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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 610 में से

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पृष्ठ 383

परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ३६५
मेव वादी सत्प्रतिपक्षतां परिहरेदिति साधु स्यात् । प्रतिहेतोः प्रतिक्षेपमकृत्वा
स्वीकृत्यैव तत् सत्प्रतिपक्षता प्रतिक्षेप्स्येति ।
न च स्वीकारादेव प्रतिहेतोः पराजयः स्यात्, सत्प्रतिपक्षतापरिहारोपायतया
स्वीकारस्य करणात् , स्वीकारे सति सम्भावनानिवृत्त्या तल्लक्षणकस्य सत्प्रतिपक्ष-
स्यापि निवृत्तेः । तस्मात् स्वीकारोऽप्ययं परस्यानिष्टार्थं सिद्धसाधने परकीय-
साध्यस्वीकारवद् गुणाय स्वीकर्तुर्न दोषायेति ।
यदि च सत्प्रतिपक्षे वादिनोः समानप्रतिपक्षदर्शनजनितात् स्वहेत्वाभासत्व-
संशयात्, तदा क्वचिदपि नास्ति सत्प्रतिपक्षता, स्वहेतुपक्षपातेन परहेतावेव दोषः
कश्चिदस्ति, मया तुन गृह्यत इति ताभ्यां मन्यमानत्वात् । यदाह—‘निश्चितौ हि
वादं कुरुतः’ इति ।
अर्थौचित्यादावर्जता संशयेन सत्प्रतिपक्षता स्यात्, तदा सर्वत्रैव वादे
जाने से सम्भावनाघटित उक्त लक्षण भी व्यावृत हो जायगा । तब इसी प्रकार सर्वत्र
वादी सत्प्रतिपक्ष का परिहार करेगा । अतः यह अच्छा हुआ कि सत्प्रतिपक्षहेतु का प्रति-
क्षेप न कर उसके स्वीकार से ही सत्प्रतिपक्ष का प्रतिक्षेप हो गया ।
समर्थन—वादी ने प्रतिहेतु का स्वीकार किया, इसीसे उसकी पराजय होगी ।
खण्डन—सत्प्रतिपक्षता के परिहार का उपायरूप से स्वीकार किया है, कारण स्वीकार
करने पर सत्प्रतिपक्षत्व भी निवृत्त हो जाता है । सत्प्रतिपक्षत्व का स्वीकार भी पर की
पराजय के लिए ही है, जैसे कि सिद्धसाधन में पर के साध्य का स्वीकार स्वीकर्ता के
लिए अत्यन्त उपकारक होता है, दोषकारक नहीं ।
किञ्च—यदि सत्प्रतिपक्ष का फल वादी, प्रतिवादी दोनों को ( प्रतिपक्ष-दर्शन से
जनित स्वहेतु में आभासत्वका संशय है, तो कहीं भी सत्प्रतिपक्षत्व नहीं होना चाहिए।
कारण स्वहेतु में ‘पक्षपात होने से परहेतु में ही कोई दोष होगा, हमें ज्ञात नहीं होता’
ऐसा दोनों मानेंगे । फिर सन्देह कैसे होगा ? कहा भी है कि ‘निश्चय में ही विवाद
करते हैं ।’
समर्थन—यद्यपि स्वहेतु में पक्षपात है; तथापि प्रतिहेतु का दर्शन होने पर उसके
उचित होने से ही स्वहेतु में आभासत्व का सन्देह संभव होने से सत्प्रतिपक्षता युक्त
ही है । खण्डन—तब तो सभी वादोंमें अनुमानमात्र में सत्प्रतिपक्षत्व दुर्निवार हो जायगा,