खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
तथापि प्रमाणेन बोधितविपर्ययो विषयो यस्य स कालात्ययापदिष्ट इति ।
न; 'इदं रजतमिति शुक्तिंविषयीकुर्वति प्रत्यक्षाभासे 'नेदं रजतमिति प्रमाणेन
बाध्यमानेऽपि हेत्वाभासविशेषलक्षणमिदं गच्छदतिव्यापकतामापद्येत । एवं
बाध्यविषयिण्यामिच्छायामपि गच्छेत् ।
प्रमाणेन बोधितो यदीयविषयस्यान्यथाभावः स हेतुः कालात्ययापदिष्ट इति
चेन्न । यदि मुख्यार्थो हेतुशब्दः, तदा हेत्वाभासत्वव्याघातः । अथामुख्यार्थस्तदा
कोऽस्यार्थः, यत्रैष व्यवस्थाप्यते इति सोऽभिधातव्यः ।
प्रमाणेन बोधितो यदीयविषयस्य व्यतिरेकः, स हेत्वाभासः कालात्ययापदिष्ट
इति चेन्न । यद्यग्रे हेत्वाभासत्वानिश्चयस्तदा लक्षणस्य दुरवधारणत्वम् । अथ
कालात्ययापदिष्टत्वे निरूपित एव हेत्वाभासत्वनिर्णयस्तदा तत एव दुष्टत्वसिद्धेः
कृतं पश्चात्प्रतीतिकस्य कालात्ययापदेशस्योपन्यासेनेति ।
निर्वचन—तब भी प्रमाण से बोधित है साध्य का अभाव जिसका, वह कालात्यया-
पदिष्ट है ।' खण्डन-यह युक्त नहीं, कारण जहाँ 'नेदम् रजतम्' इस प्रत्यक्ष प्रमाण
से शुक्ति को विषय करनेवाले 'इदं रजतम्' इस प्रत्यक्षाभास का बाध होता है, वहाँ
इस हेत्वाभास-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । इसी प्रकार से जहाँ 'परस्त्रियं न
गच्छेत्' इस शब्द से उत्पन्न बोध से परदारा में सुभ्रूत्वादि के अभ्यास से जनित 'परस्त्रियं
न गच्छेयम्' इस इच्छाका बाध होता है, वहाँ बाधित इच्छा में भी अतिव्याप्ति
हो जायगी ।
समर्थन—'प्रमाण से यदीय साध्यका अन्यथाभाव, बोधित है, वह हेतु कालात्यया-
पदिष्ट है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन-इस लक्षण में 'हेतु' शब्द यदि मुख्यार्थक
अर्थात् 'व्याप्तिपक्षधर्मताविशिष्ट' अर्थ को बोधित करता है, तो उसमें हेत्वाभासत्व का
व्याघात हो जायगा, कारण हेतु हेत्वाभास नहीं हो सकता । यदि वह मुख्यार्थपरक न हो,
तो उसका क्या अर्थ है, जिसमें यह 'हेतु' शब्द व्यवस्थित हो, यह आप बतायें ।
यदि कहें कि 'प्रमाण से जिसके विषय का व्यतिरेक बोधित है वह हेत्वाभास
कालात्ययापदिष्ट है', तो यह युक्त नहीं । कारण यदि प्रथम से हेत्वाभास का निश्चय न
हो, तो लक्षण का ज्ञान ही न होगा। और यदि कालात्ययापदिष्ट की अनिश्चय-दशा में
ही हेत्वाभासत्व का निश्चय हो, तो उसीसे हेतु में दुष्टत्व सिद्ध है। अतः जिसकी पश्चात्
प्रतीति है, उस कालात्ययापदिष्ट का उपन्यास व्यर्थ है ।