खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
किञ्च—प्रतीयमानता यदि निश्चीयमानता विवक्षिता, तदानीमसम्भव एव;
यतो विरुद्धार्थयोरेकस्यावश्यं दोषः, स च कस्यास्त्विति तदा निर्द्धारयितुमशक्य-
तया प्रतिहेतावपि तत्संशयात् । अथ सम्भावना प्रतीयमानता, तत्रोद्भावनसम्भावनां
दूषयन्तो यद्वक्ष्यामस्तदेव दूषणमतिदेष्टव्यम् ।
नापि द्वितीयतृतीयचतुर्थाः ; परबुद्धेरवधारणतया परस्यासिद्ध्यादिविरहित्व-
बुद्धिरत्र भविष्यतीत्यग्रेऽवधारयितुं प्रमाणाभावेनाशक्यत्वात् कथं सत्प्रतिपक्षतां
प्रतिज्ञाय व्युत्पादयेत् । शङ्कान्तरांश्च निरसिष्यामः ।
एतेन—असिद्धिविरोधकालात्ययापदेशव्यभिचारवत्तया व्याप्तिपक्षधर्मता-
विरहवत्तया वाऽगृह्यमाणेन बोधितसाध्यविपर्ययः सत्प्रतिपक्ष इति निरस्तम् ।
केनागृह्यमाणत्वमिति निर्वक्तुमशक्यत्वात् ।
किञ्च—यदि प्रतीति को निश्चयरूप कहें, तो असम्भव हो जायगा, कारण विरुद्ध
अर्थ के साधक दो हेतुओं में से एक हेतु में अवश्य दोष रहता है, पर वह किसमें है,
इसका निश्चय उस काल में नहीं रहता; अतः प्रतिहेतु में दोष का संशय ही रहता है।
यदि 'प्रतीति' से सम्भावना का ग्रहण करें, तो हम उद्भावना की सम्भावना के
खण्डन के प्रस्ताव में जो दोष देंगे, यहाँ भी उन्हीं दोषों को जानना चाहिए। अर्थात्
यदि संभावना दोषोद्भावन से पूर्वकालिकी विवक्षित हो, तो बाद में प्रतिहेतु-दोष कहने
पर भी पूर्वकालिक अनुद्भावना में कोई प्रतिबन्ध नहीं। अतः सभी हेत्वाभास सत्प्रतिपक्ष
हो जायँगे । यदि उद्भावना का जो अवसर हो, तात्कालिकी संभावना विवक्षित हो, तो
सत्प्रतिपक्षादि के उत्पादन-काल में वह नहीं है। एवञ्च विशेषण के अभाव से ही
लक्षण का अभाव हो जायगा, यह भाव है।
द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ कल्प भी युक्त नहीं हैं, कारण दूसरे को पर की बुद्धि का
अवधारण न होने से, 'पर की असिद्ध्यादिरहितत्व बुद्धि यहाँ होगी' इस अवधारण में
कुछ प्रमाण नहीं । अतः वह सत्प्रतिपक्ष की प्रतिज्ञा कर उसका व्युत्पादन कैसे करेगा ?
इस लक्षण की अन्य शङ्काओं का निरास आगे करेंगे ।
समर्थन—'असिद्ध, विरोध, कालात्ययापदेश और व्यभिचार से युक्तत्व रूप से तथा
व्यासिपक्षधर्मता-विरहितत्वरूप से अगृह्यमाण प्रतिहेतु से बोधित है साध्य-विपर्यय जिस
हेतु का, वह सत्प्रतिपक्ष है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यह लक्षण भी खण्डित
है, कारण इस लक्षण में 'किससे अगृह्यमाण हो ? इत्यादि विकल्पक पूर्वोक्त दोष विद्य-
मान ही हैं ।