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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 60

४४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

ननु सदसत्पक्षयोर्दोषदर्शनाद् अनिर्वचनीयतेति ब्रुवाणस्य किं सदसत्त्व-
संशयः, किं वा सदसत्पक्षपक्षबहिर्भावाभ्युपगमः ? आद्ये भवितव्यं तावत्सदसत्त्व-
योरन्यतरेणेति एकपक्षदोषस्याभासत्वम्, तच्च सत्त्वपक्षदोषस्यैवाभ्युपेयमावश्यक-
त्वात् । यदि तावत्सत्त्वपक्षस्तदा सत्त्वपक्षदोषः कथं संगच्छेत । अथाऽसत्त्वपक्ष-
स्तदा सर्वासत्त्वे तद्दोषः कथं सद्भाववान् भवितुं प्रभवेत् ? द्वितीयस्तु
व्याघातादेवासम्भवो, 'परस्परविरोधे हि न प्रकारान्तरस्थितिरि'ति ।
तदेतदनाकलितपराभिसन्धेः प्रत्यवस्थानम् । यो हि सर्वमनिर्वचनीयसद-
सत्त्वं ब्रूते, स कथमनिर्वचनीयतासत्त्वव्यवस्थितौ पर्यनुयुज्येत, साऽपि हि
कृत्स्नप्रपञ्चपरसर्वशब्दाभिधेयमध्यनिविष्टैव ।
परस्यैव व्यवस्थयैवं पर्यवस्यति—निर्वचनप्रतिषेपादनिर्वचनीयत्वम्,
विधिनिषेधयोरेकतरनिरासस्य इतरपर्यवसायितायास्तेनाभ्युपगमात् । ततः परकीय-
रीत्येदमुच्यते—अनिर्वचनीयत्वं विश्वस्य पर्यवस्यतीति ।
कर सकते, अतः जाति भी असत् है । फिर मेरे कथन में आप 'जाति' कैसे दे
सकते हैं ?
प्रश्न—'सत्, असत् दोनों पक्षों में दोष है', इस युक्ति से अनिर्वचनीय कहनेवाले
आपको सत्-असत्-विषयक सन्देह है या तृतीय पक्ष का स्वीकार ? यदि सन्देह है,
तो सत्त्व और असत्त्व दोनों में से एक अवश्य सिद्ध होगा और दूसरे पक्ष के दोष को
आभास कहना पड़ेगा । आवश्यक होने से सत्त्व-पक्ष के दोषों को ही आभास कहा
जायगा, क्योंकि यदि सत्त्व-पक्ष है, तब तो उस पक्ष के दोष आभास हैं ही और
यदि असत्त्व पक्ष है, तब भी सब के असत् होने से सत्त्व-पक्ष के दोष भी असत् ही
हैं । सत्-असत् से विलक्षण तृतीय पक्ष का आश्रयण तो व्याघात होने के कारण
असंगत है । सत्त्व-असत्त्व दोनों आपस में विरुद्ध हैं । अतः इनसे भिन्न तृतीय पक्ष
नहीं है; क्योंकि जो सत् नहीं, वह असत् अवश्य है और जो असत् नहीं, वह सत् है ।
उत्तर—जबतक इस प्रकार साफ़-साफ़ दोष न दें कि इस-इस दोष से सत्-पक्ष
का दोष आभास है, तबतक सत्त्व-पक्ष का स्थापन या अनिर्वचनीयत्व का खण्डन नहीं
हो सकता । फिर यदि अनिर्वचनीयत्व का खण्डन हो भी जाय, तो हानि क्या है ?
जो सम्पूर्ण जगत् को अनिर्वचनीय कहता है, वह अनिर्वचनीयत्व को भी अनिर्वचनीय
ही कहेगा, क्योंकि जगत् के भीतर अनिर्वचनीयत्व भी आ ही जाता है ।
प्रश्न—आप यदि अनिर्वचनीयत्व का साधन न करेंगे, तो वह सिद्ध कैसे होगा ?