खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ : सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
'अन्यथानुपपत्तिश्चेदस्ति वस्तुप्रसाधिका ।
पिनष्टि दृष्टवैषम्यं सैव सर्वबलाधिका ॥'
वाच्याऽन्यथोपपत्तिर्वा त्याज्यो वा दृष्टताग्रहः ।
न ह्येकत्र समावेशः, छायातपवदेतयोः ॥'—इति ।
तदित्थं त्वदङ्गीकृतसद्विचारलक्षणोपपन्नैरेवंविधैर्विचारैः स्वप्रकाशता भवता
सुप्रतिपदा, अस्माभिस्तु स्वसंवेदनबलादेव स्वतःसिद्धरूपं विज्ञानमास्थीयत इति ।
शून्यवाद-स्वप्रकाशवादयोर्भेदः
एवं च सति सौगतब्रह्मवादिनोरयं विशेषः – यदादिमः सर्वमेवानिर्वचनीयं
वर्णयति । तदुक्तं भगवता लङ्कावतारे२—
'बुद्ध्या विविच्यमानानां स्वभावो नावधार्यते ।
अतो निरभिलाप्यास्ते निःस्वभावाश्च देशिताः ॥'—इति ।
अर्थापत्ति पदार्थ का, साधक यदि है मान ।
वे ही दृष्टि-विरोध का चूर्ण करेगी मान ॥
उपपत्ति हि तुम अन्यथा, करो या छोड़ो दृष्टि ।
एक जगह कस होयगी, छायाऽऽतप की सृष्टि ॥
इस प्रकार आप द्वारा अङ्गीकृत सद्विचार ( कथा ) के लक्षण से युक्त विचार द्वारा
आप ज्ञान की स्वप्रकाशता भलीभाँति जान सकते हैं । हम तो अपने अनुभव से ही
स्वतःसिद्ध ब्रह्मरूप विज्ञान को प्राप्त हैं ।
शून्यवाद और स्वप्रकाश-विज्ञानवाद का भेद
ऐसा होने पर बौद्ध और वेदान्तियों में यह भेद है कि बौद्ध तो सब वस्तुओं
को ही 'अनिर्वचनीय' कहते हैं । 'लङ्कावतार' नामक ग्रन्थ में भगवान् बुद्ध के
शिष्यों ने कहा है कि 'बुद्धि से विचारने पर वस्तु के स्वभाव निश्चित नहीं होते ।
अतः सम्पूर्ण वस्तुएँ स्वभाव से रहित और अनिर्वचनीय हैं।'
१. बौद्धों के चार भेद हैं—माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभाषिक । इनमें
प्रथम शून्यवादी, द्वितीय क्षणिक-विज्ञानवादी, तृतीय क्षणिक विज्ञान से अनुमेय क्षणिक बाह्य-
पदार्थवादी और चतुर्थ क्षणिक विज्ञान से अभिन्न क्षणिक बाह्य-पदार्थवादी हैं। यहाँ शून्यवादी
और वेदान्तियों का भेद दिखाया गया है ।
२. 'अलंकारावतारे इति पाठः' इति विद्यासागरः । पुस्तकस्यानुपलम्भात कः सन्पाठ इति
निर्णेतुं न शक्यते ।