खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ५१
ननु नाद्वैतश्रुतीनामृजावर्थे प्रामाण्यं सम्भवति, प्रत्यक्षादिबाधात् । ततश्चा-
न्यत्रैव क्वचित्तातपर्यं कल्प्यम् ।
मैवम्; यदद्वैतश्रुतेर्बाधकं प्रत्यक्षादि मन्यसे तदाऽऽत्मीये विषये घटपटादेर्भेदे
नियत एवोत्पद्यते, न तु प्रत्यक्षादिकं भूतभाविवर्तमानसकलव्यक्तिभेदग्राहि जाय-
मानमावयोः सम्प्रतिपन्नमस्ति, तादृशेन ज्ञानेन चोत्पद्यमानेन सर्वज्ञतां तदा तव
श्रद्दध्यां, यदि जानासि मम चेतसि किं वर्तते इति ।
यदि च प्रत्यक्षादि किञ्चिन्मात्रविषयम्, तदा तद्विषयादन्यत्रापि प्रवर्त-
माना अद्वैतश्रुतिस्तेन न बाधितुं शक्यते, स्वविषयमात्रे प्रमया विपरीतविषयज्ञान-
बाधनात् । अन्यथाऽतिप्रसङ्गात् । मा हि भूदग्नीषोमीयपश्वालम्भनविधिना सर्व-
भूताहिंसाश्रुतेर्वैयर्थ्यम् ।
शङ्का -- 'आदित्यो यूपः' इस अर्थवाद का प्रशंसा में तात्पर्य होने से, पद-समन्वय
से प्रतीयमान सामानाधिकरण्य जैसे प्रत्यक्ष से बाधित होता है, वैसे ही 'एकं ब्रह्म' इस
स्थल में अद्वैत का बाध क्यों न हो ? समाधान -- बुद्धि का स्वतःप्रामाण्य तो केवल
बाधक रहने पर ही दूर होता है । 'आदित्यो यूपः' यहाँ प्रत्यक्ष बाधक है, पर 'एकं ब्रह्म'
यहाँ कोई बाधक है ही नहीं ।
प्रश्न -- अद्वैत-श्रुति का ऋजु अर्थ ( वाच्यार्थ ) में प्रामाण्य नहीं है, क्योंकि
द्वैत प्रत्यक्ष से गृहीत होता है । अतः प्रत्यक्ष से अद्वैत बाधित होगा । इसलिए उपासना
आदि में ही श्रुति का तात्पर्य्य है ।
उत्तर -- जिन प्रत्यक्षादिकों को अद्वैत-श्रुति के बाधक मानते हैं, वे (प्रत्यक्षादि)
केवल अपने-अपने विषय में घट-पटादि के भेदों से नियत ही उत्पन्न होते हैं । अतः
प्रत्यक्ष द्वारा श्रुति से जात सर्वाद्वैत बोध का बाध कैसे होगा ?
प्रत्यक्ष के सर्वविषयकत्व का समर्थन-- सामान्यलक्षणा से भूत, भावि और वर्तमान
सकल भेदविषयक एक ही प्रत्यक्ष होता है और वही अद्वैत का बाधक होगा । खण्डन--
सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति (सन्निकर्ष) से आपके सर्वविषयक ज्ञान में हम तब श्रद्धा करें,
यदि आप सामान्यलक्षणा के बल से बतला दें कि हमारे चित्त में क्या है ?
यदि कहें -- प्रत्यक्ष किञ्चिन्मात्रविषयक होता है, तो उस विषय से अन्यत्र भी प्रवृत्त
अद्वैत-श्रुति उससे बाधित कैसे होगी, क्योंकि प्रमा स्व-विषय में ही स्व-विषय के विपरीत-
विषयक ज्ञान की बाधक होती है । अतएव 'अग्नीषोमीयं पशुमालभेत' यह श्रुति 'मां हिंस्यात्