सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 63

४८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

विषयनियतत्वात् अन्यथा व्यवहाराणां विषयनियमप्रयोजकस्य ज्ञानस्यासम्भवेन
व्यवहारविषयपारिप्लवापत्तेः ।
यदि चाद्वैतं प्रश्नविषयः प्रतीतमुच्यते, तदा तत्प्रतीतिस्ते प्रमा वा स्यात्,
अप्रमा वा ? आद्ये यदेव तस्याः प्रमायाः करणम्, तदेवा द्वैते प्रमाणं तवापि
सम्प्रतिपन्नमिति वृथा तस्य प्रश्नः ।
न च वाच्यम्—सामान्यतोऽद्वैतप्रमाणसिद्धौ भूतायामपि विशेषतः प्रमाणप्रश्नः;
यतः सामान्यसिद्धावेव अद्वैतसिद्धौ विशेषविचारः 'काकदन्तविचारवत् स्यात् ।
सामान्यसिद्धिरेव च विशेषमध्याक्षिप्यानयन्ती विशेषमपि ते कथितवती किमत्र
प्रश्नेन ? परिगणितेषु हि प्रमाणप्रकारे षु मध्ये यत्रैव दोषं न प्रमिणोषि, तत्रैव
विशेषे सामान्यस्य विश्रान्तेः । यदि च परिचितचरेषु प्रमाणप्रकारे षु सर्वेष्वेव
दोषं प्रमिणोषि, तदा प्रमाणान्तरमाक्षिप्यापि सामान्येन विश्रमणीयमेव ।
व्यवहारविशेष रूप है और व्यवहार ज्ञान से जन्य होता है; अतः वह ( व्यवहार )
स्वजनक ज्ञान के विषय से नियत ( व्याप्य ) है । यदि व्यवहार स्वजनक ज्ञान के
विषय का अतिक्रमण करे, तो 'अमुक व्यवहार का विषय अमुक व्यवहर्तव्य है', यह
नियम ही नहीं हो पायेगा ।
फिर, यदि प्रश्न का विषय अद्वैत प्रतीत ( ज्ञात ) हो, तो वह प्रतीति अम्र है या
प्रमा ? यदि प्रमा है, तो जो प्रमा का कारण है, वही अद्वैत में प्रमाण है, यह तुम
भी मानोगे । अतः प्रमाण-प्रश्न व्यर्थ है ।
प्रश्न का समर्थन—अद्वैत में सामान्य रूप से प्रमाण सिद्ध है और यह विशेष रूप
से प्रमाण का प्रश्न है । प्रश्न-खण्डन—प्रमाण यदि सामान्य रूप से सिद्ध ही है, तो
विशेष रूप से उसका विचार कौए के दाँतों की परीक्षा के तुल्य निष्फल है ।
कारण सामान्य रूप से प्रमाण की सिद्धि ही विशेष का भी आक्षेप कर लेगी,
क्योंकि विशेष के बिना सामान्य होता ही नहीं । ( यदि कहो कि इससे
विशेषत्व रूप से ही विशेष सिद्ध हुआ, अनुमानादिरूप से नहीं और हम
तो वैसी ही सिद्धि चाहते हैं, तो ) प्रत्यक्ष आदि परिगणित प्रमाणों में से
जिस प्रमाण में आप दोष की प्रमिति न करें, उसी विशेष में विश्राम होगा । यदि
आप पूर्वपरिचित प्रत्यक्षादि सभी प्रमाणों में दोष जानते हों, तो सामान्य उनसे अन्य
विशेष प्रमाण का अध्याहार कर विश्राम करेगा ।
१ 'काकस्य कति दन्ताः सन्ति' यह विचार नहीं होता, क्योंकि इसका कुछ फल नहीं
और बिना फल के किसी काम में प्रवृत्ति नहीं होती ।