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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
भावमासादयन्त्यां श्रुतिस्तत्र तत्राऽप्रतिद्वन्द्वित्वाऽसङ्कुचितस्वतःप्रामाण्यबललब्ध-
तत्तदर्थैक्यान्यथानुपपत्तिसहायसम्पदजय्या तयोरप्यभेदं बोधयन्ती न प्रतिहन्तुं
शक्येति न क्वचिदपि प्रतिहतप्रसरा सती सर्वाद्वैतप्रमापिकेति ।
भेदप्रमान्यथानुपपत्त्या च वैपरीत्यमशक्यम्, तत्राद्वैतश्रुत्या सन्दिह्यमानस्य
प्रमात्वस्यैवासिद्धेः, भेदधीमात्रस्य च द्विचन्द्रादिवोधवदन्यथोपपत्तेः ।
'एकम्' इत्युपादाय यद् एवकारमप्युपादत्ते श्रुतिः 'एकमेवेदम्' इतिरूपा,
तदैकान्तिकमैक्यं बोधयतीति भेदाभेदेनाप्यशक्यसमर्थनं घटपटादिभेदग्राहि प्रत्य-
क्षादिप्रामाण्यमिति ।
बुद्धेर्विरम्य व्यापाराभावात् कथमित्थमिति चेन्न । श्रुतितो द्रागेव जातायाः
सर्वविषयाया अद्वैतधियोऽस्मद्बुद्धय एवंविधविचारसोपानपरम्परामारोहन्त्यो
नानाविषयेषु तत्प्रामाण्यविषयाः क्रमेण परिनितिष्ठन्तीत्युच्यमानत्वात् ।
में प्रतिद्वन्द्वी के न होने से असङ्कुचित और स्वप्रामाण्य के बल से लब्ध जो स्व
( श्रौत-बुद्धि ) से घट-पट आदि अर्थों का ऐक्य, उसकी जो अन्यथानुपपत्ति है, उसकी
सहायता से अजेय—घट-पट के भी अभेद का बोधन करती हुई—बोधन के अयोग्य
कहीं भी न रुकनेवाली—अद्वैत श्रुति, सब पदार्थों के अद्वैत की प्रमा करायेगी ।
प्रश्न—'घटः पटाद् भिन्नः' इत्याकारक घट-पट के भेद की प्रमा ही अनुपपन्न
होकर अद्वैत-श्रुति का सर्वत्र बाध क्यों नहीं कर देती ? उत्तर—अद्वैत-श्रुति से भेद-
प्रत्यक्ष में सन्देह होता है, अतः उसमें प्रमात्व की सिद्धि ही नहीं होगी । फलतः भेद-
प्रत्यक्षमात्र द्वि-चन्द्रादि-ज्ञानसदृश भ्रम में ही पर्यवसित होगा¹।
प्रश्न—श्रुति से अभेद बोधित होता है, तो प्रत्यक्ष से भेद । दोनों प्रमाण
माननीय हैं, अतः भेद और अभेद दोनों रहें । उत्तर—'एकमेवाद्वितीयम्' यह श्रुति
'एक' शब्द कहकर 'एव'कार का भी उपादान करती है, फलतः श्रुति का अत्यन्त अभेद
में तात्पर्य है । अतः भेदाभेद भी असङ्गत ही है ।
प्रश्न—आपातः प्रत्यक्ष-विरोध होने से श्रुति द्वारा जायमान बुद्धि प्रथम अपने
से ही प्रत्यक्ष-बुद्धि और उसके विषयों के अभेद का बोध कराती है, पश्चात् स्व
( बुद्धि ) से अर्थों के ऐक्य की अन्यथानुपपत्तिरूप अर्थापत्ति की सहायता से विषयों
¹ जैसे नेत्र-कनीनिका ( आँख की पुतली ) के सामने तृण रखकर देखने से 'द्वौ 'चन्द्रौ'
ऐसा भ्रमरूप ज्ञान होता है, 'वितस्तिपरिमितः सूर्यः' ऐसा भ्रम होता है; वैसे ही भेद-प्रत्यक्ष
भी भ्रम ही है, प्रमा नहीं ।