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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 610 में से

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पृष्ठ 387

परिच्छेद ] बाध-लक्षण का खण्डन ३६६
तदिदं तन्मते लक्षणमस्तु मा वा भूत, सामुद्रिकप्रमाणेण पुनर्महदेतदलक्षणं
कालात्ययापदेशस्य, येनास्य नाम हेत्वाभासभेदपदेऽपभ्रंशः प्रासाधि ।
अथ ब्रूषे—हेत्वाभासत्वं हेतुवदाभासमानत्वं हेतुसदृशतया प्रतीयमानत्वम्,
न तु हेतुदोषवत्त्वमिति । मैवम्; हेतुना तुल्यता ह्यहेतुत्वावगमं विना न शक्य-
प्रतिपत्तिः, सादृश्यस्य भिन्नाधिष्ठानस्य तथैव प्रतीतेः । अन्यथा हेतोरपि हेत्वा-
भासत्वापातात् । ततश्च हेतुरूपवैकल्यस्यावश्यं प्रत्येत्तव्यत्वेन प्रागुक्तदोषानिवृत्तिः ।
प्रमाणेन बोध्यमानो यदीयपक्षव्यतिरेकः स कालात्ययापदिष्ट इति चेन्न ।
आश्रयासिद्धव्यापनात् ।
आश्रयासिद्धव्यतिरिक्त इति विशेषणीयमिति चेन्न । विशेषणाद्यसिद्ध्या
आश्रयासिद्धेन सह सङ्कीर्णकालात्ययापदिष्टोदाहरणमेवं न व्याप्येत ।
तस्मात् आपके मत में कालात्ययापदिष्ट का यह लक्षण हो या न हो, किन्तु
सामुद्रिक-प्रमाण ( ज्योतिषशास्त्र ) से कालात्ययापदिष्ट का यह महान् अलक्षण ( कुलक्षण )
ही हुआ कि यह कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभास के एक प्रकाररूप पद से वह भ्रष्ट
( पतित ) हो गया ।
समर्थन—इस लक्षण में हेत्वाभासत्व 'हेतु-सदृश रूप से प्रतीयमानत्व' है, हेतुदोष-
वत्त्व' नहीं है । खंडन—हेतु से तुल्यता अहेतुता के ज्ञान के बिना प्रमित नहीं हो सकती,
कारण भेदनिबन्धन सादृश्य की प्रमिति भेदज्ञानपूर्वक ही हो सकती है । अन्यथा हेतु
भी हेत्वाभास हो जायगा । तब हेतुरूप का अभाव अवश्य ज्ञातव्य हुआ । एवञ्च यदि
वह लक्षण से पूर्व अज्ञात है, तो लक्षण का अवधारण नहीं होगा । यदि प्रथम से
ज्ञात है, तो उसीसे हेतु में दुष्टत्व का ज्ञान हो जायगा, फिर कालात्ययापदिष्ट का यह
लक्षण व्यर्थ है ।
समर्थन—'प्रमाण से जिसके पक्ष का अभाव बोध्यमान है, वह कालात्ययापदिष्ट
है ।' बाधस्थल में साध्यरूप विशेषण के अभावकृत सिषाधयिषित साध्यरूप धर्म से 'विशिष्ट
पक्ष का भी अभाव रहता है, अतः असम्भव नहीं होगा । खंडन—आश्रयासिद्धि
पक्ष का अभावरूप है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी ।
यदि लक्षण में 'आश्रयासिद्धि-भिन्नत्व' का निवेश करें, तो आश्रयसिद्धि-संकीर्ण
'प्रधानपुरुषेश्वरा अनित्याः पदार्थत्वात्' इस कालात्ययापदिष्ट में उक्त विशेषण का अभाव
होने से अव्याप्ति हो जायगी ।
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