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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 379

परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ३६१
तत्राप्येतं सत्प्रतिपक्षताऽक्षतैव स्यात्, यत उक्तविशेषवत्तया तेनासौ न गृहीतः ,
उक्तरूपस्य समानतयैव तेन गृहीतत्वात् ।
तथापि प्रतिहेतुवादिना तावद्विशेषवत्तयैव गृहीतस्तस्य तत्साधारणाभावास्फुर-
णात्, भ्रान्त्यभ्रान्तिसाधारणस्य चात्र ग्रहणमात्रस्य विवक्षितत्वादिति चेन्न । प्रति-
हेतुवाद्यभिप्रायेण अगृह्यमाणतापक्षस्य प्रागेव निरस्तत्वात् ।
किञ्च प्रतिहेतुवाद्यपि यदि साधारणतां तस्य दोषस्य तदैव पश्येत्तदा का गतिः?
यद्यसौ वादिहेतावपि दोषं पश्येत् तदा तमुद्भावयेत् ; तथा सति च तत्रैव
कथासङ्क्रमः स्यात् सत्प्रतिपक्षमुपेक्ष्येति चेन्न । यदि पश्यन्नपि प्रतिवादी तत्र
दोषमेवं मन्त्रयेत्— 'यदिदानीं सत्प्रतिपक्षतां प्रतिज्ञातां विहाय दोषान्तरमुद्भाव
यामि तदाऽपि प्रतिज्ञातत्यागान्मम भङ्गः । अथ नोद्भावयामि, तथापि प्रतिज्ञात
दोषानिर्वाहान्मम पराजयः । 'तदेवं वृथा दोषान्तरव्युत्पादनायासः' इति परामृश्य
तूष्णीमास्ते तदा का गतिः ?
पक्षी उसका परिहार करने में समर्थ नहीं है, वहाँ भी सत्प्रतिपक्षता हो जायगी । कारण
व्याप्ति आदि के भङ्ग [ सामान्यरूप से ग्रहण होने पर भी विशेषरूप से ] अगृह्यमाण
ही हैं ।
समर्थन—प्रतिवादी द्वारा विशेषरूप से ही व्याप्ति का भङ्ग गृहीत है, कारण
वादी के हेतु में व्याप्तिभङ्ग की उसे स्फूर्ति नहीं है । लक्षण में भ्रान्ति-प्रमासाधारण-
प्रतीतिमात्र का निवेश है। खण्डन—प्रतिहेतुवादी के अभिप्राय से अगृह्यमाणता-पक्ष
का पहले खण्डन हो ही चुका है ।
किञ्च—प्रतिहेतुवादी भी यदि व्याप्त्यादि के भङ्गादि की उभयहेतुसाधारणता उसी
काल में जान जाय, तो वहाँ क्या गति होगी ? अर्थात् वहाँ अतिव्याप्ति हो ही जायगी ।
समर्थन—यदि वह वादी के हेतु में भी दोष जान ले, तो सत्प्रतिपक्ष की उपेक्षा
कर उस दोष का ही उद्भावन करेगा और सत्प्रतिपक्ष को छोड़कर उसीमें कथा का
सङ्क्रम हो जायगा । खंडन—यदि दोष को देखता हुआ भी प्रतिवादी ऐसा ध्यान करे
कि 'यदि उस काल में सत्प्रतिपक्षता की प्रतिज्ञा को त्यागकर अन्य दोष की उद्भावना
करता हूँ, तो प्रतिज्ञा-त्याग नामक भङ्ग ( पराजय ) होता है । यदि उद्भावना नहीं
करता, तो प्रतिज्ञात दोष का अनिर्वाह होने से मेरी पराजय होती है । तस्मात्
'दोषान्तर के उपन्यास में आयास व्यर्थ है,' ऐसा सोचकर चुप होकर बैठ जाय, तो
क्या गति होगी ?
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