्णय की इच्छा करते हैं, उनसे हम कहते हैं कि 'आपकी यह व्यवस्था ठीक नहीं,
क्योंकि आपके द्वारा कल्पित दूषणों से ही वह खण्डित हो जाती है ।'
प्रश्न — अव्याप्ति आदि दोषों के लक्षणों में दोष होने से वे अनिर्वचनीय हैं या
नहीं ? यदि अनिर्वचनीय हैं, तो उन दोषों से प्रमाण-प्रमेय के लक्षण दूषित कैसे होंगे ।
यदि अनिर्वचनीय नहीं हैं, तो उन दोषों से ही द्वैत हुआ । उत्तर—हम उन
दोषों को भी अनिर्वचनीय ही मानते हैं, अतः द्वैत नहीं है । किन्तु आप उन दोषों
को मानते हैं, अत एव आपके मतानुसार ही हम उन दोषों से प्रमाण-प्रमेय के
लक्षणों का खण्डन करते हैं । प्रश्न—दोषों और कथा के स्वीकार के बिना दोषों का
कथन नहीं हो सकता, क्योंकि कथा में स्वीकृत का ही कथन होता है । इसलिए
दोषों का उपन्यास ही उनके स्वीकार का हेतु होगा ? उत्तर--विचार ( कथा )
१ विचारस्येति सुपाठः, विचारोपन्यासस्येति कुपाठः, अनन्वयात् । विचारस्येत्यस्य
निर्बन्धेऽन्वयः । निर्बन्धः = स्वीकारः । उपन्यास इत्यस्याग्रे दोषाणामिति शेषः, विचारं विना
दोषोपन्यासानुपपत्तेरिति भावः ।
परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ४७
यदि च त्वद्दर्शनरीत्या अभिधीयमानमस्माभिर्बाधं बाधसे, तदा स्वाभ्युपगम-
रीतिबाधादभिधायितैव ते स्यात् । अस्माभिर्निर्वाह्यमानस्य त्वया खण्डनयुक्त्यैव
बाधेऽस्माकमेव जेतृता, 'खण्डनयुक्तयो बाधिकाः, निर्वाह्यपक्षश्च बाध्यः' इत्यस्या-
स्मदुक्तपक्षस्य त्वयैव निर्वाहात् । तस्मात् त्वया निर्वाह्यमस्माभिश्च खण्डनीय-
मितीदृश्यामेव परं कथायां त्वन्निर्वाहानिर्वाहे तव जयो नान्यथेति । तदेवं
भेदप्रपञ्चोऽनिर्वचनीयः, ब्रह्मैव तु परमार्थसदद्वितीयमिति स्थितम् ।
अद्वैत-प्रमाण-विचारः
ननु अद्वैते किं प्रमाणम् ? प्रश्न एव तावत् अद्वैतमनङ्गीकुर्वतो नोपपद्यते ।
प्रमाणं यत्राद्वैते पृच्छयते तस्याऽप्रतीतौ कथमेवंभूतः प्रश्नः संगच्छते ? नहि प्रमाण-
मात्रं भवता पृच्छयते, किन्नाम विषयविशेषनियतम् । तच्च तदोपपद्यते, यदि तादृशं
ते प्रतीतिमारोहेत् । प्रश्नस्य वाग्व्यवहारविशेषत्वात् व्यवहारस्य च स्वजनकज्ञान-
यदि तुम्हारे दर्शन की रीति से हमने जो अव्याप्ति आदि दोष दिये हैं, उन-
का खण्डन करते हो, तो अपनी रीति का ही खण्डन करते हो । यदि कदाचित् हम
अव्याप्ति आदि दोषों का समर्थन करें और आप खण्डनोक्त युक्तियों से उनका खण्डन
करें, तब भी हमारी ही विजय होगी । क्योंकि आपने ही हमारे इस पक्ष का साधन किया
है कि 'खण्डन में उक्त युक्ति बाधक और निर्वाह्य पक्ष बाध्य है।' आप प्रपञ्च को
सत्य मानते हैं, अतः आपको प्रमाण-प्रमेय के लक्षणों का निर्वाह करना चाहिए और
हम अनिर्वचनीयवादी हैं, अतः हमें उनका खण्डन करना चाहिए, ऐसी वितण्डा
में यदि आप लक्षणों का समर्थन कर सकें, तभी आपकी जय होगी, अन्यथा नहीं ।
इस तरह आप लक्षणों का स्थापन नहीं कर सकते । अतः भेद-प्रपञ्च अनिर्वचनीय है
और अद्वितीय ब्रह्म ही परमार्थ में सत् हैं, यह सिद्ध हुआ ।
अद्वैत में प्रमाण-विचार
प्रश्न—अद्वैत में क्या प्रमाण है ? प्रश्न का खण्डन—जो अद्वैत को स्वीकार नहीं
करते, वे 'अद्वैत में क्या प्रमाण है?' ऐसा प्रश्न ही नहीं कर सकते । आप जिस
अद्वैत में प्रमाण पूछते हैं, उसके अज्ञात रहने पर ऐसा प्रश्न ही कैसे होगा ? क्योंकि
आप केवल प्रमाण तो पूछते नहीं, अद्वैत में प्रमाण पूछते हैं । पर अद्वैत में प्रमाण
का प्रश्न तभी हो सकता है, जब आप अद्वैत को जानते हों । क्योंकि प्रश्न वचन-
४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
विषयनियतत्वात् अन्यथा व्यवहाराणां विषयनियमप्रयोजकस्य ज्ञानस्यासम्भवेन
व्यवहारविषयपारिप्लवापत्तेः ।
यदि चाद्वैतं प्रश्नविषयः प्रतीतमुच्यते, तदा तत्प्रतीतिस्ते प्रमा वा स्यात्,
अप्रमा वा ? आद्ये यदेव तस्याः प्रमायाः करणम्, तदेवा द्वैते प्रमाणं तवापि
सम्प्रतिपन्नमिति वृथा तस्य प्रश्नः ।
न च वाच्यम्—सामान्यतोऽद्वैतप्रमाणसिद्धौ भूतायामपि विशेषतः प्रमाणप्रश्नः;
यतः सामान्यसिद्धावेव अद्वैतसिद्धौ विशेषविचारः 'काकदन्तविचारवत् स्यात् ।
सामान्यसिद्धिरेव च विशेषमध्याक्षिप्यानयन्ती विशेषमपि ते कथितवती किमत्र
प्रश्नेन ? परिगणितेषु हि प्रमाणप्रकारे षु मध्ये यत्रैव दोषं न प्रमिणोषि, तत्रैव
विशेषे सामान्यस्य विश्रान्तेः । यदि च परिचितचरेषु प्रमाणप्रकारे षु सर्वेष्वेव
दोषं प्रमिणोषि, तदा प्रमाणान्तरमाक्षिप्यापि सामान्येन विश्रमणीयमेव ।
व्यवहारविशेष रूप है और व्यवहार ज्ञान से जन्य होता है; अतः वह ( व्यवहार )
स्वजनक ज्ञान के विषय से नियत ( व्याप्य ) है । यदि व्यवहार स्वजनक ज्ञान के
विषय का अतिक्रमण करे, तो 'अमुक व्यवहार का विषय अमुक व्यवहर्तव्य है', यह
नियम ही नहीं हो पायेगा ।
फिर, यदि प्रश्न का विषय अद्वैत प्रतीत ( ज्ञात ) हो, तो वह प्रतीति अम्र है या
प्रमा ? यदि प्रमा है, तो जो प्रमा का कारण है, वही अद्वैत में प्रमाण है, यह तुम
भी मानोगे । अतः प्रमाण-प्रश्न व्यर्थ है ।
प्रश्न का समर्थन—अद्वैत में सामान्य रूप से प्रमाण सिद्ध है और यह विशेष रूप
से प्रमाण का प्रश्न है । प्रश्न-खण्डन—प्रमाण यदि सामान्य रूप से सिद्ध ही है, तो
विशेष रूप से उसका विचार कौए के दाँतों की परीक्षा के तुल्य निष्फल है ।
कारण सामान्य रूप से प्रमाण की सिद्धि ही विशेष का भी आक्षेप कर लेगी,
क्योंकि विशेष के बिना सामान्य होता ही नहीं । ( यदि कहो कि इससे
विशेषत्व रूप से ही विशेष सिद्ध हुआ, अनुमानादिरूप से नहीं और हम
तो वैसी ही सिद्धि चाहते हैं, तो ) प्रत्यक्ष आदि परिगणित प्रमाणों में से
जिस प्रमाण में आप दोष की प्रमिति न करें, उसी विशेष में विश्राम होगा । यदि
आप पूर्वपरिचित प्रत्यक्षादि सभी प्रमाणों में दोष जानते हों, तो सामान्य उनसे अन्य
विशेष प्रमाण का अध्याहार कर विश्राम करेगा ।
१ 'काकस्य कति दन्ताः सन्ति' यह विचार नहीं होता, क्योंकि इसका कुछ फल नहीं
और बिना फल के किसी काम में प्रवृत्ति नहीं होती ।
परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ४६
यदि च का प्रमाणव्यक्तिरसौ इति प्रश्नार्थः परिशिष्यते, तदा न सर्वा
व्यक्तिर्विशेषतो निर्देष्टुं शक्यते इति तदनिर्देशेऽपि न नः किञ्चिदपचीयते ।
यदि च द्वितीयः, तदानीमद्वैतप्रतीतिमप्रमां मन्यमानस्य तव 'अप्रमाविषये
किं प्रमाणम्' इति कथं न प्रश्नो व्याहन्यते ?
अथ अप्रमा सा मम मते, त्वन्मते तु प्रमैवेति तत्करणं प्रमाणं पृच्छयते
इति ब्रूषे; नैतदप्युपपद्यते, तवाऽद्वैते ज्ञानं यदुत्पद्यते तत्करणं मया प्रमाणरूपं
वक्तव्यमित्यत्र ममाऽनियमात् । यदि नाम मया सदाऽद्वैतमभ्युपेयते, तावता किं
तावकीनस्य तज्ज्ञानस्य करणमवश्यं प्रमाणं स्यात् ? वस्तुतो वह्निमत्यपि पर्वते
यदि कश्चिद्वाष्पं धूमं प्रतीत्य ततो वह्निमनुमिनोत्येतावता किंबाष्पविषयं धूम-
ज्ञानं करणं प्रमाणमेष्टव्यमिति ?
अस्तु वा प्रश्नोऽयं यथा तथा, श्रुतिरेवाद्वैते प्रमाणमिति ब्रूमः । श्रूयते
खलु 'एकमेवाद्वितीयम्', 'नेह नानास्ति किंचन' इत्यादि । श्रुतिप्रामाण्यं सिद्धार्थ-
प्रश्न-समर्थन—अनुमानत्वरूप विशेष भी सामान्य ही है, अतः अद्वैत में कौन-सी
अनुमान व्यक्ति प्रमाण है ?, यह प्रश्न का आशय है । प्रश्न-खंडन—सम्पूर्ण प्रमाण-
व्यक्तियों का विशेष रूप से कोई भी निर्देश नहीं कर सकता, तब हम भी उसका
निर्देश न कर सकें, तो हमारी हानि क्या है ?
यदि आपकी अद्वैत-प्रतीति अप्रमा हो, तो प्रश्न का आशय यह हुआ
कि 'अप्रमा के विषय अद्वैत में प्रमाण क्या है।' किन्तु यह प्रश्न बाधित है, क्योंकि
जो अप्रमा का विषय है, वह प्रमा का विषय कैसे होगा ?
समर्थन—हमारे मत में अद्वैत-ज्ञान अप्रमा है, पर आपके मत में वह सब
प्रमा ही है । अतः उसके कारणरूप प्रमाण के प्रश्न में व्याघात देना ठीक नहीं है ।
खण्डन—'तुम्हें अद्वैतविषयक जो ज्ञान हुआ है, उसका प्रमाणरूप करण हमें कहना
चाहिए', इसमें मेरी नियुक्ति नहीं हो सकती । हम सदा अद्वैत मानते हैं, क्या इतने
मात्र से तुम्हारे अद्वैत के ज्ञान का करण अवश्य प्रमाण होगा ? (कदापि नहीं) ।
वस्तुतः वह्निमान् भी पर्वत में यदि कोई बाष्प या धूलि-पटल को धूम जानकर
उससे वह्नि का अनुमान करे, तो वह्नि-ज्ञान के प्रमा होने पर भी क्या बाष्प का
धूमरूप से ज्ञान उसका (वह्नि-ज्ञान का) करण प्रमाण माना जायगा ?
प्रश्न का उत्तर—मान लें कि जिस किसी प्रकार 'अद्वैत में क्या प्रमाण है' यह प्रश्न
५० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
प्रामाण्यं चेश्वराभिसन्धौ साधयिष्यते ।
सिद्धार्थानीं श्रुतीनामन्यपरत्वमपि यदि स्यात्तथापि पदसमन्वयबलेन तामु
प्रतीयमानमर्थमबाधितमादायैव तासामन्यपरिमवनात्, धियां स्वतःप्रामाण्यस्य
बाधकैकापोद्यत्वात् ।
बन जाय, तब भी छान्दोग्य ( ६।२।१) की 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' और वृहदारण्यक
( ६।२।१) की 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुतियाँ ही अद्वैत में प्रमाण हैं ।
शंका—प्रथम तो १चार्वाकादिकथित दोषों से वेद ही अप्रमाण है । उसमें भी
स्वतःसिद्ध ब्रह्म का प्रतिपादक उपनिषदें तो २मीमांसक युक्तियों से अप्रमाण
ही हैं । समाधान—श्रुतियों के प्रामाण्य तथा स्वतःसिद्ध ब्रह्म की प्रतिपादक उपनिषदों
के प्रामाण्य की सिद्धि तो 'ईश्वराभिसन्धि' नामक अपने अन्य ग्रन्थ में करेंगे ।
शंका—उपनिषदों का ब्रह्माद्वैत में तात्पर्य नहीं, किन्तु एक ही ब्रह्म ( ईश्वर )
है, ब्रह्म ही उपासनीय है, इत्यादि अर्थ में ही तात्पर्य है । समाधान—यदि स्वतः-
सिद्ध अद्वैत की प्रतिपादक उपनिषदों का 'एक ईश्वर है, केवल ब्रह्म ही उपासनीय है'
इस अर्थ में तात्पर्य मानें, तो भी श्रुति 'एकम्' और 'ब्रह्म' इन पदों के अन्वय से
प्रतीयमान अद्वैत अर्थ को ग्रहण करके ही द्वैत का बाध कर देगी ।
१ नास्तिक लोग पुत्रेष्टि करने पर भी पुत्र के न होने से वेद में अनृतत्व ( मिथ्या-कथन )
तथा 'उदिते जुहुयात्' कहकर 'श्यावोऽस्याहुतिमभ्यवहरति य उदिते जुहोति' इस प्रकार निषेध करने
से व्याघात ( आपस में विरोध ) दोष देते हैं । किन्तु यह उनका भ्रम है, क्योंकि 'पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या
यजेत' इस श्रुति का आशय यह है कि पुत्रोत्पत्ति के सब लौकिक कारण रहते हुए भी यदि किसी
पापवश पुत्र न होता हो, तो इस इष्टि से पाप की निवृत्ति द्वारा पुत्र होता है । इसी तरह अग्निहोत्र
का यह प्रकार है कि उदित होम सदा उदय में ही करें और अनुदित होम सदा अनुदित में
ही करें । यदि इसके विपरीत करें, तो 'श्यावो०' इत्यादि निषेध के भागी होंगे । अतः अनृतत्व,
व्याघात आदि दोष नहीं हैं । यद्यपि 'ईश्वराभिसन्धि' ग्रन्थ अब मिलता नहीं, परन्तु सम्भव है
कि उसमें ऐसे ही परिहार हों ।
२ मीमांसक लोग कहते हैं कि 'सोमेन यजेत', 'न कलञ्जं भक्षयेत्' इत्यादि वेदवाक्य
शुभकर्म में प्रवृत्ति तथा अशुभ से निवृत्ति कराते हैं, अतः प्रमाण हैं । उपनिषद् तो सिद्धस्वरूप
ब्रह्म का प्रतिपादन करती हैं, प्रवृत्ति तथा निवृत्ति नहीं बतलातीं, अतः प्रमाण नहीं हैं । यदि प्रमाण
भी हों, तो शरीर से व्यतिरिक्त आत्मा की प्रतिपादक होने से कर्मकाण्ड के अङ्ग हैं, क्योंकि जो
शरीर से पृथक् आत्मा को मानते हैं, वे ही स्वर्गादि फलवाले कर्मकाण्ड में प्रवृत्त हो सकते हैं ।
उपनिषद् स्वतंत्र-प्रमाण नहीं है । किन्तु यह उनका भ्रम है, उपनिषद् में भी 'आत्मा वा अरे
द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इत्यादि विधिवाक्य हैं, जिनसे श्रवणादि में प्रवृत्ति
होती है । 'ब्रह्मविद् परमेति' इत्यादि स्वतंत्र फल हैं, अतः वे भी स्वतंत्र शास्त्र एवं प्रमाण हैं ।
परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ५१
ननु नाद्वैतश्रुतीनामृजावर्थे प्रामाण्यं सम्भवति, प्रत्यक्षादिबाधात् । ततश्चा-
न्यत्रैव क्वचित्तातपर्यं कल्प्यम् ।
मैवम्; यदद्वैतश्रुतेर्बाधकं प्रत्यक्षादि मन्यसे तदाऽऽत्मीये विषये घटपटादेर्भेदे
नियत एवोत्पद्यते, न तु प्रत्यक्षादिकं भूतभाविवर्तमानसकलव्यक्तिभेदग्राहि जाय-
मानमावयोः सम्प्रतिपन्नमस्ति, तादृशेन ज्ञानेन चोत्पद्यमानेन सर्वज्ञतां तदा तव
श्रद्दध्यां, यदि जानासि मम चेतसि किं वर्तते इति ।
यदि च प्रत्यक्षादि किञ्चिन्मात्रविषयम्, तदा तद्विषयादन्यत्रापि प्रवर्त-
माना अद्वैतश्रुतिस्तेन न बाधितुं शक्यते, स्वविषयमात्रे प्रमया विपरीतविषयज्ञान-
बाधनात् । अन्यथाऽतिप्रसङ्गात् । मा हि भूदग्नीषोमीयपश्वालम्भनविधिना सर्व-
भूताहिंसाश्रुतेर्वैयर्थ्यम् ।
शङ्का -- 'आदित्यो यूपः' इस अर्थवाद का प्रशंसा में तात्पर्य होने से, पद-समन्वय
से प्रतीयमान सामानाधिकरण्य जैसे प्रत्यक्ष से बाधित होता है, वैसे ही 'एकं ब्रह्म' इस
स्थल में अद्वैत का बाध क्यों न हो ? समाधान -- बुद्धि का स्वतःप्रामाण्य तो केवल
बाधक रहने पर ही दूर होता है । 'आदित्यो यूपः' यहाँ प्रत्यक्ष बाधक है, पर 'एकं ब्रह्म'
यहाँ कोई बाधक है ही नहीं ।
प्रश्न -- अद्वैत-श्रुति का ऋजु अर्थ ( वाच्यार्थ ) में प्रामाण्य नहीं है, क्योंकि
द्वैत प्रत्यक्ष से गृहीत होता है । अतः प्रत्यक्ष से अद्वैत बाधित होगा । इसलिए उपासना
आदि में ही श्रुति का तात्पर्य्य है ।
उत्तर -- जिन प्रत्यक्षादिकों को अद्वैत-श्रुति के बाधक मानते हैं, वे (प्रत्यक्षादि)
केवल अपने-अपने विषय में घट-पटादि के भेदों से नियत ही उत्पन्न होते हैं । अतः
प्रत्यक्ष द्वारा श्रुति से जात सर्वाद्वैत बोध का बाध कैसे होगा ?
प्रत्यक्ष के सर्वविषयकत्व का समर्थन-- सामान्यलक्षणा से भूत, भावि और वर्तमान
सकल भेदविषयक एक ही प्रत्यक्ष होता है और वही अद्वैत का बाधक होगा । खण्डन--
सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति (सन्निकर्ष) से आपके सर्वविषयक ज्ञान में हम तब श्रद्धा करें,
यदि आप सामान्यलक्षणा के बल से बतला दें कि हमारे चित्त में क्या है ?
यदि कहें -- प्रत्यक्ष किञ्चिन्मात्रविषयक होता है, तो उस विषय से अन्यत्र भी प्रवृत्त
अद्वैत-श्रुति उससे बाधित कैसे होगी, क्योंकि प्रमा स्व-विषय में ही स्व-विषय के विपरीत-
विषयक ज्ञान की बाधक होती है । अतएव 'अग्नीषोमीयं पशुमालभेत' यह श्रुति 'मां हिंस्यात्
५२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
यदा चैवं तदा बाधिकायाः प्रत्यक्षधियो बाध्यायाश्चाऽद्वैतबोधने श्रुतिनिरा-
बाधा सती तयोरैक्यं बोधयतीति तत्प्रत्यक्षादि कथं स्वात्मानमेव बाधेत । घटेन
पटेन तद्भेदेन च स्वविषयेण सह तस्या एव धियः श्रुत्या सर्वस्याद्वैतं गोचर-
यन्त्या कथं नामेदे प्रामाण्यमासादितव्यम्, तत्राबाध्यमानत्वात् । र्नाह तस्या
धियः स्वात्मा वा स्वात्मना सह घटपटादेर्भेर्दोऽपि वा विषयः । 'घटपटौ भिन्नौ'
इत्येवमाकारा हि सा जायते, न तु 'अहं घटात् पटाच्च भिन्ना, मत्तो वा तौ
भिन्नौ' इति ।
स्वप्रकाशताऽपि स्वमात्रे साक्षिणी, न तु यतो यतः प्रकाशो भिद्यते ततस्तत-
स्तस्य भेदेऽपि । अन्यथा तत्तदपि स्वप्रकाशकुक्षौ निक्षिपन्ती न कथमद्वैते
एव पर्यवस्यति ।
सर्वा भूतानि' इस श्रुति का अग्नीषोमीय पशुमात्र विषय में बाध करती है, अन्य पशु-
विषय में नहीं। यदि अन्यत्र भी बाध करे, तो 'मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि' इस श्रुति
का वैयर्थ्य हो जायगा ।
यदि ऐसा है, तो बाधक प्रत्यक्ष-बुद्धि और बाध्य अद्वैत-बुद्धि दोनों के अद्वैत-
बोधन में बाध-रहित अद्वैत-श्रुति उन दोनों के अभेद का बोध करायेगी । अतः वह
प्रत्यक्ष-बुद्धि अपने आपका बाध कैसे कर सकती है ? परस्पर सारे जगत् के अभेद
को विषय करनेवाली श्रुति 'घटः पटाद् भिन्नः' इस प्रत्यक्ष-बुद्धि के स्व-विषय घट-
पट और भेद के साथ अभेद-बोधन में प्रामाण्य क्यों न प्राप्त करे; क्योंकि उस
विषय में कोई बाधक नहीं है । उस बुद्धि के विषय अपनी आत्मा ( स्वरूप ) या
अपनी आत्मा के साथ घट-पट के भेद नहीं है; क्योंकि प्रत्यक्ष-बुद्धि 'घटपटौ भिन्नौ'
इत्याकारक ही होती है, 'अहं घटात् पटाच्च भिन्ना' अथवा 'मत्तो वा तौ भिन्नौ'
इत्याकारक नहीं होती ।
समर्थन—बुद्धि स्वप्रकाश है, अतएव स्व और स्व के भेद का व्यवहार करायेगी।
खंडन--स्वप्रकाश होने से बुद्धि अपना तो व्यवहार अवश्य करायेगी, परन्तु जिस-
जिससे वह भिन्न है, उस-उससे अपने में रहनेवाले भेद का व्यवहार नहीं
करायेगी; क्योंकि भेद का स्वभाव है कि वह प्रतियोगी और धर्मी से व्यतिरिक्त ज्ञान का
गोचर होता है । यदि ज्ञान का गोचर न होकर भी भेद को सिद्ध मानें, तो भेद भी
ज्ञानस्वरूप हो जायगा, क्योंकि संविद्-विषय के न होने पर भी सिद्धत्व संविद् का
ही स्वभाव है ।
परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ५३
न च तया धिया स्वस्य स्वविषयस्य च स्वरूपावगाहने स्वरूपलक्षणो भेदः
प्रकाशित एव स्यादिति वाच्यम्; 'पुरोवर्ति रजतम्' इति भ्रान्तौ पुरोवर्त्यात्मनो
रजतात्मनश्च प्रकाशे भेदग्रहापत्तेः ।
धर्मविशेषमन्तर्भाव्य स्वरूपस्य भेदत्वे धियोऽपि तथा स्यादिति सैव धीर्न
तत्प्रकाशः, तस्मिन् सन्निकर्षाद्यपेक्षायां धियः प्राक् तदसंभवात् । आत्मवदात्मधर्मेऽपि
सन्निकर्षानपेक्षा सा इति चेन्न । ग्रहणत्व-स्मृतित्व-प्रमात्वादावपि तथैव स्यादिति ।
तदेवं सा बुद्धिः श्रुत्या घटपटात्मतया व्यवस्थाप्यमाना कथमात्मनः
स्वस्मादेव भेदे प्रमाणीभवितुं प्रभवतीति बाधिकायां बुद्धौ घटपटयोर्भेदे प्रमात्वा-
समर्थन—स्व-प्रकाश ज्ञान का स्व भी विषय है। अतः घट-पट आदि विषय और स्व
का स्वरूपलक्षण भेद ज्ञान का विषय है ही। खंडन—स्वरूप भेद नहीं है। क्योंकि यदि
स्वरूप को भेद कहें, तो 'इदं रजतम्' इस स्थल में शुक्ति और रजत दोनों के स्वरूप-लक्षण
भेद का ग्रह होने से अभेद-भ्रम नहीं होगा, क्योंकि भेद-ग्रह अभेद-ग्रह का विरोधी है।
समर्थन—स्वरूपमात्र भेद नहीं, किन्तु वैधर्म्य-विशिष्ट स्वरूप ही भेद है।
शुक्ति-रजत का वैधर्म्ययुक्त स्वरूपलक्षण भेद गृहीत नहीं है। अतः 'इदं रजतम्' ऐसा
अभेद-भ्रम हो जाता है। खण्डन—बुद्धि का भी स्वरूप भेद नहीं है, किन्तु वैधर्म्य से युक्त
स्वरूप ही भेद है। बुद्धि के स्वप्रकाश होने पर भी वैधर्म्य स्व का विषय नहीं है,
क्योंकि सन्निकर्ष के बिना वैधर्म्य का भान हो नहीं सकता। वैधर्म्य के साथ 'मनः-
संयुक्तात्मसमवेतज्ञान-समवाय' ही सन्निकर्ष हो सकता है। वह ज्ञान-घटित होने से स्व
से पूर्व नहीं है। अतः विरोधी (भेद-ग्रह) के न होने से श्रुति घट-पटभेदरूप स्व-
विषय के साथ प्रत्यक्ष-बुद्धि के अभेद का बोधन करेगी।
समर्थन—वैधर्म्य स्वप्रकाश (ज्ञान) का विषय है। जैसे ज्ञान अपना सन्निकर्ष
के बिना ग्रहण करता है, वैसे ही स्व-धर्म का भी ग्रहण करेगा। खण्डन—यदि स्व-
प्रकाश ज्ञान को स्व-धर्म का प्रकाशक मानें, तो बुद्धित्व और स्मृतित्व का भी ज्ञान हो
जायगा। यदि ज्ञान के स्वप्रकाश होने से ज्ञान-धर्म का भी ज्ञान मान लें, तो ज्ञान के होने
पर प्रमात्वादि का जो सन्देह होता है, वह नहीं होगा।
तस्मात् इस प्रकार श्रुति द्वारा घट-पट के अभेद रूप से व्यवस्थित प्रत्यक्ष-बुद्धि,
अपनी आत्मा घट के—स्व की आत्मा पट से—भेद में प्रमाण कैसे हो सकती
है ? अतः बाधक प्रत्यक्षबुद्धि के घट-पट-भेदरूप विषय में अप्रमात्व होने पर अभेद
५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
भावमासादयन्त्यां श्रुतिस्तत्र तत्राऽप्रतिद्वन्द्वित्वाऽसङ्कुचितस्वतःप्रामाण्यबललब्ध-
तत्तदर्थैक्यान्यथानुपपत्तिसहायसम्पदजय्या तयोरप्यभेदं बोधयन्ती न प्रतिहन्तुं
शक्येति न क्वचिदपि प्रतिहतप्रसरा सती सर्वाद्वैतप्रमापिकेति ।
भेदप्रमान्यथानुपपत्त्या च वैपरीत्यमशक्यम्, तत्राद्वैतश्रुत्या सन्दिह्यमानस्य
प्रमात्वस्यैवासिद्धेः, भेदधीमात्रस्य च द्विचन्द्रादिवोधवदन्यथोपपत्तेः ।
'एकम्' इत्युपादाय यद् एवकारमप्युपादत्ते श्रुतिः 'एकमेवेदम्' इतिरूपा,
तदैकान्तिकमैक्यं बोधयतीति भेदाभेदेनाप्यशक्यसमर्थनं घटपटादिभेदग्राहि प्रत्य-
क्षादिप्रामाण्यमिति ।
बुद्धेर्विरम्य व्यापाराभावात् कथमित्थमिति चेन्न । श्रुतितो द्रागेव जातायाः
सर्वविषयाया अद्वैतधियोऽस्मद्बुद्धय एवंविधविचारसोपानपरम्परामारोहन्त्यो
नानाविषयेषु तत्प्रामाण्यविषयाः क्रमेण परिनितिष्ठन्तीत्युच्यमानत्वात् ।
में प्रतिद्वन्द्वी के न होने से असङ्कुचित और स्वप्रामाण्य के बल से लब्ध जो स्व
( श्रौत-बुद्धि ) से घट-पट आदि अर्थों का ऐक्य, उसकी जो अन्यथानुपपत्ति है, उसकी
सहायता से अजेय—घट-पट के भी अभेद का बोधन करती हुई—बोधन के अयोग्य
कहीं भी न रुकनेवाली—अद्वैत श्रुति, सब पदार्थों के अद्वैत की प्रमा करायेगी ।
प्रश्न—'घटः पटाद् भिन्नः' इत्याकारक घट-पट के भेद की प्रमा ही अनुपपन्न
होकर अद्वैत-श्रुति का सर्वत्र बाध क्यों नहीं कर देती ? उत्तर—अद्वैत-श्रुति से भेद-
प्रत्यक्ष में सन्देह होता है, अतः उसमें प्रमात्व की सिद्धि ही नहीं होगी । फलतः भेद-
प्रत्यक्षमात्र द्वि-चन्द्रादि-ज्ञानसदृश भ्रम में ही पर्यवसित होगा¹।
प्रश्न—श्रुति से अभेद बोधित होता है, तो प्रत्यक्ष से भेद । दोनों प्रमाण
माननीय हैं, अतः भेद और अभेद दोनों रहें । उत्तर—'एकमेवाद्वितीयम्' यह श्रुति
'एक' शब्द कहकर 'एव'कार का भी उपादान करती है, फलतः श्रुति का अत्यन्त अभेद
में तात्पर्य है । अतः भेदाभेद भी असङ्गत ही है ।
प्रश्न—आपातः प्रत्यक्ष-विरोध होने से श्रुति द्वारा जायमान बुद्धि प्रथम अपने
से ही प्रत्यक्ष-बुद्धि और उसके विषयों के अभेद का बोध कराती है, पश्चात् स्व
( बुद्धि ) से अर्थों के ऐक्य की अन्यथानुपपत्तिरूप अर्थापत्ति की सहायता से विषयों
¹ जैसे नेत्र-कनीनिका ( आँख की पुतली ) के सामने तृण रखकर देखने से 'द्वौ 'चन्द्रौ'
ऐसा भ्रमरूप ज्ञान होता है, 'वितस्तिपरिमितः सूर्यः' ऐसा भ्रम होता है; वैसे ही भेद-प्रत्यक्ष
भी भ्रम ही है, प्रमा नहीं ।