खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 384, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें३६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
सर्वानुमानानां सत्प्रतिपक्षता दुर्निंवारो । तद्यथा-- शब्दानित्यत्वानुमानेन
बुद्धिमद्भिः शतशः शब्दनित्यत्ववादिजयात्, शब्दनित्यत्वानुमानेन च प्राज्ञैः
शतशः शब्दानित्यत्ववादिजयात् । द्वयोः पक्षयोरनुमानेषु कतरद्वस्तुतः सदनुमान-
मित्यर्हतो दोषसंशयस्य दुर्निंवारत्वादिति ।
बाध-लक्षण-खण्डनम्
प्रकारभेदाभावाच्च न कालात्ययापदिष्टः पृथक् । तद्यथा—बाधितविषयः
कालात्ययापदिष्ट इत्यलक्षणम् ।
तथाहि—बाधितविषयत्वं किं विवक्षितम् ? न तावद् बलवता बोधितो विषय-
विपर्ययो यस्य तत्त्वम्; यथाश्रुतस्य सत्प्रतिपक्षेऽपि गतत्वात् । तत्र प्रत्यनुमानस्य
प्रथमानुमानविषयविपर्ययबोधकस्य पक्षधर्मतादिबलसम्भवात् ।
अथ बलवदित्यधिकबलेनेति विवक्षितम्, तदाऽपि केवलव्यतिरेकिणोऽन्वय-
कारण बुद्धिमान् नैयायिकों ने शब्दानित्यत्वानुमान से सौ बार शब्दनित्यत्ववादियों को
परास्त किया होगा । और प्राज्ञ मीमांसकों ने शब्दनित्यत्वानुमान से हजार बार शब्दा-
नित्यत्ववादियों को परास्त किया होगा । अतः दोनों पक्षों में कौन वस्तुतः सदनुमान है,
यह योग्य सन्देह सर्वत्र दुर्वार है । फिर जब स्वहेतु में औचित्य से आभासत्व का
सन्देहरूप सत्प्रतिपक्ष का फल सर्वत्र विद्यमान है, तो सर्वत्र सत्प्रतिपक्षत्व क्यों न हो ?
बाध-लक्षण का खण्डन
उक्त हेत्वाभास के प्रकारों से अन्य प्रकार भी सम्भव नहीं है, अतः कालात्ययाप-
देश (बाध) भी भिन्न हेत्वाभास नहीं है। देखिये—'बाधित विषय ( साध्य ) है जिसका,
वह कालात्ययापदेश है,' यह लक्षण उसका नहीं कह सकते । कारण बाधितविषयत्व
क्या है, इसका निर्वचन नहीं हो सकता ।
देखिये—'बलवान् से बोधित विषय ( साध्य) का अभाव जिसका, वह बाधित-
विषयत्व है' यह नहीं कह सकते; क्योंकि यथाश्रुत (बलवत्त्व के विवेचन के बिना
(सामान्यतः) लक्षण सत्प्रतिपक्ष में भी अतिव्याप्त है । वहाँ भी प्रथम अनुमानके विषय
के अभाव के बोधक द्वितीय अनुमान में पक्षधर्मता आदि बल है ही ।
यदि 'बल' से अधिक बलका ग्रहण करें, तो केवलव्यतिरेकी के अन्वय-व्यतिरेकी से