खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष लक्षण का खण्डन ३५५
अथान्यथाकारं लक्षणमभिधत्से—असिद्धिविरोधव्यभिचारकालात्ययापदेश-
विरहितया प्रतीयमानेन बोधितो यदीयसाध्यस्य विपर्ययः, स प्रकरणसम इति ।
एतदपि विचारासहम् ; केन तथा प्रतीयमानत्वमभिमतं किं प्रत्यनुमानप्रयोक्त्रा,
अथ प्रथमानुमानवादिना, द्वाभ्यामपि वा, येन केनचिद्वा ?
न तावदाद्यः ; स्वयं दोषं जानतोऽपि दूषणान्तरापरिस्फूर्ती यद्ययं दोषं न
प्रतिसन्धायति तदाऽभीष्टमेव । अथ प्रतिसन्धायति तदानीमन्यथाऽपि ममा-
स्फुरद्दोषान्तरस्य पराजये अनेन कक्षान्तरारूढायां कथायां शाखान्तरं वा
सङ्क्रमितुमवकाशमासादयिष्यामीत्यभिप्रायवतोऽल्पप्रज्ञस्य, मयि वदत्यसत्पक्षोऽपि
निर्वहतीति लोके प्रकर्षदर्शनार्थम् , कथमपि ग्रन्थकारादिभिरुक्तस्य वा तथाविध-
प्रतिहेतोर्निर्वाहार्थमन्यानुयुक्तस्य प्रौढप्रज्ञस्य स्फुरद्दोषेणापि प्रतिहेतुना सत्प्रति-
पक्षीकरणदर्शनात् । तत्र परेण दोषानुद्भावने जयस्यापि भावात् ।
समर्थन – 'असिद्धि, विरोध, व्यभिचार, कालात्ययापदेश से रहितस्वरूप से ज्ञाय-
मान जो हेतु, उससे जिस हेतु के साध्य का अभाव बोधित है, वह प्रकरणसम है' ऐसा
लक्षणान्तर करेंगे । खंडन—यह कथन भी विचारसह नहीं है । देखिये—अन्ततः
किससे प्रतीयमानत्व कहेंगे ? क्या प्रति-अनुमानप्रयोक्ता से, प्रथम अनुमानप्रयोक्ता से,
दोनों से या जिस किसीसे ?
इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है; कारण जब वादी-प्रयुक्त हेतु में असिद्धि आदि
दोषों की स्फूर्ति नहीं होती, तब अल्पज्ञ पण्डित सदोष हेतु से भी इस आशय से सत्प्र-
तिपक्ष देते हैं कि 'यदि वादी को दोषस्फूर्ति न हुई, तो निश्चय ही विजय होगी और
यदि हुई, तो भी द्वितीय कक्षा में पराजय होगी या शाखान्तर के अवलम्बन का अवसर
मिलेगा, जब कि सदोष हेतु सत्प्रतिपक्ष से न दें, तो इसी कक्षा में पराजय होती है ।
इतना ही नहीं, विशेषज्ञ भी जगत् में अपनी यह अतिशयता प्रकट करने के लिए सदोष
हेतु से भी सत्प्रतिपक्ष देते हैं कि हमारे कहने पर असत्पक्ष का भी निर्वाह हो जाता है,
तो सत्पक्ष की बात ही क्या है । किंवा 'ग्रन्थकार या गुरुओं द्वारा प्रयुक्त स्फुट दोष प्रति-
हेतुका निर्वाह कैसे हो ?' इस प्रकार शिष्य या वादी द्वारा पूछे जाने पर उसके निर्वा-
हार्ध भी प्रौढमति सदोष हेतु से सत्प्रतिपक्ष दे ही सकता है । वैसी स्थिति में प्रतिपक्षी
को उसमें दोषस्फूर्ति न हो, तो विजय भी संभाव्य हो जाती है अर्थात् एकान्त पराजय
की अपेक्षा विजय-संशय ही अच्छा है ।
३५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
किञ्च—प्रतीयमानता यदि निश्चीयमानता विवक्षिता, तदानीमसम्भव एव;
यतो विरुद्धार्थयोरेकस्यावश्यं दोषः, स च कस्यास्त्विति तदा निर्द्धारयितुमशक्य-
तया प्रतिहेतावपि तत्संशयात् । अथ सम्भावना प्रतीयमानता, तत्रोद्भावनसम्भावनां
दूषयन्तो यद्वक्ष्यामस्तदेव दूषणमतिदेष्टव्यम् ।
नापि द्वितीयतृतीयचतुर्थाः ; परबुद्धेरवधारणतया परस्यासिद्ध्यादिविरहित्व-
बुद्धिरत्र भविष्यतीत्यग्रेऽवधारयितुं प्रमाणाभावेनाशक्यत्वात् कथं सत्प्रतिपक्षतां
प्रतिज्ञाय व्युत्पादयेत् । शङ्कान्तरांश्च निरसिष्यामः ।
एतेन—असिद्धिविरोधकालात्ययापदेशव्यभिचारवत्तया व्याप्तिपक्षधर्मता-
विरहवत्तया वाऽगृह्यमाणेन बोधितसाध्यविपर्ययः सत्प्रतिपक्ष इति निरस्तम् ।
केनागृह्यमाणत्वमिति निर्वक्तुमशक्यत्वात् ।
किञ्च—यदि प्रतीति को निश्चयरूप कहें, तो असम्भव हो जायगा, कारण विरुद्ध
अर्थ के साधक दो हेतुओं में से एक हेतु में अवश्य दोष रहता है, पर वह किसमें है,
इसका निश्चय उस काल में नहीं रहता; अतः प्रतिहेतु में दोष का संशय ही रहता है।
यदि 'प्रतीति' से सम्भावना का ग्रहण करें, तो हम उद्भावना की सम्भावना के
खण्डन के प्रस्ताव में जो दोष देंगे, यहाँ भी उन्हीं दोषों को जानना चाहिए। अर्थात्
यदि संभावना दोषोद्भावन से पूर्वकालिकी विवक्षित हो, तो बाद में प्रतिहेतु-दोष कहने
पर भी पूर्वकालिक अनुद्भावना में कोई प्रतिबन्ध नहीं। अतः सभी हेत्वाभास सत्प्रतिपक्ष
हो जायँगे । यदि उद्भावना का जो अवसर हो, तात्कालिकी संभावना विवक्षित हो, तो
सत्प्रतिपक्षादि के उत्पादन-काल में वह नहीं है। एवञ्च विशेषण के अभाव से ही
लक्षण का अभाव हो जायगा, यह भाव है।
द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ कल्प भी युक्त नहीं हैं, कारण दूसरे को पर की बुद्धि का
अवधारण न होने से, 'पर की असिद्ध्यादिरहितत्व बुद्धि यहाँ होगी' इस अवधारण में
कुछ प्रमाण नहीं । अतः वह सत्प्रतिपक्ष की प्रतिज्ञा कर उसका व्युत्पादन कैसे करेगा ?
इस लक्षण की अन्य शङ्काओं का निरास आगे करेंगे ।
समर्थन—'असिद्ध, विरोध, कालात्ययापदेश और व्यभिचार से युक्तत्व रूप से तथा
व्यासिपक्षधर्मता-विरहितत्वरूप से अगृह्यमाण प्रतिहेतु से बोधित है साध्य-विपर्यय जिस
हेतु का, वह सत्प्रतिपक्ष है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यह लक्षण भी खण्डित
है, कारण इस लक्षण में 'किससे अगृह्यमाण हो ? इत्यादि विकल्पक पूर्वोक्त दोष विद्य-
मान ही हैं ।
परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डनं ३५७
किञ्च—सर्वेषामेवैषां लक्षणानां धर्म्यादिग्राहकानुमानबाधितेऽपि गतत्वा-
दतिव्यापकत्वम् ।
एतेन—स्वार्थानुमाने तदाभासेऽपि वा सत्प्रतिपक्षस्य दोषत्वमपोढम् ।
अथोच्यते—अगृह्यमाणविशेषेण बोधितसाध्यविपर्ययः प्रकरणसम इति ।
अस्तु तावत् केनागृह्यमाणत्वमित्यादिविकल्पदोषाभिधानम् ।
यदि यः कश्चिद्विशेषो विशेषशब्देनाभिप्रेतस्तदा तदग्रहणं क्वचिदपि नास्तीति
सर्वाव्याप्तिः । अथ हेतुदोषलक्षणो विशेषोऽभिमतस्तदा धर्म्यादिग्राहकानुमान-
बाधितेऽपि गतत्वादतिव्यापकता, अगृह्यमाणहेतुदोषरूपविशेषेण बोधितसाध्य-
विपर्ययत्वात्तस्यापि, तत्र हेतुदोषस्याभावादेवागृह्यमाणविशेषत्वात् ।
न च अगृह्यमाणपरमार्थस्थितहेतुदोषरूपविशेषेणेति कृते निस्तारः ; तथा
किञ्च—इन सभी लक्षणों की धर्मिग्राहक मान से बाधित हेतु में अतिव्याप्ति है,
देखिये—'परमाणुः निरवयवः विश्रान्तपरिमाणतरतमादिभावत्वात् व्योमवत्' इस अनुमान
में 'परमाणुः सावयवः मूर्तत्वात् घटवत्' इस अनुमान से सत्प्रतिपक्ष हो जायगा ।
कारण उक्त हेतु परमाणुरूप धर्मी के ग्राहक 'अणुपरिमाणतरतमभावः क्वचिद्विश्रान्तः,
परिमाणतरतमादिभावत्वात्, महत्परिमाणतरतमादिभाववत्' इस अनुमान से बाधित
होने से वास्तव में सत्प्रतिपक्षत नहीं है । इससे 'स्वार्थानुमान में सत्प्रतिपक्ष दोष है और
वहाँ स्व से दोष अगृहीत है, अतः 'केन प्रतीयमानत्वम्' इत्यादि विकल्पोक्त दोष नहीं
हैं,' यह कथन भी खण्डित हो जाता है । कारण उस दोष के न होने पर भी
धर्मिग्राहक प्रमाण से बाधित अनुमानस्थलीय यह दोष तदवस्थ ही है ।
समर्थन—'अगृह्यमाण है विशेष जिसका, ऐसे हेतु से बोधित है साध्यविपर्यय
जिसका, वह हेतु प्रकरणसम है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—इस लक्षण में भी 'केन
अगृह्यमाणत्वम्' इत्यादि विकल्पोक्त दोष हैं ही ।
किंच—विशेष से यदि यत्किंचित् विशेष का ग्रहण करें, तो यत्-किंचित् विशेष
सर्वत्र गृहीत है, अतः अगृह्यमाणत्व न होने से सर्वत्र असम्भव हो जायगा । यदि
हेतु-दोष लक्षण-विशेष का ग्रहण करें, तो धर्मिग्राहक अनुमान से बाधित में अतिव्याप्ति
हो जायगी । कारण वहाँ भी अगृह्यमाण है, विशेष जिसका ऐसे हेतु से बोधित साध्य-
विपर्यय है ही; हेतु में दोष न होने से ही दोष अगृहीत है ।
समर्थन—'अगृह्यमाण है परमार्थतः स्थित हेतुदोषरूप विशेष जिसका, ऐसे हेतु
से जिसका साध्यविपर्यय बोधित है, वह प्रकरणसम है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—
[३५८] सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम
सति संत्प्रतिपक्षहेतुकः सत्प्रतिपक्षो न व्याप्यते । परमार्थतस्तिष्ठतीति च
दर्शनीयम्, न च ज्ञेयमिति च महती प्रज्ञा ।
न चागृह्यमाणहेतुदोषहेतुगुणरूपविशेषेणेति विशेषणे विवक्षिते निस्तारः,
व्यतिरेकिण्यन्वयव्यतिरेकिणा सत्प्रतिपक्षे हेतुगुणरूपो विशेषः सपक्षसत्त्वलक्षणो
गृह्यते इति तदव्यापकत्वापत्तेः !
अथ अगृह्यमाणाव्याप्तिपक्षधर्मताभङ्गरूपविशेषेणेति क्रियते, तदा प्रष्टव्यम्—
किमपेक्ष्य विशेषत्वमिदमिष्टम् ? यदि यत्किञ्चिदपेक्ष्य, तदा प्रसिद्धासिद्ध्यादिभावं
हेत्वाभासमपेक्ष्य विशेषो गृह्यते सदनुमानात्मके प्रतिहेताविति तत्राव्यापकत्वम् ।
अथ प्रकृतविरोधिनं हेतुमपेक्ष्य, तदा लक्षणवाक्यमीदृशं पर्यवस्यति—
ऐसा मानने पर सद्हेतु से सत्प्रतिपक्षस्थल में अव्याप्ति हो जायगी, कारण सद्हेतु में
परमार्थतः दोष नहीं होता । किञ्च—इस हेतु में परमार्थतः दोष है, यह दिखाना
पड़ेगा; फिर वह अगृह्यमाण कैसे रहेगा ? अतः दोष परमार्थतः स्थित हो तथा अगृह्यमाण
हो, यह आपका कथन बड़ी ही बुद्धिमानी का रहा !
समर्थन—'अगृह्यमाण है हेतु का दोषगुणरूप विशेष जिसका' इत्यादि विवक्षा से
निर्वाह हो जायगा । खंडन—इस विवक्षा में 'आत्मा स्वव्यवहारहेतुप्रकाशः अदृष्टत्वात्'
इस व्यतिरेकी में 'आत्मा प्रत्यक्षः महत्त्वे सति अश्रावणविशेषगुणाधिकरणत्वात्' इस अन्वय-
व्यतिरेकी से सत्प्रतिपक्ष स्थल में सपक्षसत्त्वलक्षण हेतु का गुणरूप विशेष गृहीत है ।
अतः उक्त लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । प्रतिवादी स्वोक्त हेतु में सपक्षसत्त्व को न
जानता हो, यह अशक्य है ।
समर्थन—'अगृह्यमाण है व्याप्तिपक्षधर्मता ( भाव-अभाव ) रूप विशेष जिसका,
ऐसे हेतु से बोधित है साध्यविपर्यय जिसका, वह सत्प्रतिपक्ष है' ऐसा लक्षण करेंगे ।
खण्डन—इस लक्षण में यह प्रष्टव्य है कि किसकी अपेक्षा से विशेष अभिप्रेत है,
यदि यत्किञ्चित् की अपेक्षा, तो यत्किञ्चित् की अपेक्षा विशेष सदनुमान में भी
अगृहीत है, अतः वहाँ अव्याप्ति हो जायगी ।
यदि प्रकृत हेतु की अपेक्षा कहें, तो लक्षण-वाक्य ऐसा हुआ—'व्याप्तिपक्षधर्मता
भंग-अभंगरूप ( भाव-अभावरूप ) प्रकृत हेतु की अपेक्षा जिसका विशेष गृह्यमाण
१. सन् = निरवद्यः प्रतिपक्षः = प्रतिहेतुः सद्धेतुरित्यर्थः ।
परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ३५६
व्याप्तिपक्षधर्मताभङ्गाभङ्गरूपः प्रकृतहेतुतो यस्य विशेषो न गृह्यते, तेन बोधितो
यदीयसाध्यव्यतिरेकः स प्रकरणसम इति । ईदृशमप्येतद्वाक्यं व्याकारमर्हति ।
तथाहि—व्याप्तिपक्षधर्मतेति मिलितस्य भङ्गाभङ्गपदसम्बन्धे विवक्षिते प्रत्येको
दाहरणातिव्याप्तिः ।
तद्भङ्गाभङ्गरूप इत्यस्य च मिलितस्य विशेषपदसम्बन्धेऽभिप्रेते सर्वथा-
ऽसम्भवितया सर्वाव्याप्तिः ।
अपि च एवमस्य वाक्यस्यार्थो वक्तव्यः—'व्याप्तिभङ्गरूपो व्याप्यभङ्गरूपः
पक्षधर्मताभङ्गरूपः पक्षधर्मत्वाभङ्गरूपः प्रकृतहेतुतो विशेषो न गृह्यते यस्य तेन
बोधितो यदीयसाध्यव्यतिरेकः स प्रकरणसमः ।' तथा सति 'परमाणुर्निरवयवो
विश्रान्तपरिमाणतरतमादिभावत्वात् , व्योमवदि'त्युक्ते 'परमाणुः सावयवो मूर्तत्वात्
घटवदि'ति प्रत्यनुमानेन प्रतिवाद्युक्तेन परमाणुधर्मग्राहिणोऽपि 'अणुपरिमाणतर-
तमादिभावः क्वचिद्विश्रान्तः परिमाणतरतमादिभावत्वात् महत्परिमाणतरतमादि-
भाववदि'त्यादेः सदनुमानतयेष्टस्य पक्षधर्मताबलेन तदीयनिरवयवत्वेऽपि प्रमाणतां
गतस्य सत्प्रतिपक्षता स्यात् ।
न हो, उससे बोधित है साध्यविपर्यय जिसका, वह सत्प्रतिपक्ष है।' अब इस वाक्य
में यह विचारणीय है कि यदि व्याप्तिपक्षधर्मता-समुदाय का मिलित भङ्गाभङ्ग पद से
सम्बन्ध करें, तो जहाँ केवल व्याप्ति का भङ्ग या केवल पक्षधर्मता का भङ्ग ही गृह्यमाण
हो, वहाँ भी समुदाय का भङ्गाभङ्ग अगृह्यमाण होने से अतिव्याप्ति हो जायगी।
किञ्च—मिलित भङ्गाभङ्गरूप समुदाय का विशेष पद से सम्बन्ध करें, तो एक हेतु
में भावाभावरूप भङ्ग-अभङ्ग दोनों कहीं नहीं रहते, अतः सर्वत्र असम्भव
हो जायगा।
अतएव यदि भङ्गाभङ्गरूप समुदाय का विशेष में सम्बन्ध न करें, तो ऐसा वाक्यार्थ-
बोध होगा—'व्याप्तिभङ्गरूप या पक्षधर्मताभङ्गरूप व्याप्यभङ्गरूप या पक्षधर्मत्वाभङ्गरूप
हेतु से जिस हेतु का विशेष गृह्यमाण न हो, उससे बोधित है साध्यविपर्यय जिसका, वह
प्रकरणसम है।' ऐसा लक्षण होने पर 'परमाणुः निरवयवः विश्रान्तपरिमाणतरतमादिभावात्
व्योमवत्' यह कहने पर प्रतिवादी द्वारा उक्त 'परमाणुः सावयवः मूर्तत्वाद् घटवत्'
इस प्रत्यनुमान से परमाणुरूप धर्मी के ग्राहक, सदनुमानरूप से इष्ट तथा परमाणु की
निरवयवता का प्रमापक 'अणुपरिमाणतरतमादिभावः क्वचिद्विश्रान्तः परिमाणतरतमादि-
भावत्वात् महत्परिमाणतरतमादिभाववत्' यह अनुमान भी सत्प्रतिपक्षित हो जायगा।
३६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
यश्चास्य सदनुमानतां न मन्यते, तं प्रत्येवंप्रायाणि बहून्युदाहरणानि
सन्तीति तेषु प्रसङ्गः ।
न च सोऽपि तथाऽस्त्येव ; तस्य धर्मिसिद्ध्यर्थमुपजीव्यत्वेन बलवत्त्वात् ।
तद्व्यवच्छेदार्थं स प्रकृतः प्रकरणसम इति कर्तव्यमिति चेत् ; तथाप्यनुपपत्तिः।
अत्र हि यदि यस्य न गृह्यत इति सम्बन्धः, तेन यत्सम्बन्धितया न गृह्यत इत्यर्थो
विवक्षितः तदाऽव्यापकत्वं दोषः । तथाहि—यत्र द्वयोरपि हेत्वोः परमार्थतः
साधारणो व्याप्त्यादिभङ्गः सत्प्रतिपक्षदशायामगृह्यमाणस्तत्र नास्त्येतल्लक्षणम् ।
न हि तत्र व्याप्त्यादिभङ्गो विशेषः, अपि तु प्रकृतहेतुना सह साधारण एव ।
नन्वत्यन्तासतो व्याप्त्यादिभङ्गरूपस्य विशेषस्यापि तावत्तत्राग्रहणमस्ति,
तदादायैव लक्षणं तद्व्यापि भविष्यति । तर्हि यत्र वादी स्वहेतुसाधारणं व्याप्ति-
भङ्गादिदोषं जानन् प्रतिहेतुनिष्ठतया परस्योद्भावयति, परश्च परिहर्तुं न शक्नोति
जो भट्ट आदि इसको सदनुमान ही मानते हैं, उनके मत में 'आकाशं विभु निःस्पर्श-
द्रव्यत्वात्' यह कहने पर 'आकाशं न विभु आत्मान्यविशेषगुणवत्त्वात्' इससे 'शब्दो
भूतेन्द्रियग्राह्यो बहिर्द्रव्यत्वात्' इसे सत्प्रतिपक्षत्व हो जायगा । यहाँ आकाशरूपधर्मी का
ग्राहक तृतीय अनुमान आकाश के विभुत्व में पर्यवसित है ।
यहाँ तृतीय अनुमान सत्प्रतिपक्षिक ही है, ऐसी इष्टापत्ति नहीं कह सकते । कारण
वह अनुमानरूप धर्मी की सिद्धि के लिए है, अतः उपजीव्य होने से प्रबल है ।
समर्थन—इस दोष के निवारणार्थ हेतु में प्रकृत ( प्रथम ) विशेषण देंगे । एवञ्च
तृतीय में अव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—फिर भी अनुपपत्ति है ही । यहाँ 'यदि विशेषो
यस्य न गृह्यते' ऐसा अन्वय करें, तो 'विशेष यत्सम्बन्धित्वरूप से गृहीत न हो' यह अर्थ
हुआ, तब अव्याप्ति दोष होगा । देखिये—जहाँ दोनों हेतुओं में वस्तुतः साधारण
( व्याप्त्यादिभङ्गरूप ) दोष है और सत्प्रतिपक्ष-दशा में वह अगृह्यमाण है, वहाँ इस लक्षण
की अव्याप्ति हो जायगी । कारण व्याप्ति आदि का भङ्ग विशेष नहीं है, किन्तु दोनों
हेतुओं के सम्बन्धी होने से साधारण ( सामान्य ) ही है । फिर जब विशेष नहीं है,
तो हेतुसम्बन्धित्वरूप से ग्रहण किसका होगा ?
यदि कहें कि 'अत्यन्त असत् जो व्याप्त्यादिभङ्गरूप विशेष, उसका अग्रहण यहाँ
है ही, अतः अव्याप्ति नहीं होगी' तो जहाँ व्याप्त्यादिभङ्गरूप दोष को वादी स्वहेतु-
साधारण जानता हुआ, पर के प्रति प्रतिहेतुनिष्ठत्वरूप से उद्भावन करता है और प्रति-
परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ३६१
तत्राप्येतं सत्प्रतिपक्षताऽक्षतैव स्यात्, यत उक्तविशेषवत्तया तेनासौ न गृहीतः ,
उक्तरूपस्य समानतयैव तेन गृहीतत्वात् ।
तथापि प्रतिहेतुवादिना तावद्विशेषवत्तयैव गृहीतस्तस्य तत्साधारणाभावास्फुर-
णात्, भ्रान्त्यभ्रान्तिसाधारणस्य चात्र ग्रहणमात्रस्य विवक्षितत्वादिति चेन्न । प्रति-
हेतुवाद्यभिप्रायेण अगृह्यमाणतापक्षस्य प्रागेव निरस्तत्वात् ।
किञ्च प्रतिहेतुवाद्यपि यदि साधारणतां तस्य दोषस्य तदैव पश्येत्तदा का गतिः?
यद्यसौ वादिहेतावपि दोषं पश्येत् तदा तमुद्भावयेत् ; तथा सति च तत्रैव
कथासङ्क्रमः स्यात् सत्प्रतिपक्षमुपेक्ष्येति चेन्न । यदि पश्यन्नपि प्रतिवादी तत्र
दोषमेवं मन्त्रयेत्— 'यदिदानीं सत्प्रतिपक्षतां प्रतिज्ञातां विहाय दोषान्तरमुद्भाव
यामि तदाऽपि प्रतिज्ञातत्यागान्मम भङ्गः । अथ नोद्भावयामि, तथापि प्रतिज्ञात
दोषानिर्वाहान्मम पराजयः । 'तदेवं वृथा दोषान्तरव्युत्पादनायासः' इति परामृश्य
तूष्णीमास्ते तदा का गतिः ?
पक्षी उसका परिहार करने में समर्थ नहीं है, वहाँ भी सत्प्रतिपक्षता हो जायगी । कारण
व्याप्ति आदि के भङ्ग [ सामान्यरूप से ग्रहण होने पर भी विशेषरूप से ] अगृह्यमाण
ही हैं ।
समर्थन—प्रतिवादी द्वारा विशेषरूप से ही व्याप्ति का भङ्ग गृहीत है, कारण
वादी के हेतु में व्याप्तिभङ्ग की उसे स्फूर्ति नहीं है । लक्षण में भ्रान्ति-प्रमासाधारण-
प्रतीतिमात्र का निवेश है। खण्डन—प्रतिहेतुवादी के अभिप्राय से अगृह्यमाणता-पक्ष
का पहले खण्डन हो ही चुका है ।
किञ्च—प्रतिहेतुवादी भी यदि व्याप्त्यादि के भङ्गादि की उभयहेतुसाधारणता उसी
काल में जान जाय, तो वहाँ क्या गति होगी ? अर्थात् वहाँ अतिव्याप्ति हो ही जायगी ।
समर्थन—यदि वह वादी के हेतु में भी दोष जान ले, तो सत्प्रतिपक्ष की उपेक्षा
कर उस दोष का ही उद्भावन करेगा और सत्प्रतिपक्ष को छोड़कर उसीमें कथा का
सङ्क्रम हो जायगा । खंडन—यदि दोष को देखता हुआ भी प्रतिवादी ऐसा ध्यान करे
कि 'यदि उस काल में सत्प्रतिपक्षता की प्रतिज्ञा को त्यागकर अन्य दोष की उद्भावना
करता हूँ, तो प्रतिज्ञा-त्याग नामक भङ्ग ( पराजय ) होता है । यदि उद्भावना नहीं
करता, तो प्रतिज्ञात दोष का अनिर्वाह होने से मेरी पराजय होती है । तस्मात्
'दोषान्तर के उपन्यास में आयास व्यर्थ है,' ऐसा सोचकर चुप होकर बैठ जाय, तो
क्या गति होगी ?
४६
३६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
अथ यस्य विशेष इत्युक्तलक्षणवाक्ये पदसम्बन्धस्तवाभिमतः, तदा उक्तस्ताव-
दोषो दोषान्तरं च स्यात्। व्याप्यभङ्गादेर्विरुद्धार्थहेत्वोः साधारणस्यासम्भवाद् विशेष-
पदेनाव्यवच्छेदकेन सह विशेषणविशेष्यभावानुपपत्तेः।
अथोच्यते—व्याप्तिपक्षधर्मताभङ्गाभङ्गरूपप्रकृतहेत्वपेक्षविशेषवत्तया अनुद्भाव्य-
मानेन बोधितो यदीयसाध्यस्य विपर्ययः स प्रकृतः सत्प्रतिपक्ष इति। तदपि
नोपपन्नम् ; यदि परः 'त्वदीयोऽयं प्रतिहेतुरित्थं भग्नव्याप्तिकः' इत्येवाभिधत्ते, न तु
'मद्धेतुतोऽयं विशेषः' इत्यपि ब्रूते, आभासान्तरत्वव्युत्पादनादेव प्रतिहेतोः सत्प्रतिपक्ष-
तामङ्गात्, तदापीत्थं सत्प्रतिपक्षता न निवर्तेत । तथा सति च प्रतीयमानासिद्ध्या-
दिनाऽपि सत्प्रतिपक्षीकरणमिति साधु व्युत्पादितं सर्वानुमानानुक्लं स्यात् ।
किञ्च—कस्मिन् काले तथाऽनुद्भाव्यमानत्वमपेक्षितम् ? यदि यदा प्रतिहेतू-
द्भावनेन परहेतुं दूषयति प्रतिवादी तस्मिन् कालेऽनुद्भावनम्; तदा पश्चादुक्तेऽपि
और यदि 'यस्य विशेषः' ( यत्सम्बन्धी विशेष ) ऐसा उक्त लक्षण-वाक्य में पद-
सम्बन्ध हो, तो भी प्रथम पक्ष में उक्त दोष तो है ही, अन्य भी दोष है। देखिये—
व्याप्ति आदि के भङ्गादि ( विरुद्ध अर्थ के साधक दो हेतुओं में ) कहीं साधारण तो
मिलेंगे ही नहीं। फिर विशेष पद अव्यवच्छेदक है, अतः भङ्गाभङ्ग के साथ विशेष
पदार्थ विशेषणभाव से सम्बद्ध नहीं होगा ।
समर्थन—'व्याप्तिपक्षधर्मता-भङ्गाभङ्ग जो प्रकृत हेत्वपेक्ष विशेष है, तादृशविशेषवत्त्व
रूप से अनुद्भाव्यमान जो प्रतिहेतु, उससे बोधित है साध्यविपर्यय जिस हेतुका, वह
सत्प्रतिपक्ष है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—यह भी लक्षण युक्त नहीं, कारण यदि
प्रतिपक्षी कहे कि 'तुम्हारा हेतु इस प्रकार व्याप्तिरहित है' और 'मेरे हेतु से यह विशेष
है' ऐसा न कहें—क्योंकि व्याप्तिभङ्ग कहने से ही प्रतिहेतु में सत्प्रतिपक्षत्व का भंग
हो जाता है— तो वहाँ सत्प्रतिपक्षत्व नहीं है। पर उक्त लक्षण चला जाता
है, अतः उक्त लक्षण की वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी। ऐसा मान लेने पर जिस
हेतु में असिद्धादि प्रतीयमान भी हैं, उस हेतु से भी सत्प्रतिपक्षत्व हो सकेगा । अतः
आपने बहुत सुन्दर कहा, आपका कथन अनुमितिमात्र के अनुकूल हुआ !
किञ्च—जिस काल में प्रतिहेतु का उद्भावन कर वादी परहेतु को दूषित करता है,
यदि उस काल में विशेषवत्त्वरूप से उद्भावन अभिप्रेत है, तो जहाँ उस काल में प्रतिहेतु
के दोष का उद्भावन नहीं है, किन्तु पश्चात् है, वहाँ भी पूर्वकालिक अनुद्भावन के
वारण का कोई प्रतीकार नहीं है। अतः लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । इसी
परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ३६३
प्रतिहेतुदोषे पूर्वकालिकानुद्भावने प्रतीकारो न कश्चिदिति सर्वहेत्वाभासैः सत्प्रति-
पक्षीकरणमदुष्टमिति गतमनुमानकथया ।
अथ प्रतिवादिनाऽभिहिते यदा पुनर्वादिवचनावसरस्तदाऽनुद्भावनमिष्टम्,
तर्हि तत्कथमग्रे प्रत्यनुमानवादिनाऽवधारणीयमयमत्र विशेषतो दोषं नोद्भावयि-
ष्यतीति ।
दोषशून्यत्वात् स्वकीयस्य प्रतिहेतोः समर्थस्तदवधारयितुं शक्नोतीति चेन्न ।
उक्तमत्र प्रतीतदोषेणाऽपि सत्प्रतिपक्षताकरणं सम्भवति, तत्र परेण दोषेऽनुद्भाविते
विजयश्च भवतीति ।
किञ्च—विशेषदोषशून्यत्वमपि स्वकीयहेतोः कथमयमवधारयेत् ? विरुद्धार्थ-
योस्तावद्द्वयोरेकस्यावश्यं दोषेण भाव्यम् । तत्र यथा तेन स्वहेतौ दोषो न दृश्यते
तथा परहेतावपि । तद्दर्शने तमेवोद्भावयेत् । को हि सचेता निश्चितं दोषमुपेक्ष्य
सदोषस्य निर्दोषसामान्येन प्रत्यवतिष्ठते । तस्मात् सदोषेऽपि दोषमपश्यन्नयं न
स्वेनादर्शनं दोषाभावे प्रमाणयितुमर्हतीति ।
प्रकार स्फुट ज्ञात सभी हेत्वाभासों से सत्प्रतिपक्षत्व होने पर तो अनुमान की कथा ही
नष्ट हो जायगी, अर्थात् सद्हेतु में भी व्यक्त हेत्वाभास से युक्त प्रतिहेतु से सत्प्रतिपक्ष
दे सकते हैं ।
यदि कहें कि प्रतिवादी के कथन के बाद फिर जब वादी के वचन का अवसर
हो, उस काल में उद्भावन अभिप्रेत है, तो आप यह बतायें कि पूर्वकाल में प्रतिवादी
यह कैसे जानेगा कि यहाँ वादी दोष का उद्भावन नहीं करेगा ?
'अपने हेतु में दोष न होने से वादी इसमें दोषोद्भावन नहीं करेगा, यह निश्चय
हो सकता है' यह कथन युक्त नहीं, कारण हम कह आये हैं कि सदोष हेतु से
भी सत्प्रतिपक्षीकरण हो सकता है और पर यदि दोष का उद्भावन न करे, तो विजय
भी होती है ।
किञ्च—विशेष दोष से शून्यत्व का भी अवधारण हेतु में कैसे करेगा, विरुद्धार्थ
हेतुओं के बीच एक में दोष अवश्य है और प्रतिवादी जैसे अपने हेतु में दोष नहीं
देखता, वैसे ही परहेतु में भी नहीं देखता । यदि वह परहेतु में भी दोष देखता,
तो उसीका उद्भावन करता । कौन बुद्धिमान् पुरुष निश्चित दोष को छोड़कर निर्दोष
के साम्य से सदोष का खण्डन करेगा ? तस्मात् सदोष में भी दोष को न देखता
हुआ वह स्व के अदर्शन ( अनुपलब्धि ) को दोषाभाव में प्रमाण नहीं कर सकता ।
३६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम
अथोच्यते—व्याप्तिपक्षधर्मताभङ्गाभङ्गरूपप्रकृतहेत्वपेक्ष विशेषवत्त्वेनानुद्भाव्य-
तया सम्भाव्यमानेन बोधितो यदीयसाध्यस्य विपर्ययः स प्रकृतः प्रकरणसम इति,
नैतदपि सुस्थम् ; यद्युद्भावनकालात् पूर्वकालिकी सम्भावना विवक्षिता, तदा
तात्कालिकानुद्भावनपक्षोक्त एव दोषोऽतिदेष्टव्यः ।
अथोद्भावनस्य योऽवसरो भविष्यति तात्कालिकतया, तदा सत्प्रतिपक्षता-
व्युत्पादनकाले सा नास्तीति विशेषणाभावाल्लक्षणाभावः ।
अथोच्यते—यावत्सम्भावनाऽनुवर्तते तावत्सत्प्रतिपक्षता, किं सम्भावनायाः
कालनियमगवेषणेन । मैवम् ; एवं हि प्रतिहेतोर्दोषेऽनुद्भाविते प्रत्युत निर्दोषतयैव
स्वीकृते दोषोद्भावनसम्भावनाया निवृत्तेः सत्प्रतिपक्षता निवर्तेत । तथा चेत्थङ्कार-
समर्थन—'व्याप्तिपक्षधर्मता-भङ्गाभङ्गरूप प्रकृतहेतु से जो विशेष है, तादृश विशे-
षवत्त्वेन अनुद्भाव्यमानत्व से सम्भाव्यमान जो हेतु उससे बोधित है साध्यविपर्यय
जिसका, वह प्रकृत सत्प्रतिपक्ष है ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यह भी युक्त नहीं, कारण
यदि उद्भावन से पूर्वकालिक सम्भावना की अर्थात् जिस काल में प्रतिवादी प्रतिहेतु का
उद्भावन करता है, उससे पूर्वकालिक संभावना का ग्रहण विवक्षित हो, तब जहाँ प्रतिहेतु
के उद्भावनकाल में तो दोषोद्भावन की सम्भावना है नहीं; किन्तु फिर जब वादी के
वचन का अवसर हुआ, उस काल में दोषोद्भावन की सम्भावना है, वहाँ भी पूर्वकालिक
अनुद्भावन की सम्भावना होने से अतिव्याप्ति हो जायगी ।
यदि कहें कि प्रतिहेतु के उपन्यास के बाद जब वादी के दोष के उद्भावन का
अवसर हो, उस काल में दोषानुद्भावन की सम्भावना विवक्षित है, तो जहाँ स्थापना-
वादी से प्रतिहेतु को दूषित करने पर प्रतिवादी दोषों का उद्धार कर सत्प्रतिपक्षत्व को
ही दृढ़ करे, वहाँ अनुद्भावन की सम्भावना न होने से लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—जबतक दोषानुद्भावन हो, तभीतक सत्प्रतिपक्षत्व रहता है अर्थात्
जिस काल में प्रतिवादी वादी के दोषों का उद्धार कर सत्प्रतिपक्षत्व का दृढ़ीकरण
करता है, उस काल में वह सत्प्रतिपक्ष ही नहीं है । फिर अव्याप्ति कहाँ होगी ?
किन्तु उस काल में वादी से उक्त दोषों का उद्धार कर निरनुयोज्यानुयोग रूप निग्रहस्थान
से ही वादी की पराजय अभिप्रेत है । अतः सम्भावना-काल का गवेषण व्यर्थ है । खण्डन—
यदि ऐसा ही है, तो प्रतिहेतु में दोष-उद्भावन न कर, प्रत्युत निर्दोषत्वरूप से प्रतिहेतु
को स्वीकार करने पर दोषों के उद्भावन या अनुद्भावन की सम्भावना की निवृत्ति हो.
परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ३६५
मेव वादी सत्प्रतिपक्षतां परिहरेदिति साधु स्यात् । प्रतिहेतोः प्रतिक्षेपमकृत्वा
स्वीकृत्यैव तत् सत्प्रतिपक्षता प्रतिक्षेप्स्येति ।
न च स्वीकारादेव प्रतिहेतोः पराजयः स्यात्, सत्प्रतिपक्षतापरिहारोपायतया
स्वीकारस्य करणात् , स्वीकारे सति सम्भावनानिवृत्त्या तल्लक्षणकस्य सत्प्रतिपक्ष-
स्यापि निवृत्तेः । तस्मात् स्वीकारोऽप्ययं परस्यानिष्टार्थं सिद्धसाधने परकीय-
साध्यस्वीकारवद् गुणाय स्वीकर्तुर्न दोषायेति ।
यदि च सत्प्रतिपक्षे वादिनोः समानप्रतिपक्षदर्शनजनितात् स्वहेत्वाभासत्व-
संशयात्, तदा क्वचिदपि नास्ति सत्प्रतिपक्षता, स्वहेतुपक्षपातेन परहेतावेव दोषः
कश्चिदस्ति, मया तुन गृह्यत इति ताभ्यां मन्यमानत्वात् । यदाह—‘निश्चितौ हि
वादं कुरुतः’ इति ।
अर्थौचित्यादावर्जता संशयेन सत्प्रतिपक्षता स्यात्, तदा सर्वत्रैव वादे
जाने से सम्भावनाघटित उक्त लक्षण भी व्यावृत हो जायगा । तब इसी प्रकार सर्वत्र
वादी सत्प्रतिपक्ष का परिहार करेगा । अतः यह अच्छा हुआ कि सत्प्रतिपक्षहेतु का प्रति-
क्षेप न कर उसके स्वीकार से ही सत्प्रतिपक्ष का प्रतिक्षेप हो गया ।
समर्थन—वादी ने प्रतिहेतु का स्वीकार किया, इसीसे उसकी पराजय होगी ।
खण्डन—सत्प्रतिपक्षता के परिहार का उपायरूप से स्वीकार किया है, कारण स्वीकार
करने पर सत्प्रतिपक्षत्व भी निवृत्त हो जाता है । सत्प्रतिपक्षत्व का स्वीकार भी पर की
पराजय के लिए ही है, जैसे कि सिद्धसाधन में पर के साध्य का स्वीकार स्वीकर्ता के
लिए अत्यन्त उपकारक होता है, दोषकारक नहीं ।
किञ्च—यदि सत्प्रतिपक्ष का फल वादी, प्रतिवादी दोनों को ( प्रतिपक्ष-दर्शन से
जनित स्वहेतु में आभासत्वका संशय है, तो कहीं भी सत्प्रतिपक्षत्व नहीं होना चाहिए।
कारण स्वहेतु में ‘पक्षपात होने से परहेतु में ही कोई दोष होगा, हमें ज्ञात नहीं होता’
ऐसा दोनों मानेंगे । फिर सन्देह कैसे होगा ? कहा भी है कि ‘निश्चय में ही विवाद
करते हैं ।’
समर्थन—यद्यपि स्वहेतु में पक्षपात है; तथापि प्रतिहेतु का दर्शन होने पर उसके
उचित होने से ही स्वहेतु में आभासत्व का सन्देह संभव होने से सत्प्रतिपक्षता युक्त
ही है । खण्डन—तब तो सभी वादोंमें अनुमानमात्र में सत्प्रतिपक्षत्व दुर्निवार हो जायगा,
३६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
सर्वानुमानानां सत्प्रतिपक्षता दुर्निंवारो । तद्यथा-- शब्दानित्यत्वानुमानेन
बुद्धिमद्भिः शतशः शब्दनित्यत्ववादिजयात्, शब्दनित्यत्वानुमानेन च प्राज्ञैः
शतशः शब्दानित्यत्ववादिजयात् । द्वयोः पक्षयोरनुमानेषु कतरद्वस्तुतः सदनुमान-
मित्यर्हतो दोषसंशयस्य दुर्निंवारत्वादिति ।
बाध-लक्षण-खण्डनम्
प्रकारभेदाभावाच्च न कालात्ययापदिष्टः पृथक् । तद्यथा—बाधितविषयः
कालात्ययापदिष्ट इत्यलक्षणम् ।
तथाहि—बाधितविषयत्वं किं विवक्षितम् ? न तावद् बलवता बोधितो विषय-
विपर्ययो यस्य तत्त्वम्; यथाश्रुतस्य सत्प्रतिपक्षेऽपि गतत्वात् । तत्र प्रत्यनुमानस्य
प्रथमानुमानविषयविपर्ययबोधकस्य पक्षधर्मतादिबलसम्भवात् ।
अथ बलवदित्यधिकबलेनेति विवक्षितम्, तदाऽपि केवलव्यतिरेकिणोऽन्वय-
कारण बुद्धिमान् नैयायिकों ने शब्दानित्यत्वानुमान से सौ बार शब्दनित्यत्ववादियों को
परास्त किया होगा । और प्राज्ञ मीमांसकों ने शब्दनित्यत्वानुमान से हजार बार शब्दा-
नित्यत्ववादियों को परास्त किया होगा । अतः दोनों पक्षों में कौन वस्तुतः सदनुमान है,
यह योग्य सन्देह सर्वत्र दुर्वार है । फिर जब स्वहेतु में औचित्य से आभासत्व का
सन्देहरूप सत्प्रतिपक्ष का फल सर्वत्र विद्यमान है, तो सर्वत्र सत्प्रतिपक्षत्व क्यों न हो ?
बाध-लक्षण का खण्डन
उक्त हेत्वाभास के प्रकारों से अन्य प्रकार भी सम्भव नहीं है, अतः कालात्ययाप-
देश (बाध) भी भिन्न हेत्वाभास नहीं है। देखिये—'बाधित विषय ( साध्य ) है जिसका,
वह कालात्ययापदेश है,' यह लक्षण उसका नहीं कह सकते । कारण बाधितविषयत्व
क्या है, इसका निर्वचन नहीं हो सकता ।
देखिये—'बलवान् से बोधित विषय ( साध्य) का अभाव जिसका, वह बाधित-
विषयत्व है' यह नहीं कह सकते; क्योंकि यथाश्रुत (बलवत्त्व के विवेचन के बिना
(सामान्यतः) लक्षण सत्प्रतिपक्ष में भी अतिव्याप्त है । वहाँ भी प्रथम अनुमानके विषय
के अभाव के बोधक द्वितीय अनुमान में पक्षधर्मता आदि बल है ही ।
यदि 'बल' से अधिक बलका ग्रहण करें, तो केवलव्यतिरेकी के अन्वय-व्यतिरेकी से
परिच्छेद ] बाध-लक्षण का खण्डन ३६७
व्यतिरेकिणा सत्प्रतिपक्षे गतत्वादतिव्यापकत्वम्, तत्रान्वयव्यतिरेकिणः
प्रतिहेतोः सपक्षसत्त्वलक्षणबलाधिक्यसम्भवात् ।
किञ्चैवं प्रत्यक्षेणानुमानाभासबाधो न स्यात् । प्रत्यक्षस्येन्द्रियार्थसन्निकर्षो-
त्पन्नाभ्रान्तज्ञानकरणत्वमात्रं बलम्,अनुमानस्य तु पक्षधर्मत्वादिभूयिष्ठं बलमितिचे ।
अथ मन्यसे-अनन्यथासिद्धत्वं बलं विवक्षित्वेवमुच्यते । तेनानन्यथासिद्धेन
बोधितो यदीयसाध्यस्य व्यतिरेकस्तत्त्वं बाधितविषयत्वमिति । मैवम्; तथाऽपि
वस्तुतोऽनन्यथासिद्धेन सत्प्रतिपक्षेऽपि गतत्वम् ।
किञ्च-अन्यथेत्यन्येन प्रकारेणेत्युच्यते, अनन्यथेति चानन्येन प्रकारेण,
यस्मादनन्यत्वं तेनैवेत्यर्थः सम्पद्यते । तथा च वक्तव्यं किं तदन्यताप्रतियोगीति ?
प्रामाण्यं तदिति चेत् , अहो दुर्वैदग्धी भवतः । प्रामाण्येनेति वक्तव्ये 'प्रामाण्यात्
योऽन्यः, स यो न भवति, तेन प्रकारेण यः सिद्धः प्रतीत उत्पन्नो वा
तेने'ति ब्रुवाणस्य ।
दिये जानेवाले सत्प्रतिपक्षत्व में अतिव्याप्ति हो जायगी, कारण वहाँ अन्वय-व्यतिरेकी
प्रतिहेतु में सपक्षसत्त्वरूप बल अधिक है ।
किञ्च-ऐसा लक्षण मानने पर प्रत्यक्ष से अनुमानाभास का बाध नहीं होगा,
कारण प्रत्यक्ष में इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न अभ्रान्त ज्ञानमात्र का
करणत्वरूप बल है, किन्तु अनुमान में तो पक्षधर्मता आदि बहुत-सा बल है ।
समर्थन--अनन्यथासिद्ध बल के अभिप्राय से यहाँ अधिक बल का कथन है ।
अतः 'अनन्यथासिद्ध बलवान् से जिसके साध्य का अभाव बोधित है, वह कालात्या-
पदिष्ट है' ऐसा लक्षण करेंगे, तो कोई दोष न होगा । खंडन-ऐसा लक्षण करने
पर भी वस्तुतः अनन्यथासिद्ध (सद्धेतु) से दिये गये सत्प्रतिपक्ष में अतिव्याप्ति हो
जायगी ।
किञ्च-'अन्यथा, शब्द का 'अन्य प्रकार से' यह अर्थ है और 'अनन्यथा' शब्द
का 'अनन्य प्रकार से' । अर्थात् जिससे अन्य न हो 'उसीसे' यह अर्थ सम्पन्न हुआ ।
अब यह बताना होगा कि इस अन्यत्व का प्रतियोगी कौन है ? यदि प्रामाण्य को
उसका प्रतियोगी कहें, तो प्रामाण्य से सिद्ध अर्थात् 'प्रमाण से' इस कथन के स्थान
पर 'प्रामाण्य से जो अन्य, वह जो न हो, उससे सिद्ध ( उत्पन्न या प्रतीत ) उससे' यह
कथन करनेवाले आपकी वैदग्धी (चातुर्य) सचमुच आश्चर्यजनक है ।
१६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
तथापि प्रमाणेन बोधितविपर्ययो विषयो यस्य स कालात्ययापदिष्ट इति ।
न; 'इदं रजतमिति शुक्तिंविषयीकुर्वति प्रत्यक्षाभासे 'नेदं रजतमिति प्रमाणेन
बाध्यमानेऽपि हेत्वाभासविशेषलक्षणमिदं गच्छदतिव्यापकतामापद्येत । एवं
बाध्यविषयिण्यामिच्छायामपि गच्छेत् ।
प्रमाणेन बोधितो यदीयविषयस्यान्यथाभावः स हेतुः कालात्ययापदिष्ट इति
चेन्न । यदि मुख्यार्थो हेतुशब्दः, तदा हेत्वाभासत्वव्याघातः । अथामुख्यार्थस्तदा
कोऽस्यार्थः, यत्रैष व्यवस्थाप्यते इति सोऽभिधातव्यः ।
प्रमाणेन बोधितो यदीयविषयस्य व्यतिरेकः, स हेत्वाभासः कालात्ययापदिष्ट
इति चेन्न । यद्यग्रे हेत्वाभासत्वानिश्चयस्तदा लक्षणस्य दुरवधारणत्वम् । अथ
कालात्ययापदिष्टत्वे निरूपित एव हेत्वाभासत्वनिर्णयस्तदा तत एव दुष्टत्वसिद्धेः
कृतं पश्चात्प्रतीतिकस्य कालात्ययापदेशस्योपन्यासेनेति ।
निर्वचन—तब भी प्रमाण से बोधित है साध्य का अभाव जिसका, वह कालात्यया-
पदिष्ट है ।' खण्डन-यह युक्त नहीं, कारण जहाँ 'नेदम् रजतम्' इस प्रत्यक्ष प्रमाण
से शुक्ति को विषय करनेवाले 'इदं रजतम्' इस प्रत्यक्षाभास का बाध होता है, वहाँ
इस हेत्वाभास-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । इसी प्रकार से जहाँ 'परस्त्रियं न
गच्छेत्' इस शब्द से उत्पन्न बोध से परदारा में सुभ्रूत्वादि के अभ्यास से जनित 'परस्त्रियं
न गच्छेयम्' इस इच्छाका बाध होता है, वहाँ बाधित इच्छा में भी अतिव्याप्ति
हो जायगी ।
समर्थन—'प्रमाण से यदीय साध्यका अन्यथाभाव, बोधित है, वह हेतु कालात्यया-
पदिष्ट है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन-इस लक्षण में 'हेतु' शब्द यदि मुख्यार्थक
अर्थात् 'व्याप्तिपक्षधर्मताविशिष्ट' अर्थ को बोधित करता है, तो उसमें हेत्वाभासत्व का
व्याघात हो जायगा, कारण हेतु हेत्वाभास नहीं हो सकता । यदि वह मुख्यार्थपरक न हो,
तो उसका क्या अर्थ है, जिसमें यह 'हेतु' शब्द व्यवस्थित हो, यह आप बतायें ।
यदि कहें कि 'प्रमाण से जिसके विषय का व्यतिरेक बोधित है वह हेत्वाभास
कालात्ययापदिष्ट है', तो यह युक्त नहीं । कारण यदि प्रथम से हेत्वाभास का निश्चय न
हो, तो लक्षण का ज्ञान ही न होगा। और यदि कालात्ययापदिष्ट की अनिश्चय-दशा में
ही हेत्वाभासत्व का निश्चय हो, तो उसीसे हेतु में दुष्टत्व सिद्ध है। अतः जिसकी पश्चात्
प्रतीति है, उस कालात्ययापदिष्ट का उपन्यास व्यर्थ है ।
परिच्छेद ] बाध-लक्षण का खण्डन ३६६
तदिदं तन्मते लक्षणमस्तु मा वा भूत, सामुद्रिकप्रमाणेण पुनर्महदेतदलक्षणं
कालात्ययापदेशस्य, येनास्य नाम हेत्वाभासभेदपदेऽपभ्रंशः प्रासाधि ।
अथ ब्रूषे—हेत्वाभासत्वं हेतुवदाभासमानत्वं हेतुसदृशतया प्रतीयमानत्वम्,
न तु हेतुदोषवत्त्वमिति । मैवम्; हेतुना तुल्यता ह्यहेतुत्वावगमं विना न शक्य-
प्रतिपत्तिः, सादृश्यस्य भिन्नाधिष्ठानस्य तथैव प्रतीतेः । अन्यथा हेतोरपि हेत्वा-
भासत्वापातात् । ततश्च हेतुरूपवैकल्यस्यावश्यं प्रत्येत्तव्यत्वेन प्रागुक्तदोषानिवृत्तिः ।
प्रमाणेन बोध्यमानो यदीयपक्षव्यतिरेकः स कालात्ययापदिष्ट इति चेन्न ।
आश्रयासिद्धव्यापनात् ।
आश्रयासिद्धव्यतिरिक्त इति विशेषणीयमिति चेन्न । विशेषणाद्यसिद्ध्या
आश्रयासिद्धेन सह सङ्कीर्णकालात्ययापदिष्टोदाहरणमेवं न व्याप्येत ।
तस्मात् आपके मत में कालात्ययापदिष्ट का यह लक्षण हो या न हो, किन्तु
सामुद्रिक-प्रमाण ( ज्योतिषशास्त्र ) से कालात्ययापदिष्ट का यह महान् अलक्षण ( कुलक्षण )
ही हुआ कि यह कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभास के एक प्रकाररूप पद से वह भ्रष्ट
( पतित ) हो गया ।
समर्थन—इस लक्षण में हेत्वाभासत्व 'हेतु-सदृश रूप से प्रतीयमानत्व' है, हेतुदोष-
वत्त्व' नहीं है । खंडन—हेतु से तुल्यता अहेतुता के ज्ञान के बिना प्रमित नहीं हो सकती,
कारण भेदनिबन्धन सादृश्य की प्रमिति भेदज्ञानपूर्वक ही हो सकती है । अन्यथा हेतु
भी हेत्वाभास हो जायगा । तब हेतुरूप का अभाव अवश्य ज्ञातव्य हुआ । एवञ्च यदि
वह लक्षण से पूर्व अज्ञात है, तो लक्षण का अवधारण नहीं होगा । यदि प्रथम से
ज्ञात है, तो उसीसे हेतु में दुष्टत्व का ज्ञान हो जायगा, फिर कालात्ययापदिष्ट का यह
लक्षण व्यर्थ है ।
समर्थन—'प्रमाण से जिसके पक्ष का अभाव बोध्यमान है, वह कालात्ययापदिष्ट
है ।' बाधस्थल में साध्यरूप विशेषण के अभावकृत सिषाधयिषित साध्यरूप धर्म से 'विशिष्ट
पक्ष का भी अभाव रहता है, अतः असम्भव नहीं होगा । खंडन—आश्रयासिद्धि
पक्ष का अभावरूप है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी ।
यदि लक्षण में 'आश्रयासिद्धि-भिन्नत्व' का निवेश करें, तो आश्रयसिद्धि-संकीर्ण
'प्रधानपुरुषेश्वरा अनित्याः पदार्थत्वात्' इस कालात्ययापदिष्ट में उक्त विशेषण का अभाव
होने से अव्याप्ति हो जायगी ।
४७
३७० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
प्रमाणेन बोध्यमानो यदीयसाध्यस्य व्यतिरेकः स कालात्ययापदिष्ट इति
चेन्न । प्रत्यक्षाभासव्यापनात् । तत्रापि हि साध्यस्य ज्ञाप्यरूपस्य व्यतिरेको
बोध्यत एव प्रमाणेन ।
प्रमाणेन बोध्यमानो यदीयसाध्यस्य व्यापकस्य व्यतिरेकः, स कालात्यया-
पदिष्ट इति चेन्न । प्रमाणेन बोध्यमानाभावस्य प्रकृतहेतुव्यापकत्वासम्भवात् ।
प्रमाणेन बोध्यमानो यदीयसाध्यस्य प्रतिज्ञातस्याभावः स कालात्ययापदिष्ट
इति चेन्न । स्वार्थानुमाने कालात्ययापदिष्टस्यैवमव्यापनात् । तत्र शब्दरूपस्य
प्रतिज्ञातस्याभावात्, शब्दस्य परार्थत्वात् ।
प्रमाणेन बोध्यमानो यदीयसाध्यस्य पक्षनिविष्टस्य व्यतिरेकः, स कालात्यया-
पदिष्ट इति चेन्न । तथाभूतस्य पक्षाभासत्वाभ्युपगमेन मुख्यपक्षार्थत्वासम्भवात् ।
पक्षाभासनिविष्टत्वे सतीति तु क्रियमाणे पूर्वं पक्षाभासत्वप्रतीत्यप्रतीतिपक्षयोः
पृथक् हेत्वाभासत्वप्रतीत्यप्रतीतिपक्षोक्तदोषवद्दोषो द्रष्टव्यः ।
समर्थन—'प्रमाण से जिसके साध्य का अभाव बोध्यमान है, वह कालात्ययापदिष्ट
है।' खण्डन—जहाँ 'नेदं रजतम्' इस प्रत्यक्ष से प्रत्यक्षाभास का बाध होता है,
वहाँ (प्रत्यक्षाभास में) अतिव्याप्ति हो जायगी, कारण 'इदं रजतम्' इससे ज्ञाप्य होने से
रजत भी साध्य ही है ।
समर्थन—'प्रमाण से बोध्यमान है व्यापक साध्य का व्यतिरेक जिसका, वह
कालात्ययापदिष्ट है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—प्रमाण से जिस साध्य का अभाव
बोध्यमान है, वह साध्य हेतु का व्यापक नहीं हो सकता ।
समर्थन—'प्रमाण से जिसके प्रतिज्ञात साध्य का अभाव बोध्यमान है, वह
कालात्यादिष्ट है।' खण्डन—स्वार्थानुमान में अव्याप्ति हो जायगी, कारण शब्दप्रयोग
दूसरे के लिए होता है, अतः यहाँ शब्दरूप प्रतिज्ञा नहीं होती ।
समर्थन—'प्रमाण से जिसके पक्षनिविष्ट साध्य का व्यतिरेक बोध्यमान है, वह
कालात्ययापदिष्ट है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—बाधस्थल में मुख्य पक्ष का अभाव
होने से 'पक्ष' से पक्षाभास का ही ग्रहण करना होगा । एवञ्च पक्षाभास-निविष्ट साध्य
का ग्रहण करने पर 'लक्षण से पूर्व पक्षाभासत्व की प्रतीति है या नहीं?' ऐसा विकल्पकर,
हेत्वाभासघटित लक्षण में 'लक्षण से पूर्व हेत्वाभासत्व की प्रतीति है या नहीं?' इस विकल्प
के तुल्य दोष जानना चाहिए ।
परिच्छेद ] बाध-लक्षण का खण्डन ३७१
पक्षत्वाभिमतांशभूतस्येति च क्रियमाणे प्रष्टव्यं किं पक्षत्वाभिमतत्वम्—
किमु पक्षतयाऽभ्युपगम्यमानत्वम्, अथ तत्तया प्रमितत्वम्, उत प्रत्यक्षतया
प्रतीतत्वम् ?
नाद्यः; दूषकं प्रति तदसम्भवात्, तेन बाध्यसाध्यस्य पक्षाभासतयैव
प्रत्युताङ्गीकारात् । अनुमानवाद्यपेक्षयाऽपि नियमाभावः, सदनुमानापरिस्फूर्त्तौ
मन्दप्रज्ञेन प्रज्ञाभिमानभृता च 'मयि वदति स्फुटदोषमपि को दूषयितुं शक्तः'
इत्यभिप्रायेण यदृच्छया ज्ञातदोषस्यापि प्रयोगस्य सम्भवात् । तत्रानुमानवादिना
पक्षत्वाङ्गीकाराभावेन तथाभूतबाधितानुमानाव्यापकमिदं लक्षणं स्यात् ।
न च पक्षतयोपन्यस्यमानत्वमङ्गीकारार्थ इति युक्तम्; तथा सति
स्वार्थानुमाने कालात्ययापदेशाव्याप्तिः ।
नापि द्वितीयः; पक्षत्वेन प्रमिते विषये कालात्ययापदेशानवकाशात् । नापि
तृतीयः; तदा ह्येवं लक्षणमिदं सम्पद्यते—प्रमाणेन बोधितो यदीयसाध्यस्य पक्ष-
यदि साध्य में 'पक्षत्वाभिमत में अंशभूत' यह विशेषण दें, तो यह पूछा जायगा
कि पक्षत्वाभिमतत्व क्या वस्तु है—क्या पक्षत्वरूप से अभ्युपगम्यमानत्व है अथवा पक्षत्व-
रूप से प्रमितत्व है या पक्षत्वरूप से प्रतीतत्वमात्र है?
इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण बाध का उद्भावनकर्ता ( अनुमान का दूषक )
वहाँ साध्य बाधित होने से उसे पक्षरूप से स्वीकार नहीं करता, किन्तु पक्षाभासत्वरूप
से ही स्वीकार करता है । अनुमानवादी भी उसे पक्षरूप मानें, यह नियम नहीं है;
कारण सत्-अनुमान की अस्फूर्तिदशा में मन्दप्रज्ञ तथा प्रज्ञाभिमानी भी 'जब
मैं कहता हूँ, तो स्फुट दोष को भी कौन दूषित कर सकता है' इस अभिप्राय से स्वेच्छा
से सदोषत्वरूप से ज्ञात का भी प्रयोग करता है । वहाँ बाधित अनुमान के विषय पक्ष को
अनुमानवादी भी पक्षत्वरूपसे स्वीकार नहीं करता । अतः उस स्थल में अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—'पक्षत्वरूप से उपन्यास अभ्युपगम्यमानत्व है ।' उक्त स्थल में उपन्यास
है, अतः दोष नहीं है । खंडन—यह भी युक्त नहीं, कारण स्वार्थानुमान में पक्ष का
उपन्यास नहीं होता, अत वहाँ अव्याप्ति हो जायगी ।
द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है; कारण जहाँ पक्ष की प्रमिति है, वहाँ कालात्यया-
पदेश नहीं हो सकता । तृतीय कल्प भी युक्त नहीं है; कारण उस कल्प में ऐसा लक्षण
सम्पन्न हुआ कि 'प्रमाण से जिसके पक्ष की प्रतीति के अंशभूत साध्य का व्यतिरेक
बोधित है, वह कालात्ययापदिष्ट है । इस वाक्य का कहीं भी सम्भव नहीं दीखता । जब
३७२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
प्रतीतिविषयांशस्य व्यतिरेकः, स कालात्ययापदिष्ट इति । अस्य च वाक्यार्थस्य न
कदाचिदपि सम्भवं पश्यामः । यदा तावत्प्रमाणेन साध्यस्य व्यतिरेकबोधस्तदा
पक्षप्रतीतिर्नास्ति विशेषदर्शने भ्रमस्यानवकाशात् । ततश्च तदा पक्षप्रतीत्यभावेन
तद्विषयत्वाभावात् तद्विषयांशस्येति विशेषणाभावाधीनो विशिष्टस्य लक्षणात्म-
नोऽभावः ।
यदाऽपि च प्रमाणेन साध्यव्यतिरेकबोधनं नास्ति, तदा तस्यैव लक्षणा-
भागस्याभावात् लक्षणाभाव इति नित्यमसत्त्वव्यवस्थितेन लक्षणेन लक्ष्यं व्यवस्था-
पयन् श्लाघनीयप्रज्ञो भवान् ।
न च वैशेषिकप्रक्रियामाश्रित्य विनश्यदवस्थाऽपि पक्षप्रतीतिस्तत्काले सम्भा-
वनीया । तदीयसाध्यव्यतिरेकावगमनिवर्तनीया हि सा । तत्साध्यव्यतिरेकावगमश्च
पूर्वतरमेव भूत इत्यवश्यमभ्युपगम्यम् । अन्यथा प्रमाणेन बोध्यमानत्वं कथं
साध्यव्यतिरेकस्य तदाऽवगम्येत ।
न च वाच्यं प्रतीतिविषयत्वमिदं विशेषणं न भवति, किन्तु उपलक्षणम् ।
साध्य के व्यतिरेक का बोध हो, तब पक्ष की प्रतीति हो ही नहीं सकती । कारण
विशेष-दर्शन होने से भ्रम का अवकाश ही नहीं है । तब तो उस काल में पक्ष की
प्रतीति का अभाव होने से तद्विषयत्व का अभाव है । अतः तद्विषयांशरूप विशेषण
के अभाव से विशिष्ट लक्षण का भी अभाव होने के कारण सर्वत्र अव्याप्ति हो जायगी ।
फिर जिस काल में प्रमाण से साध्य के व्यतिरेक का बोध नहीं है, उस काल में उसी
लक्षणभाग का अभाव होने से लक्षण का अभाव है। अतः सदा लक्ष्य में अविद्यमान
लक्षण से लक्ष्य की व्यवस्था करनेवाले आपकी बुद्धि प्रशंसनीय (बुद्धि की बलिहारी ) है !
समर्थन—वैशेषिक-प्रक्रिया (योग्यविभुविशेषगुणानां स्वोत्तरवर्तिविशेषगुणनाश्यत्व-
रूप नियम ) का आश्रयणकर बाधग्रहकाल में भी विनश्यत्-अवस्था का या द्वितीय-
क्षणचुम्बिनी पक्ष की प्रतीति हो सकती है । अतः उस प्रतीति का आश्रयणकर समन्वय
हो जायगा । खण्डन —साध्य-प्रतीति की निवृत्ति साध्याभाव-प्रतीति से होती
है और साध्याभाव की प्रतीति पहले हो चुकी है, यह अवश्य मानना होगा । अन्यथा
साध्य-व्यतिरेक का प्रमाणतः बोध्यमानत्व ज्ञात कैसे होगा ?
समर्थन—'प्रतीति-विषयत्व' पक्ष का विशेषण नहीं, किन्तु उपलक्षण है ।
एवञ्च अविद्यमान भी उपलक्षण व्यवच्छिन्नत्व रूप से उपलक्ष्य की प्रतीति का कारण
परिच्छेद ] बाध-लक्षण का खण्डन ३७३
उपलक्षणेन चासताऽपि व्यवच्छिन्नप्रतीतिरूपजन्यते । यथा—'काकवन्तो
देवदत्तगृहाः' इत्युपलक्षणीभूतया काकवत्तया देवदत्तगृहस्य व्यवहारकाल इति ।
यतस्तत्रोपलक्ष्यदेवदत्तगृहस्य स्वाभाविको विशेषोऽस्ति व्यवहारकाले, तेन
काकवत्त्वाभावेऽपि तमादाय व्यवहारनियमप्रवृत्तिः, न तु तत्राऽप्यसत उपलक्षणस्य
कारणत्वम् । अत्र तु व्यक्तीनामुपलक्ष्यत्वे लक्षणस्याननुगतत्वम् । अनुगतञ्च
किञ्चिदुपलक्ष्यं न लक्षयामहे । अत उक्तमेव वाक्यार्थमादाय प्रवर्तमाने लक्षणात्मके
साधने विशेषाणासिद्धिर्दुर्निवारा ।
एतेन पूर्वशङ्कितस्य हेतुरित्यस्य प्रत्यक्षाभासव्यवच्छेदार्थमुपात्तस्य स्थाने
हेतुत्वाभिमत इत्येतादृशस्य करणं दूषितप्रायम् ।
होता ही है । जैसे 'काकवन्तो देवदत्तस्य गृहाः' यहाँ असत् भी काक उपलक्ष्य
देवदत्तगृह की प्रतीति का जनक होता है । खण्डन—'काकवन्तो देवदत्तस्य गृहाः'
इस स्थल में व्यवहार-काल में काकरूप उपलक्षण न होने पर भी उपलक्ष्य देवदत्त-
गृह में इष्टका-दारूमयत्व आदि विशेष विद्यमान ही हैं । अतएव व्यवहार की प्रवृत्ति
होती है । असत् काक वहाँ भी व्यवहार का कारण नहीं है । यदि यहाँ तत्-तत् व्यक्ति
को उपलक्ष्य मानें, तो लक्षण का अननुगम होगा । कोई अनुगत रूप हमें नहीं दीखता,
अतः प्रतीति को विशेषण ही मानना होगा । एवञ्च लक्ष्य में व्यतिरेकानुमिति के
साधक उक्त लक्षण में विशेषण की असिद्धि हो जायगी ।
इसी प्रकार प्रत्यक्षाभास के व्यवच्छेद के लिए उपात्त 'हेतु' पद के स्थान पर विकल्प-
भय से 'हेतुत्वाभिमतत्व'रूप जो विशेषण दिया गया है, वह भी दूषितप्राय जानना
चाहिए । अर्थात् 'हेतुत्वाभिमत' यहाँ अभिमान क्या पदार्थ है ? क्या वह अभ्युपगम
है, प्रमा है या भ्रान्ति है ? अभ्युपगम कहें, तो वह दूषक का नहीं है, क्योंकि उसने
असद्हेतु माना है । स्थापनावादी का भी नहीं, कारण उसने भी अपने हेतु में आभासता
समझकर ही स्थापना का प्रयोग किया है । सिवा इसके उपन्यास को अभ्युपगम मानें, तो
स्वार्थानुमान-बाध का असंग्रह हो जायगा । द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं, बाधित हेतु में
व्याप्ति या पक्षधर्मता इनमें से किसी एक का भंग निश्चित होने से हेतुत्वप्रतीति
प्रमा नहीं, अप्रमा ही है । तृतीय पक्ष भी अस्वीकार्य है, बाधग्रह होने पर हेतुभ्रम नहीं
हो सकता । कदाचित् उसे अपेक्षणीय मानें, तो अव्यावर्तकता या अतिव्याप्ति होगी,
कारण प्रत्यक्षाभासादि में कदाचित् हेतुभ्रम हो सकता है, यह भाव है ।
अथ ब्रूषे—प्रमाणेन बोधितो यदीयसाध्याभावः, स प्रत्यक्षाभासातिरिक्तः
कालात्ययापदिष्ट इति । नैतदपि सुस्थम् ; शब्दोपमानाभाससाधारण्यात् ।
तद्व्यतिरिक्त इत्यपि विशेषणीयमिति चेत् । एतदपि विचार्यताम्; किं प्रत्य-
क्षाभासादिव्यतिरिक्तत्वं प्रत्यक्षाभासादिभ्यो वैधर्म्यं किञ्चित्, उत स्वरूपभेदः,
अथवाऽन्योन्याभावः ?
न तावदाद्यः; तद्भेदकस्य धर्मस्य निर्वक्तुमशक्यत्वात् । नापि द्वितीयः ;
स्वरूपस्य परस्परव्यावृत्ततया लक्षणानौपयिकत्वात् । नापि तृतीयः ; व्यतिरिक्त-
त्वस्यान्योन्याभावात्मनः प्रत्यक्षाभासादावपि भावेन तद्व्यवच्छेदानुपपत्तेः ।
ननु न व्यतिरिक्तमात्रमन्योन्याभावस्वरूपं विशेषणमस्माभिरुपात्तम्,
किन्नाम ? प्रत्यक्षाभासादिभ्यो व्यतिरिक्तत्वम् । न च प्रत्यक्षाभासादयः
स्वात्मभ्य एव भिन्नाः, तत्कथमुक्तस्य प्रसङ्गस्यावकाशः ? अवगतमिदं त्वद्विव-
समर्थन—'प्रमाण से बोधित है साध्यव्यतिरेक जिसका, और जो प्रत्यक्षाभास से
व्यतिरिक्त भी हो, वह कालात्ययापदिष्ट है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—यह भी
युक्त नहीं है, कारण जहाँ शब्द से शब्दाभास का अथवा उपमानाभास का
बाध है, वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—'शब्दाभास-उपमानाभास-व्यतिरिक्तत्व' निवेश कर देंगे, तो उक्त
दोष नहीं होगा । खण्डन—यहाँ यह भी विचारें कि प्रत्यक्षाभासादि-व्यतिरिक्तत्व
क्या वस्तु है ? क्या प्रत्यक्षाभास से कुछ वैधर्म्य है, स्वरूपभेद है या अन्योन्या-
भाव है ?
इनमें प्रथम वैधर्म्यरूप व्यतिरिक्तत्व नहीं कह सकते; कारण अद्यावधि
कालात्ययापदेश में कोई भेदक धर्म निरुक्त हो नहीं है । द्वितीय (स्वरूपरूप)
व्यतिरिक्तत्व भी नहीं कह सकते, कारण स्वरूप परस्पर व्यावृत्त होने से लक्षण का
उपयोगी नहीं है । अर्थात् लक्षण लक्ष्यमात्र का उपसंग्राहक होना चाहिए और स्वरूप
ऐसा नहीं है । तृतीय (अन्योन्याभावरूप) व्यतिरिक्तत्व भी ठीक नहीं है, कारण
वह प्रत्यक्षाभास में भी विद्यमान है, अतः उसका व्यवच्छेद नहीं हो सकता ।
समर्थन—हम अन्योन्याभावरूप व्यतिरिक्तमात्र विशेषण नहीं देते, किन्तु
प्रत्यक्षाभास-व्यतिरिक्तत्व विशेषण देते हैं । एवञ्च प्रत्यक्षाभास अपनी आत्मा से भिन्न
नहीं, फिर उसमें अतिव्याप्ति कैसे होगी ? खण्डन—आप क्या कहना चाहते हैं,
वह सब तो जान लिया । विचारणीय यही है कि अन्योन्याभाव का लक्षण में निवेश