खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] स्वप्रकाश-विज्ञानवाद-विचार ३७
चेन्न । अपादानस्यापि व्याप्तेः अपादानं कर्मापीति चेन्न । 'वृक्षात्पतति पर्णमि'तिवत्
'वृक्षं पर्णं पतती'त्यपि स्यात् ।
विवक्षातः कारकाणि भवन्तीति तदविवक्षया नैवमिति चेन्न । वस्तुतः सतस्ता-
द्रूप्यस्य यदि विवक्षा स्यात्तदा तदपि स्यात् । अपादानस्य कर्मत्वं न विवक्ष्यत
इति शाब्दिकसम्प्रदायोऽयमिति चेत्, तर्हि तत्र निवृत्तसर्वकर्मव्यवहारेऽपि स्वकृत-
कर्मलक्षणानुरोधेन कर्मत्वमभ्युपगच्छता वस्तुमात्रं कर्मेत्यपि लक्षणं सावकाशितं स्यात् ।
कथञ्च लोकोत्तरप्रज्ञेन निवृत्तसर्वकर्मव्यवहारेऽपि स्वकृतकर्मत्वमस्तीत्यधिगतम् ?
अपादानेतरद् ईदृशं कर्मेति चेन्न । तत्रापि 'नदी वर्धते' इत्यादौ तद्वृद्धे-
रप्राप्ततीरभागादिप्राप्तिफलायाः सकर्मकत्वापत्तेः । अपादानेतरदिति स्थाने क्रिया-
पतति' यहाँ वृक्षरूप अपादान पर्णनिष्ठ-पतन-क्रिया के विभागरूप फल से युक्त
है, अतः उसमें भी कर्म-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । निर्वचन—अपादान कर्म भी
है । खंडन—फिर तो जैसे 'वृक्षात् पतति' प्रयोग होता है, वैसे ही 'वृक्षं पतति'
यह भी प्रयोग हो जायगा ।
निर्वचन—कारक वक्ता की इच्छा से होते हैं । यहाँ वक्ता को कर्मत्व की इच्छा
नहीं है, अतः द्वितीया नहीं होती । खंडन—यदि वस्तुतः अपादान भी कर्म हो, तब तो
जिस काल में उसे कर्मत्वरूप से कहने की इच्छा हो, उस काल में 'वृक्षं पतति' ऐसा
भी प्रयोग हो जायगा । निर्वचन—अपादान की कर्मत्वरूप से विवक्षा नहीं होती,
ऐसा वैयाकरणों का सम्प्रदाय है । खंडन—जिसमें कर्मत्व का कभी भी व्यवहार नहीं
होता, उसमें भी स्वकल्पित लक्षण के अनुरोध से कर्मत्व माननेवाले आप 'वस्तुमात्र
कर्म है' ऐसे ही लक्षण की कल्पना क्यों न करें ? जब कोई दोष दे, तो वैयाकरणों
के सम्प्रदाय का आश्रयण कीजिये । इसके अतिरिक्त जिसमें कर्मत्वकृत कोई भी
व्यवहार नहीं होता, उस अपादान में कर्मत्व को लोकोत्तर बुद्धिवाले आपने कैसे
जाना ? अर्थात् जब कि अपादान में वृद्धों द्वारा कर्मत्वव्यवहार नहीं होता,
तब उसे कर्म मानना ठीक नहीं ।
निर्वचन---'अपादान से इतर जो पर-समवेत क्रिया के फल का आश्रय हो, वह
कर्म है' ऐसा निवेश करने पर कोई दोष नहीं होगा । खंडन---फिर भी 'नदी वर्धते'
इस स्थल में तीर को कर्मत्व होने लगेगा, क्योंकि वह नदीवृद्धिरूप क्रिया के फल
( अप्राप्त तीरभाग में प्राप्ति ) का आश्रय है । निर्वचन—'क्रिया का नाशक जो
पर-समवेतक्रियाफल है, उसका भागी कर्म है' ऐसा लक्षण करेंगे । इससे 'वृक्षं पतति'